ओलंपिक मेडल से चूके भारतीय बॉक्सर निशांत देव

    • Author, मनोज चतुर्वेदी
    • पदनाम, वरिष्ठ खेल पत्रकार, बीबीसी हिन्दी के लिए

पेरिस ओलंपिक की पुरुष मुक्केबाज़ी के 71 किलोग्राम वर्ग के क्वार्टरफ़ाइनल में भारतीय बॉक्सर निशांत देव मेक्सिको के मार्को वेर्दे से हार गए.

इसके साथ ही मेंस बॉक्सिंग में भारत की पिछले 16 सालों से चली आ रही पदक दूरी को ख़त्म करने की आस का भी अंत हो गया.

भारत के लिए पुरुष मुक्केबाज़ी में इकलौते पदक विजेता विजेंदर सिंह हैं. उन्होंने 2008 के बीजिंग ओलंपिक में कांस्य पदक जीता था.

हालांकि महिला वर्ग में 2012 में एमसी मैरिकॉम कांस्य पदक जीत चुकी हैं. पर पुरुष वर्ग में हम विजेंदर के बाद लंदन, रियो और टोक्यो ओलंपिक से खाली हाथ लौटे हैं.

दूसरी वरीयता प्राप्त मुक्केबाज़ मार्को वेर्दे पैन अमेरिकन गेम्स के मौजूदा चैंपियन हैं.

निशांत देव को पहले प्रयास में मिली थी वाहवाही

निशांत ने अपनी पहली अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता के तौर पर 2021 में विश्व चैंपियनशिप में भाग लिया था.

इसमें वह क्वार्टर फाइनल में हारकर पदक तो नहीं पा सके थे, पर अपने क्वार्टर फ़ाइनल तक के सफ़र में किए प्रदर्शन से सभी को प्रभावित करने में सफल रहे.

उन्होंने अपने क्वार्टर फ़ाइनल तक के सफ़र में हंगरी के नौ बार के राष्ट्रीय चैंपियन लाजलो कोजाक, मॉरीशस के दो बार के ओलंपियन मेर्विन क्लेयर और मैक्सिको के मार्को अल्वारेज़ को हराकर खूब सुर्खियां बटोरी थीं.

इसी साल मई में पाया ओलंपिक कोटा

निशांत देव ने इस साल मई महीने में बैंकॉक में हुई आईबीए विश्व चैंपियनशिप के क्वार्टर फ़ाइनल में मालदीव के वेसिली सोवोटरी को हराकर ओलंपिक कोटा हासिल किया था.

वह इस ओलंपिक के लिए क्वालिफ़ाई करने वाले पहले भारतीय पुरुष मुक्केबाज़ थे. इससे पहले भारतीय महिला मुक्केबाज़ों ने ही पेरिस का टिकट कटाया था.

इस मुक़ाबले के दौरान निशांत देव ने जिस चतुराई से प्रतिद्वंद्वी पर पंच लगाए थे, उसकी सभी ने तारीफ़ की थी.

इस मुक़ाबले में 5-0 से जीत पाने पर ही कहा गया था कि वह अब बहुत ही परिपक्व मुक्केबाज़ हो गए हैं. वह अच्छे से जानते हैं कि मुक़ाबले में कब और क्या करने की ज़रूरत है.

हार से लिया सबक

इस साल की शुरुआत में ही इटली में हुए पहले ओलंपिक क्वालिफ़ायर में उन्हें निराशा का सामना करना पड़ा था, क्योंकि वह अमेरिका के ओमारी जोंस से क्वार्टरफ़ाइनल के बहुत ही क़रीबी मुक़ाबले में हार गए थे.

इस हार से निशांत ने मायूस होने के बजाय अपने पिता पवन देव के साथ बैठकर लंबी चर्चा की और भविष्य की योजना बनाई और दो माह तक कड़ी मशक्कत की और अपनी खामियों पर खासा काम किया. जिसका परिणाम मई में बैंकॉक ओलंपिक क्वालिफ़ायर में हासिल कर लिया.

जब आइसक्रीम प्रेम भारी पड़ा

यह बात पिछले साल मई में ताशकंद में हुए विश्व कप की है. वह इसमें भाग लेने के लिए जब होटल में पहुंचे तो उन्होंने देखा कि होटल के बाहर आइसक्रीम वाला खड़ा है.

