नेतन्याहू ने भंग की वॉर कैबिनेट, फ़ैसले का इसराइल-हमास जंग पर क्या होगा असर

इसराइली पीएम बिन्यामिन नेतन्याहू

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, इसराइली पीएम बिन्यामिन नेतन्याहू (फाइल फोटो)

इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने सोमवार को वॉर कैबिनेट भंग कर दी.

छह सदस्य वाली इस कैबिनेट से विपक्षी नेता और पूर्व जनरल बेनी गैंट्ज़ और उनके साथी गादी आइज़नकॉट के इस्तीफ़ा देने के बाद यह घोषणा की गई है. ये दोनों नेता सेन्ट्रिस्ट यानी मध्यमार्गी हैं.

दोनों नेताओं की ये शिकायत थी कि इसराइल और हमास के बीच ग़ज़ा में जो युद्ध चल रहा है उसमें रणनीति का अभाव है.

हालांकि धुर-दक्षिणपंथी मंत्री इतेमार बेन ग्विर और बेज़ालेल स्मॉट्रिच का कहना था कि बैनी गैंट्ज़ और आइज़नकॉट के इस्तीफ़े से वॉर कैबिनेट में जो जगह बनी है उसमें उन्हें जगह दी जाए.

एक सरकारी प्रवक्ता का कहना है कि इसके बाद अब ग़ज़ा में हमास के साथ युद्ध के बारे में फ़ैसले पहले से मौजूद सुरक्षा कैबिनेट और मंत्रिमंडल में होंगे. हालांकि संवेदनशील फ़ैसले चार सदस्यों वाले एक कंसल्टेटिव फ़ोरम में लिए जाएंगे.

बीबीसी हिंदी का व्हाट्सऐप चैनल
इमेज कैप्शन, बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

सेना का क्या कहना है?

इसराइली डिफेन्स फोर्सेस के प्रवक्ता डेनियल हगारी

इमेज स्रोत, GIL COHEN-MAGEN/AFP via Getty Images

इमेज कैप्शन, इसराइली डिफेन्स फोर्सेस के प्रवक्ता डेनियल हगारी

एक दिन पहले इसराइली सेना ने कहा था कि वह दक्षिणी ग़ज़ा से सटी सड़क पर हर रोज़ कुछ वक्त के लिए "सैन्य अभियान को रोकेगी" ताकि इस इलाक़े में अधिक मानवीय सहायता पहुंचाई जा सके.

शनिवार से लागू इस रोक के तहत स्थानीय समयानुसार सुबह आठ बजे से लेकर शाम सात बजे तक इसराइल की सैन्य कार्रवाई बंद रहेगी.

इस विराम का असर केवल उस अहम रास्ते पर होगा, जो ग़ज़ा और इसराइल के बीच प्रमुख माने जाने वाले केरेम शलोम क्रॉसिंग से उत्तर की ओर जाती है. इससे राहत सामग्री ग़ज़ा के उत्तर की तरफ पहुंचाई जा सकेगी.

छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें
कहानी ज़िंदगी की

मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ.

एपिसोड

समाप्त

धुर-दक्षिणपंथी मंत्री इतेमार बेन ग्विर और बेज़ालेल स्मॉट्रिच ने सेना के इस फ़ैसले का विरोध किया.

राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतेमार बेन ग्विर ने कहा कि लड़ाई रोकने का फ़ैसला किसी 'मूर्ख' ने लिया है जो 'दुष्ट' है.

वहीं वित्त मंत्री बेज़ालेल स्मॉट्रिच ने कहा है कि ग़ज़ा पहुंच रही राहत सामग्री के कारण हमास को ताकत मिली है और इससे "युद्ध में अब तक मिली क़ामयाबी बेकार हो जाएगी."

इसके बाद सेना ने सफ़ाई दी कि युद्ध को लेकर आईडीएफ़ की नीति में कोई बदलाव नहीं हुआ है और रफ़ाह में लड़ाई योजना के अनुसार ही जारी रहेगी.

इसके एक दिन बाद नेतन्याहू ने वॉर कैबिनेट को भंग करने का एलान किया. इससे एक सवाल पैदा हुआ क्या इसका असर राहत सामग्री पहुंचाने की कोशिशों पर और युद्ध पर पड़ेगा. और सेना ने जिस सीमित विराम की बात की है क्या वो लागू रहेगा?

इस सवाल पर इसराइली डिफेन्स फोर्सेस के प्रवक्ता डेनियल हगारी ने भरोसा दिलाया है कि सेना आदेशों का पालन करेगी और इससे कमान चेन पर असर नहीं पड़ेगा.

