ईरान चुनाव: कौन हैं पेज़ेश्कियान और सईद जलीली जिनके बीच अब होगा मुक़ाबला

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बीते महीने एक हेलिकॉप्टर हादसे में ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी की मौत के बाद शुक्रवार को ईरान में नए राष्ट्रपति के लिए मतदान हुआ. शनिवार को वहां मतों की गिनती हुई.
देश के 14वें राष्ट्रपति चुनावों के लिए ईरान में मैदान में कुल चार उम्मीदवार थे, जिनमें से दो के बीच अब अगले चरण में मुक़ाबला होगा.
ईरान की इंटीरियर मिनिस्ट्री (गृह मंत्रालय) के अनुसार, मतदान में किसी एक उम्मीदवार को 50 फ़ीसदी से अधिक वोट न मिल पाने के कारण अब पांच जुलाई को दूसरे चरण का मतदान (रन ऑफ़) कराया जाएगा.
ईरान में अगर चुनाव में किसी भी उम्मीदवार को पचास फ़ीसदी से कम वोट मिलते हैं तो चुनाव का दूसरा चरण आयोजित किया जाता है.
पांच जुलाई को होने वाला मुक़ाबला सुधारवादी माने जाने वाले नेता मसूद पेज़ेश्कियान और कट्टरपंथी माने जाने वाले सईद जलीली के बीच होगा.
समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार ईरान के गृह मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा है कि कुल 2.45 करोड़ वोटों में से पेज़ेश्कियान को 1.04 करोड़ (10,415,991) और सईद जलीली को 9.47 करोड़ (9,473,298) वोट मिले.
प्रवक्ता मोहसिन इस्लामी ने कहा, "चुनाव में किसी एक उम्मीदवार को स्पष्ट बहुमत नहीं मिल सका है इसलिए सबसे अधिक वोट पाने वाले पहले और दूसरे उम्मदीवारों के बारे में गार्डियन काउंसिल को जानकारी दी जाएगी."

कम वोटर टर्नआउट को लेकर चिंता
कहा जा रहा है कि ईरान के चुनावों में इस बार काफ़ी कम वोटर टर्नआउट देखा गया.
जानकार इसे ईरानी व्यवस्था पर लोगों का भरोसा कम होना बता रहे हैं.
ईरान की कुल आबादी 9 करोड़ है, जिसनें योग्य मतदाताओं की संख्या क़रीब 6.15 करोड़ है.
ईरान के गृह मंत्रालय के जारी किए आंकड़ों के अनुसार, इन चुनावों में क़रीब 40 फ़ीसदी लोगों ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया.
साल 1979 में हुई इस्लामी क्रांति के बाद से अब तक का ये सबसे कम वोटर टर्नआउट है.

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चुनाव की ज़रूरत क्यों पड़ी?
इब्राहिम रईसी ने जून 2021 में ईरान की सत्ता संभाली थी.
इस साल मई में एक हेलिकॉप्टर हादसे में उनकी मौत हो गई.
इस हादसे में उनके अलावा विदेश मंत्री हुसैन अमीर-अब्दुल्लाहियन समेत कुल नौ लोगों की जान गई.
रईसी पूर्वी अज़रबैजान प्रांत में बांध का उद्घाटन करके तबरेज शहर की तरफ़ जा रहे थे, लेकिन उनका हेलिकॉप्टर पहाड़ों में क्रैश हो गया.
ईरान में कैसे होते हैं चुनाव?
ईरान में कौन चुनाव लड़ेगा और कौन नहीं लड़ेगा, इसका फ़ैसला गार्डियन काउंसिल करती है.
इस काउंसिल के सदस्यों को खुद ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली ख़ामेनेई नामांकित करते हैं. वो खुद इसके प्रमुख भी हैं.
इस बार के चुनाव के लिए शुरुआत में गार्डियन काउंसिल ने छह उम्मीदवार तय किए थे लेकिन रूढ़िवादी वोटों के बंटने के डर से दो उम्मीदवारों को हटा दिया गया.
ये चार उम्मीदवार हैं - सुधारवादी नेता मसूद पेज़ेश्कियान, ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड के पूर्व कमांडर मोहम्मद बाक़र क़ालीबाफ़, पूर्व परमाणु वार्ताकार सईद जलीली और धर्मगुरु मुस्तफ़ा पूरमोहम्मदी. हालांकि पेज़ेश्कियान के चुनावी मैदान में उतरने को वाइल्डकार्ड एंट्री माना जा रहा है.
ईरान के चुनाव आयोग के अनुसार, इस बार चुनावों में मतदान के लिए देश के भीतर 58,640 मतदान केंद्र बनाए गए, वहीं 95 से अधिक देशों में 340 ख़ास केंद्र बनाए गए.
मतदान शुक्रवार को स्थानीय समयानुसार, सवेरे आठ बजे शुरू हुआ. मतदान शाम छह बजे तक बंद होना था, लेकिन अधिकारियों ने मतदान का समय छह घंटे तक के लिए बढ़ाया और मतदान आधी रात तक कराया गया.

