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कोलकाता रेप-मर्डर केस: क्या पहली बार भारी दबाव में हैं ममता बनर्जी?
- Author, प्रभाकर मणि तिवारी
- पदनाम, कोलकाता से, बीबीसी हिंदी के लिए
"आर.जी.कर अस्पताल की घटना के अभियुक्त को रविवार तक फांसी दे दी जाए.. बांग्लादेश की तरह यहां मेरी सरकारी भी गिराने की कोशिश चल रही है.. मुझे सत्ता का कोई लालच नहीं है.. इस घटना पर सीपीएम और भाजपा राजनीति कर रही हैं.. आर.जी. कर अस्पताल पर हमले के पीछे भी वाम और राम का ही हाथ है..’’
यह बयान कोलकाता के आर.जी.कर अस्पताल में जूनियर डॉक्टर के साथ रेप और हत्या के मामले में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की ओर से बीते दो दिनों के दौरान दिए गए हैं.
अमूमन इससे पहले उनको किसी मामले में लगातार ऐसी बयानबाज़ी करते नहीं देखा गया है.
इससे राजनीतिक हलकों में सवाल उठ रहे हैं कि क्या ममता इस घटना की वजह से भारी दबाव में हैं? क्या उनको अपने सबसे बड़े वोट बैंक के बिखरने का ख़तरा नज़र आ रहा है? क्या अपने तीसरे कार्यकाल में उनको पहली बार ऐसी कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है?
ममता का सड़क पर उतरना
अभियुक्त को फांसी की सज़ा की मांग को लेकर शुक्रवार शाम को ममता के सड़क पर उतरने से इन चर्चाओं और सवालों को और बल मिल गया है.
अमूमन वो किसी घटना के विरोध में सड़क पर नहीं उतरतीं. चुनावी पदयात्राओं को छोड़ दें तो आख़िरी बार उनको एनआरसी और नागरिकता (संशोधन) क़ानून के विरोध में ही इस तरह सड़क पर उतरते देखा गया था.
इस घटना के बाद जहां सरकार और पुलिस की भूमिका सवालों के घेरे में है वहीं ‘रीक्लेम द नाइट’ की अपील पर राज्य के क़रीब तीन सौ स्थानों पर महिलाओं के स्वतः स्फूर्त जमावड़े और विरोध प्रदर्शन के कारण उनके इस सबसे मज़बूत वोट बैंक के बिखरने का भी ख़तरा पैदा हो गया है.
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि फ़िलहाल राज्य में कोई चुनाव भले नहीं हो, विपक्ष इस मुद्दे को भुनाने और अगले विधानसभा चुनाव तक इसे जीवित रखने की कोशिश ज़रूर करेगा. यह कोशिशें शुरू भी हो गई हैं.
विपक्ष कितना हमलावर और ममता के चेहरे पर चिंता की लकीरें
ममता बनर्जी सरकार पर चौतरफ़ा हमले हो रहे हैं. भाजपा और सीपीएम तो आक्रामक तौर पर उसका विरोध कर रही है, कांग्रेस भी मुख्यमंत्री के ख़िलाफ़ टिप्पणियां कर रही है. इनमें राहुल गांधी और प्रदेश कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी शामिल हैं.
ममता ने शुक्रवार शाम को कोलकाता के मौलाली से धर्मतल्ला इलाक़े तक क़रीब डेढ़ कि.मी. की पदयात्रा की. पार्टी के तमाम सांसद और नेता उनके साथ इस पदयात्रा में शामिल थे. उन लोगों का एक ही नारा था कि 'दोषियों को सज़ा देनी होगी. उनको फांसी पर लटकाना होगा.'
उन लोगों ने अपने हाथों में पोस्टर और बैनर ले रखे थे और कुछ लोगों ने अपने गले में इसी मांग में तख़्ती भी टांग रखी थी. ममता हाथ जोड़े सबसे आगे चल रही थीं. अपने स्वभाव के अनुरूप ही वो बीच-बीच में रुक कर आम लोगों से भी बतिया रही थीं.
लेकिन उनके चेहरे पर अमूमन रहने वाले आत्मविश्वास की जगह चिंता की लकीरों ने ले रखी थी. यह कहना ज़्यादा सही होगा कि पदयात्रा के दौरान यह लकीरें कुछ गहरी ही नज़र आ रही थीं.
पदयात्रा के दौरान बीबीसी ने कुछ आम लोगों से भी बात की. हालांकि वह लोग फोटो खिंचाने के लिए राज़ी नहीं हुए.
