इसराइल और हमास क्या युद्ध अपराधों को अंजाम दे रहे हैं?

ग़ज़ा

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    • Author, ऑन्या गालागर
    • पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस

फ़लस्तीनियों की मौत के बढ़ते आंकड़े के बीच, एमनेस्टी इंटरनेशनल और ह्यूमन राइट्स वॉच जैसे मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि इसराइल ग़ज़ा में रहने वाले लोगों को 'सामूहिक सज़ा' देते हुए 'युद्ध अपराधों' को अंजाम दे रहा है.

इसराइल कहता है कि उसे आत्मरक्षा का अधिकार है और वह चरमपंथी संगठन हमास को तबाह करना चाहता है. सात अक्टूबर को हमास के हमले में अपने 1400 से ज़्यादा नागरिकों की मौत और 200 को बंधक बनाए जाने के बाद से ही इसराइल लगातार ग़ज़ा पर हवाई हमले कर रहा है.

संयुक्त राष्ट्र और मानवाधिकार संगठनों ने हमास के हमले की आलोचना की है, मगर साथ ही इसराइल से संयम दिखाने को भी कहा है.

हमास स्वास्थ्य मंत्रालय का कहना है कि इसराइली हमलों से ग़ज़ा में अब तक 10 हज़ार से ज़्यादा लोग मारे गए हैं.

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने कहा है कि ग़ज़ा बच्चों की कब्रगाह बनता जा रहा है.

क्या है 'अंतरराष्ट्रीय मानवीय क़ानून'

संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि किसी भी संघर्ष के दौरान आम लोगों की सुरक्षा सबसे अहम है और कोई भी पक्ष क़ानून से ऊपर नहीं है.

इसी को अंतरराष्ट्रीय मानवीय क़ानून या इंटरनेशनल हम्यूमैनिटेरियन लॉ (आईएचएल) कहा जाता है.

एसेक्स लॉ स्कूल एंड ह्यूमन राइट्स सेंटर में एसोसिएट प्रोफ़ेसर तारा वान हो कहती हैं, “एक पक्ष अगर इस क़ानून का उल्लंघन करता है, तो दूसरे पक्ष को भी उल्लंघन का बहाना नहीं मिल जाता.”

वह कहती हैं, “इसराइल और फ़लस्तीनी सरकार व हमास की ताक़त में समानता या असामता होने से किसी भी पक्ष की ज़िम्मेदारी कम नहीं हो जाती.”

टैंक

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इमेज कैप्शन, ये क़ानून देशों और नॉन स्टेट एक्टर, दोनों पर लागू होते हैं

'जिनेवा कन्वेंशन्स' क्या हैं

दूसरे विश्व युद्ध के दौरान यूरोप में 1939 से 1945 तक नाज़ियों ने 60 लाख यहूदियों की हत्या कर दी थी.

इस युद्ध के दौरान हुए जानमाल के भारी नुक़सान ने मानवीय क़ानूनों और संयुक्त राष्ट्र की स्थापना की नींव डाली थी.

1949 जिनेवा कन्वेंशन के चार अहम सिद्धांत हैं:

  • युद्ध वाले इलाक़ों में अस्पतालों और स्वास्थ्यकर्मियों की रक्षा की जानी चाहिए और उन्हें खुलकर काम करने देना चाहिए.
  • युद्ध में घायल होने वालों और हथियार डालने वालों का इलाज किया जाना चाहिए.
  • युद्धबंदियों के साथ मानवीय व्यवहार किया जाए.
  • युद्ध करने वाले पक्षों पर आम नागरिकों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी है. (इसमें नागरिक इन्फ्रास्ट्रक्चर, जैसे कि बिजली और पानी की सप्लाई को निशाना बनाने पर रोक भी शामिल है.)
ऑशविज़

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इमेज कैप्शन, ऑशविज़ में लाखों यहूदियों को गैस चैंबर में डालकर मार डाला गया था.

'जनसंहार' क्या है

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जेनोसाइड (Genocide) को हिंदी में जनसंहार कहा जाता है. जेनोसाइड शब्द पोलैंड के एक यहूदी वकील रफाएल लेमकिन ने गढ़ा था, जिन्होंने होलोकॉस्ट (यहूदी जनसंहार) में अपने परिवार के ज़्यादातर सदस्य खो दिए थे.

