स्लीप पैरालिसिस क्या होता है और क्या हैं लक्षण?

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- Author, फ़ातिमा फ़रहीन
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि आधी रात को अचानक आपकी नींद खुलती है और आपको लगता है कि कमरे की दीवारें चारों तरफ़ से सिकुड़ रही हैं और आपको जकड़ लेंगी?
या फिर कभी लगता है कि कमरे के पर्दे के पीछे या आपके बिस्तर के बिल्कुल आस-पास कोई खड़ा है और वो आपको दबोचने की कोशिश कर रहा है.
आप बचने की कोशिश भी करते हैं लेकिन आपका जिस्म नहीं हिलता है. आप डर जाते हैं और डर कर चीखने की कोशिश करते हैं लेकिन आपको ये महसूस होता है आपके गले से आवाज़ भी नहीं निकल रही है और इस बीच आपको पसीना आने लगता है.
ऐसा कई लोगों के साथ होता है और भारत में तो कुछ लोग मानने लगते हैं कि यह कोई भूत-प्रेत या बुरी आत्मा का साया है.
लेकिन विज्ञान ने आपकी इस स्थिति को बहुत हद तक समझ लिया है और वैज्ञानिक आधार पर इसका जवाब ढूंढने की कोशिश की है.
मेडिकल साइंस में ऐसी अवस्था को स्लीप पैरालिसिस कहते हैं.
दिल्ली स्थित बीएलके मैक्स अस्पताल के न्यूरोलॉजिस्ट डॉक्टर विनीत बंगा कहते हैं कि जब हम सोते हैं तो हमारी स्लीप साइकिल के दो हिस्से होते हैं:
- रैपिड-आई मूवमेंट (REM)
- नॉन-रैपिड-आई मूवमेंट (NREM) स्लीप.
जब हम आरईएम स्लीप फ़ेज़ में होते हैं तो उस समय हम सपने देखते हैं. इस दौरान हमारे ब्रेन सेल्स बॉडी को ऐसे सिग्नल देते हैं कि वो मूव नहीं कर पाएं क्योंकि अगर बॉडी मूव करेगी तो हम हाथ पैर चला सकते हैं.
स्लीप पैरालिसिस के दौरान ब्रेन जाग गया है लेकिन बॉडी अभी भी पूरी तरह नहीं जागी है. नींद खुल गई है लेकिन बॉडी के पैरालिसिस में रहने को स्लीप पैरालिसिस कहा जाता है.

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क्या कहता है शोध
स्लीप पैरालिसिस के दौरान कुछ लोगों को लगता है कि उन्होंने किसी दानव, भूत-प्रेत, एलियंस या फिर अपने मरे हुए रिश्तेदारों को देखा है.
कुछ लोग अपने ही शरीर के कुछ हिस्सों को हवा में तैरते हुए देखते हैं और कुछ को तो लगता है कि उनका ही हमशक्ल उनके बगल में खड़ा है.
कुछ लोग इसे धार्मिक अनुभव समझते हैं और कहते हैं कि उन्होंने सपने में फ़रिश्तों को देखा है.
शोधकर्ताओं का मानना है कि इन हैलोसिनेशन की वजह से ही आधुनिककालीन यूरोप के शुरुआती दिनों में चुड़ैलों के होने जैसे अंधविश्वास को बढ़ावा मिला.
वैज्ञानिकों का मानना है कि स्लीप पैरालिसिस संभवतः तब से अस्तित्व में है जब से मनुष्य सो रहे हैं. साहित्यिक इतिहास के ज़रिए इसका कई रंगीन वर्णन मिलता है.
19वीं सदी की ब्रितानी लेखिका मैरी शेली ने अपने मशहूर उपन्यास फ़्रैंकनस्टाइन में भी स्लीप पैरालिसिस का ज़िक्र किया है. लेकिन हाल तक इस पर बहुत कम शोध हुए हैं.
हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में इंसानों की नींद पर शोध कर रहे बालंद जलाल का कहना है कि अबतक इसको काफ़ी नज़रअंदाज़ किया जाता रहा है लेकिन पिछले दस सालों में इस विषय में लोगों की रुचि बढ़ी है.
जलाल ने 2020 में स्लीप पैरालिसिस के इलाज के लिए विभिन्न तरीक़ों का पहले क्लिनिकल ट्रायल पूरा किया.
सेंट मैरी कॉलेज ऑफ़ मैरीलैंड में विज़िटिंग एसोसिएट प्रोफ़ेसर और क्लिनिकल मनोवैज्ञानिक ब्रायन शार्पलेस ने साल 2011 में पेंसिल्वेनिया स्टेट यूनिवर्सिटी में रहते हुए इस मामले में अब तक का सबसे गहन अध्ययन किया है.
उन्होंने पांच दशकों के दौरान 35 अध्ययनों के आंकड़ों का विश्लेषण किया, जिसमें क़रीब 36 हज़ार से अधिक वॉलेंटियर्स शामिल थे.
शार्पलेस ने पाया कि स्लीप पैरालिसिस पहले की तुलना में अब ज़्यादा कॉमन है. उनके अनुसार क़रीब आठ फ़ीसद व्यस्कों ने कम से कम एक बार इस तरह का अनुभव किया है.
उन्होंने इस पर एक किताब भी लिखी है जिसका नाम है ‘स्लीप पैरालिसिस: हिस्टॉरिकल, साइकोलॉजिकल एंड मेडिकल पर्सपेक्टिव’.