‘ममता और उनकी सरकार फंस गई है’
जिस सड़क से उनकी यह यात्रा गुज़र रही थी, उसी सड़क के किनारे एक पुराने दो मंज़िला मकान में रहने वाले सेवानिवृत्त शिक्षक मंजूनाथ विश्वास का कहना था, "इस बार ममता और उनकी सरकार फंस गई है. अगर उसने पूरा मामले की लीपापोती का प्रयास नहीं किया होता तो आज सड़क पर नहीं उतरना पड़ता. ख़ासकर प्रिंसिपल का बचाव करना और उसको इस्तीफ़े के कुछ घंटों के भीतर नई बहाली देना उनके गले की फांस बनता जा रहा है.”
विश्वास के मुताबिक़, ममता के ख़िलाफ़ मुद्दों की तलाश में जुटे विपक्ष ने अब इस मुद्दे को लपक लिया है.
इसी सड़क पर एक दुकान चलाने वाले मोहम्मद साबिर का कहना था, "मुख्यमंत्री महिला हैं, पार्टी में 11 महिला सांसद है. फिर भी एक महिला के साथ घटी ऐसी बर्बर घटना के बाद सरकार वैसी सक्रियता नहीं दिखा सकी, जैसी इस मामले में उम्मीद थी.”
उन्होंने कहा कि सीबीआई इस घटना की जांच ज़रूर कर रही है. लेकिन बंगाल के मामले में उसका ट्रैक रिकॉर्ड भी बेहतर नहीं है.
यही वजह है कि विपक्षी हमले की धार कुंद करने के लिए अब ममता भी राज्य के आम लोगों के सुर में सुर मिलाते हुए दोषियों के लिए फांसी की मांग कर रही हैं.
ममता का 'वाम और राम' पर आरोप
पदयात्रा के बाद ममता ने एक सभा को भी संबोधित किया. वहां अपने भाषण में उन्होंने विपक्षी दलों की खिंचाई के साथ ही सीबीआई जांच रविवार तक पूरी कर दोषियों को फांसी देने की भी मांग दोहराई.
उन्होंने सवाल उठाया कि हाथरस, उन्नाव और मणिपुर में जब ऐसी घटनाएं हुईं तो केंद्र ने कितनी केंद्रीय टीमों को वहां भेजा था? बंगाल में अगर किसी को चूहा भी काट ले तो केंद्र की 55 टीमें यहां आ जाती हैं.
मुख्यमंत्री ने नाराज़गी भरे स्वर में कहा कि उन्होंने जांच पूरी करने के लिए 164 लोगों की विशेष टीम बनाई थी और रविवार तक का समय मांगा था. जांच की प्रक्रिया लंबी होती है और इसमें समय लगता है. लेकिन किसी को भरोसा नहीं हुआ. इस पर राजनीति की गई और अब सीबीआई जांच कर रही है. वह रविवार तक जांच पूरी कर दोषी को फांसी की सज़ा दिलाए.
ममता ने अपनी सरकार की ओर से महिलाओं के कल्याण के लिए किए गए कार्यों को गिनाते हुए कहा कि एकमात्र उनकी पार्टी ने ही 38 फ़ीसदी महिलाओं को लोकसभा में भेजा है. नगर पालिका में 50 फीसदी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं. स्वास्थ्य साथी कार्ड पर भी परिवार की मुखिया के तौर पर घर की महिला का ही नाम है. महिलाओं के लिए कन्याश्री और रूपश्री जैसी तमाम योजनाएं चलाई जा रही हैं.
मुख्यमंत्री ने एक बार फिर विपक्षी दलों ख़ासकर 'वाम और राम' यानी लेफ्ट और भाजपा पर इस घटना पर राजनीति करने का आरोप लगाया.
पहला मामला नहीं
वैसे, ममता बनर्जी सरकार पर ऐसी किसी घटना की लीपापोती का प्रयास करने के आरोप पहली बार नहीं लगे हैं.
उनके सत्ता में आने के सालभर बाद यानी साल 2012 में कोलकाता के पॉश इलाक़े पार्क स्ट्रीट में एक महिला के साथ चलती कार में सामूहिक बलात्कार की घटना ने पूरी दुनिया में सुर्खियां बटोरी थीं.
पीड़िता ने सामने आकर सार्वजनिक रूप से यह आरोप लगाया था. लेकिन तब ममता ने इसे ‘सजाया हुआ मामला’ कहा था. इससे उनकी काफ़ी किरकिरी हुई थी.
उसके अगले साल ही कामदुनी में 20 साल की एक कॉलेज छात्रा के साथ आठ लोगों ने सामूहिक बलात्कार किया था. उसके बाद उसकी हत्या कर शव को खेत में फेंक दिया गया था. आरोप है कि इस मामले की जांच इतनी ढीले-ढाले तरीक़े से की गई कि अभियुक्तों को मामूली सज़ा ही मिल सकी.
बीते साल कामदुनी मामले ने उस समय पर सुर्खियां बटोरीं जब कलकत्ता हाईकोर्ट ने दोषियों की सज़ा माफ़ कर दी थी. उस फ़ैसले के ख़िलाफ़ सैकड़ों महिलाओं ने सड़कों पर उतर कर विरोध जताया था.