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ईरान में राष्ट्रपति की शक्तियां
यहां राष्ट्रपति सर्वोच्च निर्वाचित अधिकारी होता है और सर्वोच्च लीडर के बाद उसकी अहमियत दूसरे स्थान पर होती है.
राष्ट्रपति सरकार के रोज़ाना के कामकाज के लिए ज़िम्मेदार होता है. घरेलू नीति और विदेश नीति के मामलों पर भी राष्ट्रपति का महत्वपूर्ण प्रभाव होता है.
हालांकि राष्ट्रपति की शक्तियां अपेक्षाकृत सीमित होती हैं - ख़ासकर सुरक्षा मामलों में.
इंटीरियर मिनिस्ट्री राष्ट्रपति के मातहत होती है और ये मिनिस्ट्री राष्ट्रीय पुलिस बल को नियंत्रित करती है.
लेकिन इसके कमांडर की नियुक्ति सर्वोच्च लीडर करते हैं जो सीधा उन्हें रिपोर्ट करता है.
इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स के लिए भी यही नियम लागू होता है.
ईरान की संसद नए क़ानून बनाती है. वो राष्ट्रपति की शक्तियों पर रोक लगा सकती है.
वहीं, नए क़ानून को मंज़ूरी देने का काम गार्डियन काउंसिल का होता है जिसमें सर्वोच्च लीडर के चुने नेता शामिल होते हैं. ये काउंसिल क़ानून को वीटो भी कर सकती है.
कौन हैं मसूद पेज़ेश्कियान?

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69 साल के मसूद पेज़ेश्कियान पेशे से हार्ट सर्जन रह चुके हैं. एक वक्त वो देश के स्वास्थ्य मंत्री भी थे.
साल 2021 में हुए राष्ट्रपति चुनावों के लिए उन्होंने भी पर्चा भरा था, हालांकि उनकी उम्मीदवारी को रिजेक्ट कर दिया गया था.
वो पांच बार ईरान की संसद में पहुंचे हैं और एक बार संसद के डिप्टी स्पीकर भी रहे हैं.
पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद ख़ातमी (1997-2005) की पहली सरकार में पेज़ेश्कियान डिप्टी स्वास्थ्य मंत्री रहे.
पूर्व राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद (2005-2013) की सरकार के दौर में वो 2007 में तबरेज़ से संसदीय चुनावों में बतौर उम्मीदवार शामिल हुए और जीत हासिल की. यहां से वो और चार बार जीते हैं.
साल 2009 में राष्ट्रपति चुनावों के नतीजे आने के बाद देश में व्यापक और हिंसक विरोध प्रदर्शन हुए. अपने तीखे बयानों के लिए जाने जाने वाले पेज़ेश्कियान ने प्रदर्शनकारियों के साथ हो रहे बर्ताव की कड़ी आलोचना की. इस कारण वो कट्टरपंथी नेताओं के निशाने पर भी आए.
साल 2013 में हुए राष्ट्रपति चुनावों के लिए पेज़ेश्कियान ने नामांकन दाखिल किया था. हालांकि अकबर हाशिमी रफ़सनजानी के नामांकन देने के बाद उन्होंने अपना नाम वापिस ले लिया.
साल 2021 के राष्ट्रपति चुनावों के लिए भी उन्होंने पर्चा भरा, हालांकि उनकी उम्मीदवारी को गार्डियन काउंसिल ने रिजेक्ट कर दिया.
बीते साल हुए संसदीय चुनावों में उनके नामांकन को गृह मंत्रालय के एक्ज़ीक्यूटिव बोर्ड ने ये कहते हुए रिजेक्ट कर दिया कि उनमे "इस्लामिक गणराज्य के प्रति प्रतिबद्धता की कमी" है. हालांकि बाद में गार्डियन काउंसिल ने उनके नाम को अप्रूव किया था.

