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कॉरपोरेट्स को बैंकों का लाइसेंस देने को लेकर क्यों उठे सवाल
- Author, निधि राय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारतीय रिज़र्व बैंक की ओर से गठित एक आंतरिक कार्य समूह की हालिया रिपोर्ट चर्चा का विषय बनी हुई है.
इस आंतरिक कार्य समूह (आईडब्ल्यूजी) का गठन देश के निजी क्षेत्र के बैंकों के लिए मौजूदा स्वामित्व दिशा-निर्देशों और कॉरपोरेट संरचना की समीक्षा करने के लिए किया गया था.
इस कार्य समूह की सिफारिशें इसलिए चर्चा का कारण बनी हुई हैं क्योंकि इसमें सुझाव दिया गया है कि बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 में आवश्यक संशोधन के बाद बड़े कॉरपोरेट/ औद्योगिक घरानों को बैंकों के प्रवर्तकों के रूप में अनुमति दी जा सकती है.
इसका मतलब ये है कि अडानी, अंबानी, टाटा, पिरामल और बजाज जैसे बड़े कॉरपोरेट घराने बैंक के लिए लाइसेंस ले सकते हैं और अगर वो उपयुक्त पाए जाते हैं तो वो बैंक भी खोल सकते हैं.
इस बात पर बहस नहीं की जा सकती कि भारतीय बैंकिंग प्रणाली अत्यधिक कमज़ोर है.
आंतरिक कार्य समूह की रिपोर्ट कहती है, ''1947 में भारत की आज़ादी के समय व्यावसायिक बैंक (इनमें से कई बैंक कारोबारी घरानों के नियंत्रण में थे) सामाजिक उद्देश्यों को पूरा करने में पिछड़ गए थे. इसलिए, भारत सरकार ने 1969 में 14 और 1980 में छह बड़े व्यावसायिक बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया था.''
''हालांकि, नब्बे के दशक के प्रारंभ में आर्थिक सुधारों की शुरुआत के साथ, निजी बैंकों की भूमिका को तेज़ी से स्वीकारा गया है.''
रिपोर्ट में इस तथ्य पर भी विचार किया गया है कि ''भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में पिछले कुछ वर्षों में काफ़ी वृद्धि हुई है लेकिन भारत में बैंकों की कुल बैलेंस शीट अब भी जीडीपी के 70 फ़ीसद से कम है, जो कि वैश्विक स्तर पर मौजूद समकक्षों के मुक़ाबले बहुत कम है, वो भी एक बैंक-प्रभुत्व वाली वित्तीय प्रणाली के लिए.''
देश की ज़रूरत और बैंक
इसका मतलब ये है कि भारतीय बैंक एक विकासशील अर्थव्यवस्था की वित्त की बढ़ती माँग को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.
वर्तमान में स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया भारत का एकमात्र ऐसा बैंक है जो दुनिया के शीर्ष 100 बैंकों का हिस्सा है. रिपोर्ट बताती है कि निजी क्षेत्र के बैंक सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को पीछे छोड़ रहे हैं क्योंकि वो अधिक कुशल, लाभदायक और जोखिम लेने वाले हैं.
रिपोर्ट के मुताबिक़, ''सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक निजी बैंकों के हाथों लगातार बाज़ार में हिस्सेदारी खो रहे हैं, ये प्रक्रिया पिछले पाँच सालों में तेज़ हुई है.''
इसमें कोई संदेह नहीं कि अगर भारत पाँच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनना चाहता है, तो उसे अपने बैंकिंग क्षेत्र को बढ़ाना होगा और आईडब्ल्यूजी के सुझाव ज़्यादातर इसी से जुड़े हुए हैं.
समस्या कहां है?
लेकिन, आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन और पूर्व डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने इससे आने वाली समस्या को उठाया है. रघुराम राजन ने अपने लिंक्डइन अकाउंट पर इसे लेकर पोस्ट शेयर किया है.
इस तीन पेज के पोस्ट में उन्होंने कहा है कि कॉरपोरेट घरानों को बैंकिंग क्षेत्र में आने की अनुमति देना विस्फोटक है.
उन्होंने इन सिफ़ारिशों के समय को लेकर भी सवाल उठाया है.
राजन और आचार्य ने एक संयुक्त पोस्ट में कहा है, ''क्या हमें ऐसा कुछ पता चला है जो हमें औद्योगिक घरानों को बैंकिंग में अनुमति देने से पहले की सभी सावधानियों की अवहेलना करने की अनुमति देता है? हम बहस नहीं करेंगे. असल में, इसके उलट, आज ये और भी महत्वपूर्ण है कि बैंकिंग में कॉरपोरेट भागीदारी को लेकर आज़माई गईं और परखी हुईं सीमाओं को बनाए रखा जाए.''
