मालदीव का भारतीय सैनिकों के मुद्दे पर नरम रुख़, क्या ये भारत की कूटनीतिक जीत है?

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- Author, आदर्श राठौर
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए
मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज़्ज़ू ने सोमवार को देश की संसद को पहली बार संबोधित किया तो भारत का भी ज़िक्र किया.
उन्होंने कहा, "मेरा मानना है कि देश की बड़ी आबादी ने हमें इसलिए वोट दिया था कि हम विदेशी सेना को देश से हटाएंगे और कोई ऐसा समझौता नहीं करेंगे, जिससे देश की संप्रभुता को ख़तरा हो."
भारतीय सैनिकों को मालदीव से हटाने के बारे में उन्होंने कहा, "हमने भारत से आधिकारिक तौर पर मालदीव से सेना हटाने को कहा है. इस मुद्दे पर बातचीत जारी है. अभी तक हुई बातचीत के मुताबिक़, तीन में से एक एविएशन प्लेटफॉर्म में से सैनिकों को 10 मार्च 2024 तक बुला लिया जाएगा. बाकी के दो एविएशन प्लेटफॉर्म पर मौजूद सैनिकों को 10 मई 2024 तक बुला लिया जाएगा."
इससे पहले 2 फ़रवरी को दिल्ली में भारत और मालदीव के उच्च स्तरीय कोर ग्रुप की दूसरी बैठक हुई थी.
इस बैठक के बाद मुइज़्ज़ू सरकार की ओर से जारी प्रेस रिलीज़ में कहा गया था कि दोनों पक्षों के बीच सैनिकों को रीप्लेस करने यानी उन्हें बदलने पर सहमति बनी है.
ख़बरों के अनुसार, इन भारतीय सैनिकों की जगह सिविल ऑपरेटर या पूर्व सैनिकों को तैनात किया जा सकता है.
विशेषज्ञों का मानना है कि यह क़दम एक ओर मालदीव के बदले हुए रुख़ को दिखाता है, दूसरी ओर इसे भारतीय कूटनीति की सफलता के तौर पर भी देखा जा सकता है, जिसका उसके राष्ट्रीय हितों पर अच्छा असर पड़ेगा.

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नई दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में चीनी अध्ययन केंद्र में एसोसिएट प्रोफ़ेसर अरविंद येलेरी कहते हैं कि मालदीव की ओर से ऐसा किया जाना ज़रूरी भी था ताकि संबंध एक हद से ज़्यादा ख़राब न हों.
प्रोफ़ेसर येलेरी के मुताबिक़, पहले तो मालदीव भारतीय सैनिकों की पूरी तरह से वापसी पर अड़ा हुआ था, लेकिन यह बड़ी बात है कि वह इस बात पर राज़ी हुआ है कि जो लोग यहां तैनात होंगे, वे एक्टिव सर्विस में नहीं होने चाहिए.
वह कहते हैं, "किसी सेवारत सैनिक के अपने देश में तैनात होने पर चिंता लाज़िमी है. रिटायर्ड अधिकारियों, कोस्ट गार्ड या अन्य अर्धसैनिक बलों के मामले में बात अलग हो जाती है. हालांकि, इस तरह की व्यवस्था को स्वीकारना मालदीव के लचीलेपन का संकेत है. उसने एक तरह से स्वीकारा है कि इस क्षेत्र में भारत के हितों को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता."

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प्रोफ़ेसर अरविंद येलेरी कहते हैं मालदीव के बदले हुए रुख़ में मालदीव की आंतरिक राजनीति और हिंद महासागर में भारत के रुतबे का प्रतिबिंब भी दिखता है.
वह कहते हैं, "इस दौरान भारत ने भी यह रुख़ बनाए रखा कि हम आपके देश में दख़ल नहीं देना चाहते और न ही संबंधों में किसी तरह का तनाव चाहते हैं. मालदीव ने भारत की अहमियत को समझा है.
इसके अलावा, इसमें चीन के पहलू को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता.
प्रोफ़ेसर अरविंद येलेरी के मुताबिक़, "चीन की भारत के साथ होड़ है, लेकिन वह भारत से टकराव को सीमित रखता है. वह नहीं चाहता कि भारत चीन से ज़्यादा दूरी बनाते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुछ ऐसी रणनीति अपनाए कि हिंद महासागर या कहीं और चीन की चुनौतियां बढ़ जाएं."
वह कहते हैं, "दो-तीन महीने से भारत का अच्छा रुख़ बना रहा. इससे भारत की अच्छी छवि बनकर उभरी. चीन को भी लगने लगा कि मालदीव की आक्रामकता से चीन विरोधी रुख़ भी बनता जा रहा है. मालदीव के ताज़ा रुख़ को समझने के लिए इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखना चाहिए."
भारतीय सैनिकों के ख़िलाफ़ क्यों हैं मुइज़्ज़ू

