संसद पर 22 साल पहले हुआ हमला और सुरक्षा में हालिया चूक: सरकार और विपक्ष, तब और अब

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- Author, कीर्ति दुबे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कुछ दिनों पहले 13 दिसंबर को चार लोगों ने संसद में प्रवेश किया, वे मुख्य हॉल में कूद गए. इन लोगों ने यहां पीले रंग का धुआँ छोड़ा. उसी समय संसद के बाहर भी दो लोगों ने नारेबाज़ी की, इन सभी को गिरफ़्तार कर लिया गया.
जो प्रदर्शनकारी संसद के भीतर घुसे उन्होंने बीजेपी के मैसूरु से सांसद प्रताप सिम्हा के ज़रिए विज़िटर पास हासिल किया था. अब तक बीजेपी सांसद प्रताप सिम्हा पर किसी तरह की कोई कार्रवाई तो दूर, उनसे किसी तरह की पूछताछ की बात भी सामने नहीं आई है.
इस वाकये ने देश की सबसे अहम इमारत के सुरक्षा पर तो सवाल उठाए ही, उसके बाद जो कुछ हुआ उसे 'लोकतंत्र की हत्या' की संज्ञा दी जा रही है.
संसद की सुरक्षा में चूक ही 146 सासंदों के निलंबन की पृष्ठभूमि है. जब संसद में ये सब हुआ उस दिन अमित शाह और पीएम मोदी मध्य प्रदेश में नए मुख्यमंत्री मोहन यादव के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने के लिए भोपाल में थे.
घटना के बाद से विपक्ष के नेता ये मांग कर रहे थे कि गृह मंत्री इस सुरक्षा चूक पर सदन में बयान दें, उसी माँग के तेज़ होने के बाद विपक्षी सांसदों के सामूहिक निलंबन की कार्रवाई हुई, निलंबन का कारण 'हंगामा करना और सदन के काम में बाधा डालना' बताया गया.
वाजपेयी के दौर में क्या हुआ था?
भारतीय संसद ने अतीत में एक भयानक हमला देखा है. 13 दिसंबर, 2001 को संसद पर हमला हुआ था. जिसमें नौ लोगों की मौत हुई. 22 साल बाद इस हमले की बरसी पर संसद में प्रदर्शनकारी घुसे, हालांकि ये हमला तो नहीं था लेकिन ये सुरक्षा में हुई बड़ी चूक थी.
कांग्रेस सांसद अधीर रंजन चौधरी ने लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला को एक चिट्ठी लिखकर कहा कि 2001 और 2023 में जो हुआ है वो दोनों अलग तरह की घटनाएं हैं, लेकिन इस मामले ने भी देश की "उस संस्था की सुरक्षा पर सवाल खड़े गए हैं जो हमारे लोकतंत्र के केंद्र में है. जब 2001 में संसद पर हमला हुआ था तो लालकृष्ण आडवाणी जी ने संसद में विस्तृत बयान दिया था, और विपक्ष उनके साथ खड़ा था. आज के संदर्भ में ये उचित होगा कि गृह मंत्री सुरक्षा में हुई चूक पर सदन में बयान दें."
विपक्ष यही मांग कर रहा है और इस मांग को लेकर हंगामा करने के आरोप में सांसद निलंबित कर दिए गए हैं.
इन सांसदों पर आरोप है कि उन्होंने सदन में प्लेकार्ड लहराए, वेल में घुसकर नारेबाज़ी की और सदन के नियमों का उल्लंघन किया.
दोनों सदनों को मिलाकर 146 सांसद निलंबित हैं जो संसद से बाहर प्रदर्शन कर रहे हैं जबकि सरकार ने लोकसभा से कई अहम क़ानून बिना किसी बहस के पारित घोषित कर दिए हैं.
पीएम और गृह मंत्री ने अब तक क्या कहा है?

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में तो नहीं, लेकिन एक हिंदी अख़बार दैनिक जागरण को दिए एक इंटरव्यू में लोकसभा की सुरक्षा में हुई चूक पर बात की. उन्होंने कहा, "संसद में जो घटना हुई उसकी गंभीरता को ज़रा भी कम नहीं आंकना चाहिए इसलिए स्पीकर महोदय पूरी गंभीरता के साथ आवश्यक कदम उठा रहे हैं. जांच एजेंसियां सख्ती से जांच कर रही हैं. इसके पीछे कौन से तत्व हैं, क्या मंसूबे हैं, इसकी गहराई में जाना जरूरी है. एक मन से समाधान के रास्ते भी खोजने चाहिए. ऐसे विषयों पर वाद-विवाद या प्रतिरोध से सभी को बचना चाहिए."
गृह मंत्री अमित शाह ने एक न्यूज़ चैनल के इवेंट पर बात करते हुए कहा था कि "लोकसभा इस मामले में जांच कर रही है. सबको पता है कि लोकसभा की सुरक्षा स्पीकर के क्षेत्राधिकार में आती है. स्पीकर ने गृह मंत्रालय को चिट्ठी लिखी है और हमने एक पूछताछ कमेटी गठित कर दी है, ये रिपोर्ट जल्द स्पीकर को सौंप दी जाएगी."
गृहमंत्री अमित शाह ने संसद में बयान तो नहीं दिया लेकिन सदन में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सरकार की ओर से बयान दिया.
उन्होने सभी सांसदों को किसी को भी प्रवेश पास जारी करने के प्रति आगाह किया और कहा कि "दुर्भाग्यपूर्ण घटना की हम सभी ने निंदा की है और स्पीकर ने इसका संज्ञान लेते हुए जांच के आदेश दिए हैं."
वाजपेयी सरकार और 22 साल पहले संसद पर हमला