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि ममता हर बार ऐसी चुनौतियों और अपने ख़िलाफ़ उठने वाले राजनीतिक तूफान से निपटने में कामयाब रही हैं. लेकिन इस घटना ने उनकी पुलिस, सरकार की पारदर्शिता और महिलाओं की सुरक्षा के सवाल पर उनकी सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया है.
क्या और वजहें हैं जिससे ममता सरकार निशाने पर
विश्लेषकों के मुताबिक, दरअसल आम लोगों में आक्रोश इस घटना से ज़्यादा इस बात को लेकर है कि प्रशासन और पुलिस ने इस मामले में कथित तौर पर लीपापोती का प्रयास किया.
पहले तो नौ घंटे तक किसी को इस घटना की जानकारी नहीं मिली. उसके बाद मृतका के घरवालों को पहले बताया गया कि उनकी बेटी बीमार है. कुछ देर बाद उनसे फ़ोन पर कहा गया कि उसने आत्महत्या कर ली है. उसके बाद जब उस जूनियर डॉक्टर के माता-पिता अस्पताल पहुंचे तो उनको पुलिस कार्रवाई जारी रहने की बात कह कर तीन घंटे तक एक कमरे में बिठाए रखा गया.
वहीं प्रिंसिपल संदीप घोष का इस्तीफ़ा स्वीकार करने की बजाय उनको कोलकाता में ही नेशनल मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल पद पर तैनात कर दिया गया. इस फ़ैसले ने आंदोलन कर रहे छात्र और जूनियर डॉक्टरों की नाराज़गी में आग में घी डालने का काम किया.
समाज विज्ञान के प्रोफ़ेसर रहे अनिरुद्ध पाल कहते हैं, "ममता बनर्जी सरकार के ख़िलाफ़ यह नाराज़गी एक दिन में नहीं पनपी है. शिक्षक भर्ती के अलावा राशन और कोयला जैसे घोटाले, उत्तर दिनाजपुर और दक्षिण 24-परगना समेत कई इलाकों में कंगारू अदालतों के बर्बर फ़ैसलों और इनमें तृणमूल कांग्रेस के नेताओं के शामिल होने के सबूत आने के कारण आम लोगों के मन में नाराज़गी जमती जा रही थी. नाराज़गी की उस आग को पलीता लगाने का काम किया आर.जी.कर की घटना ने. इससे ममता के सामने मुश्किल पैदा हो गई है."
राजनीतिक विश्लेषक शिखा मुखर्जी कहती हैं, "ममता की पदयात्रा तो विपक्षी दलों को उनका राजनीतिक जवाब थी. लेकिन ममता के लिए विपक्षी दलों के हमले उतनी चिंता का विषय नहीं है. वो पहले भी संदेशखाली समेत ऐसे तमाम हमलों को कामयाबी के साथ झेल चुकी हैं. लेकिन इस बार उनकी सबसे बड़ी चिंता इस घटना के ख़िलाफ़ भारी तादाद में आम महिलाओं और छात्राओं का सड़क पर उतरना और सरकार को कठघरे में खड़ा करना है.”
“यह महिलाएं ही ममता का सबसे बड़ा वोट बैंक हैं. साल 2008 के पंचायत चुनावों से ही ममता की पार्टी को इस वोट बैंक का भारी समर्थन मिलता रहा है. 2021 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की ओर से बेहद कड़ी चुनौती के बावजूद इस वोट बैंक के सहारे ही पार्टी तीसरी बार सत्ता में आने में कामयाब रही थी."
शिखा कहती हैं कि ‘ममता को अब तक यह नहीं सूझा है कि महिलाओं की नाराज़गी दूर करने के लिए आख़िर वो कौन सी रणनीति बनाएं. रीक्लेम द नाइट के स्वतः स्फूर्त और बेहद कामयाब आयोजन ने उनके माथे पर चिंता की लकीरों को काफ़ी गहरा कर दिया है. यही वजह है कि उन्होंने अब तक उस अभियान पर एक शब्द भी नहीं कहा है. उल्टे पदयात्रा के बाद सभा में भी उन्होंने महिलाओं के लिए किए गए कार्यों को ही गिनाया है. महिलाओं का यह विरोध ममता बनर्जी सरकार के सिर पर तलवार की तरह लटक रहा है.’
वो कहती हैं कि अगले विधानसभा चुनाव में दो साल से भी कम समय बचा है. ऐसे में अगर महिलाओं का उनकी सरकार से मोहभंग होता है तो ममता और तृणमूल कांग्रेस का राजनीतिक करियर ख़तरे में पड़ सकता है.
