राजस्थान में किसका होगा राज, शिवराज और रमन सिंह के बाद क्या अब वसुंधरा की बारी है?

इमेज स्रोत, Getty Images
- Author, त्रिभुवन
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
राजस्थान भाजपा में मुख्यमंत्री पद को लेकर चल रही कयासबाज़ियों के सारे पैमाने छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के फ़ैसलों ने उलट दिए हैं.
भाजपा हाईकमान के इन फ़ैसलों ने विधायक चुने जाने तक की आकांक्षाओं के आगे सपने में भी न सोच पाने वाले चेहरों के दिलों में सियासी हुस्न के अक्स छलका दिए हैं.
किसी ने सियासी सिंगारदान तो किसी ने आँखों की पलकों पर दिवास्वप्न के दर्पण सजा लिये हैं.
ऐसे विधायक जो गुलाबी नगरी में पहली बार निर्वाचित होकर आने के बाद गुम होने का अहसास करते थे, अब उन्हें लगता है कि इस जगह से तो सीधा मुख्यमंत्री पद के लिए शपथग्रण का रास्ता निकलता है.
ख़ासकर ऐसे समय जब छत्तीसगढ़ में एक आदिवासी नेता को मुख्यमंत्री बनाया गया है और मध्य प्रदेश में महज तीसरी बार के विधायक को महज़ दस साल के विधायी सफ़र में सबसे बड़ा पद सौंप दिया गया है.
राजस्थान के नव-विर्चाचित विधायक हों या संगठन से जुड़े लोग, स्कूल-कॉलेज या विश्वविद्यालयों के परिसर हों या व्यापारिक संगठनों के गप्पबाज़ी वाले अड्डे, कॉफ़ी शॉप्स हों या सियासी गलियारे, हर जगह तरह-तरह के क़िस्से तैर रहे हैं और उनके माध्यम से राजस्थान के हालात को जानना एक अलग नज़रिया मिलता है.
देखते-देखते हैरान कर देने वाले नज़ारे दिखते हैं.
एक विधायक के मुरीद के फोन पर कॉल आती है. वह पूछता है कि कल किसे शपथ दिलवा रहे हैं. विधायक जवाब देते हैं, तू पूछ मत. ज़मीन पर पांव ही नहीं पड़ रहे. उस समय वाक़ई उनका फोन और हाथ कांप रहा है.
वे कहते हैं, मैं भी तो ...हूँ, मैं भी तो ...हूँ और मैं भी तो ...हूँ! तो बता मैं क्यों नहीं शपथ ले सकता. मोहन यादव को भी तो कहाँ पता था कि उसका नंबर आ रहा है!
भाजपा हाईकमान के ताज़ा फ़ैसलों ने विधायकों के दिलों की हालत वो कर दी है कि इस सियासत में बारिश वो बरसती है कि भर जाते हैं जल-थल, देखो तो कहीं अब्र का टुकड़ा नहीं होता.
आइए, बीजेपी ऑफ़िस और विधायकों के ठिकानों के आसपास टहलते हैं.
दृश्य एक : राजस्थान में एसटी और ओबीसी की फ़ाइल बंद...

इमेज स्रोत, ANI
पहला: अरे, मध्यप्रदेश में तो मोहन यादव को सीएम बनाया है.
दूसरा: लो, अपने यहाँ तो हो गई दो की फ़ाइल एक साथ बंद!
पहला: एक तो बाबा; क्योंकि वह यादव है और दो स्टेट में यादव तो कैसे होंगे; लेकिन दूसरा कौन?
दूसरा: अरे भाई शिवराज सिंह को भी तो निबटा दिया. मतलब साफ़ है कि न तो पहले सीएम रहे रमन सिंह को बनाया और न बनाया शिवराज सिंह को. यानी हमारे यहाँ भी किसी नए चेहरे पर ही दांव खेलेंगे! यानी मैडम के मुख्यमंत्री बनने की संभावना तो अब न के बराबर है.
पहला: इसका मतलब दो की नहीं, तीन की फ़ाइल बंद. छत्तीसगढ़ में एसटी बना है तो फिर राजस्थान में भी एसटी की संभावना नहीं है.
दूसरा: हाँ, ये भी है. डागदर साब (डॉक्टर किरोड़ीलाल मीणा) की संभावना ज़्यादा तो नहीं थी; लेकिन लगता था कि शायद बन जाएं. अब तो नहीं.
पहला: इस हिसाब से ये भी है कि अब राजस्थान में ओबीसी वाला कार्ड भी शायद ही चले. लगता है, जनरल की राहें खुल गई हैं.
दृश्य दो: कश्तियां बनाने वाले डूब रहे हैं ...