ईरान में महिलाओं के लिए कड़े ड्रेस कोड लागू करने वाली मोरैलिटी पुलिस की कार्रवाई को पेज़ेश्कियान 'अनैतिक' बता चुके है. बीते दिनों ईरान में महिलाओं ने सख्त ड्रेस कोड का उल्लंघन किया था.
इसे लेकर पेज़ेश्कियान कह चुके हैं, "अगर किसी ख़ास तरीके़ से या कोई कपड़ा पहनना पाप है तो महिलाओं और लड़कियों के लिए ऐसे बर्ताव करना 100 गुना अधिक बड़ा पाप है. धर्म में कहीं भी ऐसा नहीं कहा गया है कि किसी को उसके कपड़े के लिए सज़ा देने की इजाज़त दी जाए."
साल 2022 में 22 साल की महसा अमीनी की मौत के बाद ईरान की मोरैलिटी पुलिस के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन हुए थे. मोरेलिटी पुलिस पर ड्रेस कोड का उल्लंघन करने के आरोप में महसा अमीनी को हिरासत में लेने का आरोप है.
पेज़ेश्कियान ने वादा किया है कि वो पश्चिम के साथ रिश्तों को बेहतर करेंगे और परमाणु बातचीत को फिर शुरू करेंगे. उनको उम्मीद है कि ईरान पर लगी पाबंदियां हटेंगी जिससे देश की बिगड़ती अर्थव्यवस्था को मदद मिलेगी. पेज़ेश्कियान की रैली में भारी भीड़ भी देखने को मिलती है.
मसूद पेज़ेश्कियान को दो पूर्व सुधारवादी राष्ट्रपति हसन रूहानी और मोहम्मद ख़ातमी और पूर्व विदेश मंत्री मोहम्मद ज़वाद ज़रीफ़ का समर्थन हासिल है.
कौन हैं सईद जलीली?

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समर्थकों के "न समझौता, न सरेंडर" के नारों के बीच 59 साल के सईद जलीली ने बीते दिनों राष्ट्रपति चुनावों में अपना नामांकन भरा. जलीली के समर्थकों के ये नारे उनके कड़े राजनीतिक रुख़ के बारे में काफी कुछ बताते हैं.
ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर हुई बातचीत में सईद जलीली की भूमिका अहम रही थी. इस बातचीत के नाकाम होने के बाद ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए थे.
पूर्व राष्ट्रपति अहमदीनेजाद के दौर में साल 2007 में जलीली सुप्रीम राष्ट्रीय सुरक्षा काउंसिल के नए सेक्रेटरी चुने गए. हसन रूहानी और अली लाजिरानी के बाद वो तीसरे शख्स थे जो इस पर नियुक्त किए गए थे.
उस वक्त परमाणु कार्यक्रम को लेकर पश्चिमी मुल्कों के साथ जो बातचीत चल रही थी उसमें राष्ट्रीय सुरक्षा काउंसिल के सेक्रेटरी भी शामिल होते थे.
एक साल बाद 2008 में ईरान के सुप्रीम लीडर ने अपने प्रतिनिधि के रूप में जलीली को सुप्रीम राष्ट्रीय सुरक्षा काउंसिल में शामिल किया. इस पद पर वो 16 साल तक काबिज़ रहे.
जलीली अक्सर ये कहते हुए सुने जाते रहे हैं कि 'आपदा को अवसर में बदलें'. लेकिन कई लोगों का ये मानना है कि पश्चिम के साथ छह साल तक चली बातचीत ख़त्म होते-होते उन्होंने 'अवसरों को आपदा में बदलने' का काम किया था.
जलीली का कार्यकाल ख़त्म होते-होते संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा काउंसिल में ईरान के ख़िलाफ़ प्रस्ताव पास हो चुका था और अमेरिका और यूरोप ईरान के ख़िलाफ़ कड़ी पाबंदियों का एलान कर चुके थे.
हालांकि जलीली के समर्थकों का मानना है कि उन्होंने पश्चिमी मुल्कों की मांगों के आगे घुटने नहीं टेके और उनके दबाव का मुक़ाबला किया.

साल 2013 में जलीली राष्ट्रपति चुनावों की रेस में शामिल हुए. इन चुनावों में हसन रूहानी की जीत हुई.
दूसरे नंबर पर कालीबाफ़ थे और 11 फ़ीसदी वोट के साथ जलीली तीसरे नंबर पर रहे.
हार के बाद जलीली ने एलान किया कि वो मौजूदा सरकार की मदद के लिए वो एक शैडो सरकार बनाएंगे.
कुछ दिन पहले उन्होंने खुद ये बाद स्वीकार की कि उन्होंने शैडो सरकार बनाई और अंतरराष्ट्रीय पाबंदियों के बीच अन्य मुल्कों को तेल बेचने के रास्ते सुझाए.
साल 2021 में दूसरी बार वो बतौर उम्मीदवार राष्ट्रपति चुनावों में उतरे.
उनके प्रतिद्वंद्वी अब्दुलनासिर हिम्मती ने उनपर आरोप लगाया कि वो 'बैकअप उम्मीदवार' हैं जो प्रचार के दौरान प्रतिद्वंद्वियों पर हमले करते हैं और फिर चुनावों से अपना नाम वापिस ले लेते हैं.
मसूद पेज़ेश्कियान और सईद जलीली के अलावा कुछ उम्मीदवार ऐसे भी थे जिन्हें गार्डियन काउंसिल ने चुनाव लड़ने की मंज़ूरी दी थी. इनमें मोहम्मद बाक़र क़ालीबाफ़ और मुस्तफ़ा पुरमोहम्मदी के नाम प्रमुख हैं.
कौन हैं मोहम्मद बाक़र क़ालीबाफ़?

