अब तो सवाल है कि नफ़रत ने किसे बीमार नहीं बनाया: ब्लॉग

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- Author, नासिरूद्दीन
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
इस वक़्त हम हिंसा से घिरे हैं. भारत के पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर में लंबे वक़्त से हिंसा हो ही रही है.
इस हिंसा के साथ देश के अलग-अलग हिस्सों में जो हो रहा है, वह भी कम फ़िक्र करने वाला नहीं है. पिछले चंद दिनों की ही कुछ घटनाओं पर नज़र डालते हैं.
दृश्य-एक: एक व्यक्ति ट्रेन के ऊपर वाली सीट पर नमाज़ पढ़ रहा है. नीचे की सीट पर कुछ नौजवान बैठे हैं. वे ज़ोर-ज़ोर से भजन गा रहे हैं. प्रतिक्रिया जानने की बेचैनी में वे बीच-बीच में ऊपर की ओर भी देखते हैं. किसी को भजन याद नहीं है. वे मोबाइल का सहारा ले रहे हैं. बेताल तालियाँ बजा रहे हैं. वे सभी फैल कर बैठे हैं. उनके सामने एक बुज़ुर्ग महिला ट्रेन के फ़र्श पर बैठी है.
दृश्य दो: एक व्यक्ति ख़ून से लथपथ पड़ा है. उसके पास एक सिपाही खड़ा है. वह बता रहा है कि यह कौन लोग हैं और इनसे बचने के लिए किन्हें वोट देना चाहिए. सिपाही के ठीक पीछे कुछ लोग बैठे हैं. सामने लोग बैठे हैं.
इस सिपाही पर तीन अलग-अलग बोगियों में चार लोगों की हत्या का आरोप है. इनमें एक उसका वरिष्ठ अफ़सर है. तीन एक ही धर्म के मानने वाले लोग हैं. जैसा अब तक सामने आई ख़बरें बता रही हैं, वह इनकी पहचान उनकी वेशभूषा से करता है. तब मारता है.
दृश्य तीन: एक और वीडियो है. उस वीडियो में जो शख़्स है, उस पर एक ही मज़हब के दो लोगों को जलाकर मारने का आरोप है. वह ‘गो-रक्षक’, ‘धर्म रक्षक’ के रूप में मशहूर है. वह पिछले कई महीने से दो राज्यों की पुलिस की पकड़ से दूर है.
वह एक जुलूस में शामिल होने की बात कर रहा है. जिस इलाके से जुलूस निकलना है, वहाँ ज़बर्दस्त तनाव है. जुलूस निकलता है. हिंसा होती है. उसके बाद वीडियो और अफ़वाहों का दौर शुरू होता है. हिंसा की आग दिल्ली के आसपास के कई इलाकों में फैल जाती है. कई लोग हताहत हैं.

क्या ये ‘छिटपुट’ घटनाएँ हैं?
ऐसी घटनाएँ हर कुछ दिनों पर हमारे सामने आ जा रही हैं. हमें लगता है कि ये ‘छिटपुट’ घटनाएँ हैं. ‘छिटपुट’ लोग शामिल हैं. इनका कोई ठोस वजूद नहीं हैं. या यह हल्ला मचाने वाली घटनाएँ नहीं हैं.
ऊपर गिनाई गई तीनों घटनाएँ भी अलग-अलग क्षेत्र की हैं. इसलिए लग सकता है कि यह अलग-अलग ही हो रही हैं. सच्चाई ऐसी नहीं है. इन तीनों में एक बात है. तीनों की जड़ में नफ़रत है. एक धर्म और उसके मानने वालों के प्रति नफ़रत है. एक-दूसरे को बर्दाश्त न करने की चाहत है. बल्कि दूसरे को ख़त्म करने या दोयम दर्जे का बना देने की हसरत है.

