चीन के ऐप्स क्या मोदी सरकार की नीतियों में सेंध लगा रहे हैं?

    • Author, दिनेश उप्रेती
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

"मैंने कई ऑनलाइन ऐप्स से लोन लिया है,...पर मैं लोन नहीं भर पा रहा हूँ...इज़्ज़त के डर से ये क़दम उठा रहा हूँ."

मध्य प्रदेश पुलिस के मुताबिक़ ये चंद लाइनें उस सुसाइड नोट की हैं जिसे इंदौर के एक शख़्स ने लिखा था. जिसने कथित तौर पर अपनी पत्नी और दो बच्चों की हत्या करने के बाद आत्महत्या कर ली थी.

अगस्त महीने के आख़िरी हफ़्ते में इंदौर में एक ही घर में चार लाशें मिलने की यह सनसनीखेज़ ख़बर सामने आई थी. शुरुआती तहक़ीक़ात के बाद पुलिस का कहना था कि अमित कर्ज़ की किस्तें नहीं चुका पा रहा था और ये घटना उसका ही नतीजा है.

ऐसे ऐप्स से लोन लेने और फिर इसके भंवर जाल में फँसने के सैकड़ों मामले पिछले कुछ सालों में देशभर में सामने आए हैं.

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो यानी एनसीआरबी के मुताबिक़, साल 2020 में साइबर अपराध के कुल मामलों में से 60.2 फ़ीसदी मामले फ़र्जीवाड़े के थे. यानी कुल 50,035 में से 30,142 मामले फ़्रॉड के थे.

इंस्टेंट लोन ऐप्स यानी बग़ैर ज़्यादा लिखत-पढ़त के चंद घंटों में ही फ़टाफ़ट लोन देने वाले ऐप्स ने पिछले दो-तीन साल में अपना जाल ख़ूब फैला लिया है और कोरोना महामारी और उसके बाद बने तंगी के हालातों में उनके लिए अपना 'शिकार' ढूँढना बेहद आसान हो गया है.

हालात ये हैं कि प्लेस्टोर्स में हज़ारों की संख्या में अवैध लोन ऐप्स मौजूद हैं. रिज़र्व बैंक की साल 2021 की रिपोर्ट को ही लें तो पता चलता है कि केंद्रीय बैंक के जनवरी-फ़रवरी के जुटाए आँकड़ों के मुताबिक़, 81 ऐप स्टोर्स में लगभग 1100 लोन ऐप्स मौजूद थे, जिनमें से क़रीब 600 ऐप्स अवैध थे.

प्रवर्तन निदेशालय और एसएफ़आईओ की जाँच में ऐसे कई ऐप्स का चीन से कनेक्शन भी सामने आया है.

चीनी ऐप्स से कर्ज़ लेने वाले कुछ लोगों के आत्महत्या करने के मामले सामने आने के बाद रिज़र्व बैंक ऐसे वैध ऐप्स की 'व्हाइट लिस्ट' तैयार करने में जुटा है.

संसद में उठे सवाल

दो अगस्त 2022 को राज्य सभा में बीजू जनता दल के सांसद सुजीत कुमार ने मोदी सरकार से जानना चाहा कि क्या उनके पास रिज़र्व बैंक के नियमों का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन कर लोन देने वाले ऐप्स पर नकेल कसने के पर्याप्त नियम-क़ानून हैं? उन्होंने ये भी बताया कि अकेले ओडिशा में ही ऐसे डेढ़ लाख ऐप डाउनलोड हुए हैं.

इस पर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने जवाब दिया कि केंद्र सरकार ने 'किसी एक ख़ास देश' से दिए जाने वाले डिजिटल लोन, नागरिकों को प्रताड़ित करने और उगाही करने के मामलों को बेहद गंभीरता से लिया है. उन्होंने ये भी कहा कि वित्त, कंपनी मामले, इलेक्ट्रॉनिक्स-सूचना तकनीकी और गृह मंत्रालय एक साथ मिलकर ऐसे ऐप्स पर कार्रवाई करने की दिशा में काम कर रहे हैं.