उनसे रहा नहीं गया और वह आइसक्रीम खाने चले गए और अपनी मनपसंद आइसक्रीम खाकर मन शांत कर लिया.

पर आइसक्रीम खाने के बाद जब अगले दिन वजन कराने गए तो वह निर्धारित वजन से कुछ ग्राम ज़्यादा निकला.

उनका पहला ही मुक़ाबला क्यूबा के जोर्गे क्यूलर से था. वह अपने प्रतिद्वंद्वी पर फोकस करने के बजाय इस उधेड़बुन में ही लगे रहे कि वजन को कैसे कम किया जाए. वह इसके लिए दिनभर दौड़ते रहे.

इस तरह वह अपना वजन तो कम करने में सफ़ल हुए. साथ ही मुक़ाबले पर ध्यान नहीं दे पाने से मन कुछ भी नकारात्मक विचार भी नहीं आए.

इसका मुक़ाबले में फायदा मिला और वह यह मुक़ाबला जीतकर विश्व कप में कांस्य पदक जीतने वाले भारतीय मुक्केबाज़ों में अपना नाम शुमार कराने में सफल हो गए.

उतार-चढ़ाव भरा रहा साल 2022

निशांत 2021 में जब पहली बार विश्व कप में भाग लेने गए तो अपने प्रदर्शन से तो प्रभावित करने में सफल रहे. पर उन्हें पूरे समय कंधे की चोट ने परेशान किया, साथ ही वह मुक़ाबले के दौरान चोटिल भी हो गए.

वह जब पटियाला शिविर गए तो दर्द बहुत बढ़ गया. जांच कराने पर पता चला कि पुरानी चोट उभर आई है.

नौ साल की उम्र में सीढ़ियों से गिरने के कारण उन्हें चोट आई थी, तब ऑपरेशन से उनके शरीर में रॉड डाली गई थी. इसमें 10 साल बाद संक्रमण हो गया था.

इस स्थिति में उन्हें फिर से सर्जरी करानी पड़ी. इसकी वजह से उन्हें 9 महीने तक रिंग से दूर रहना पड़ा. पर इस दौरान उन्होंने कभी अपने ऊपर नकारात्मक सोच को हावी नहीं होने दिया.

मुक्केबाज़ मनोज ने दी प्रेरणा

करनाल के जमींदार परिवार में जन्मे निशांत को बचपन में ही मुक्केबाज़ी से लगाव हो गया था. उनके मामा जर्मनी में पेशेवर मुक्केबाज़ थे.

लेकिन 2010 के कॉमनवेल्थ गेम्स में मनोज कुमार को गोल्ड जीतते देखकर उन्हें मुक्केबाज़ी में आने की प्रेरणा मिली.

वह करनाल के करन स्टेडियम में सुरेंद्र चौहान से प्रशिक्षण लेने लगे. उनके पिता सुबह 4 बजे उन्हें उठाकर ट्रेनिंग पर ले जाते थे. यही सिलसिला सालों तक चलता था. सही मायनों में उनके सफल बनने में पिता का भी योगदान है.

बचपन में वह 100 और 200 मीटर दौड़ और स्केटिंग में भाग लेते थे.

एक किस्सा मशहूर है कि स्केटिंग में भाग लेते समय एक बार उनके स्केट का पहिया निकल गया पर वह फिर भी दौड़कर जीत गए. यह उनके भरोसे को जताता है.

सेंटियागो की निगाह में चढ़े

वह पहली बार बादली में 2019 में हुई सीनियर राष्ट्रीय चैंपियनशिप में कर्नाटक के लिए उतरे.

वह अपनी चुनौती को क्वार्टरफ़ाइनल से आगे नहीं ले जा सके. लेकिन इस दौरान उन पर हाई परफ़ॉर्मेंस डायरेक्टर सेंटियागो की निगाह पड़ गई और उन्होंने निशांत को राष्ट्रीय शिविर में शामिल कर लिया.

राष्ट्रीय शिविर में शामिल होने का भरपूर लाभ मिला. सही मायनों में उन्हें यहीं पंख लगे और उन्होंने बहुत कुछ सीखा.

निशांत देव के बारे में यह कहा जाता है कि उनकी सोच साफ़ है और वह सफलता के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं.

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