राजन और आचार्य का कहना है कि अगर ऐसा करने की अनुमति दी जाती है तो आर्थिक ताक़त कुछ ही कॉरपोरेट्स के हाथों में सिमट कर रह जाएगी.
इन कॉरपोरेट्स को ख़ुद भी वित्तपोषण की ज़रूरत होती है और ऐसे में वो अपने ही बैंकों से जब चाहे आसानी से पैसा निकाल लेंगे. उनसे सवाल करना बहुत मुश्किल होगा. ये ऋण की बुरी स्थिति की ओर ले जाएगा.
राजन और आचार्य ने लिखा है, ''ऐसे जुड़े हुए ऋणों का इतिहास बेहद विनाशकारी रहा है. जब क़र्ज़दार ही बैंक का मालिक होगा, तो ऐसे में बैंक ठीक से ऋण कैसे दे पाएंगे? दुनियाभर की सूचनाएं पाने वाले एक स्वतंत्र और प्रतिबद्ध नियामक के लिए भी ख़राब क़र्ज़ वितरण पर रोक लगाने के लिए हर जगह नज़र रखना मुश्किल होता है. ऋण प्रदर्शन को लेकर जानकारी शायद ही कभी समय पर आती है या सटीक होती है. यस बैंक अपने कमज़ोर ऋण जोखिमों को काफ़ी समय तक छुपाने में कामयाब रहा था.''
उन्होंने यह भी कहा कि नियामक इन संस्थाओं के कारण भारी राजनीतिक दबाव में भी आ सकता है.
और भी ख़तरे
राजन और आचार्य का कहना था, ''इसके अलावा, अत्यधिक ऋणग्रस्त और राजनीति से जुड़े व्यावसायिक घरानों के पास लाइसेंस के लिए ज़्यादा ज़ोर लगाने की क्षमता होगी. इससे हमारी राजनीति में पैसे की ताक़त का महत्व और अधिक बढ़ जाएगा.''
दोनों ने इस बात पर सहमति जताई है कि भारत को और बैंकों की ज़रूरत है क्योंकि जीडीपी के लिए जमा धन बहुत कम है यानी देश में अपने देयताएं चुकाने की कितनी क्षमता है.
उन्होंने इस पर ज़ोर दिया है कि आरबीआई ने पहले "औद्योगिक घरानों को पेमेंट बैंकों के साथ आने की अनुमति दी है. ये बैंक रिटेल क़र्ज़ (जैसे पर्सनल लोन, क्रेडिक कार्ड और गिरवी रखना) देने के लिए अन्य बैंकों के साथ गठजोड़ कर सकते हैं."
उन्होंने कहा है कि जब हमारे पास पहले से ये विकल्प हैं तो हमें औद्योगिक घरानों को पूरा बैंक खोलने का लाइसेंस देने की क्या ज़रूरत है. अभी क्यों, वो भी उस समय पर जब हम आईएलएफएस और यस बैंक की विफलता से सबक़ सीखने की कोशिश कर रहे हैं?
इस सिफ़ारिश के समय और इरादों के अलावा दोनों ने ये सुझाव दिया है कि ख़राब प्रदर्शन करने वाले सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को कॉरपोरेट्स के हवाले कर दिया जाना बेहद मूखर्तापूर्ण होगा.
इन सार्वजनिक बैंकों को कॉरपोरेट्स को देने का मतलब है कि हम इन मौजूदा बैंकों के ख़राब प्रशासन को कॉरपोरेट्स के विवादित स्वामित्व के हवाले कर देंगे.
अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी एसएंडपी ग्लोबल रेटिंग्स ने भी इन सिफ़ारिशों को लेकर चिंता ज़ाहिर की है. एजेंसी ने कहा है, ''कॉरपोरेट्स को बैंक खोलने की इजाज़त देने में हितों में टकराव, आर्थिक ताक़त का केंद्रीयकरण और वित्तीय स्थिरता से जुड़ी आंतरिक कार्य समूह की चिंताएं संभावित जोखिम हैं.''
इस बात में कोई शक नहीं है कि भारत को वृद्धि करने के लिए वित्त की आवश्यकता है और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक ऐसा करने में सक्षम नहीं हैं.
सरकार कोरोना वायारस महामारी के कारण पहले बड़ी चुनौतियों का सामना कर रही है. ऐसे में वित्तीय क्षमता रखने वाले बड़े औद्योगिक घराने देश में पैसे की कमी को पूरा कर सकते हैं. लेकिन, इन कॉरपोरेट्स को पूरी तरह बैंकों का मालिक बनने देना कितना सुरक्षित है, इस सवाल का जवाब आरबीआई को देना बाक़ी है.
आरबीआई ने समिति की रिपोर्ट पर अपने विचार व्यक्त करने के लिए आमंत्रित किया है जिसे 15 जनवरी, 2021 तक प्रस्तुत किया जा सकता है.
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