निर्मला ने कहा, "मैं बताना चाहती हूँ कि पिछले कुछ महीनों में देशभर में ख़ासकर तेलंगाना में कई लोगों ने प्रताड़ना झेली है, और उन मामलों में कार्रवाई की गई है. ऐसा नहीं है कि दूसरी जगहों पर ऐक्शन नहीं हुआ है. हम उन भारतीय नागरिकों के ख़िलाफ़ भी कार्रवाई कर रहे हैं जिन्होंने उन फ़र्ज़ी कंपनियों को बनाने में मदद की जो लोन दे रही हैं."

मनी लॉन्ड्रिंग यानी हवाला कारोबार की कई शिकायतों के बाद प्रवर्तन निदेशालय ने भी पिछले कुछ दिनों में अपनी कार्रवाई तेज़ की है.

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़ बीते हफ्ते प्रवर्तन निदेशालय ने 12 एनबीएफ़सी के खातों में पड़ी 105 करोड़ रुपए से अधिक की राशि ज़ब्त की. आरोप है कि इन कंपनियों के चीनी नागरिकों के साथ संबंध हैं. इन कंपनियों ने चीन के निवेश वाली फ़िनटेक कंपनियों की मदद से 4,000 करोड़ रुपए के लोन दिए और 800 करोड़ रुपए का ब्याज कमाया.

ईडी ने इस सिलसिले में हैदराबाद और देश के दूसरे हिस्सों की कई एनबीएफ़सी कंपनियों की जाँच की है. ये कंपनियाँ छोटी अवधि के पर्सनल लोन देती थीं और उस पर मोटा ब्याज वसूलती थीं. ईडी अब तक इस मामले में कुल 264 करोड़ रुपए की संपत्ति ज़ब्त कर चुका है.

सवाल ये है कि सरकार जब बैंकिंग सेवाओं पर इतना ज़ोर दे रही है और ग़रीब और मध्यम वर्ग के लिए समय-समय पर कई क़र्ज़ योजनाओं की घोषणा भी की है तो फिर लोग इन 'फ़टाफ़ट लोन स्कीम्स' के फेर में कैसे पड़ जाते हैं.

दरअसल, डिजिटल क्रांति के इस दौर में बैंकिंग सेवाओं में 'डिपॉज़िट' और 'ट्रांसफ़र पेमेंट' तो चुटकियों में हो जाता है, लेकिन अगर आपको कर्ज़ की दरकार है तो विश्वसनीय संस्थाओं से इसे लेना अब भी इतना आसान नहीं है. ख़ासकर उन लोगों के लिए जिनके पास 'ज़रूरी दस्तावेजों' का अभाव रहता है.

सरकारी दावों के मुताबिक़ देशभर में 46 करोड़ 40 लाख जन-धन खाते हैं और वर्ल्ड बैंक की 2021 की रिपोर्ट बताती है कि भारत के 78 फ़ीसदी लोगों के पास बैंक खाता है.

लेकिन बैंक चाहे सरकारी हों या प्राइवेट, उनके पास बड़े पैमाने पर छोटे कर्ज़ देने का कारगर मॉडल अब भी तैयार नहीं है.

शायद इसी कमी का फ़ायदा फ़ाइनेंशियल टेक्नोलॉजी कंपनियां उठा रही हैं और ग्राहक की सुविधा को ही उन्होंने अपनी 'ख़ासियत' बनाया है.

क़र्ज़ देने वाले ये ऐप आमतौर पर 2-1-0 फ़ॉर्मूले पर काम करते हैं. यानी फ़ैसला लेने के लिए दो मिनट, एक मिनट में पैसा ट्रांसफ़र और कोई मेल-मुलाक़ात नहीं (नो ह्यूमन कॉन्टैक्ट). सबसे ख़ास और इन ऐप्स के प्रति आकर्षित करने वाली बात ये है कि क़र्ज़ लेने के लिए कुछ रेहन या गिरवी नहीं रखना पड़ता.