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ये हिंसा, इतनी बेख़ौफ़ कैसे हो गई?
इन सबमें साफ़-साफ़ या कहीं-कहीं थोड़ा ढके-छिपे तौर पर हिंसा शामिल है. यह कोई सामान्य हिंसा नहीं है. यह नफ़रत से उपजी हिंसा है. नफ़रत का आधार बस एक धर्म का होना है. यह ज़हरीली मर्दानगी से भरी बेख़ौफ़ हिंसा है.
सवाल है, यह नफ़रत इस मुकाम पर कैसे पहुँच गई कि उसने खुलेआम हिंसा का रूप ले लिया है? इस हिंसा की बात करने में कोई लाज-लिहाज़ नहीं. कोई डर नहीं.
देश-समाज को इस हालत तक पहुंचाने में सबसे बड़ी भूमिका ताक़त की जगहों पर बैठे लोगों की है. इनमें लीडर और मीडिया का बड़ा तबका शामिल है. अगर यह बात कुछ अटपटी लग रही हो तो हम कुछ सवालों पर ग़ौर कर सकते हैं.
जो नफ़रत बो रहे हैं, वे इतना बेख़ौफ़ कैसे हो गए कि हत्या का मुलज़िम ख़ुलेआम वीडियो बनाकर लोगों को आह्वान करता है? कैसे एक सिपाही हत्याएँ करने के बाद उन लोगों के नाम लेता है, जो सत्ता में हैं?
कैसे एक व्यक्ति हाथ में गँड़ासा लिए हुए यह कहने की हिम्मत कर पा रहा है कि बदला लिया जाएगा? कैसे नौजवानों का एक समूह इबादत में बाधा पहुँचा रहा है? या कैसे सोशल मीडिया के अलग-अलग मंचों पर अलग-अलग लोग मारने और बदला लेने की बात कर रहे हैं?
इसीलिए यह कहना ज़्यादा सटीक होगा कि इस नफ़रत का सोता नीचे नहीं, ऊपर है. उसने हमारी पूरी सोच को दो खानों में बाँट दिया है. टीवी पर होने वाली बहसों का ज़ोर है कि अब कुछ लोगों का ‘अंतिम उपाय’ किया जाना चाहिए. यह ‘अंतिम उपाय’ का विचार, नफ़रत का फैलाव नहीं है? हिंसा का उकसावा नहीं है? नफ़रत और हिंसा को जायज़ ठहराना नहीं है? मगर ऐसा खुलेआम हो रहा है.

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क्या वह मानसिक रूप से सेहतमंद नहीं है?
जैसे ही वीडियो आया, ट्रेन में हत्याओं के अभियुक्त सिपाही के बारे में कहा जाने लगा कि वह मानसिक रूप से सेहतमंद नहीं है. ऐसा कहने वालों का मक़सद साफ़ है, वे उसके अपराध को नफ़रती अपराध या सोचा-समझा अपराध मानने को तैयार नहीं है. वे उसे इस शक के बिना पर उसके पक्ष में माहौल बनाने की क़ोशिश कर रहे हैं. मगर क्या वह वाक़ई सेहतमंद नहीं है?
जी, वह वाक़ई सेहतमंद नहीं है. मानसिक तौर पर और दिल से वह एक सामान्य इंसान जैसा नहीं बचा. वह नफ़रत से भरे हिंसक इंसान में बदल गया है.
हिंसक मर्दानगी, उसके गले का हार बन गई है. जहाँ उसे कुछ समुदाय के लोग दुश्मन नज़र आने लगे हैं. उसकी ज़िम्मेदारी सबकी हिफ़ाज़त करने की है. मगर उसे लगता है कि कुछ लोगों को मारकर ही बाकियों की हिफ़ाज़त की जा सकती है. वह ऐसा कर देता है. बेझिझक.
वह वाक़ई दिमाग़ी तौर पर सेहतमंद नहीं है. तब ही तो वह एक डिब्बे से दूसरे डिब्बे और दूसरे से तीसरे डिब्बे में एक ही धर्म के लोगों की पहचान कर लेता है. उन पर गोलियाँ चलाता है. उनकी हत्याएँ करता है.
दिमाग़ी रूप से सेहतमंद इंसान किसी की जान नहीं ले सकता है. वह धर्म या जाति या क्षेत्र देखकर नफ़रत नहीं कर सकता है. मगर ऐसा अस्वस्थ, वह अकेला सिपाही नहीं है. यहीं भूल की गुंजाइश है. वे नौजवान, जिन पर देश का भविष्य है, वे भी दिमाग़ी रूप से सेहतमंद नहीं बचे. वे लोग जो सिपाही को गोली मारते देखते रहे. उसका भाषण सुनते रहे. अपने काम में लगे रहे. वे भी दिमाग़ी तौर पर सेहतमंद कैसे कहे जा सकते हैं?
टीवी की बहसें तो हैं ही, व्हाट्सएप, फ़ेसबुक जैसे ‘सामाजिक मंच’ ने समाज के बड़े तबके को ऐसा ही दिमाग़ी तौर पर बीमार बना दिया है. वे ऐसे ही होते जा रहे हैं. नफ़रत के वाहक. नफ़रत के तमाशबीन. नफ़रत की घटनाओं में उनकी रज़ामंदी शामिल है.
चूँकि वे सीधे-सीधे किसी पर हमलावर नहीं हो पाते तो वे अपनी चुप्पी से ऐसे लोगों और उनके ख़्याल के साथ एकजुटता दिखाते हैं. वरना ट्रेन के एक डब्बे से दूसरे डब्बे और दूसरे से तीसरे डब्बे तक जाने की हिम्मत वह सिपाही नहीं जुटा पाता. या कोई उन नौजवानों को कह ही देता कि दो-तीन मिनट रुक जाइए, फिर पूरे रास्ते भजन गाइए.