भारत और मालदीव में तनाव के केंद्र में वे भारतीय सैनिक हैं, जिन्हें मोहम्मद मुइज़्ज़ू वापस भेजना चाहते हैं. समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़, मालदीव में फ़िलहाल 88 भारतीय सैनिक हैं.
दरअसल, भारत ने मालदीव को साल 2010 और 2013 में दो हेलिकॉप्टर और साल 2020 में एक छोटा विमान तोहफ़े में दिया था.
भारत का कहना था कि इन्हें राहत एवं बचाव कार्यों और मेडिकल इमरजेंसी में इस्तेमाल किया जाना है.
साल 2021 में मालदीव के सुरक्षा बलों ने बताया कि इन हेलिकॉप्टरों और विमान के संचालन और देखरेख के लिए क़रीब 75 भारतीय सैनिक मालदीव में मौजूद हैं.
इसके बाद से मालदीव के विपक्ष इन सैनिकों की मौजूदगी पर सवाल खड़े किए थे.
मोहम्मद मुइज़्ज़ू ने भी बीते साल हुए चुनाव में अपने प्रचार अभियान के दौरान 'इंडिया आउट' का नारा दिया था. उनका कहना था कि मालदीव में विदेशी सैनिकों की कोई ज़रूरत नहीं है और उनकी मौजूदगी देश की संप्रभुता के लिए ख़तरा है.
सत्ता में आने के बाद भी यह मुद्दा मुइज़्ज़ू की प्राथमिकताओं में रहा है. उन्होंने भारतीय सैनिकों को 15 मार्च तक मालदीव छोड़ने का अल्टीमेटम दिया था.
नए मोर्चे पर टकराव भी

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जिस रोज़ मालदीव में मौजूद भारतीय सैनिकों की वापसी के लिए दोनों देशों की बीच 'साझा योजना' पर सहमति बनी, उसी शाम मालदीव के रक्षा मंत्रालय ने भारतीय तटरक्षकों पर उसकी संप्रभुता के उल्लंघन का आरोप लगाया.
समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार, मालदीव का आरोप है कि 'भारतीय कोस्ट गार्ड के जवान मालदीव की समुद्री सीमा में मछली पकड़ रहे लोगों की तीन नावों पर चढ़ आए' और 'अंतरराष्ट्रीय समुद्री नियम-क़ायदों का उल्लंघन किया.'
मालदीव के विदेश मंत्रालय की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि मालदीव की नावों पर चढ़कर पूछताछ करने के लिए भारतीय कोस्ट गार्ड के शिप 246 और 254 को इस्तेमाल किया गया था.
मालदीव के रक्षा मंत्रालय ने शुक्रवार शाम को जारी इस बयान में कहा कि विदेश मंत्रालय के माध्यम से भारत से इस मामले में स्पष्टीकरण की मांग की गई है.
भारतीय कोस्ट गार्ड (तटरक्षक) ने मालदीव के इन दावों के संबंध में अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है.
हालांकि, दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के सेंटर फ़ॉर साउथ एशियन स्टडीज़ के प्रोफ़ेसर संजय भारद्वाज कहते हैं भारत अपनी सुरक्षा से जुड़े कारणों के चलते समंदर में ज़्यादा सक्रिय और संवेदनशील रहता है.
वह बताते हैं, "ये बात ध्यान रखनी चाहिए कि भारत आतंकवाद से ग्रस्त रहा है और मुंबई में 2008 के 26/11 हमले को अंजाम देने वाले समुद्री मार्ग से आए थे. ऐसे में भारतीय तटरक्षक अरब सागर और हिंद महासागर में अलर्ट रहते हैं. साथ ही चीन यहां अपनी गतिविधियां बढ़ा रहा है. ऐसे में दो मित्र देशों (भारत-मालदीव) को ऐसे मामलों को शांति से सुलझाना चाहिए, इसे एक-दूसरे की संप्रभुता के उल्लंघन के तौर पर नहीं देखना चाहिए."
मुइज़्ज़ू अपने वोटरों और कट्टरपंथियों को यह संदेश देना चाह रहे हैं कि भारत पहले भी हमारी संप्रुभता का उल्लंघन करता था और अब भी कर रहा है, तभी हमने भारत को लेकर ऐसा रुख़ अपनाया है.
विशेषज्ञों का मानना है मालदीव के इस आक्रामक रवैये के पीछे भी वहां की आंतरिक राजनीति है.
आदित्य शिवमूर्ति थिंक टैंक 'ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन' (ओआरएफ़) में एसोसिएट फ़ेलो हैं.
उनका मानना है कि मुइज़्ज़ू सरकार की विदेश नीति को उनकी घरेलू राजनीति से अलग करके नहीं देखा जा सकता.
वह कहते हैं, “मुइज़्ज़ू ‘इंडिया आउट’ अभियान चलाकर सत्ता में आए थे. उनकी पार्टी के पास स्पष्ट बहुमत नहीं है. लेकिन वह जानते हैं कि भारत विरोधी भावनाओं को एक मुद्दा बनाकर फिर से चुनाव जीता जा सकता है. वह अपने वोटरों और कट्टरपंथियों को यह संदेश देना चाह रहे हैं कि भारत पहले भी हमारी संप्रुभता का उल्लंघन करता था और अब भी वैसा ही कर रहा है, तभी हमने भारत को लेकर ऐसा रुख़ अपनाया है.”
प्रोफ़ेसर संजय भारद्वाज भी मानते हैं कि मुइज़्ज़ू सरकार की आक्रामकता के पीछे राजनीतिक कारण हैं.
वह कहते हैं, “मालदीव में भारतीय सैनिकों की मौजूदगी जिस व्यवस्था के तहत है, वैसी व्यवस्थाएं पड़ोसी देशों की आपसी समझ और भरोसे के आधार पर होती हैं. लेकिन भारत और मालदीव के बीच ये भरोसा प्रभावित हो रहा है कि क्योंकि मालदीव की घरेलू राजनीति उसके अंतरराष्ट्रीय रिश्तों पर हावी हो गई है."
प्रोफ़ेसर संजय भारद्वाज कहते हैं, "मुइज़्ज़ू ने चुनाव में भारतीय सैनिकों की मौजदूगी ख़त्म करने का वादा किया था, ऐसे में सत्ता में आने के बाद फ़ेस सेविंग यानी लाज बचाने के लिए उन्हें ऐसा करना ही होगा.”
विदेश नीति पर घरेलू राजनीति का इतना असर क्यों?