बस इसी लालच में ख़तरे भी छिपे होते हैं. कई लोन ऐप्स रिज़र्व बैंक से मान्यता प्राप्त नहीं होते यानी ग़ैर क़ानूनी होते हैं. इनमें से कई का इस्तेमाल मनी लॉन्ड्रिंग या डेटा चुराने के लिए हो रहा होता है.

'वित्तीय सुधार ज़रूरी'

वित्तीय मामलों के जानकार एससी गर्ग कहते हैं, "इन ऐप्स के ज़रिए फर्ज़ीवाड़ा करने वाले निम्न और मध्यम आय वर्ग को अपना निशाना बनाते हैं. ये वो वर्ग है जिन्हें 10-20 हज़ार रुपए का क़र्ज़ चाहिए होता है, लेकिन जल्द. इनका काम करने का तरीक़ा बेहद आसान सा है. प्रोसेसिंग फ़ीस के नाम पर रकम एडवांस में काट लेते हैं. ब्याज तो अधिक होता ही है फिर अगर समय पर रकम न चुकाई तो पहले दिन से ही पेनल्टी लगा देते हैं. रकम चुकाने में आनाकानी की तो फिर बदसलूकी के अलग-अलग तरीक़े अपनाते हैं."

दरअसल, क़र्ज़ पर मोटा सूद वसूलने की ये कहानी हर दौर में दोहराई जाती रही है, पर अलग-अलग शक्ल में. आंध्र प्रदेश का माइक्रोफ़ाइनेंस संकट याद करने के लिए ज़्यादा पीछे नहीं जाना पड़ेगा.

साल 2005 से 2010 की अवधि में अकेले आंध्र प्रदेश में ही 50 से अधिक छोटे क़र्ज़दारों ने ख़ुदकुशी कर ली थी. शुरुआत में इन कंपनियों को काफ़ी सफल माना गया क्योंकि सरकारी बैंक जो काम नहीं कर पा रहे थे, वो माइक्रोफ़ाइनेंस कंपनियां कर रही थीं.

सरकार इसे विकास की नीतियों में शामिल करना चाहती थी, लेकिन माइक्रोफ़ाइनेंस कंपनियों को ज़्यादा अधिकार देने के हक़ में भी नहीं थीं.

फ़ाइनेंस रिसर्च से जुड़े आसिफ़ इक़बाल कहते हैं, "सरकार माइक्रोफ़ाइनेंस को लेकर कुछ स्पष्ट तय नहीं कर पाई. वो चाहती तो थी कि ग़रीबों को सस्ती दर पर लोन मिल सके और विकास योजनाओं को रफ़्तार मिले. कुछ माइक्रोफ़ाइनेंस संगठनों को कॉमर्शियल बैंक की तरह काम करने का मौका भी मिला, लेकिन जमा पैसे को अपने पास रखने का हक़ उनके पास नहीं था. अगर उन्हें डिपॉज़िट रखने और बैंकिंग व्यवस्था का अंग बनने का मौक़ा मिलता तो कहानी कुछ और हो सकती थी."

कहने की ज़रूरत नहीं कि साल 2010 में आंध्र प्रदेश में माइक्रोफ़ाइनेंस संकट आया और एसकेएस माइक्रोफ़ाइनेंस जैसी कंपनियाँ तबाह हो गईं.

तो क्या रिज़र्व बैंक को बैंकिंग लाइसेंस नियमों में कुछ बदलाव की ज़रूरत है?

एससी गर्ग कहते हैं, "इस सवाल का सीधा जवाब तो नहीं हो सकता, लेकिन इतना तय है कि मौजूदा व्यवस्था में कमी है. सरकारी और निजी क्षेत्र में ऐसे छोटे बैंक खोले जाने चाहिए जो ज़रूरतमंदों को लोन दे सकें."