ममता बनर्जी के सामने ये है असली चुनौती
दूसरी ओर, विपक्ष इस मुद्दे पर लगातार दबाव बढ़ा रहा है. सीपीएम और भाजपा पहले दिन से ही इस मुद्दे पर सरकार और पुलिस के ख़िलाफ़ आक्रामक हैं. जिस रात हज़ारों महिलाएं सड़क कर उतरी थीं उसी रात सीपीएम की युवा और छात्र शाखा ने भी आर.जी.कर अस्पताल समेत पूरे राज्य में कई स्थानों पर अलग से विरोध प्रदर्शन आयोजित किया था.
भाजपा भी सरकार पर लगातार हमले कर रही है. अस्पताल पर हमले के मामले में ममता ने भले ‘राम और वाम’ को ज़िम्मेदार ठहराया हो, विधानसभा में विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी ने अपने एक ट्वीट में आरोप लगाया था कि ममता ने ही टीएमसी के गुंडों से अस्पताल पर हमला करवाया था.
प्रदेश अध्यक्ष सुकांत मजूमदार ने कोलकाता के पुलिस आयुक्त विनीत गोयल के इस्तीफ़े की मांग की है.
उन्होंने शुक्रवार को कहा, "पुलिस आयुक्त को उस घटना की ज़िम्मेदारी लेते हुए फ़ौरन इस्तीफ़ा दे देना चाहिए."
पार्टी ने शुक्रवार को दोपहर दो से चार बजे तक सड़कों पर वाहनों की आवाजाही ठप कर दी. विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने सुकांत मजूमदार को भी हिरासत में ले लिया था.
उधर, कांग्रेस ने भी इस मुद्दे पर इंडिया गठबंधन में अपने सहयोगी दल तृणमूल कांग्रेस की सरकार पर सवाल उठाए हैं.
प्रदेश कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने कहा है कि एक महिला मुख्यमंत्री के राज में भी महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं. उनका कहना था कि हैरानी इस बात से है कि घटना के बाद भी लीपापोती कर दोषियों को बचाने का नाकाम प्रयास किया गया. शुरू से ही परिवार को गलत सूचना दी जाती रही.
राजनीतिक विश्लेषकों कहना है कि ममता बनर्जी समझ गई हैं कि इस घटना के दूरगामी नतीजे हो सकते हैं. इसलिए वो पुलिस आयुक्त से रोज़ाना सफ़ाई दिला रही हैं. शुक्रवार को भी पुलिस आयुक्त ने पत्रकारों से कहा कि इस बारे में ग़लत सूचनाएं फैलाई जा रही हैं. ऐसी सूचनाओं से पुलिस की साख पर सवाल उठ रहे हैं जबकि पुलिस ने अपनी जांच में बेहद ईमानदारी बरती थी. ख़ुद ममता बनर्जी ने भी इन कथित अफ़वाहों की आलोचना की है. उनका कहना था कि हर ख़बर सच नहीं होती.
वरिष्ठ पत्रकार तापस मुखर्जी कहते हैं, "ममता के माथे पर चिंता की गहराती लकीरें राजनीतिक विरोधियों के हमलों से नहीं बल्कि अपने महिला वोट बैंक के बिखरने के डर का संकेत है. यही वजह है कि यह मामला सीबीआई के हाथों में जाने के बाद वो कई ऐसी टिप्पणियां कर रही हैं जो उनके स्वभाव से मेल नहीं खाता."
इस मामले की जांच कर रही सीबीआई के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बीबीसी को बताया, "ममता बनर्जी का मांग के मुताबिक रविवार तक इस मामले की जांच पूरी करना संभव ही नहीं है. हम कई पहलुओं की जांच कर रहे हैं. तमाम दस्तावेज़ों की जांच के अलावा दर्जनों लोगों से पूछताछ और सीसीटीवी कैमरे के फुटेज खंगालने में लंबा समय लग सकता है."
दूसरी ओर, सीबीआई ने शुक्रवार को आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज के पूर्व प्रिंसिपल संदीप घोष से भी लंबी पूछताछ की. इसके अलावा जूनियर डॉक्टर जिस विभाग में काम रही थी उसके विभागाध्यक्ष समेत दो लोगों से भी पूछताछ की गई है. सीबीआई के एक अधिकारी ने बताया कि अभी दर्जनों लोगों से पूछताछ की जानी है.
उधर, अस्पताल पर हमले के मामले में पुलिस ने अब तक 24 लोगों को गिरफ्तार किया है. उनमें एक महिला भी शामिल है.
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि ममता बनर्जी पहले के कई मामलों की तरह इस बार भी अपनी सरकार को भंवर से बचाने में कामयाब रहेंगी या नहीं, इसका जवाब तो आने वाले दिनो में ही मिलेगा. लेकिन फ़िलहाल तो महिला वोट बैंक को अटूट रखने की कड़ी चुनौती से जूझ रही हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित