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भारतीय अर्थव्यवस्था को आरबीआई की ब्याज दर कटौती से नहीं मिली राहत
- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 12 मई को लॉकडाउन की वजह से देश की तेज़ी से गिरती अर्थव्यवस्था को पटरी पर दोबारा लाने के लिए 20 लाख करोड़ रुपये के एक बड़े आर्थिक पैकेज की घोषणा की थी. इसे देश के सकल घरेलू उत्पाद का 10 प्रतिशत बताया गया.
लेकिन कई अर्थशास्त्रियों ने कहा कि इस पैकेज की एक बड़ी राशि को अप्रैल में घोषित किए गए आर्थिक पैकेज में शामिल कर बड़ा बनाया गया है, असल में ये पैकेज 10 लाख करोड़ रुपये का है.
उधर भारतीय रिजर्व बैंक ने व्यापारियों और आम लोगों को राहत देने के लिए ब्याज़ दर में दो बार कटौती की. लॉकडाउन से पहले भी मांग बढ़ाने के लिए आरबीआई ने दर में कटौती की थी.
लेकिन मांग में जारी गिरावट से पता चलता है कि ब्याज़ दरों में कटौती के बावजूद अर्थव्यवस्था की हालत काफ़ी ख़राब है. इसका उदाहरण अप्रैल-जून की तिमाही की आर्थिक स्थिति के नतीजे हैं जिसके दौरान देश का सकल घरेलू उत्पाद 23. 9 प्रतिशत के हिसाब से सिकुड़ गया यानी जीडीपी लगभग एक चौथाई कम हो गयी.
एक और आर्थिक पैकेज?
इतने बड़े झटके के बाद अब बात हो रही है कि एक और आर्थिक पैकेज की ज़रूरत हैं. प्रधानमंत्री से लेकर वित्त मंत्री ने इस तरफ इशारा भी किया है. लेकिन सरकार दुविधा में नज़र आती है क्योंकि कोरोना महामारी कम होने के बजाय तेज़ी से बढ़ रही है और आर्थिक गतिविधियों के दोबारा पटरी पर लौटने में बाधा डाल रही है.
आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने सोमवार (7 सितंबर ) को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म लिंक्डइन पर एक टिप्पणी में कहा है कि सरकार आर्थिक पैकेज देने से इसलिए हिचक रही है क्योंकि वो शायद भविष्य में पैकेज देने के लिए पैसे रख रही है.
उनका कहना था, "भारत में महामारी अभी भी बढ़ रही है. इसलिए ऐसे ख़र्च जिनके लिए आपको फ़ैसले करने पड़ते हैं, विशेष रूप से रेस्त्रां जैसी जगहों पर जाना जहाँ काफ़ी लोगों से संपर्क हो सकता है, तो इससे जुड़ी नौकरियाँ वायरस के ख़त्म होने तक कम रहेंगी. ऐसे में सरकार की ओर से दी जाने वाली राहत महत्वपूर्ण हो जाती है."
वरिष्ठ अर्थशास्त्री रथिन रॉय ने पिछले महीने स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया के एक वेबिनार में कहा था कि ऐसा मानना कि ब्याज़ दरों में कटौती से अर्थव्यवस्था विकास के रास्ते पर लौट रही है, ग़लत होगा. ये काम नहीं कर रहा है.
वित्त मंत्रालय से प्रभावित थिंक टैंक नेशनल इंस्टीच्यूट ऑफ़ पब्लिक फ़ाइनेंस एंड पॉलिसी के निदेशक रथिन रॉय कहते हैं, "मैं आरबीआई की मौद्रिक नीति के बयानों से सहमत नहीं हूं, जिसमें दरों में कटौती के बारे में गवर्नर के क़दम भी शामिल हैं."
आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास ने महामारी की शुरुआत के बाद दो चरणों में दरों में 1.15 प्रतिशत की कमी की थी. इससे पहले एक प्रतिशत से अधिक की कटौती हो चुकी थी.