गर्ग कहते हैं, "मनी लेंडिंग के नए-नए तरीके इजाद होते रहे हैं. बैंक और एनबीएफ़सी जो रिज़र्व बैंक के नियम-कायदों से बंधे हुए हैं, उनसे नॉन सिक्योर्ड (बग़ैर रेहन) क़र्ज़ लेना आसान नहीं है. जैसे पहले के ज़माने में सूदखोर लाला होते थे, वैसे ही आज डिजिटल लोन ऐप्स हैं. क्योंकि लोन की रकम कम होती है, ऐसे में क़र्ज़ लेने वाले को लगता है कि 1000 रुपए के बदले महीने में बतौर ब्याज 100 रुपए ही चुकाने हैं तो उसे ये ज़्यादा नहीं लगता. अगर इसे सालाना कैलकुलेट करें तो आँखें फटी की फटी रह जाती है."

आसिफ़ इक़बाल का कहना है कि मौजूदा व्यवस्था के लिए रिज़र्व बैंक को अपने दिशानिर्देशों का दायरा बढ़ाना चाहिए. "पिछले कई साल में कुछ नए निजी बैंक खुले हैं, हालाँकि कई सरकारी बैंकों का मर्जर भी हुआ है. बढ़ते एनपीए को देखते हुए बैंक वैसे भी बैकफ़ुट पर हैं, लेकिन रिज़र्व बैंक को इस हक़ीक़त को भी समझना चाहिए कि मनी लेंडिंग व्यवस्था में सुधार ज़रूरी हैं. डिजिटल युग में क़र्ज़ देने के नियम आसान बनाए जाने चाहिए, हालाँकि ये रकम डूबे नहीं इसका पूरा प्रबंध करना अपने आप में बड़ी चुनौती होगी."

कैसे काम करते हैं ये लोन ऐप्स

ऐप्स डाउनलोड करते समय कॉन्टैक्ट्स, इमेज एक्सेस की अनुमति देनी होती है

ये ऐप्स 2,000 से 10 हज़ार रुपए की छोटी राशि का क़र्ज़ देते हैं

प्रोसेसिंग फ़ीस के नाम पर मोटी रकम काटते हैं. तक़रीबन 70 से 80 फ़ीसदी रकम अकाउंट में ट्रांसफ़र होती है.

लोन पर ब्याज दर बहुत अधिक. लोन समय पर न चुकाने पर पहले दिन से ही पेनल्टी. क़र्ज़ की उगाही के लिए लोगों को ब्लैकमेलिंग और धमकियां. कई बार क़र्ज़दारों की मॉर्फ्ड नंगी तस्वीरें उनके रिश्तेदारों को भेज देते हैं.

क़र्ज़ देने का अवैध धंधा

क़र्ज़ देने वाली कंपनी का बैंक के रूप में या ग़ैर बैंकिंग फ़ाइनेंशियल कंपनी (एनबीएफ़सी) के रूप में भारतीय रिज़र्व बैंक के पास रजिस्टर्ड होना अनिवार्य है.

रिज़र्व बैंक ने जून 2020 में एक आदेश जारी किया था जिसके मुताबिक़ ऐसी कंपनियों के बारे में पूरी जानकारी बैंक या एनबीएफ़सी की वेबसाइट पर डाली जानी चाहिए. इसके अलावा ग्राहक को इस बारे में साफ़ तौर पर बताया जाना चाहिए कि लिए गए क़र्ज़ पर उन्हें कितना सूद चुकाना होगा.

इसी साल 10 अगस्त को रिज़र्व बैंक ने डिजिटल ऋण के संबंध में एक और दिशानिर्देश जारी किया. डिजिटल ऋण देने के लिए कड़े मानदंड जारी किए. केंद्रीय बैंक ने साफ़ तौर पर कहा कि डिजिटल माध्यम से क़र्ज़ सीधे क़र्ज़ लेने वाले के बैंक खाते में जमा किया जाना चाहिए न कि किसी तीसरे पक्ष के माध्यम से.

