रात में बार-बार नींद टूटने से पड़ सकता है आपकी दिमाग़ी क्षमता पर असर

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- Author, सुशीला सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
अगर आपको नींद ठीक से नहीं आती है और ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया(ओएसए) के लक्षण हैं तो इससे दिमाग़ के सोचने-समझने की क्षमता पर असर पड़ सकता है.
इस विषय पर आई नई रिपोर्ट कहती है कि भारत में 10 में एक व्यक्ति ऐसी समस्या से प्रभावित है और उम्र बढ़ने पर ये व्यक्ति के दिमाग़ की कार्य क्षमता पर असर डालता है.
इस शोध का नेतृत्व अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में न्यूरोलॉजी(तंत्रिका) विभाग के प्रमुख रह चुके और पदमश्री से सम्मानित डॉ कामेश्वर प्रसाद ने किया.
ये शोध 7505 वयस्कों पर किया गया.
भारत के कई स्वास्थ्य संस्थानों के अलावा नीदरलैंड्स के इरामस मेडिकल सेंटर के एपिडेमियोलॉजी विभाग और अमेरिका के हार्वर्ड टीएच चेन स्कूल के पब्लिक हेल्थ के सोशल और बिहेवियरल साइंसेज के डॉक्टरों ने मिलकर इस विषय पर अध्ययन किया.
बीबीसी से बातचीत में डॉ कामेश्वर प्रसाद बताते हैं, ''भारत में ये पहली तरह का शोध है, जिसमें जीनोमिक्स, न्यूरोइमेजिंग और नींद से जुड़े कई पैमानों का अध्ययन किया गया. इसमें महिला और पुरुषों की संख्या लगभग बराबर थी.''

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शोध में क्या सामने आया?

वे इस शोध का कारण बताते हुए कहते हैं कि कई देशों की तरह भारत में लोगों की आयु सीमा के साथ -साथ बुज़ुर्गों की संख्या बढ़ रही है. समय बीतने पर इनकी संख्या में बढ़ोतरी होती जाएगी.
डॉ कामेश्वर प्रसाद के अनुसार, ''उम्र बढ़ने पर मुख्य बड़ी बीमारियां सामने आती हैं वो है डिमेंशिया या भूलने की बीमारी, हार्ट अटैक और स्ट्रोक. ये शोध मुख्यतौर पर उन समस्याओं पर केंद्रित था.''
इस शोध में लोगों से नींद के बारे में कई सवाल पूछे गए जिसमें नींद ठीक से न आना, ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया(ओएसए) आदि के बारे में पूछा गया और ये जाना गया कि उनका दिमाग की कार्य क्षमता जैसे चीज़ें याद रखना, योजना, डिज़ाइन बनाने और सिक्वेंसिंग आदि दोनों बातों में कितना संबंध है?
डॉ कामेश्वर प्रसाद कहते हैं, ''शोध में पाया गया कि जिन लोगों को ख़राब नींद आती है या ओएसए है, उनके दिमाग़ की कार्य क्षमता उन लोगों के मुक़ाबले उतनी अच्छी नहीं है, जिन्हें नींद को लेकर कोई परेशानी पेश नहीं आती है.''

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ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया या ओएसए क्या है?
नेशनल लाइब्ररेरी ऑफ़ मेडिसिन में छपी जानकारी के अनुसार, ओएसए एक डिसआर्डर होता है, जिसमें एक व्यक्ति की सांस नींद के दौरान लगातार रुकती रहती है.
डॉक्टर जेसी सूरी इसे विस्तार से समझाते हुए बताते हैं कि दिन में एक व्यक्ति आराम से सांस लेता और छोड़ता है और इसमें कोई रुकावट नहीं आती.
लेकिन रात को सोते वक़्त हमारी मांसपेशियां रिलेक्स या शिथिल पड़ जाती हैं और कोई भी व्यक्ति खड़े हो कर नहीं सो पाता.
डॉक्टर जेसी सूरी फोर्टिस अस्पताल में पल्मनेरी, क्रिटिकल केयर एंड स्लीप मेडिसिन विभाग के प्रमुख और निदेशक हैं और दिल्ली स्थित सफदरजंग अस्पताल में 34 साल काम कर चुके हैं.
डॉक्टर जेसी सूरी बताते हैं, ''नींद के दौरान हमारी जीभ गले की ओर पीछे की तरफ गिर जाती है और इससे रास्ता बंद हो जाता है और सांस रुक जाती है.''
''रात में जब किसी व्यक्ति की सांस रुक जाती है तो वो उठ जाता है और जीभ में हरकत आ जाती है. वो मुँह में आगे आ जाती है और सांस लेने का रास्ता खुल जाता है, जिससे व्यक्ति को सांस आने लगती है. इसके बाद व्यक्ति फिर सो जाता है और फिर जीभ पीछे की ओर चली जाती है और सांस रुक जाती है जिसके कारण फिर नींद टूट जाती है. पूरी रात ये सिलसिला चलता रहता है. इसे ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया कहा जाता है.''
डॉक्टर बताते हैं कि नींद के भी कई स्तर होते हैं जिसमें हल्की, गहरी नींद, ड्रीम या नॉन ड्रीम स्लीप होती हैं और ये शरीर के अलग-अलग अंगों की मदद करती हैं.