संयुक्त राष्ट्र ने साल1948 में 'जेनोसाइड कन्वेंशन' अपनाया था.

डॉक्टर वान हो कहती हैं, “जनसंहार की सबसे ख़ास बात यह है कि हमलावर सिर्फ़ एक व्यक्ति या सैन्य अथवा हथियारबंद समूह के सदस्यों को मारने का इरादा नहीं रखते, बल्कि वे एक विशेष पहचान रङने वाले पूरे समूह या उसके एक भाग का अस्तित्व ही मिटा देना चाहते हैं.”

वह कहती हैं, “तबाह करने की ऐसी मंशा के चलते ही यह साबित करने के लिहाज़ से सबसे मुश्किल अंतरराष्ट्रीय अपराध है.”

जनसंहार में मारना, बच्चे पैदा करने से रोकना और जबरन बच्चों को उनके परिवारों से अलग करना भी शामिल है.

रवांडा के हुतू ज्यां-पॉल अकायेसु को संयुक्त राष्ट्र के तहत आने वाले अंतरराष्ट्रीय क्रिमिनल ट्राइब्यूनल फ़ॉर रवांडा ने साल 1998 में जरसंहार का दोषी पाया था. यह इस क़ानून के तहत दोषी पाए जाने का पहला मामला था. पुतू पर बड़े पैमाने पर तुत्सी समुदाय के लोगों की हत्या का आरोप था. रवांडा में छह लाख तुत्सी मारे गए थे.

संयुक्त राष्ट्र समर्थित अदालतों में जनसंहार के दो और मामले चले थे. पहला मामला 70 के दशक का था, जब कंबोडिया के खमेर रूज पर अल्पसंख्यक चाम और वियतनामी लोगों की हत्या का आरोप था.

दूसरा मामला बोस्निया के स्रेब्रेनिका का था, जहां साल 1995 में 8000 मुसलमान पुरुषों और लड़कों की हत्या कर दी गई थी.

रवांडा

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'मानवता के विरुद्ध अपराध' क्या हैं?

मानवता के ख़िलाफ़ किए जाने वाले अपराधों में आम नागरिकों को निशाना बनाया जाता है. इनमें जनसंहार की तरह किसी ख़ास जातीय या नस्लीय समूह को निशाना नहीं बनाया जाता.

इनमें हत्या, निर्वासन, ग़ुलाम बनाना, यौन हिंसा, रंगभेद, यातना देना और ग़ायब कर देना शामिल है.

डॉक्टर वान हो कहती हैं, “पहले तो आपको इन हमलों में फ़र्क करना होगा कि इनमें आम लोगों को निशाना बनाया जा रहा है या फिर वास्तव में संघर्ष में शामिल किसी व्यक्ति या जगह (जो सैन्य उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल की जा रही है) को निशाना बनाने की कोशिश में आम लोगों भी नुक़सान पहुंच रहा है.”

वह कहती हैं, "दूसरी बात है कि ये हमले संगठित होने चाहिए ताकि इनका दायरा बड़ा हो और इन्हें चरणबद्ध ढंग से अंजाम दिया जा रहा हो.साथ ही इसमें शामिल लोगों को पता होना चाहिए के वे भी इसके लिए ज़िम्मेदार हैं."

रोहिंग्या

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'युद्ध अपराध' क्या हैं?

युद्ध अपराध की परिभाषा में कोई अपराध तभी आ सकता है, जब वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर या किसी देश में छिड़े आंतरिक संघर्ष के दौरान हुआ हो.

प्रोफ़ेसर वान हो कहती हैं, “युद्ध अपराधों की एक लंबी सूची है और इनको लेकर कई सारी संधियां हैं. मगर सभी उन क़दमों को युद्ध अपराध मानते हैं, जिनके चलते आम लोगों को अकारण नुक़सान पहुंचाया जा रहा हो.

इन अपराधों पर मुक़दमा कैसे चलता है?

