ट्रंप के टैरिफ़ के बाद क्या पाकिस्तान में एक आईफ़ोन की कीमत 10 लाख रुपये हो जाएगी?

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कई लोगों के मन में यह आशंका है कि अमेरिका और चीन ने एक-दूसरे पर जो टैरिफ़ लगाए हैं, उससे लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर असर पड़ सकता है.
इसे समझने के लिए हम स्मार्टफोन कंपनी एप्पल के लोकप्रिय प्रोडक्ट आईफोन का उदाहरण ले सकते हैं. विशेषज्ञों के मुताबिक़ यह फोन अब काफ़ी महंगा हो सकता है.
व्यापार कर या टैरिफ़ सेवाओं पर नहीं लगते हैं, यह वस्तुओं पर लगाया जाता है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दुनियाभर से अमेरिका में आयात किए जाने वाली वस्तुओं पर टैरिफ़ लगा दिया है.
हालाँकि आईफोन जैसे कई अमेरिकी प्रोडक्ट चीन में भी बनाए जाते हैं. आयात की जाने वाली वस्तुओं पर लगने वाले इस टैक्स को वैश्विक व्यापार प्रणाली के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है.
इसका असर भारत और पाकिस्तान जैसे दक्षिण एशियाई देशों पर भी पड़ सकता है.

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अगर हम एलन मस्क की कंपनी टेस्ला या एप्पल के आईफोन की बात करें तो ये अमेरिकी उत्पाद आमतौर पर चीन में बनाए जाते हैं. चीन वह देश है जिस पर अमेरिका ने कुल 54% अतिरिक्त टैरिफ लगाया है.
यदि ये टैरिफ़ लागू रहे तो एप्पल जैसी कंपनियों के पास केवल दो विकल्प होंगे, या तो वे ख़ुद इसका नुक़सान उठाएं या इसका बोझ उपभोक्ताओं पर डाल दें.
एक आईफोन कितना महंगा हो सकता है?

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डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ़ की घोषणा के बाद से गुरुवार तक एप्पल के शेयर की कीमत में 9.3% की गिरावट आ चुकी है. यह मार्च 2020 के बाद अपने सबसे निचले स्तर पर है.
एप्पल हर साल 22 करोड़ आईफोन बेचता है. अमेरिका, चीन और यूरोप इसके सबसे बड़े खरीदार हैं.
लेकिन इसके अलावा भारत, पाकिस्तान जैसे कई एशियाई देशों में भी बड़ी संख्या में लोग इसे ख़रीदते हैं.
अगर एप्पल टैरिफ़ का बोझ उपभोक्ताओं पर डालता है तो इसकी क़ीमत में क़रीब 43 फ़ीसदी की बढ़ोतरी होगी.
अमेरिका में सबसे सस्ते आईफ़ोन16 मॉडल की कीमत क़रीब 799 डॉलर यानी 2 लाख 24 हज़ार पाकिस्तानी रुपए है. लेकिन रोसेनब्लाट सिक्योरिटीज़ के मुताबिक़ ये क़ीमत बढ़कर 1142 डॉलर यानी 3 लाख 20 हज़ार पाकिस्तानी रुपए तक हो सकती है.
वहीं अमेरिका में सबसे महंगे मॉडल आईफोन 16 प्रो मैक्स की कीमत 1,599 डॉलर यानी 4,50,000 पाकिस्तानी रुपए है. अगर 43% की इस बढ़ोतरी का बोझ उपभोक्ताओं पर डाल दिया जाता है तो इसकी नई कीमत साढ़े छह लाख रुपये होगी.
अनुमान के मुताबिक़ पाकिस्तान में आईफोन पहले से ही अमेरिका की तुलना में 40% ज़्यादा महंगा है.
अब एप्पल के इन्हीं मॉडल्स की पाकिस्तान में क़ीमत की बात करें तो वहां एप्पल के डिस्ट्रिब्यूटर मर्केंटाइल के मुताबिक़ देश में आईफोन-16 मॉडल की कीमत 3 लाख 17 हज़ार पाकिस्तानी रुपये है और सबसे महंगे मॉडल आईफोन-16 प्रो मैक्स की कीमत 6 लाख़ 24 हज़ार पाकिस्तानी रुपये है.
राजधानी इस्लामाबाद में एक आईफोन डीलर ने बीबीसी को बताया कि इस समय ऐसी अफवाहें चल रही हैं कि पाकिस्तान में आईफोन की कीमतें 10 लाख पाकिस्तानी रुपये से ज़्यादा हो सकती हैं, लेकिन जब तक कि एप्पल खुद कीमतें नहीं बढ़ाता, इस बात में कोई सच्चाई नहीं है.
उन्होंने कहा कि आईफोन जैसे अमेरिकी उत्पादों पर देश में पहले से ही कई प्रकार के टैक्स और शुल्क लगाए गए हैं, जिससे उनकी कीमतें, यहां अमेरिका की तुलना में ज़्यादा हैं.