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भले ही मालदीव और भारत में ऐतिसाहिक और सांस्कृतिक रिश्तों की बात की जाती है, लेकिन पहले भी वहां ऐसी सरकारें भी रही हैं, जिनका झुकाव चीन की ओर ज़्यादा रहा है.
मगर उस दौरान भी भारत और मालदीव के संबंधों में इस तरह की गिरावट नहीं आई थी और न ही मालदीव की ओर से ऐसी आक्रामकता दिखी थी.
तो क्या भारत को लेकर मालदीव की जनता में इतना रोष है कि उसका राजनीतिक लाभ उठाने के लिए ही मुइज़्ज़ू सरकार का रुख़ भारत को लेकर सकारात्मक नहीं दिख रहा?
इस सवाल के जवाब में प्रोफ़ेसर संजय भारद्वाज कहते हैं, "मुइज्जू के सत्ता में आने का एक कारण यह भी था कि सोलिह और नशीद के बीच टकराव हो गया, जिसका मुइज़्ज़ू को फ़ायदा मिला. वरना ऐसा बिल्कुल नहीं है कि मालदीव की जनता में भारत को लेकर किसी तरह का ज़्यादा रोष है."
फिर ऐसा क्या हो गया जो अब मालदीव की घरेलू राजनीति उसकी विदेश नीति पर हावी हो गई है?
इस सवाल के जवाब में आदित्य शिवमूर्ति कहते हैं कि मालदीव की राजनीति में विदेश नीति ख़ुद में कोई बड़ा मुद्दा नहीं है, लेकिन बात तब अलग हो जाती है, जब यह राष्ट्रवाद और अन्य घरेलू मसलों से जुड़ जाता है.
वह कहते हैं, “छोटे देशों में अपनी संप्रभुता को लेकर चिंता रहती है. वहां राष्ट्रवाद की भावना भी काफ़ी ज़्यादा देखने को मिलती है. इसी कारण वहां विदेश नीति पर फ़ोकस रहता है. लेकिन, हर चुनाव में सत्ताधारी दल की विदेश नीति की आलोचना होती रही है.”
आदित्य शिवमूर्ति कहते हैं, “2008 से देखें 2012 तक मोहम्मद नशीद की सरकार थी जो भारत के प्रति झुकाव रखती थी. उसकी आलोचना हुई, फिर 2013 से 2018 अबुदल्ला यामीन की सरकार रही जिसका चीन के प्रति झुकाव माना जाता है. उसकी नीतियों की भी आलोचना हुई. फिर इब्राहिम मोहम्मद सोलिह की सरकार आई तो आलोचना हुई कि वह भारत पर ज़्यादा ध्यान दे रहे हैं. अब मुइज़्ज़ू आए हैं तो वही चक्र एक बार फिर घूम रहा है."
आदित्य शिवमूर्ति का कहना है कि मालदीव जैसे छोटे देश विकास कार्यों के लिए काफ़ी हद तक सहयोगी देशों की मदद पर निर्भर रहते हैं. जब ये विकास कार्य रुकते हैं और लोगों को दिक्कत होती है तो वे सहयोगी देश के साथ स्थानीय सरकार को भी कोसते हैं.
क्या रिश्तों में गांठ पड़ गई है?