संयुक्त राष्ट्र का अंग है- अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय (आईसीजे), जहां कोई भी देश किसी दूसरे देश के ख़िलाफ़ मामला दर्ज़ करवा सकता है.

जैसे कि अभी इस कोर्ट में यह देखा जा रहा है कि 2017 में म्यामांर की सेना का रोहिंग्या मुसलमानों को विस्थापित होने के लिए मजबूर करना जनसंहार था या नहीं. म्यांमार के ख़िलाफ़ यह मामला गाम्बिया ने दायर किया था.

इसी तरह, एक और अदालत है- अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय (आईसीसी). इसकी स्थापना 2002 में हुई थी, ताकि लोगों पर इस तरह के अपराधों पर मुक़दमा चलाया जाए.

यह क़ानून का आख़िरी विकल्प है और कोर्ट तभी दख़ल देता है कि जब कोई देश इस तरह के मामलों पर सुनवाई नहीं कर सकता या करना नहीं चाहता.

अमेरिका, चीन, रूस, भारत और इसराइल ने इसपर हस्ताक्षर नहीं किए हैं. हालांकि, फ़लस्तीनी प्राधिकरण साल 2015 में इसमें शामिल हो गया था.

आईसीसी में अभियोजक करीम ख़ान हाल ही में मिस्र गए थे, मगर ग़ज़ा में दाख़िल नहीं हो पाए. एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने इसराइल को लेकर कहा, “जिन हमलों से बेगुनाह नागरिकों या 'सुरक्षा प्राप्त' जगहों पर असर पड़ता हो, वेसै हमले उन्हें युद्ध के क़ायदे-क़ानूनों के मुताबिक़ करने चाहिए.".

उन्होंने कहा, “हर रिहायशी मकान, स्कूल, अस्पताल, चर्चा या मस्जिद सुरक्षा को प्राप्त है. इन पर तब तक हमला नहीं हो सकता, जब तक कि इनसे 'सुरक्षा प्राप्त' होने का दर्ज़ा छीन न लिया गया हो. और इन्हें मिला यह दर्जा छिनने की बात साबित करने की ज़िम्मेदारी भी हमला करने वाले पर होगी.”

करीम ख़ान

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इमेज कैप्शन, आईसीसी में अभियोजक करीम ख़ान

हमास के हमले के शिकार हुए इसराइलियों ने भी आईसीसी में अपील करके जांच की मांग की है, जबकि उनकी सरकार इस अदालत के ख़िलाफ़ हैं.

अंतरराष्ट्रीय अपराधों की अधिवक्ता याएल वियास ग्विर्समन, तेल अवीव के पास राइकमन यूनिवर्सिटी में लेक्चरर भी हैं. वह मारे गए, बंधक बनाए गए या लापता 49 लोगों के परिजनों का प्रतिनिधित्व कर रही हैं.

वह कहती हैं, “हमास और इस्लामिक जिहाद ने मानवता के ख़िलाफ़ किए जाने वाले अपराध किए हैं. आईसीसी को सबके लिए फ़ैसला सुनाने दीजिए. पीड़ितों को न्याय मिलना चाहिए.”

इसराइल

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इमेज कैप्शन, हमास ने 200 से अधिक इसराइलियों को बंधक बना लिया है

डॉक्टर वान हो कहती हैं कि जवाबदेही तय करवाने के लिए प्रयास करते रहना कभी फ़िज़ूल नहीं जाता, लेकिन इस मामले में 'पावर' का बहुत महत्व है.

वह कहती हैं, “आईसीसी के सामने सबसे बड़ी बाधा यह है कि जो सूचनाएं उसे चाहिए होती हैं, कई बार वे सरकारों या सशस्त्र समूहों के पास होती हैं और वे इन सूचनाओं को मुहैया करवाने के इच्छुक नहीं होते.

डॉक्टर वान हो को लगता है कि देश अपने हितों की रक्षा को सबसे ज़्यादा तरजीह देते हैं. ऐसे में जवाबदेही और न्याय हासिल करना बहुत संघर्ष भरा काम है.

वह कहती हैं, "दुर्भाग्य से, सरकारों की प्राथमिकताओं की क़ीमत आम नागरिकों को चुकानी पड़ती है."