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पाकिस्तान और म्यांमार की सेना में बढ़ती नज़दीकियों में क्या है चीन का रोल - प्रेस रिव्यू
अंग्रेज़ी अख़बार इकोनॉमिक टाइम्स में छपी रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान और म्यांमार की सेना के प्रतिनिधिमंडलों ने बीते कुछ समय में एक-दूसरे देश की यात्राएं की है और दोनों ही देशों के सैन्य औद्योगिक लिंक इससे तेज़ी से आगे बढ़े हैं.
अख़बार को मिली जानकारी के मुताबिक़, बीते महीने पाकिस्तानी सेना के वरिष्ठ अधिकारियों का एक प्रतिनिधिमंडल म्यांमार में यांगाओ के पास बने सैन्य इंडस्ट्रियल कॉम्प्लेक्स का दौरा करने गया था.
यहां उन्होंने J-17 एयरक्राफ़्ट की वर्कशॉप में भी भागीदारी ली जो म्यांमार ने पाकिस्तान से खरीदा है.
इसके अलावा एक और पाकिस्तानी टीम म्यांमार गई थी जिसने म्यांमार सेना को हथियारों के उत्पादन में तकनीकी मदद की.
दोनों देशों के बीच हो रही सैन्य मुलाकातों से परिचित एक शख्स ने अख़बार को बताया कि सितंबर की शुरुआत में म्यांमार सेना का एक प्रतिनिधिमंडल उन बमों और कारतूसों का निरीक्षण करने पहुंचा था जिन्हें वो पाकिस्तान से आयात करने वाला है.
म्यांमार की इस टीम ने नवंबर महीने की शुरुआत में एक बार फिर पाकिस्तान का दौरा किया ताकि बमों और बुलेटों का शिपमेंट से पहले निरीक्षण किया जा सके.
अख़बार लिखता है कि पाकिस्तान को युद्ध से जुड़े हथियार तैयार करने में चीन से बड़ा सहयोग मिलने की उम्मीद है. इससे भी महत्वपूर्ण है कि चीन, पाकिस्तान को चीनी हथियारों का रख-रखाव और मेंटेनेंस करने देगा. चीन पाकिस्तानी सैन्य उद्योग के ज़रिए अपने हथियार बेचना चाहता है.
चीन की ही मदद से पाकिस्तान और म्यांमार के बीच सैन्य उद्योग में साझेदारी बढ़ी है.
म्यांमार अपनी सैन्य ताकत बढ़ाना चाहता है. तख्तापलट कर देश की कमान संभालने वाले म्यांमार के नेता जनरल मिन ऑन्ग ह्लाइंग फाइटर जेट और मिसाइलों की लिस्ट लेकर रूस जाते रहते हैं.
अख़बार के अनुसार चीन इससे चिंतित है. उसकी चितां है कि वह म्यांमार को एक ग्राहक के तौर पर खो सकता है.
अब चीन की मदद से पाकिस्तान भी म्यांमार को 60-एमएम और 81-एमएम मोर्टार वाली भारी मशीनगन, एम-79 ग्रेनेड लॉन्चर बेंचने की कोशिश में है.
म्यांमार भी पाकिस्तान के साथ अपनी सैन्य साझेदारी बढ़ा रहा है और अपने जे-17 फ़ाइटर एयरक्राफ्ट के लिए पाकिस्तान से एयर-टू-सरफ़ेस मिसाइल खरीदने वाला है.
पांच साल में 10 लाख करोड़ के 'राइट-ऑफ़' ने बैंकों को बढ़ते एनपीए से बचाया
अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक़, पिछले पांच वर्षों में 10 लाख करोड़ रुपये से अधिक की भारी राशि को राइट ऑफ करने के बाद भी बैंक अब तक इसका केवल 13 प्रतिशत ही वसूल कर पाए हैं.
अख़बार की ओर से दायर आरटीआई के जवाब में रिज़र्व बैंक ने बताया है कि इस बड़े राइट-ऑफ ने बैंकों को पिछले पांच सालों में अपने नॉन परमोर्फ़िंग एसेट्स (एनपीए) या डिफॉल्ट लोन को 10,09,510 करोड़ रुपये कम करने में मदद की है.