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भारत में शोध की स्थिति
गुरुग्राम स्थित फ़ोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट में न्यूरोलॉजी डिपार्टमेंट के हेड डॉक्टर प्रवीण गुप्ता कहते हैं कि भारत में इस बारे में कोई ख़ास शोध नहीं हुआ है इसलिए यह बताना मुश्किल है कि भारत में कितने लोग इसके शिकार हैं.
डॉक्टर विनीत बंगा का भी कहना है कि भारत के बारे में फ़िलहाल कोई आंकड़ा मौजूद नहीं है.
ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी में नींद के बारे में पढ़ाने वाली प्रोफ़ेसर कॉलिन एस्पी के अनुसार, स्लीप पैरालिसिस स्लीपवॉकिंग की तरह है और ज़्यादातर लोग इसके लिए शायद ही कभी डॉक्टर के पास जाते हैं. ज़्यादा से ज़्यादा यह घर-परिवार में बस बातचीत का एक टॉपिक होता है.
लेकिन शार्पेलेस ने अपने शोध में पाया कि 15 से 44 फ़ीसद लोग जो स्लीप पैरालिसिस के शिकार थे वो डिस्ट्रेस से भी पीड़ित थे.
प्रोफ़ेसर एस्पी कहती हैं कि आप रात आते ही एंज़ाइटी के शिकार हो सकते हैं और आपको पैनिक अटैक भी आ सकता है.
कुछ गंभीर मामलों में आप नार्कोलेप्सी के भी शिकार हो सकते हैं. नार्कोलेप्सी एक ऐसी अवस्था होती है जब आपका दिमाग सोने और जागने में ठीक संतुलन नहीं बैठा पाता है और अब दिन में या कभी भी अचानक सो जाते हैं.

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क्यों होता है स्लीप पैरालिसिस?
डॉक्टरों का कहना है कि स्लीप पैरालिसिस की एक बड़ी वजह नींद का पूरा नहीं होना है.
सोने का टाइम-टेबल नियमित ना होने या कई बार स्ट्रेस की वजह से भी आप इसके शिकार हो सकते हैं. कुछ डॉक्टरों का तो कहना है कि पीठ के बल सोने से भी आप स्लीप पैरालिसिस के शिकार हो सकते हैं.
डॉक्टर बंगा कहते हैं कि इसका सबसे साधारण इलाज तो यह है कि स्लीप पैरालिसिस के बारे में लोगों को सही जानकारी दी जाए. मरीज़ों को बताना चाहिए कि उन्हें किसी तरह की कोई गंभीर बीमारी नहीं है और उनको कोई ख़तरा नहीं है.
कुछ मामले में मेडिटेशन थेरेपी भी डॉक्टर बताते हैं.
सबसे अहम है कि मरीज़ को यह यक़ीन दिलाना होता है कि वो बिस्तर पर जाते वक़्त किसी तरह की टेंशन में ना रहें और उन्हें यह बताया जाना चाहिए कि अगर स्लीप पैरालिसिस होता भी है तो वो शांत रहें और घबराएं नहीं.
अगर मामला ज़्यादा बढ़ता है तो कुछ लोगों को डिप्रेशन से निपटने के लिए दी जाने वाली दवाएं इस्तेमाल करने का सुझाव दिया जाता है.

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यूनिवर्सिटी ऑफ़ लंदन के क्रिस्टोफ़र फ़्रेन्च ने एक दशक से भी ज़्यादा समय तक दुनिया भर में कई लोगों से बात की है जिन्हें स्लीप पैरालिसिस हुआ है या जो हैलुसिनेशन के शिकार रहे हैं.
उन्होंने उन लोगों के अनुभव को रिकॉर्ड किया है और पाया है कि कुछ लोगों को सपने में काली बिल्ली दिखी तो किसी को पेड़ों से जकड़ता हुआ इंसान.
लेकिन ज़्यादातर मामलों में उन्होंने पाया कि लोगों के अनुभव उनकी अपनी संस्कृति से प्रभावित थे.
कनाडा के ज़्यादातर लोगों को लगता था कि उन्होंने अपने सीनों पर ओल्ड हैग को देखा है तो मैक्सिको के लोगों को लगता है कि कोई मरा हुआ आदमी उनके सीने पर बैठा हुआ था.
इटली के लोगों को लगता था कि उन्होंने चुड़ैल को देखा है तो तुर्की के लोगों को लगता है कि कोई भूत-प्रेत देखा है.
जलाल ने अपने शोध में पाया कि जहां मिस्र के लोगों में 44 फ़ीसद लोग स्लीप पैरालिसिस के शिकार थे तो डेनमार्क के 25 फ़ीसद लोग.
जलाल का मानना है कि जो लोग किसी सुपरनैचुरल शक्ति में विश्वास रखते हैं, वो स्लीप पैरालिसिस के ज़्यादा शिकार होते हैं.
(साभार- इस कहानी का मूल रूप पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें.
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