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बीते दो दशक से क़ालीबाफ़ की छवि रुढ़िवादी नेता की रही है. मौजूदा वक्त में वो ईरानी संसद के स्पीकर हैं.
रुढ़िवादियों के बीच कालीबाफ़ सुधारवादियों का कड़ा विरोध करने के लिए जाने जाते हैं.
अब तक वो तीन बार राष्ट्रपति पद की दौड़ में शामिल हो चुके हैं. 2005 और 2013 में वो हार गए थे. वहीं 2017 में इब्राहिम रईसी के नामांकन भरने के बाद उन्होंने अपना नाम वापिस ले लिया था.
2005 में राष्ट्रपति की रेस से बाहर होने के बाद कालीबाफ़ तेहरान के मेयर बने. इस पद पर वो 12 साल तक रहे.
उनके बाद मेयर बने मोहम्मद अली नजाफ़ी ने उन पर आर्थिक गड़बड़ी करने, म्युनिसिपैलिटी के पैसों का इस्तेमाल राष्ट्रपति चुनाव के प्रचार के लिए करमने का आरोप लगाया.
अली नजाफ़ी के बाद मेयर बने पिरोज़ हनाची ने कहा कि म्युनिसिपैलिटी के 70 ट्रिलियन ईरानी तोमान अभी भी कर्ज़ में डूबे हैं.
साल 2022 में जब को संसद के स्पीकर थे, उस दौरान उनके परिवार के सदस्यों को तुर्की में शॉपिंग करते देखा गया जिसके बाद उनकी कड़ी आलोचना हुई और उनके इस्तीफ़े की मांग होने लगी. इसे लेयटगेट स्कैंडल कहा गया.
हालांकि कालीबाफ़ का कहना था कि ये आलोचना राजनीति से प्रेरित है और उन्हें ईरान की राजनीति से दूर रखने की कोशिश है.
कौन हैं मुस्तफ़ा पुरमोहम्मदी?

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पुरमोहम्मदी ने 1987 में इंटेलिजेंस मंत्रालय में ज्वाइन किया. उनके करियर का ये सबसे संवेदनशील दौर था.
साल 1988 में ईरान में सैकड़ों राजनीतिक बंदियों को मौत की सज़ा दी गई थी.
सज़ा सुनाने के लिए जो कमिटी बनी थी उसके सदस्यों में एक मुस्तफ़ा पुरमोहम्मदी भी थे. इस कमिटी को 'डेथ कमिटी' कहा जाता था.
वो मंत्री के सलाहकार के तौर पर मंत्रालय में आए थे लेकिन उन्हें राजनीतिक बंदियों से जुड़े मामलों में इंटेलिजेंस मंत्रालय के प्रतिनिधि के रूप में काम करने और उन्हें मौत की सज़ा दिलाने में उनकी भूमिका के लिए जाना जाता है.
इस बार चुनावों में वो अकेले उम्मीदवार हैं जिनपर 'मानवता के ख़िलाफ़' अपराध का आरोप लगा है.
साल 2016 में पुरमोहम्मदी जस्टिस मंत्री थे. उस वक्त उन्होंने 1988 की घटनाओं पर कहा था, "ईश्वर का आदेश पालन करके उन्हें गर्व महसूस हुआ."
उन्होंने कहा कि उन्होंने जो किया वो इस्लामी नियमों के तहत था और इसका "उन्हें कोई पछतावा नहीं है."
आने वाले वक्त में उन्होंने फ़ॉरेन इंटेलिजेंस और ख़ुफ़िया विभागों में भी काम किया.
साल 2005 में अहमदीनेजाद की जीत के बाद उन्होंने इंटीरियर मिनिस्ट्री की ज़िम्मेदारी संभाली.
साल 2013 में हसन रूहानी की सरकार में उन्हें जस्टिस मंत्री बनाया गया.
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