जम्मू में बढ़ते चरमपंथी हमलों से लोगों में बढ़ती आशंकाएं

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इमेज कैप्शन, इसी साल मई महीने में दक्षिणी श्रीनगर के हीरपोरा शोपियां में चरमपंथियों ने सरपंच एजाज़ शेख़ की हत्या कर दी थी. एजाज़ शेख़ की अंत्येष्टि के दौरान उनके बेटे को गोद में लिए एक रिश्तेदार
    • Author, माजिद जहांगीर
    • पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए

जम्मू-कश्मीर के डोडा में चरमपंथी हमले की ताज़ा घटना में भारतीय सेना के एक अधिकारी समेत चार जवानों के अलावा एक पुलिसकर्मी की मौत हो गई.

बीते सोमवार को डोडा में सुरक्षाबलों और चरमपंथियों के बीच मुठभेड़ की घटना हुई.

पिछले एक हफ़्ते में यह दूसरी घटना है, जब सेना के जवानों ने जान गंवाई.

इससे पहले जम्मू के कठुआ में सेना के एक क़ाफ़िले पर चरमपंथियों ने घात लगाकर हमला किया था.

इस हमले में सेना के पाँच जवानों की मौत हुई थी और पांच अन्य जवान घायल हो गए थे.

जम्मू क्षेत्र में बीते तीन सालों में चरमपंथी हमले की कई घटनाएं सामने आई हैं.

शुरुआत में इन घटनाओं का दायरा जम्मू के पुंछ और राजौरी तक ही सीमित था लेकिन अब जम्मू के दूसरे इलाक़ों में भी इस तरह की घटनाओं को देखा जा रहा है.

चरमपंथी हमलों से पर्यटन पर क्या असर?

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चरमपंथी हमले की इन घटनाओं ने जम्मू-कश्मीर की अर्थव्यवस्था और पर्यटन व्यवसाय को कैसे प्रभावित किया है? बीबीसी ने इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए विशेषज्ञों से बातचीत की.

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सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़, इस साल (2024) में जून के आख़िर तक 16 लाख पर्यटक कश्मीर का रुख़ कर चुके हैं.

इस आंकड़े में विदेशी पर्यटकों की अच्छी तादाद शामिल है.

जम्मू-कश्मीर पुलिस के पूर्व महानिदेशक शेष पॉल वेद कहते हैं कि अगर चरमपंथ की घटनाएं इसी तरह जारी रहीं तो यक़ीनन जम्मू-कश्मीर के पर्यटन सेक्टर पर असर पड़ सकता है.

वो कहते हैं, "जम्मू क्षेत्र में पर्यटक वैष्णो देवी के दर्शन के लिए आते हैं. अगर चरमपंथ की घटनाएं इसी तरह जारी रहती हैं तो असर ज़रूर होगा. जब इस तरह की घटना होती है तो उसकी चर्चा मीडिया में होती है और लोगों में चिंता पैदा होती है. अगर ये घटनाएं जारी रहीं तो लोग जम्मू-कश्मीर आना कम कर देंगे."

जम्मू में ऐसी घटनाओं को रोकने में सुरक्षा बल सफल क्यों नहीं रहे?

इस सवाल पर शेष पॉल वेद कहते हैं, ''जब आतंकवादियों ने सीमा पार घुसपैठ की है तो वो कुछ ना कुछ तो करेंगे ही. भौगोलिक दृष्टि से जम्मू का इलाक़ा काफ़ी मुश्किल है. यहाँ पहाड़ हैं, जंगल हैं, रास्ते आसान नहीं हैं. जम्मू में पहले भी काफ़ी खून बहा है. जो सीमा पार करके यहाँ आते हैं वो ट्रेंड होते हैं और उनको अफ़ग़ानिस्तान में ट्रेनिंग दी गई है. उनके पास ख़तरनाक हथियार भी हैं.''

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हालांकि, जम्मू चेंबर ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज़ के अध्यक्ष अरुण गुप्ता शेष पॉल वेद की बात से पूरी तरह सहमत नहीं हैं.

उनका कहना है कि जम्मू की इन चरमपंथी घटनाओं से पर्यटन या अर्थव्यवस्था पर कोई ख़ास असर नहीं पड़ेगा.

हालाँकि, गुप्ता इस बात को वो मानते हैं कि अमरनाथ यात्रा के दौरान इस तरह की घटनाओं का होना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह संदेश जाता है कि जम्मू -कश्मीर में कुछ ना कुछ गड़बड़ है.