पैकेज से क्यों नहीं मिली राहत?
आर्थिक मामलों के जानकार पहले वाले आर्थिक पैकेज और आरबीआई के ब्याज़ दरों में कटौती जैसे क़दम उठाए जाने के बाद से ही कह रहे हैं कि इस पैकेज में खोट है.
सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के सूत्रों ने कहा, "प्रधानमंत्री ने आपूर्ति पर पूरा ध्यान दिया और आर्थिक पैकेज के कारण बाज़ार में लिक्विडिटी बढ़ी (यानी लोगों और व्यवसायों को क़र्ज़ देने के लिए बैंकों और वित्तीय संस्थाओं के पास पर्याप्त नक़दी आई). लेकिन अधिकतर लोगों की जेबों में पैसे नहीं डाले गए जिसके कारण मांग में बढ़ोतरी नहीं आ सकी है."
उनका कहना है कि मई में साधारण लोगों के बैंक खातों में अगले छह महीने के लिए हर महीने 10 हज़ार रुपये डालने चाहिए थे.
छोटे किसानों और महिलाओं को मनरेगा और दूसरी योजनाओं के ज़रिए रोज़गार दिए गए और नकदी भी. लेकिन माँग बढ़ाने के लिए मध्य वर्ग और अच्छे वेतन प्राप्त करने वालों को आर्थिक मदद नहीं दी गई.
बीजेपी सूत्रों के अनुसार इस बात पर सरकार में सहमति है कि दूसरा आर्थिक पैकेज देना चाहिए लेकिन कब इस पर सहमति नहीं बन पा रही है.
सूत्रों के मुताबिक़ 'दूसरे बड़े पैकेज पर विचार हो रहा है लेकिन इसे कब लागू किया जाएगा इस पर फ़ैसला नहीं लिया जा सका है.'
पैसा नहीं तो खर्च क्या करें?
आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ विवेक कॉल के अनुसार लोगों के पास पैसे नहीं हैं इसलिए वो खर्च नहीं कर रहे हैं लेकिन जिनके पास पैसे हैं वो भी अभी खर्च नहीं कर रहे हैं.
वो कहते हैं, "महामारी के कारण लोग घर पर ही रह रहे हैं, और खर्च का गुणक प्रभाव काफ़ी हद तक कम हो गया है. इसके कारण कई व्यवसायों ने उतनी कमाई नहीं की है जितनी वो कर सकते हैं या करते आए हैं. इसके चलते लोगों को नौकरियों से निकाला जा रहा है.
विवेक कॉल कहते हैं, "इसका नतीजा ये है कि लोग नौकरियों से हटाए जा रहे हैं. कुछ अन्य मामलों में वेतन में कटौती की गई है और नौकरियों के ऑफर को वापस ले लिया गया है."
वो कहते हैं कि इन सबकी वजह से समस्या बढ़ती चली गई और इस प्रक्रिया में और भी अधिक नौकरियाँ गईं. हमें आश्चर्य नहीं हुआ कि अप्रैल से जून के दौरान निजी खपत 26.7% थी.
सरकार को कौन से कदम उठाने चाहिए?
आर्थिक मामलों के पत्रकार स्वप्न कुमार चंचल कहते हैं कि मोदी सरकार को अर्थव्यवस्था को दोबारा विकास की पटरी पर लाने के लिए चार क़दम उठाने चाहिए.
पहला ये कि नए आर्थिक पैकेज में लोगों की जेबों में कुछ महीने के लिए पैसे डालने का प्रावधान हो.
दूसरा, कि कुछ उत्पादों में जीएसटी की दर घटा दे (जैसे कि मोटर साइकिल और स्कूटर में).
तीसरा, इसे एक अवसर समझ कर आर्थिक सुधार लाने की कोशिश करे.
और चौथा, कैबिनेट से मंज़ूर सरकारी कंपनियों का विनिवेश और निजीकरण शुरू कर दें.
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