ट्रंप ने क्या साबित कर दिया कि भारत का फ़ैसला समझदारी भरा था?

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- Author, रजनीश कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
रूस ने यूक्रेन पर 24 फ़रवरी 2022 को जब हमला किया था तो भारत पर चौतरफ़ा दबाव था कि रूस के ख़िलाफ़ खुलकर सामने आए.
तब अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन ने कहा था कि यूक्रेन पर रूस की आक्रामकता के मामले में भारत का बहुत ही ढुलमुल व्यवहार है.
बाइडन ने मार्च 2022 में कहा था, ''क्वॉड में भारत को छोड़ दें तो जापान और ऑस्ट्रेलिया रूस को लेकर बहुत सख़्त हैं. भारत का रवैया थोड़ा ढुलमुल है. हम नेटो और पैसिफिक में पुतिन के ख़िलाफ़ पूरी तरह से एकजुट हैं.''
क्वॉड गुट में अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत हैं. बाइडन चाहते थे कि रूस के मामले में क्वॉड भी एकजुट रहे लेकिन भारत ने रूस के ख़िलाफ़ पश्चिम की लाइन लेने से इनकार कर दिया था.

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पश्चिमी देशों की प्रेस में यूक्रेन पर रूस के हमले में भारत के रुख़ की तीखी आलोचना हो रही थी.
भारत ने पश्चिम के दबाव में झुकने की बजाय रूस से सस्ता तेल ख़रीदना शुरू कर दिया था और दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार रिकॉर्ड 60 अरब डॉलर से ऊपर चला गया था.
बाइडन ने कहा था कि रूस से तेल ख़रीदना भारत के हित में नहीं है. अमेरिका के तत्कालीन डेप्युटी एनएसए दलीप सिंह अप्रैल 2022 में नई दिल्ली आए थे और उन्होंने कहा था कि अगर चीन फिर से एलएसी का उल्लंघन करता है तो रूस भारत के बचाव में नहीं आएगा.
पिछले साल आठ जुलाई को प्रधानमंत्री मोदी रूस के दो दिवसीय दौरे पर गए थे. इस दौरे को लेकर पूछे गए सवाल पर 12 जुलाई को अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जैक सुलिवन ने कहा था कि रूस पर लंबी अवधि के लिए एक विश्वसनीय पाार्टनर के रूप में दांव लगाना भारत के लिए सही नहीं है.
भारत का झुकने से इनकार

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जैक सुलिवन ने कहा था, ''रूस चीन के क़रीब आ रहा है. यहाँ तक कि रूस चीन का जूनियर पार्टनर बन गया है. ऐसे में रूस भारत नहीं चीन का पक्ष लेगा. ज़ाहिर है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चीन की आक्रामकता को लेकर चिंतित हैं. हाल के वर्षों में हमने चीनी आक्रामकता देखी भी है.''
पश्चिम के प्रेस में कहा जा रहा था कि भारत पुतिन को यूक्रेन के ख़िलाफ़ जंग में मदद कर रहा है. बाइडन प्रशासन भारत के रूस के साथ होने को लेकर काफ़ी परेशान था. पिछले साल 11 जुलाई को भारत में अमेरिका के राजदूत एरिक गार्सेटी ने कहा था कि युद्ध के समय रणनीतिक स्वायत्तता जैसी कोई चीज़ नहीं होती है.
एरिक गार्सेटी ने नई दिल्ली में आयोजित इंडिया-यूएस एंड सिक्यॉरिटी पार्टनर्शिप कॉन्क्लेव में कहा था, ''भारत रणनीतिक स्वायत्तता की बात करता है और मैं इसका आदर करता हूँ. लेकिन युद्ध के समय रणनीतिक स्वायत्तता जैसी कोई चीज़ नहीं होती है. संकट की घड़ी में हमें साथ रहने की ज़रूरत है. ज़रूरत के वक़्त हमें विश्वसनीय साझेदार के रूप साथ रहना चाहिए.''
अंग्रेज़ी अख़बार द हिन्दू के अंतरराष्ट्रीय संपादक स्टैनली जॉनी ने लिखा है, ''आप कल्पना कीजिए कि भारत बाइडन और उनके यूरोपियन साझेदारों के दबाव में रूस के ख़िलाफ़ पश्चिम के प्रतिबंध में शामिल होकर संबंध सीमित कर लेता को आज किस लायक़ होता?''
ये बात अब इसलिए कही जा रही है कि ट्रंप ने ख़ुद ही पुतिन के प्रति नरमी दिखानी शुरू कर दी है और यूक्रेन समेत यूरोप को अलग-थलग कर दिया है. वहीं रूस तो भारत का ऐतिहासिक पार्टनर रहा है.
इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में अंतरराष्ट्रीय संबंध और अमेरिकी विदेश नीति के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर डॉ मनन द्विवेदी कहते हैं कि भारत ने यूक्रेन-रूस जंग में जो नीति अपनाई थी वो बिल्कुल सही लाइन थी.
भारत की दूरदर्शिता