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13 दिसंबर, 2001, उस समय की तत्कालीन एनडीए सरकार ने संसद पर गंभीर हमले पर किस तरह की राजनीतिक चर्चा की, आखिर उस समय सदन के शीतकालीन सत्र का माहौल क्या था?
यही समझने के लिए हमने उस समय के आधिकारिक बयानों को खोजा ताकि ये समझा जा सके कि अतीत में सरकार और विपक्ष का रवैया कैसा था.
18 दिसंबर, 2001 यानी संसद में हुए हमले के पाँचवे दिन तत्कालीन गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने न सिर्फ़ सदन पर हमले को लेकर बयान दिया था बल्कि जाँच में क्या निकल कर आया इसकी विस्तृत जानकारी दी थी.
सदन में तब के गृह मंत्री ने कहा, "बीते सप्ताह संसद पर हुआ हमला 20 साल से जारी पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद का सबसे बड़ा हमला है. भारत के सभी शीर्ष नेताओं को ख़त्म करने की कोशिश की गई. इस मामले में भारत स्थित पाकिस्तान हाई कमीशन को सम्मन किया गया है."
मोदी सरकार और वाजपेयी सरकार- दोनों ही सरकारें संसद की सुरक्षा को लेकर सवालों के घेरे में रही लेकिन दोनों ही सरकारों के जवाब और इस पूरे मुद्दे पर उनके रुख़ में किस तरह का अंतर है ये समझने के लिए हमने उन पत्रकारों से बात की जिन्होंने साल 2001 में हुए संसद पर हुए हमले के दौरान पॉलिटिकल रिपोर्टिंग की और मौजूदा राजनीतिक घटनाक्रम को भी देख रहे हैं.
वरिष्ठ पत्रकार और न्यूज़ वेबसाइट 'द वायर' की एडिटर सीमा चिश्ती ने बतौर पत्रकार संसद हमले को कवर किया है.
वो कहती हैं, "मैं ये नहीं कहूंगी कि वो सरकार हर लोकतांत्रिक मूल्य का निर्वाह करती थी लेकिन अभी जो संसद में हो रहा है वो पूरी तरह से लोकतंत्र का मज़ाक है. बीजेपी की संसदीय बैठक में पीएम इस पर बात कर रहे हैं, अखबारों से बात कर ले रहे हैं. लेकिन उनको सदन में इस पर बात नहीं करनी. जवाबदेही किसकी है? पहले जब रेल दुर्घटनाओं पर रेल मंत्री इस्तीफ़ा देते थे तो इसलिए नहीं देते थे कि वो रेलवे में लॉकिंग-इंटरलॉकिंग किया करते थे बल्कि वे जवाबदेही के नाते ऐसा करते थे जो लोकतंत्र में बहुत ज़रूरी है."
अटल बिहारी वाजपेयी के दो बयान

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वरिष्ठ पत्रकार अदिति फडणीस ने भी बतौर पॉलिटिकल रिपोर्टर 2001 के संसद हमले को कवर किया है.
वे कहती हैं, "अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के समय में कई गंभीर घटनाएं हुई थीं, संसद पर हमला हुआ, प्लेन हाईजैक हुआ, आतंकवादियों को छोड़ना पड़ा. लेकिन वो सरकार सदन में चर्चा को लेकर बहुत सहज थी. विस्तृत बयान दिए जाते थे, मुद्दों पर चर्चा भी होती थी लेकिन अब इस सरकार में कुछ नहीं होता. इसकी वजह ये है कि ये सरकार ऐसा कर सकती है, तो वो कर रही है."
कुछ लोगों का आरोप है कि सरकार इस सत्र में आने वाले बिलों पर चर्चा नहीं चाहती थी इसलिए बड़े पैमाने पर निलंबन किए गए?
अदिति फडणीस इस तरह की दलीलों से इत्तेफ़ाक नही रखतीं वो कहती हैं, "इस सरकार के पास इतने नंबर्स हैं कि वो अपने दम पर सदन में बिल पास करा सकती थी."
सीमा चिश्ती भी यही मानती हैं कि इस सरकार के पास सदन में बिल पास कराना कोई बड़ी चुनौती नहीं है.