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खर्राटे की समस्या
डॉ जेसी सूरी बताते हैं कि नींद में जब सांस का रास्ता संकुचित हो जाता है, जिसे आंशिक रूप से सांस का रास्ता रुका हुआ कहा जा सकता है.
ऐसी स्थिति में व्यक्ति खर्राटे लेने लगता है और जब ये रास्ता पूरी तरह से रुक जाता है तो उसे स्लीप एपनिया कहा जाता है.
ऐसे में जब आप सांस नहीं ले रहे होते हैं तो ऑक्सीजन का स्तर गिर जाता है और कॉर्बन डाइऑक्साइड बढ़ जाती है. सांस का रास्ता तभी खुलता है, जब नींद टूटती है.
ऐसे में जिन लोगों को स्लीप एपनिया की बीमारी होती है, उन व्यक्तियों की एक घंटे में 15, 25 या 50 बार नींद टूटती है क्योंकि उन्हें सांस का रास्ता खोलने के लिए उठना पड़ता है.
जिसकी वजह से व्यक्ति गहरी नींद नहीं सो पाता और नींद ख़राब हो जाती है.
डॉक्टर सलाह देते हैं कि खरार्टे से बचने के लिए वज़न पर नियंत्रण रखे क्योंकि आपकी ठुड्डी के पास अधिक वसायुक्त उत्तक हो सकते हैं. ये एयरवे को संकरा करके हवा के आने-जाने के रास्ते में बाधा डाल सकते हैं. ऐसे में स्वस्थ वज़न बनाए रखने से खर्राटों से राहत मिल सकती है.
- अगर आपको सर्दी हुई है और आपकी नाक बंद है तो आपके खर्राटे लेने की संभावना अधिक है. ऐसे में सोने से पहले अपनी नाक को अच्छे से साफ़ करें.
- शराब की वजह से नींद के दौरान मांसपेशियां अधिक रिलेक्स हो जाती हैं और इसकी वजह से एयरवे सिकुड़कर और अधिक संकरा हो जाता है. ऐसे में सलाह दी जाती है कि सोने से पहले शराब पीने से बचा जाए.
- जब आप सीधे कमर पर लेटते हैं तब आपकी जीभ, थुड्डी और थुड्डी के नीचे के वसायुक्त ऊतक, ये सब आपके एयरवे में रुकावट पैदा कर सकते हैं. ऐसे में अगर आप खर्राटे लेते हैं तो एक तरफ पलट कर सोएं.
नींद में जब सांस का रास्ता संकुचित हो जाता है तब व्यक्ति खर्राटे लेने लगता है और जब ये रास्ता पूरी तरह से रुक जाता है तो उसे स्लीप एपनिया कहा जाता है.
नींद पूरी न होने पर शरीर पर असर
डॉक्टर बताते हैं कि अगर किसी व्यक्ति की नींद पूरी नहीं होती तो पूरे शरीर पर इसका असर पड़ता और काम के प्रदर्शन पर भी प्रभाव पड़ता है.
- एकाग्रता की कमी
- याददाश्त पर असर
- दिमाग के निर्णय लेने की क्षमता पर प्रभाव
- भावनात्मक स्वास्थ्य पर असर पड़ता है जिसकी वजह से चिड़चिड़ापन, गुस्सा आता है.
- दिन में नींद आती है
- अवसाद , एग्ज़ाइटी की समस्या आ सकती है
- ऊर्जा की कमी
- ब्लडप्रेशर पर असर
- दिल की बीमारियां होने का ख़तरा
- डायबीटिज़ है तो बीमारी से निपटने में कमी आती है
- थकान रहना
- दिन में नींद आने लगती है

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कितनी नींद लेनी चाहिए?
डॉक्टर बताते हैं कि एक नवजात शिशु को ज़्यादा घंटों की नींद लेनी चाहिए वहीं जैसे-जैसे उम्र बढ़ती जाती है नींद में कमी आने लगती है.
डॉ जे सी सूरी बताते हैं कि स्लीप फाउंडेशन के मुताबिक़ नवजात शिशु को 14-17 घंटे सोना चाहिए वहीं किशोर(14-17उम्र) आठ से दस घंटे की नींद लेनी चाहिए.
वहीं 18-26 वर्ष के युवा और 26-64 वर्ष के लोगों को सात से नौ घंटे और 65 से ज़्यादा उम्र के लोगों को 7-8 घंटे की नींद लेनी चाहिए.
डॉक्टरों के अनुसार हमारी जिंदगी दिन और रात के हिसाब से चलती है, जहां हम दिन में जागते हैं और काम करते हैं वहीं रात में सोते है. उसी के अनुसार खाना भी खाते हैं. नींद हमारे मस्तिष्क, शरीर के सभी फंक्शन को सुचारु रूप से चलाने के लिए बहुत अहम होती है.
वहीं डॉक्टर जिन लोगों को नींद नहीं आती है उन्हें स्लीप हाइजीन बरतने की बात कहते हैं.
स्लीप हाइजीन में लोगों को सलाह दी जाती है कि वे दिन में न सोए और रात को चाय या काफ़ी न पीएं.
डॉक्टर के अनुसार कई लोगों का सांस लेने का रास्ता जन्म से ही छोटा होता है और वज़न बढ़ने पर ये समस्या बढ़ जाती है , वहीं मोटापा की वजह से भी ये परेशानी आ सकती है. ऐसे में सक्रिय जीवनशैली अपनानी चाहिए.
डॉ कामेश्वर प्रसाद कहते हैं कि लोग ये समझ नहीं पाते कि उन्हें नींद को लेकर समस्या है तो जांच कराएं और इलाज कराएं ताकि डिमेंशिया की परेशानी आगे जाकर न हो और उससे होने वाली अन्य बीमारियों से बचा सके.
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