उन्होंने कहा,"कैबिनेट के सदस्य बदल रहे हैं और तरीकों को बदला जा रहा है. हमारे पास एक व्यवस्था है, हम कमान की चेन को मानते हैं और हम इसके अनुसार ही काम कर रहे हैं."

"यह लोकतंत्र है, हम कमान के अनुसार ही काम करना जारी रखेंगे और अगर कैबिनेट के सदस्य बदलेंगे तो ये लोकतंत्र, कैबिनेट और प्रधानमंत्री का फै़सला होगा. हम कैबिनेट के अनुसार, क़ानून के अनुसार और अंतरराष्ट्रीय क़ानून के अनुसार भविष्य में भी काम करते रहेंगे."

यरूशलम में मौजूद बीबीसी संवाददाता योलान्डा नेल का विश्लेषण

बेनी गैंट्ज़

इमेज स्रोत, JACK GUEZ/AFP via Getty Images

इसराइल अब तक बीते साल अक्तूबर में हमास के नेतृत्व में हुए घातक हमलों से जूझ रहा था

ऐसे में विपक्षी नेता बेनी गैंट्ज़ नेशनल यूनिटी गवर्नमेंट में पीएम बिन्यामिन नेतन्याहू के साथ आए और देश के सामने खड़े संकट से जूझने के लिए वॉर कैबिनेट बनाई गई.

चूंकि अब बेनी गैंट्ज़ ने ग़ज़ा युद्ध में रणनीति के अभाव का कारण बताते हुए वॉर कैबिनेट से इस्तीफ़ा दे दिया है तो उनकी जगह लेने के लिए धुर-दक्षिणपंथी नेता सामने आ रहे हैं.

ये नेतन्याहू के लिए मुश्किल स्थिति है. वॉर कैबिनेट भंग करके नेतन्याहू गठबंधन के अपने सहयोगियों और अंतरराष्ट्रीय सहयोगियों के साथ मुश्किल स्थिति में पड़ने से बच सकते हैं.

बीते दिनों इसराइली सरकार में तनाव के और भी संकेत मिल रहे थे. केरेम शलोम सीमा के पास सड़क पर युद्ध पर 'सीमित' विराम लगाने के सेना के फ़ैसले को लेकर कुछ नेताओं ने (इतेमार बेन ग्विर और बेज़ालेल स्मॉट्रिच) नाराज़गी जताई थी.

हालांकि सेना ने कहा था कि वो यह सुनिश्चित करने के लिए आदेश का पालन कर रही है कि ग़ज़ा में लोगों तक राहत सामग्री पहुंचे सके.

आगे कौन लेगा फ़ैसले?

ग़ज़ा में मानवीय राहत

इमेज स्रोत, Dawoud Abo Alkas/Anadolu via Getty Images

इमेज कैप्शन, फरवरी की इस तस्वीर में ग़ज़ा में पहुंच रही मानवीय राहत

यरुशलम में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार हरेंद्र मिश्रा ने बीबीसी संवाददाता मानसी दाश को बताया कि जहां तक युद्ध के संचालन की बात है कि उस पर इस फ़ैसले का बड़ा असर नहीं पड़ेगा.

जिन दो मंत्रियों ने इस्तीफ़ा दिया है वो दोनों सेना में काम कर चुके हैं. बेनी गैंट्ज़ सेना अध्यक्ष थे और रक्षा मंत्री भी रह चुके हैं, वहीं गादी आइज़नकॉट पूर्व सेनाध्यक्ष हैं.

हरेंद्र कहते हैं,"दोनों के अनुभवों को काम में लाने की कोशिश हो रही थी. वॉर कैबिनेट के गठन के वक्त दोनों की मांग थी कि युद्ध में उनके अनुभवों को भी जगह दी जाए और युद्ध से जुड़े सभी फ़ैसले इसी कैबिनेट की तरफ से लिए जाएं. इसी शर्त पर दोनों इसका हिस्सा बने थे."

"आने वाले वक्त में नेतन्याहू को उनके अनुभव की कमी ज़रूर खलेगी लेकिन युद्ध के संचालन की जहां तक बात है, यहां एक चेन ऑफ़ कमान है और यहां का नेतृत्व जो फ़ैसले लेगा फौज उसी के अनुसार काम करती है, आगे भी करेगी."

पहले युद्ध से जुड़े फ़ैसले वॉर कैबिनेट ले रही थी अब फ़ैसले एक कंसल्टेटिव फ़ोरम लेगी जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार साखी हनेगी, स्ट्रेटेजी मंत्री रॉन डर्मर, रक्षा मंत्री योआव गलांट और पीएम नेतन्याहू होंगे.