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वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई कहते हैं, "जिन्होंने भी नरेंद्र मोदी का कामकाज बतौर गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में देखा है उसे इस सरकार के रवैये पर ज्यादा आश्चर्य नहीं होगा. यही उनका तरीका है. वो मानते हैं कि सरकार हमारी है और हम बताएंगे सदन कैसे चलेगा. हालांकि ये लोकतांत्रिक तरीका नहीं है लेकिन इस सरकार का यही तरीका है-माई वे, ऑर हाइवे. लेकिन तब के विपक्ष और अब के विपक्ष में भी काफ़ी फ़र्क है, अब विपक्ष में भी बात करने की मंशा नहीं दिखती."
विपक्ष के जवाब मांगने का तरीका गलत है, इस बात को सीमा चिश्ती सही नहीं मानती. वे कहती हैं, "एक नया तर्क आ गया है जिसमें लोग विपक्ष को निकम्मा बताकर सरकार को बचाने की कोशिश करते हैं. लोकतंत्र को लेकर लिबरल और विकसित देशों में कहा जाता है-'लेट द ऑपोज़िशन हैव इट से, द गवर्नमेंट हैज़ इट वे'- मतलब विपक्ष को अपनी बात कहने दें, सत्ता पक्ष के पास बहुमत तो है ही."
सीमा चिश्ती कहती हैं कि "अब ऐसा समय आ गया है जब विपक्ष आरोप लगा रहा है कि उनका माइक बंद कर दिया जाता है, कैमरे पर नहीं दिखाया जाता, उनका बोलने का समय काट दिया जाता है.
वे कहती हैं, "लंबे समय से हम देख रहे हैं कि देश को लोकतांत्रिक बनाए रखने के लिए ज़िम्मेदार संस्थाओं को ख़त्म करने के आरोप लग रहे हैं."
जब सोनिया ने वाजपेयी को हमले के तुरंत बाद किया कॉल

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उस समय देश की राजनीति वर्तमान राजनीति से कितनी अलग थी उसका अंदाज़ा इस बात से लगाइए कि जब संसद पर हमला हुआ तो तत्कलीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने तब के पीएम अटल बिहारी वाजपेयी को पहला फोन किया.
'हिंदुस्तान टाइम्स' के पॉलिटिकल एडिटर विनोद शर्मा ने इस वाकये को याद करते हुए एक कार्यक्रम में कहा था, "जब साल 2001 में संसद पर हमला हुआ तो अटल बिहारी वाजपेयी सदन में थे और तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी हमला होने से पहले घर लौट चुकी थीं लेकिन जैसे ही उन्हें संसद में हमले की जानकारी मिली उन्होंने सबसे पहला फोन कॉल अटल बिहारी वाजपेयी को किया और ये सुनिश्चित किया कि वो सुरक्षित हैं. ये बात मुझे सोनिया गांधी जी ने बताई थी."
सांसदों का सामूहिक निलंबन पहली बार नहीं
इतिहास में भी ऐसे वाकए हुए हैं जब बड़ी संख्या में सांसदों को निलंबित किया गया. साल 1989, जब लोकसभा से 63 सासंदों को एक ही दिन में निलंबित कर दिया गया था.
दरअसल, हुआ ये था कि 15 दिसंबर,1989 को ठक्कर कमीशन की रिपोर्ट आई थी. ये रिपोर्ट पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या को लेकर थी, इसके बाद 63 सांसदों को सदन न चलने देने के आरोप में निलंबित कर दिया गया. ये सांसद इस रिपोर्ट पर बहस की माँग कर रहे थे.
14 दिसंबर को एक अख़बार ने छापा कि ठक्कर कमेटी की रिपोर्ट में कहा गया है कि इंदिरा गाँधी की हत्या की साजिश में कांग्रेस नेता आरके धवन भी कथित रूप से शामिल थे. जब सदन की कार्यवाही 14 दिसंबर को शुरू हुई तो जनता दल के सांसद एस जयपाल रेड्डी ने प्रश्नकाल स्थगित करने और उस रिपोर्ट पर चर्चा की मांग की.

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तत्कालीन लोकसभा स्पीकर बलराम जाखड़ ने तब कहा कि प्रश्नकाल सस्पेंड नहीं किया जा सकता क्योंकि किसी ने भी निलंबन का प्रस्ताव नहीं दिया है और वह सदन को किसी न्यूज़पेपर में छपी किसी भी रिपोर्ट पर चर्चा करने की अनुमति नहीं दे सकते.
इसके बाद सांसदों ने अपनी मांग जारी रखी और अगले दिन 63 सांसदों को सदन से बाहर कर दिया गया.
राजदीप कहते हैं, "मुझे याद नहीं कभी अतीत में 146 सांसदों का निलंबन हुआ हो. 1989 में 63 सासंद निकाले गए थे लेकिन इतनी बड़ी संख्या कभी नहीं रही."
लेकिन वो इस तरह के बर्ताव के पीछे का कारण सरकारों को मिले भारी बहुमत को मानते हैं.
राजदीप कहते हैं, "ये चलन बीते 10-15 साल में बढ़ा है. चूंकि मनमोहन सिंह की सरकार गठबंधन की सरकार थी तो उसे सबको साथ में लेकर चलना मजबूरी थी लेकिन जब राजीव गाँधी की सरकार पूर्ण बहुमत वाली थी तो उनका की रवैया सख्त था. मुझे लगता है कि जब-जब सरकार के पास बड़ा बहुमत होगा वो इस तरह से ही व्यवहार करेगी."
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