लेकिन वह कहते हैं कि इन घटनाओं के बावजूद अमरनाथ यात्रा में कोई कमी नहीं आई है.

बढ़ते चरमपंथ से पर्यटक और व्यवसायी चिंतित

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इमेज कैप्शन, लखनऊ से कश्मीर घूमने पहुंचीं संजना.

विशेषज्ञों से इतर जम्मू-कश्मीर में पर्यटन सेक्टर से जुड़े लोग बीबीसी से बातचीत में चरमपंथ की इन घटनाओं से चिंतित दिखे.

कश्मीर के गुलमर्ग में अब्दुल हमीद मुग़ल एक घोड़ा चालक हैं. बीते तीन सालों में अब्दुल हमीद पर्यटकों के ज़रिए अच्छी ख़ासी कमाई कर रहे हैं.

उनका कहना है कि अगर जम्मू -कश्मीर में चरमपंथ की घटनाएं बंद नहीं होती हैं तो उनके धंधे पर बुरा असर पड़ सकता है.

अब्दुल कहते हैं, "जब यहाँ पर्यटक आएँगे तो हमारी रोज़ी-रोटी भी चलेगी. अगर उनका आना बंद हो गया तो हम क्या खाएंगे? बीते तीन सालों से हमारा काम अच्छा चल रहा है. हमने सुना है कि जम्मू में कुछ हमला हुआ है तो उसकी वजह से यहां पर्यटकों के आने में थोड़ी कमी हो गई है.''

''इस समय यहां पर्यटक आ रहे हैं, घूम रहे हैं. हम भी क़रीब 30 किलोमीटर की दूरी तय करके घोड़े लेकर यहां आ जाते हैं. घोड़ा चलेगा तो हमारा धंधा भी चलेगा. हमारे पास कोई ज़मीन नहीं है. दिन भर हम कभी तीन हज़ार, कभी दो हज़ार और कभी एक हज़ार रुपए कमाते हैं."

गुलमर्ग में सैंकड़ो ऐसे घोड़ा चालक हैं, जिनका रोज़ी-रोटी यहां आने वाले पर्यटकों पर निर्भर करता है. न केवल घोड़े वाले बल्कि होटल, गाड़ी और टूरिटस्ट गाइड भी पर्यटन के ज़रिए अपनी रोज़ी कमाते हैं.

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इमेज कैप्शन, अब्दुल हमीद मुग़ल जैसे कई घोड़ा चालकों की रोज़ी-रोटी पर्यटन पर निर्भर है

कश्मीर में मेरी मुलाक़ात यूपी के लखनऊ से आईं संजना गौर से हुई.

पहली बार कश्मीर आने पर संजना ख़ुश हैं लेकिन चरमपंथ की घटनाओं ने उनके मन में एक डर पैदा कर दिया है.

संजना बताती हैं, ''कश्मीर आने से पहले जब रियासी में यात्रियों की बस पर हमला हुआ था तो मेरे मन में डर पैदा हो गया था. हमले से पहले मैंने कश्मीर आने के लिए बुक किया था. अगर हालात ठीक नहीं होंगे तो लोगों का कश्मीर आना कम ही होगा क्योंकि हर कोई अपनी जान की सुरक्षा चाहता है.''

फ़याज़ अहमद गुलमर्ग में कपड़ों की दुकान चलाते हैं. बीते कुछ सालों से उनका धंधा ठीक चल रहा है लेकिन उनको भी इस बात की फ़िक्र है कि अगर हालात बिगड़े गए तो उनकी कमाई पर बुरा असर पड़ सकता है.

फ़याज़ कहते हैं, ''मैं जिस काम के साथ जुड़ा हूँ, उसका सौ प्रतिशत संबंध पर्यटकों से है. अगर हालात और ख़राब हो गए तो पर्यटकों का आना बंद होगा और काम ठप पड़ने का ख़तरा है. सरकार को शांति बनाए रखने के लिए हर संभव कोशिश करनी चाहिए.''

'1990 में भी जम्मू में ऐसा हुआ था'

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अली मोहम्मद वटाली जम्मू-कश्मीर पुलिस में डीआईजी रह चुके हैं और 'कश्मीर इंतेफ़ादा: अ मेम्योर' किताब के लेखक हैं.