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अगर इस आधार पर देखें तो क्योंकि आईफोन 16 अमेरिका में महंगा है, इसलिए पाकिस्तान में इसके कुछ मॉडल निश्चित तौर पर 10 लाख रुपये का आंकड़ा पार कर सकते हैं. लेकिन यह कीमत ख़ुद एप्पल की घोषणा पर निर्भर करती है.
राष्ट्रपति के तौर पर ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान जब चीनी आयात पर दबाव बढ़ाया गया था, तब एप्पल को विशेष छूट मिली हुई थी. इस बार एप्पल को अभी तक कोई छूट नहीं मिली है.
एप्पल ने अभी तक इस मामले पर कोई टिप्पणी नहीं की है.
पाकिस्तान और कई अन्य देशों के विपरीत, अमेरिका में कई उपभोक्ता अपने सेल फोन सेवा मुहैया कराने वाली कंपनियों से दो या तीन साल के समय के लिए आसान किश्तों पर फोन खरीदते हैं.
विश्लेषकों का मानना है कि एप्पल ने अभी तक उपभोक्ताओं के लिए एआई के क्षेत्र में बेहतर सुविधा उपलब्ध नहीं कराई है, इसलिए इसके नए मॉडलों की मांग काफ़ी कम हो सकती है. साथ ही नए टैरिफ से एप्पल पर दबाव और ज़्यादा बढ़ेगा.
कुछ विश्लेषकों का मानना है कि नए 'आईफोन 17' के लॉन्च होने तक कीमतों में बढ़ोतरी नहीं की जाएगी.
काउंटरपॉइंट रिसर्च के सह-संस्थापक नील शाह का कहना है कि आयात पर लगने वाले टैक्स की वजह से एप्पल को अपनी कीमतों में औसतन कम से कम 30 फ़ीसदी की बढ़ोतरी करनी होगी.
रोसेनब्लाट सिक्योरिटीज़ के विश्लेषण के मुताबिक़ ट्रंप के टैरिफ़ से एप्पल को 40 अरब डॉलर तक का नुक़सान हो सकता है.
नाइकी के जूते कितने महंगे हो जायेंगे?