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डॉ मनन द्विवेदी कहते हैं, ''भारत जब रणनीतिक स्वायत्तता की बात करता था तो पश्चिम के लोग इसे गंभीरता से नहीं लेते थे. लेकिन ट्रंप ने आने के बाद जिस तरह की नीति अपनाई है, उससे यूरोप को भी अब अहसास हो गया है कि अमेरिका की हर बात सुनना या उस पर निर्भर होना ठीक नहीं है."
"ट्रंप ने यूक्रेन-रूस जंग में यूरोप को पूरी तरह से अलग-थलग कर दिया है. यूरोप अभी इस हालत में नहीं है कि बिना अमेरिकी मदद के यूक्रेन के लिए रूस लड़े. भारत रूस को किसी भी सूरत में अमेरिका के दबाव में नहीं छोड़ सकता था. अगर भारत झुक जाता तो आज जो ट्रंप कर रहे हैं, उसमें दोनों तरफ़ से जाता.''
डॉ मनन द्विवेदी कहते हैं, ''मोदी जब पिछले साल जुलाई में रूस गए थे और पुतिन को गले लगाया था तो यूक्रेन के राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की ने मखौल उड़ाया था. अब अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ज़ेलेंस्की का मखौल उड़ा रहे हैं. मोदी पिछले साल अगस्त में यूक्रेन भी गए थे और उनके वापस आने के बाद ज़ेलेंस्की तंज़ कस रहे थे. अब ज़ेलेंस्की को भी अहसास हो गया होगा कि जंग किसी के भरोसे नहीं लड़ी जाती है. भारत ने अपनी विदेश नीति बिल्कुल अपने हितों के हिसाब से रखी थी न कि किसी के दबाव में आकर.''
डॉक्टर मनन द्विवेदी मानते हैं कि यूक्रेन के मामले में ट्रंप पुतिन को लेकर जैसी नरमी दिखा रहे हैं, उससे अमेरिका की विश्वसनीयता और कमज़ोर हुई है.
अब स्थिति ऐसी हो गई है कि ट्रंप और ज़ेलेंस्की एक दूसरे पर निशाना साध रहे हैं.
ट्रंप जंग ख़त्म कराने के लिए वार्ता कर रहे हैं लेकिन केवल पुतिन से. इस बातचीत में ट्रंप ने यूक्रेन और यूरोप को शाामिल नहीं किया है. अमेरिका पहले ही इस बात के लिए तैयार हो गया है कि यूक्रेन की सीमा 2014 से पहले की नहीं होगी यानी क्राइमिया रूस के पास ही रहेगा.
पुतिन की जीत और यूक्रेन की हार?