हरेंद्र कहते हैं, "माना जा रहा है कि इसमें अधिकांश लोगों से नेतन्याहू को विरोध का सामना नहीं करना पड़ेगा."

"इसके बाद बड़े फ़ैसले के लिए सुरक्षा कैबिनेट का रुख़ किया जाएगा. इसमें अधिकांश दक्षिणपंथी पार्टियों के वरिष्ठ नेता शामिल हैं. इसमें कुछ धुर-दक्षिणपंथी पार्टियों के नेता भी हैं लेकिन बहुमत नेतन्याहू के साथ होगा."

सुरक्षा कैबिनेट में 14 सदस्य होते हैं. इनमें धुर-दक्षिणपंथी मंत्री इतेमार बेन ग्विर और बेज़ालेल स्मॉट्रिच भी शामिल हैं.

"और भी बड़ा फ़ैसला लेना पड़ा तो उसके लिए चर्चा पूरे मंत्रिमंडल में की जाएगी. तो कह सकते हैं कि नेतन्याहू जो फ़ैसले लेंगे आगे उन पर अमल किया जाएगा."

लेकिन क्या इसका असर राहत सामग्री ग़ज़ा के भीतर तक पहुंचाने के लिए नेतन्याहू पर पड़ रहे अंतरराष्ट्रीय दबाव पर भी पड़ेगा?

इस सवाल पर हरेंद्र मिश्रा कहते हैं, "वॉर कैबिनेट को भंग करना एक तरह से नेतन्याहू की मजबूरी है क्योंकि वॉर कैबिनेट में दो इस्तीफ़े के बाद धुर-दक्षिणपंथी नेताओं की तरफ से नेतन्याहू पर उन्हें वॉर कैबिनेट में सामिल करने का दबाव प रहा था."

"अगर उन्हें वॉर कैबिनेट में शामिल किया जाता तो संख्या के लिहाज़ से स्थिति ऐसी होती कि वॉर कैबिनेट पंगु हो जाता क्योंकि बराबर-बराबर लोग एक दूसरे के ख़िलाफ़ खड़े नज़र आते."

"एक बात ये भी है कि जिस तरह की मांगें ये दो नेता (बैनी गैंट्ज़ और बेज़ालेल) करते रहे हैं उन पर अगर अमल किया जाए, तो इसराइल जो पहले से ही युद्ध के कारण अलग-थलग पड़ा हुआ है और ज्यादा अलग पड़ जाता."

इन नेताओं का कहना है कि ग़ज़ा तक राहत सामग्री नहीं पहुंचाई जानी चाहिए, यहां तक कि फ़लस्तीनी प्राधिकरण के टैक्स के जो पैसे हैं उसे भी बंद किया जाना चाहिए. इस पैसे को इसराइल में उन लोगों पर खर्च किया जाए जो आतंक की मार झेल रहे हैं.

हरेंद्र मिश्रा कहते हैं, "देखा जाए तो उनके वॉर कैबिनेट में आने से नेतन्याहू की मुश्किलें बढ़तीं और उन पर अंतरराष्ट्रीय दबाव भी बढ़ता."

पहले ही इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस में इसराइल पर नरसंहार के आरोप लगे हुए हैं, राहत एजेंसियां ग़ज़ा में मदद पहुंचाने को लेकर शिकायतें कर रही हैं.

नेतन्याहू की अल्पमत सरकार को दक्षिणपंथी पार्टियों की ज़रूरत

इतेमार बेन ग्विर

इमेज स्रोत, Amir Levy/Getty Images

इमेज कैप्शन, इतेमार बेन ग्विर

हरेंद्र मिश्रा कहते हैं, "नेतन्याहू सरकार और दक्षिणपंथी नेताओं बेनी गैंट्ज़ और बेज़ालेल के बीच रिश्ता भी असहज है. लेकिन ये दूसरी बात है कि ये सभी दक्षिणपंथी पार्टियां अभी एक साथ गठबंधन में सरकार में हैं."

वो कहते हैं "नेतन्याहू को ज़्यादा यकीन अपने दक्षिणपंथी सहयोगियों पर हैं इसलिए विपक्ष के नेता नेतन्याहू को एक सेफ्टी नेट देने को लेकर भी बात कर रहे थे. हालांकि विपक्ष का कहना है कि ये सपोर्ट मुद्दों पर आधारित होगा."

नेतन्याहू को इसे लेकर चिंता था कि अगर युद्ध बंद हुआ तो उनके ये समर्थक अपना समर्थन वापस ले लेंगे और उनकी सरकार गिर जाएगी.

हरेंद्र कहते हैं, "भले ही इस संबंध में खटास हो लेकिन नेतन्याहू अपने दक्षिणपंथी सहयोगियों पर यकीन करते हैं."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)