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मशहूर अमेरिकी ब्रांड नाइकी के एयर जॉर्डन वन जूते दशकों से लोकप्रिय हैं और इन्हें बास्केटबॉल के दिग्गज़ खिलाड़ी माइकल जॉर्डन इस्तेमाल करते थे.
ये ज़्यादातर अमेरिका में बेचे जाते हैं, लेकिन यह एशिया में बनाया जाता है, जहां ट्रंप ने टैरिफ लगाया है.
टैरिफ घोषणा के बाद से नाइकी के शेयरों की कीमत में 14% तक गिर गई है. आशंका जताई जा रही है कि इस टैरिफ से कंपनी की सप्लाई चेन प्रभावित होगी.
यह अहम बात होगी कि नाइकी उपभोक्ताओं पर कितना बोझ डालेगी और ये टैरिफ़ कितने समय तक जारी रहेंगे.
वियतनाम, इंडोनेशिया और चीन पर अमेरिका का टैरिफ़ सबसे ज़्यादा है, जो 32 से 54 फ़ीसदी तक है.
उम्मीद इसकी भी है कि ट्रंप अपनी घोषणा के बाद अमेरिका के ख़िलाफ़ लगाए गए टैरिफ़ पर बातचीत करेंगे. उन्होंने शुक्रवार को वियतनामी नेता के साथ "सकारात्मक बातचीत" की है, जिसके बाद नाइकी के शेयरों में सुधार हुआ है.
लेकिन ज़्यादातर विश्लेषकों का मानना है कि नाइकी के जूतों की कीमतें बढ़ेंगी. खुदरा विक्रेता मौजूदा समय में इन्हें अमेरिका में 121 से 152 डॉलर में बेच रहे हैं, लेकिन अगर नाइकी टैरिफ़ का पूरा बोझ उपभोक्ताओं पर डाल दे तो इनकी कीमतें 131 से 166 डॉलर तक बढ़ सकती हैं.
मॉर्निंगस्टार के विश्लेषक डेविड स्वार्ट्ज का मानना है कि यदि नाइकी कीमतें बढ़ाती है, तो इसकी मांग कम हो जाएगी.
अन्य अमेरिकी ब्रांड एचएंडएम, एडिडास, गैप और अन्य कंपनियां भी इसी प्रकार की समस्याओं का सामना कर रही हैं.
टैरिफ़ के ख़िलाफ़ अन्य देशों की प्रतिक्रिया होगी अहम

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नाइकी उन कंपनियों में से एक है जो पहले से ही संकटों का सामना कर रही है.
सबसे ताज़ा वित्तीय वर्ष में इसने 51 अरब डॉलर मूल्य के प्रोडक्ट बेचे हैं. कंपनी ने उत्पाद निर्माण, शिपिंग, तीसरे पक्ष के मुनाफे और अन्य ख़र्चों पर 55 फ़ीसदी खर्च किया और 40 फ़ीसदी से अधिक का ग्रॉस मार्जिन हासिल किया.
लेकिन यह लाभ कारोबार की लागतों, जैसे मार्केटिंग और प्रशासनिक खर्चों में बांटा जाता है. ब्याज और टैक्स चुकाने के बाद, नाइकी का लाभ 11% रह जाता है.
ट्रंप की घोषणा से पहले ही नाइकी की बिक्री में गिरावट आ रही थी. जबकि इस घोषणा के बाद कीमतों को लेकर उपभोक्ताओं का भरोसा भी कमजोर पड़ सकता है.
विशेषज्ञों का मानना है कि यह देखना भी अहम होगा कि अन्य देश और अमेरिका के व्यापारिक साझेदार इन टैरिफ़ पर कैसी प्रतिक्रिया देते हैं. मसलन चीन ने अमेरिका पर 34% का जवाबी टैरिफ़ लगाया है.
प्रोफेसर लू का कहना है कि नाइकी जैसी कंपनियों के लिए अचानक सप्लाई चेन को बदलना मुश्किल होगा क्योंकि जूते बनाने की प्रक्रिया काफ़ी जटिल है.
"इसमें गुणवत्ता, लागत, बाज़ार तक पहुंचाने में लगने वाला समय, पर्यावरणीय जोख़िम आदि जैसे कई कारक शामिल हैं."
पॉवर्स एडवाइज़री ग्रुप के मुताबिक़ सप्लाई चेन में बदलाव करने में कंपनियों को कई साल लग सकते हैं.
इस मुद्दे पर नाइकी ने बीबीसी के सवालों का जवाब नहीं दिया.
वहीं एशिया के 30 सप्लायर्स ने भी ट्रंप की घोषणा पर कोई टिप्पणी नहीं की है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
