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रूस ने 2014 में क्राइमिया पर क़ब्ज़ा कर लिया था. अमेरिका ने यह भी कहा है कि यूक्रेन नेटो का सदस्य नहीं बनेगा. ज़ाहिर है कि पुतिन भी यही चाहते थे. यूक्रेन के अभी 20 फ़ीसदी भूभाग पर रूस का नियंत्रण है और पुतिन ने ऐसा कोई संकेत नहीं दिया है कि यूक्रेन से जंग समाप्त करने के लिए इस नियंत्रण को ख़त्म कर देंगे.
ट्रंप के रुख़ को लेकर यूरोप में भी भारी बेचैनी है. जिस नेटो की सदस्यता के लिए ज़ेलेंस्की इतने परेशान थे और अब वही नेटो अप्रासंगिक होता दिख रहा है. नेटो एक सुरक्षा गारंटी देने वाला गुट है लेकिन ये आपस में ही तमाम मतभेदों से जूझ रहे हैं. ट्रंप की शिकायत है कि नेटो का ज़्यादातर वित्तीय बोझ अमेरिका पर आता है और वह ज़्यादा दिनों तक इसे वहन नहीं करेगा.
ट्रंप के रुख़ को लेकर यूरोप के नेताओं की बेचैनी और दुविधा साफ़ दिख रही है.
ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने ट्रंप के रुख़ पर लिखा है, ''हम यूरोप के लोग कब डोनाल्ड ट्रंप से नाराज़ होना बंद कर उन्हें जंग ख़त्म करने में मदद करना शुरू करेंगे? ज़ाहिर है कि यूक्रेन ने जंग की शुरुआत नहीं की थी. आप यह भी कह सकते हैं कि अमेरिका ने जापान के पर्ल हार्बर पर हमला किया था. ये सच है कि यूक्रेन हिंसक हमले का सामना कर रहा है, ऐसे में चुनाव नहीं करा सकता है.''
जॉनसन ने लिखा है, ''ब्रिटेन में भी 1935 से 1945 के बीच चुनाव नहीं हुआ था. यह बात भी सच है कि ज़ेलेंस्की की रेटिंग्स चार प्रतिशत नहीं है. ट्रंप का बयान ऐतिहासिक रूप से सही नहीं है लेकिन यूरोप का रुख़ भी ठीक नहीं है. ख़ासकर अमेरिका बेल्जियम में 300 अरब डॉलर की रूसी संपत्ति फ्रीज़ किए जाने को देख सकता है. इस रक़म का इस्तेमाल यूक्रेन को भुगतान करने और अमेरिका की मदद में हो सकता है. पुतिन की इस नक़दी को यूरोप ने फ्रीज़ करके क्यों रखा है? अमेरिका का मानना है कि बेल्जियम, फ़्रांस और अन्य देशों ने इसे फ्रीज़ करके रखा है. यह बहुत ही ख़राब है. हमें इसे गंभीरता से लेना होगा और तत्काल.''
भारत की समझदारी?