इमेज स्रोत, Getty Images
पहला: एमपी-सीजी के बाद अब आपको अपने यहाँ क्या लगता है?
दूसरा: ओबीसी और एसटी का चैप्टर तो क्लोज़ हुआ. अब जनरल में से ही आएगा.
पहला: तो कौन?
दूसरा: ओम बिड़ला हो सकते हैं, गजेंद्रसिंह संभव हैं. सुनील बंसल हैं. अनिल वैष्णव भी हैं.
पहला: लेकिन छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में तो मौजूदा विधायकों में से चयन किया है. लगता है, विधायकों में से ही कोई होगा.
दूसरा: फिर तो दीया कुमारी हो सकती हैं.
पहला: दीया ही क्यों? वसुंधरा राजे क्यों नहीं! आख़िर उनके यहाँ कितनी भीड़ उमड़ रही है. विधायक भी उनसे ख़ूब ही मिल रहे हैं.
दूसरा: बात आपकी ठीक है. लेकिन मोदी-शाह के युग में तो कश्तियां बनाने वाले ही डूब रहे हैं. इसलिए दीया बनती हैं तो महिला की जगह महिला हो गईं. राजघराने की जगह राजघराना हो गया और राजपूत की जगह राजपूत भी. वे भी जब सीएम बनीं तो 52 की थीं और ये भी इतनी ही हैं. और फिर धौलपुर राजघराने से जयपुर का राजघराना कहीं बड़ा रहा है.
दृश्य तीन: खेल तो अब गया है महारानी के पक्ष में

इमेज स्रोत, Getty Images
पहला: आज एमपी में जो हुआ है, उसके बाद मुझे तो लगता है कि खेल महारानी के पक्ष में चला गया है.
दूसरा: कैसे? कैसे? जरा समझाइए तो!
पहला: एक तो किसी भी जगह महिला को नहीं बनाया गया है. दूसरे, वे एसटी और ओबीसी के दायरे भी बाहर हैं और तीसरे विधायकों ने जैसा उनका साथ दिया, वैसा न छत्तीसगढ़ में हुआ और न ही मध्य प्रदेश में. और जैसे तरफ़दार उनके हैं, वैसे एमपी-सीजी वालों के नहीं थे.
दूसरा: यह मोदी-शाह का ज़माना है भाई. इससे पहले किसी के तरफ़दार हुआ करते थे. अब न कोई तरफ़दार बचा है और न ही अब कोई साहब-ए-किरदार हुआ करता है. अब वह ज़माना भी गुज़र गया है, जिसमें उसी को हक़ मिलता है, जो हक़दार हुआ करता है. अब तो एक नया ही सियासी ज़माना शुरू हो गया है.
पहला: वह क्या?
दूसरा: वह यह कि विधायकों में से किसी ऐसे को मुख्यमंत्री बना दो, जिसने ख़ुद कभी ख़्वाब में भी न सोचा हो. यह मैसेज वाली सियासत है. यानी आम लोग सोचेंगे, भाजपा से जुड़ो, दस-पंद्रह साल सलीके़ का काम करो और मुख्यमंत्री बन जाओ. कांग्रेस में पहले तो किसी आम आदमी की पहुँच गांधी-नेहरू खानदान तक होती नहीं और दूसरे हो भी जाए तो वहाँ दरवाज़े पर ओल्ड गार्डों के रहते पूरी ज़िंदगी तन्हा रात हो जाती है. पायलट, सिंधिया, जितिन प्रसाद की कहानी तो सबको पता है.
पहला: तुम्हारी बात में तो दम है. लेकिन मुझे तो अब भी महारानी भारी लगती हैं.
दूसरा: क्यों?
पहला: क्योंकि ये सिर्फ़ एलएलए को ही बना रहे हैं और केंद्रीय मंत्रियों को नहीं भेज रहे. मैडम जनरल क्या, सुपर जनरल हैं. वो जाट की बहू और गुर्जरों की समधन हैं. दो जातियों को एक साथ साधती हैं और उन जैसी ग्लोरी किसी की भी नहीं.
दूसरा: लेकिन वे भी अशोक गहलोत की तरह सरकार तो रिपीट नहीं ही कर पा रहीं न! यही बात बदलाव की वजह है.
दृश्य चार: जिसे देखा ही नहीं, उससे ख़फ़ा क्या होना!