जम्मू में हालिया चरमपंथी घटनाओं को अतीत से जोड़ते हुए अली मोहम्मद कहते हैं, ''जम्मू में कुछ समय से चरमपंथ की घटनाएं फिर शुरू हो चुकी हैं. साल 1990 में भी जम्मू का इलाक़ा चरमपंथ से प्रभावित हो गया था और फिर कुछ सालों के बाद चरमपंथ लगभग ख़त्म हो गया था. अब जो कुछ चरमपंथ के हवाले से हो रहा है वो चिंता का विषय है.''

''अगर ऐसा चलता रहा तो फिर इस पर क़ाबू पाना मुश्किल हो जाएगा. जम्मू में चरमपंथ को रोकने के लिए कुछ क़दम उठाने पड़ेगे. सरहदों को मज़बूत करना होगा. जब आज जम्मू में हो रहा है तो क्या भरोसा है कि कश्मीर में इतिहास में जो हुआ वो नहीं हो सकता है."

भारत के कोने -कोने से हर साल लाखों श्रद्धालु अमरनाथ यात्रा पर कश्मीर आते हैं.

अतीत में भी अमरनाथ यात्रा पर कई बार चरमपंथी हमले हो चुके हैं.

क़रीब दो महीने तक चलने वाली अमरनाथ यात्रा को सुरक्षित करने के लिए जम्मू से लेकर कश्मीर तक सुरक्षा के सख्त इंतज़ाम किए गए हैं.

सुरक्षा के बावजूद अली मोहम्मद इस बात से इनकार नहीं करते हैं कि चरमपंथ की बढ़ती घटनाओं से चरमपंथी पर्यटकों और अमरनाथ यात्रियों को भी निशाना बना सकते हैं.

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चरमपंथी हमलों से पर्यटन पर असर नहीं: प्रशासन

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इमेज कैप्शन, सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़, इस साल (2024) में जून के आख़िर तक 16 लाख पर्यटक कश्मीर का रुख़ कर चुके हैं

कश्मीर आने वाले पर्यटक मशहूर डल झील के हाउसबोट में रुकना पसंद करते हैं और डल झील के आस-पास पर्यटन वाली जगहों की भी सैर करते हैं.

कश्मीर हाउसबोट ओनर्स संगठन के अध्यक्ष मंज़ूर अहमद पख्तून कहते हैं कि चरमपंथी हमलों से फ़िलहाल पर्यटन पर ख़ास असर नहीं पड़ा है और अब भी सैलानी अच्छी ख़ासी तादाद में कश्मीर घूमने आ रहे हैं.

कश्मीर पर्यटन विभाग के डायरेक्टर राजा याक़ूब इस बात से इनकार कर रहे हैं कि जम्मू में हो रहीं चरमपंथी घटनाओं से कश्मीर के पर्यटन पर कोई असर पड़ा है.

बीबीसी के साथ बातचीत में उन्होंने कहा, "कश्मीर के पर्यटन सेक्टर के लिए बीते तीन साल सुनहरे दौर जैसे रहे हैं. अगर हम इस साल की बात करें तो अभी तक 16 लाख पर्यटक कश्मीर आ चुके हैं. बीते साल की तुलना में यह आंकड़ा 17 से 18 प्रतिशत बढ़ चुका है. इसमें बड़ी संख्या में विदेशी पर्यटक भी शामिल हैं. हमारे पर्यटन पर कोई असर नहीं पड़ रहा है.''

''अमरनाथ यात्रा शांति से चल रही है. अभी जो चरमपंथ की घटनाएं हो रही हैं वो जम्मू के दूर -दराज़ इलाकों में हो रही हैं और उनका कश्मीर के पर्यटन सेक्टर पर कोई असर नहीं दिख रहा है."

जम्मू -कश्मीर पुलिस के महानिदेशक रश्मि रंजन स्वैन ने कुछ दिन पहले जम्मू के हालात पर मीडिया के साथ बातचीत की थी.

उन्होंने कहा था कि जम्मू में फिर से आतंकवाद को ज़िंदा करने की कोशिश की जा रही है तो चिंता पैदा होने लगती है.

जम्मू -कश्मीर में इस समय उपराज्यपाल का शासन है. साल 2018 में यहां बीजेपी -पीडीपी की गठबंधन सरकार टूट गई थी.

फिर अगस्त 2019 में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटा दिया गया था, जिसके बाद अभी तक जम्मू -कश्मीर में विधानसभा के चुनाव नहीं हुए हैं.

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