ये राइट-ऑफ़ भारत के 2022-23 के लिए अनुमानित 16.61 लाख करोड़ रुपये के वित्तीय घाटे को 61 प्रतिशत कम कर सकता था.
अख़बार को मिली सूचना के मुताबिक बैंकों को एनपीए में मार्च 2022 तक 5.9 फ़ीसदी की गिरावट देखी गई है.
COP27 में बड़ी जीत, ‘लॉस एंड डैमेज’ फ़ंड पर मिली प्रतिबद्धता
द हिंदू में छपी ख़बर के मुताबिक़, मिस्र में दो सप्ताह तक चलने वाला जलवायु सम्मेलन COP27 का समापन एक प्रतीकात्मक जीत के साथ हुआ है.
जलवायु परिवर्तन से जुड़ी प्राकृतिक आपदाओं से होने वाला नुकसान भुगतने वाले कुछ देशों को अमीर देश मुआवजा देंगे.
विकासशील देशों ने लॉस-डैमेज फ़ंड बनाने के लिए मज़बूती से बार-बार अपील की ताकि उन देशों के लिए वितीय सहायता सुनिश्चित की जा सके, जिन्होंने जलवायु संकट में बहुत कम योगदान दिया है, मगर जो इसके प्रभावों से सबसे अधिक जूझ रहे हैं.
संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने कहा, “स्पष्ट है कि यह पर्याप्त नहीं होगा, मगर टूटे हुए भरोसे का फिर से बनाने के लिए यह एक ज़रूरी राजनैतिक संकेत है.”
27वें संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन के लक्ष्य 'कार्यान्वयन' था, जिसमें इस सवाल का हल निकालना था कि कैसे ऐतिहासिक उत्सर्जन के थोक के लिए विकसित देश ज़िम्मेदार हैं और वे विकासशील देशों को किया गया अपना पुराना वादा पूरा करें जिसके तहत कहा गया था कि विकसित देश साल 2020 तक हर 100 अरब डॉलर की मदद देंगे, जो नहीं किया गया.
सावरकर के पोते ने कहा- अंग्रेज़ों से भत्ता लेकर कुछ ग़लत नहीं किया
हाल ही में भारत जोड़ो यात्रा के दौरान कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि विनायक दामोदर सावरकर ने अंग्रेज़ों से माफ़ी और एक चिट्ठी दिखाते हुए गांधी ने ये भी कहा कि सावरकर ने अंग्रेजों से उनका नौकर बने रहने की बात कही थी.
हिंदी दैनिक अख़बार दैनिक भास्कर ने इस बयान के बाद पैदा हुए विवाद के बीच विनायक दामोदर सावरकर के पोते रणजीत सावरकर का इंटरव्यू छापा है.
इस इंटरव्यू में उनसे सवाल पूछा गया कि क्या सावरकर को अंग्रेज़ों से 60 रूपये पेंशन मिलती थी? इसके जबाव में उन्होंने कहा, “सावरकर ने अंग्रेजों से कभी एक रुपए भी पेंशन नहीं ली. ये जो 60 रुपए की बात है ये गुजारा भत्ता था. अंग्रेजों ने सावरकर को अंडमान और रत्नागिरी में 13 साल कैद रखा. सावरकर को जीविका कमाने के लिए कोई भी कारोबार करने की इजाजत नहीं थी. वे जमींदार थे और पेशे से बैरिस्टर थे. इसके मुआवज़े के रूप में अंग्रेज उनको ये भत्ता देते थे.”
उन्होंने इस बातचीत में ये भी कहा कि “ राहुल गांधी ने जो लेटर दिखाया उसके आखिर में लिखा था कि ‘आपका सबसे आज्ञाकारी सेवक’. इसका मतलब उन्होंने निकाला कि मैं आपका नौकर बनना चाहता हूं. मुझे नहीं पता कि राहुल गांधी का सामान्य ज्ञान कितना है. ये अंग्रेजों के जमाने में लिखने का एक तरीका था, जिस तरह हम आज हिंदी में भी लिखते हैं कि ‘आपका कृपाभिलाषी’.”
“ उस समय में ऐसे लिखने की परंपरा थी और गांधीजी ने भी उस वक्त ऐसे कई लेटर लिखे थे. जब सावरकर ने ये लिखा था तब गांधी ब्रिटिश के पूरी तरह वफादार थे.”
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