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मालदीव हिंद महासागर में ऐसी जगह पर है, जिसे रणनीतिक रूप से बहुत अहम माना जाता है. इसी कारण चीन और भारत, दोनों ही भू-आर्थिक और सामरिक तौर पर मालदीव से नज़दीकी बढ़ाने में जुटे हुए हैं.
जनवरी में जब मोहम्मद मुइज़्ज़ू चीन की आधिकारिक यात्रा पर गए थे तो वहां कई समझौतों पर हस्ताक्षर हुए थे.
चीन ने मालदीव को 13 करोड़ अमेरिकी डॉलर की आर्थिक मदद देने, हुलहुमाले में पर्यटन के विकास के लिए पांच करोड़ अमेरिकी डॉलर देने, विलिमाले में 100 बिस्तर के अस्पताल के लिए मदद करने और मालदीव की मदद को चीन में घरेलू उड़ानें शुरू करने की अनुमति देने की बात कही है.
चीन से लौटते हुए मुइज़्ज़ू ने एक सवाल के जवाब में कहा था कि 'भले ही हम छोटे देश हैं लेकिन इससे किसी को हमें धमकाने का लाइसेंस नहीं मिल जाता.'
माना जा रहा था कि उनका इशारा भारत की ओर था क्योंकि उस समय सोशल मीडिया पर मालदीव बनाम लक्षद्वीप की बहस चल रही थी.
तब बहुत से विशेषज्ञों का यह भी मानना था कि चीन से निवेश और आर्थिक मदद का भरोसा मिलने के बाद मुइज़्ज़ू ने इस तरह के तेवर अपनाए हैं.
अब चीनी निवेश और बढ़ने से क्या मालदीव के लिए भारत का महत्व कम होता चला जाएगा?
इस सवाल के जवाब में प्रोफ़ेसर संजय भारद्वाज कहते हैं, "आप देखेंगे कि मालदीव पर चीन का बहुत कर्ज़ है. अगर मालदीव में चीन के निवेश के बदले कमाई नहीं हुई तो मालदीव श्रीलंका की तरह कर्ज के जाल में फंसेगा. श्रीलंका में हंबनटोटा बंदरगाह डेड इन्वेस्टमेंट साबित हुआ और अब वह 99 साल की लीज़ पर चीन के पास चला गया."
मालदीव के स्थायी हित भारत से जुड़े हैं. राजनीतिक बदलाव के साथ थोड़े-बहुत बदलाव आ सकते हैं लेकिन दोनों देशों को आपसी तालमेल के साथ ही रहना पड़ेगा और ऐसी कोशिशें भी हो रही हैं.
वह कहते हैं, "मालदीव के स्थायी हित भारत से जुड़े हैं. राजनीतिक बदलाव के साथ थोड़े-बहुत बदलाव आ सकते हैं लेकिन दोनों देशों को आपसी तालमेल के साथ ही रहना पड़ेगा और ऐसी कोशिशें भी हो रही हैं. भारत ने कहा कि आप सैनिकों की मौजूदगी से असहज हैं तो आइए इसका समाधान निकालते हैं. वैसे ही जब मालदीव के तीन मंत्रियों ने भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर टिप्पणी की थी तो उन्हें तुरंत निलंबित कर दिया गया, क्योंकि वे भारत के महत्व को समझते हैं."
ओआरएफ़ में एसोसिएट फ़ेलो आदित्य शिवमूर्ति कहते हैं कि अभी तक इस पूरे मामले में भारत सधे हुए तरीक़े से चल रहा है और रिश्तों को मधुर बनाए रखने की कोशिश भी कर रहा है, लेकिन बहुत कुछ मुइज़्ज़ू सरकार के रुख़ पर निर्भर करता है.
वह कहते हैं, "भारत ने ताज़ा बजट में मालदीव को दी जाने वाली मदद पिछले बजट की घोषणा की तुलना में बढ़ाई है. एक तो भारत नहीं चाहता कि पहले से वहां जो निवेश किया है, उससे चल रहे काम रुकें. फिर वो यह संकेत भी दे रहा है कि भले आप चीन के साथ चल रहे हैं और हमसे रिश्ते ख़राब हैं, तब भी हम आपके दोस्त हैं."
आदित्य शिवमूर्ति उम्मीद जताते हैं कि जब भारतीय सैनिकों की मौजूदगी वाला मामला सुलझ जाएगा तो शायद दोनों देशों के रिश्ते भी सुधर जाएंगे. लेकिन उनका कहना है कि पहले मुइज़्ज़ू को घरेलू राजनीति और विदेश नीति में संतुलन साधना होगा.
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