इमेज स्रोत, Getty Images
पहला: मुझे लगता है, सनातन धर्म में ओम से ही सब शुरू होता है और यहाँ भी ओम ही होंगे! तो ओम बिड़ला सबसे अधिक संभावित लगते हैं.
दूसरा: देखो, राजपूत हुए तो गजेंद्रसिंह शेखावत का बनना तय है. दिल्ली ने उन्हें कुछ साल पहले स्टेट प्रेजिडेंट बनाकर भेजने की तैयारियां की थीं. लेकिन उन्हें हाथ भी नहीं धरने दिया. अब संदेश होगा कि पहले स्टेट प्रेजिडेंट नहीं बन पाए, लेकिन अब सीएम बना दिया.
पहला: हो सकता है. लेकिन वे स्टेट से भी तो कुछ पूछेंगे?
दूसरा: अब स्टेट को कौन पूछता है! गए ज़माने.
पहला: लेकिन दोनों स्टेट्स को देखकर तो यही लगता है कि उन्हें लोकसभा की चिंता है और वे इस चुनाव को आसानी से निकाल लेना चाहते हैं. 2024 के चुनाव में राइटमैन को चुनने की राह है. किसी पुराने को चुनेंगे तो जाने कौन क्या प्रतिक्रिया दे; सीएम पद के इतने सारे कैंडिडेट हैं और जाने कौन नाराज़ हो और कौन खु़श. लेकिन जिसे देखा ही नहीं, जिसे ठीक से जाना ही नहीं, उससे ख़फ़ा क्या होना!
दूसरा: तो चुनाव की स्क्रिप्ट पर नए चेहरों पर ही दांव होगा.
दृश्य पाँच: तो क्या ये सब सियासी चेहरे फ़ना हो जाएंगे?

इमेज स्रोत, ANI
पहला: एक बात बताओ. जैसे छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में हुआ है, वही का वही हमारे यहाँ भी हुआ तो क्या होगा? क्या मैडम चुप रह जाएंगी?
दूसरा: तो क्या करेंगी?
पहला: कुछ तो कर ही सकती हैं. वे कितनी पुरउम्मीद हैं. और राजस्थान में उनकी इतनी पहचान भी तो है. उनकी नाराज़गी तो भारी रहेगी ना. इतने तो विधायक उनके साथ हैं! और वो न तो रमन सिंह हैं और न ही शिवराज. लोग उन्हें वसुंधरा राजे कहते हैं. उनके तेवर किसने नहीं देखे!
दूसरा: देखिए, उन्होंने कुछ करना होता तो वे पहले ही कर देतीं. तो जो पहले न करने का कारण था, वही कारण अब भी है कुछ नहीं करने का. कई बार आँख से ऑँसू भी निकलता है और किसी दिखता भी नहीं. इश्क़ और सियासत में वक़्त के साथ बहुत कुछ हवा हो जाता है.
पहला: तो क्या सियासत के ये सब चेहरे फ़ना हो जाएंगे?
दूसरा: सवाल तो यही है. इसका जवाब मंगलवार 12 दिसंबर को मिलेगा और देखना कि सियासत से क्या-क्या ज़ुदा होता है, किस-किस के दामन की ख़ुशबू बिछड़ती है और किस-किस की सूखी टहनी पर रंगे-गुल पंख फड़फड़ाकर आ बैठते हैं!
और अंत में...

इमेज स्रोत, Getty Images
मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के फ़ैसलों ने अब एससी वर्ग की अनीता भदेल और डॉ. मंजू बाघमार के नाम भी हवा में तैरा दिए हैं. मध्य प्रदेश का फ़ैसला होते ही लोगों की निगाहों में कभी मदन दिलवार आए तो कभी नज़रें वासुदेव देवनानी पर जा टिकीं.
और तो और, संघ से जुड़े पुराने नेता और एससी विधायक जोगेश्वर गर्ग को तो सफ़ाई देनी पड़ी कि उनका नाम कहीं नहीं हैं और वे दावेदार भी नहीं हैं.
अभी दो दिन पहले बाबा बालकनाथ ने भी कहा कि उन्हें अभी बहुत अनुभव लेने हैं और बहुत कुछ सीखना है. वे सीएम पद के दावेदार नहीं हैं.
इन संभावनाओं को देखते हुए बहुत से लोग बहुत से नामों पर उलझते हुए दिखाई दिए; लेकिन लोगों को कौन समझाए कि आँखों को नए फूलों की रंगत हमेशा भली लगती है; भले पुराने ज़मज़मे कानों में गूंजते कितने ही अच्छे क्यों न लगते हों!
और राजस्थान की सियासत में अब वे घड़ियां आ गई हैं, जहाँ किसी जाने या अनजाने से चेहरे का नाम सुनने का सुख किसी को सियासत की ज़बान में सबसे मुमताज़ लग सकता है और उसे वह तमाशा नज़र आ सकता है, जिसकी सियासत का सारा शीराज़ा एक लम्हे में बिखर सकता है!
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)