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सबसे ख़तरनाक है, वजूद पर ख़तरा महसूस करना
एक बात सबसे ख़तरनाक हो रही है. समाज के एक तबके को लगने लगा है कि दूसरे का वजूद, उनके अस्तित्व के लिए ख़तरा है. अगर एक रहेगा तो दूसरा नहीं बचेगा. दिलचस्प है, अपने वजूद पर जिन्हें ख़तरा लग रहा है, वे संख्या में बहुत ज़्यादा हैं. लेकिन नफ़रत ने उन्हें यह मानने पर बेबस कर दिया है कि उनका सब कुछ ख़तरे में है. वे ख़तरे में हैं. उनका धर्म ख़तरे में है. उनका कारोबार ख़तरे में है.
उनके घर की स्त्रियाँ ख़तरे में हैं. ऐसा नहीं है कि यह सब इकतरफ़ा ही हो रहा है. दूसरी तरफ़ भी ऐसी प्रक्रिया है. मगर क्या दोनों प्रक्रिया और दोनों का वज़न तराज़ू के पलड़े पर एक जैसा ही है? इसका जवाब हमें ख़ुद ईमानदारी से देना होगा.

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नफ़रत क्या करती है?
नफ़रत हमें उन बातों पर यक़ीन करना सिखा देती है, जो सच नहीं हैं. या जो आधा सच हैं. नफ़रत हमें दोस्त नहीं, दुश्मन तलाशने पर मजबूर करती है.
नफ़रत हमें लोगों को अपना नहीं, पराया बनाना सीखाती है. नफ़रत हमें जोड़ती नहीं, तोड़ती है. बाँटती है. वह हमें सभ्य नहीं, बर्बर बनाती है. नफ़रत हमारी तर्कबुद्धि छीन लेती है. सोचने-समझने की हमारी ताक़त हर लेती है. हमें पता भी नहीं चलता, और हम इंसान से नफ़रती कठपुतली में बदल जाते हैं.
इस कठपुतली की डोर कहीं और होती है. और ये कठपुतली किसी और के इशारे पर नाचती है. यही नहीं, नफ़रत हमें इंसानी गुणों, जैसे- प्रेम, सद्भाव, सौहार्द्र, अहिंसा और बंधुता से बहुत दूर कर देती है. तो क्या नफ़रत सिर्फ़ नुक़सान करती है? नहीं. ज़ाहिर है, नफ़रत कुछ लोगों और समूहों के लिए फ़ायदेमंद है तब ही वह सीना तानकर ज़हरीली मर्दानगी के साथ बेख़ौफ़ यहां-वहां नज़र आ रही है. फ़ायदा चाहे जितना हो, नुक़सान उससे बहुत बड़ा है. वह जैसा घाव दे रहा है या देने जा रहा है… उसका दर्द दशकों तक हमें झेलना है.
तय है कि अगर यह चलता रहा तो यह नफ़रत हमें कहीं का नहीं छोड़ेगी. पहले कुछ ख़ास तरह के लोग मारे जाएँगे. फिर वह सबको मारेगी. इसलिए तय हम सबको करना है, हम सह-अस्तित्व या साझा जीवन चाहते हैं या ख़त्म हो जाना.
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