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सऊदी अरब में भारत के राजदूत रहे तलमीज़ अहमद कहते हैं कि भारत किसी भी सूरत में रूस को नहीं छोड़ सकता था. बाइडन को अंदाज़ा होना चाहिए था कि अमेरिका की विश्वसनीयता ट्रंप के पहले भी बहुत संदिग्ध रही है.
तलमीज़ अहमद कहते हैं, ''भारत ने अतीत में अमेरिका को ख़ूब अनुभव किया है. अफ़ग़ानिस्तान को अमेरिका ने युद्धग्रस्त इलाक़ा बनाकर छोड़ दिया. इराक़ में क्या किया सबको पता है. सीरिया में कुर्दों के साथ क्या किया, पूरी दुनिया ने देखा. भारत ने ख़ुद भी पाकिस्तान के साथ जंग में अमेरिका का रुख़ देखा है. ऐसे में पश्चिम के देश कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि भारत रूस को छोड़ अमेरिका पर भरोसा करने लगे? भारत ने ईरान के मामले में ट्रंप की बात इसलिए मान ली थी कि बड़े पैमाने पर हित प्रभावित नहीं हो रहे थे. तेल ख़रीदने की ही बात थी और तेल बेचने वाले देशों की कमी नहीं है.''
भारत और रूस के संबंध ऐतिहासिक रहे हैं. जब भारत में ब्रिटिश हुक़ूमत थी तब ही सोवियत यूनियन ने 1900 में पहला वाणिज्यिक दूतावास खोला था. लेकिन दोनों देशों के बीच संबंधों में गर्माहट शीत युद्ध के दौरान आई.
आज़ादी के बाद से ही भारत की सहानुभूति सोवियत यूनियन से रही है. ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन की पॉलिटिकल साइंटिस्ट पिल्लई राजेश्ववरी ने लिखा है कि भारत की सोवियत यूनियन से सहानुभूति उपनिवेश और साम्राज्यवाद विरोधी भावना के कारण भी है.
यह भावना शीत युद्ध के दौरान शीर्ष पर रही. कहा जाता है कि यह भावना कई बार पश्चिम और अमेरिका विरोधी भी हो जाती है. शीत युद्ध के बाद भी भारत की सहानुभूति रूस से ख़त्म नहीं हुई. यूक्रेन युद्ध में भी भारत के रुख़ में कोई परिवर्तन नहीं आया.
यूक्रेन संकट में भारत के रुख़ से पश्चिम को भले निराशा हुई लेकिन भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ज़ोरदार और आक्रामक तरीक़े से अपनी नीति का बचाव करते रहे.
भारत का तर्क

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जयशंकर भारत के रुख़ पर यूरोप की निराशा और सवालों का जवाब बहुत ही आक्रामक तरीक़े से दे रहे थए. 2022 के जून महीने के पहले हफ़्ते में भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने स्लोवाकिया की राजधानी ब्रातिस्लावा में एक कॉन्फ़्रेंस में कहा था, ''यूरोप इस मानसिकता के साथ बड़ा हुआ है कि उसकी समस्या पूरी दुनिया की समस्या है, लेकिन दुनिया की समस्या यूरोप की समस्या नहीं है.''
जिंदल ग्लोबल लॉ स्कूल के प्रोफ़ेसर प्रभाष रंजन ने जयशंकर की इस टिप्पणी को तीन नवंबर, 1948 में संयुक्त राष्ट्र आम सभा में नेहरू के भाषण से जोड़ा था.
नेहरू ने कहा था, ''यूरोप की समस्याओं के समाधान में मैं भी समान रूप से दिलचस्पी रखता हूँ. लेकिन मैं यह भी कहना चाहता हूँ कि दुनिया यूरोप के आगे भी है. आप इस सोच के साथ अपनी समस्या नहीं सुलझा सकते हैं कि यूरोप की समस्या ही मुख्य रूप से दुनिया की समस्या है."
समस्याओं पर बात संपूर्णता में होनी चाहिए. अगर आप दुनिया की किसी एक भी समस्या की उपेक्षा करते हैं तो आप समस्या को ठीक से नहीं समझते हैं. मैं एशिया के एक प्रतिनिधि के तौर पर बोल रहा हूँ और एशिया भी इसी दुनिया का हिस्सा है.''
जयशंकर की इस टिप्पणी का हवाला देते हुए जर्मन चांसलर ओलाफ़ शॉल्त्स ने फ़रवरी 2023 में म्यूनिख सिक्यॉरिटी कॉन्फ़्रेंस में कहा था, ''भारतीय विदेश मंत्री की टिप्पणी में दम है. लेकिन अगर अंतरराष्ट्रीय संबंधों में नियमों का पालन सख़्ती से किया जाए तो यह केवल यूरोप की समस्या नहीं रहेगी, ''
लेकिन दिलचस्प यह है कि अब तक यूरोप यूक्रेन-रूस जंग में भारत को नसीहत दे रहा था और अब ख़ुद ही आत्ममंथन के लिए मजबूर है.
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