हालाँकि चीनी ऐप्स की गतिविधियां जारी हैं और वे लगभग निष्क्रिय हो चुकी एनबीएफ़सी के माध्यम से अपना कारोबार कर रही हैं.

फ़रवरी 2022 में रिज़र्व बैंक ने पीसी फ़ाइनेंशियल सर्विसेज़ का रजिस्ट्रेशन सर्टिफ़िकेट रद्द कर दिया था. पीसी फ़ाइनेंशियल ने एक साल में कैश बीन ऐप के ज़रिए 1320 करोड़ रुपए से अधिक का कारोबार किया था.

कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय की छापेमारी के बाद ये कार्रवाई की गई थी. जाँच में पता चला कि ऐसी कई फ़र्ज़ी कंपनियां बनाई गई हैं जिनका चीन से संपर्क है.

तेज़ी से फैलता कारोबार

रिज़र्व बैंक वर्किंग ग्रुप की रिपोर्ट बताती है कि फटाफट लोन का धंधा भारत में बहुत तेज़ी से फैला है. पिछले पाँच साल की बात करें तो ये धंधा 12 गुना बढ़ गया है. साल 2017 में जहाँ इंस्टेंट ऐप से 11,617 करोड़ रुपए कारोबार किया गया, वहीं 2021 में ये बढ़कर 1 लाख 41 हज़ार 821 करोड़ रुपए पहुँच गया.

महाराष्ट्र पुलिस की साइबर इकाई के मुताबिक़, चीन के लोन ऐप्स ने पिछले दो साल में इस तरह 160 करोड़ रुपए जुटाए और चीन के एक व्यक्ति के ख़िलाफ़ लुकआउट नोटिस भी जारी किया. जाँच अधिकारियों का तो ये भी कहना है कि लोन का धंधा कर ये ऐप्स हवाला या क्रिप्टोकरेंसी के माध्यम से रक़म चीन भेज रहे हैं.

दिल्ली पुलिस ने भी हाल में अपनी जाँच में कुछ ऐसे ऐप्स की पहचान की जिसमें 3000 करोड़ रुपए से अधिक की रकम जुटाई गई और क्रिप्टोकरेंसी के ज़रिए पैसा चीन भेज दिया गया.

ज़िंदगी छीन रहे मोबाइल एप्स

इन लोन ऐप्स के ज़रिए भारी-भरकम ब्याज पर पैसा उधार लेने वालों से अगर क़र्ज़ चुकाने में ज़रा भी देरी हो जाती है तो उन्हें अक्सर धमकियों और भद्दी-भद्दी गालियों का सामना करना पड़ता है.

यह पूरी परिस्थिति इस तरह के क़र्ज़दारों के लिए एक प्रताड़ना बन गई है.

ये लोन कंपनियाँ बिना किसी अंडरराइटिंग के आकस्मिक परिस्थितियों में काम चलाने के लिए तुरत-फुरत पैसा देती हैं. बाद में ये उधार लेने वाले से मोटा पैसा वसूलती हैं.

अगर आप अपना ब्योरा मोबाइल ऐप में डालते हैं तो वे आपको लोन देते हैं. इस क़र्ज़ को आपको बाद में वापस करना होता है. जब तक आप तय वक़्त पर पैसे चुकाते हैं, तब तक सब कुछ अच्छा रहता है. चीजे़ं तब बिगड़ती हैं, जब आप लोन की रक़म चुकाने में देरी करते हैं.

साइबर मामलों के जानकारों का कहना है कि कोई ब्लैकमेल करे या धमकी दे तो क़ानूनी क़दम उठाएँ. पुलिस में प्राथमिकी दर्ज कराएँ और क़ानूनी सलाह लें.

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