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बशर अल-असद के तख़्ता पलट के बाद सीरिया क्यों नहीं जा पा रहे शिया श्रद्धालु
- Author, सैयद मोज़िज़ इमाम
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, लखनऊ से
सीरिया में बदले हालात का असर भारत पर भी पड़ रहा है. ख़ासकर, सीरिया जाने वाले शिया तीर्थयात्रियों पर इसका असर पड़ा है.
दरअसल, पिछले दिनों सीरिया पर 24 साल से शासन कर रहे बशर अल-असद की सत्ता का पतन हो गया था. विद्रोही समूह हयात तहरीर अल-शाम (एचटीएस) ने उन्हें सत्ता से बेदख़ल कर दिया था.
इसके बाद पूर्व राष्ट्रपति असद को रूस में शरण लेनी पड़ी. सीरिया में सत्ता परिवर्तन के बाद भारत सरकार ने वहाँ फँसे भारतीयों को सुरक्षित निकाल लिया है.
सरकार हालात पर नज़र बनाए हुए है. इस बीच, भारत सरकार ने अपने नागरिकों को सीरिया के सफ़र से बचने की भी सलाह दी है.
भारत के विदेश मंत्रालय ने सीरिया के बारे में छह दिसंबर एक एडवाइज़री जारी की थी.
इसमें कहा था कि वहाँ के मौजूदा हालात के कारण भारतीय नागरिकों को सलाह दी जाती है कि वे अगली जानकारी तक सीरिया की यात्रा न करें.
भारत के शिया समुदाय के लिए यह एक अच्छी ख़बर नहीं है. सीरिया में शिया समुदाय की आस्था वाले दो महत्वपूर्ण तीर्थ हैं.
ये दोनों ही मशहूर मज़ारें हैं. ये सीरिया की राजधानी दमिश्क के पास हैं.
पहली मज़ार पैगंबर मोहम्मद की नवासी सैयदा ज़ैनब की है. दूसरी शिया समुदाय के तीसरे इमाम हुसैन की बेटी सैयदा सुकैना की है.
हर साल शिया समुदाय के हज़ारों लोग इन दोनों मज़ारों के दर्शन के लिए जाते हैं. हालाँकि,अब इसमें अड़चन आ रही है.
श्रद्धालु अभी सीरिया नहीं जा रहे
शिया श्रद्धालुओं को इराक, ईरान और सीरिया ले जाने वाले लखनऊ के काज़मैन मोहल्ले के मौलाना ग़ुलाम सरवर का कहना है कि फ़िलहाल वह किसी को भी सीरिया नहीं ले जा रहे हैं.
मौलाना सरवर इसी साल दो नवंबर को सीरिया से लौटे हैं. वे बताते हैं, "पहले सीरिया के लिए ईरान से सीधे उड़ान थी. इसे अब रोक दिया गया है."
दरअसल, सीरिया की सत्ता पर काबिज़ होने वाले एचटीएस का झुकाव सुन्नी इस्लाम की तरफ़ है. उससे पहले सीरिया पर शासन कर रहे बशर अल-असद को शिया बहुल मुल्क ईरान की हिमायत मिली हुई थी.
जामिया मिलिया इस्लामिया के सेंटर फॉर वेस्ट एशियन स्टडीज़ की प्रोफ़ेसर सुजाता एश्वर्या का कहना है, ''पहले की बशर अल-असद की हुकूमत पर ईरान का असर था. इसके धार्मिक कारण भी थे. साल 1979 में ईरान में इस्लामी क्रांति हुई थी. उस वक़्त सीरिया में बशर अल-असद के पिता हफ़ीज़ अल-असद का शासन था. वे सीरिया के अल्पसंख्यक अलावी समुदाय के थे. ईरान ने इस वजह से उनका समर्थन किया था.''
शिया क्यों जाते हैं सीरिया
हमारी मुलाक़ात लखनऊ के दुबग्गा की रहने वाली 55 साल की रज़िया बानो से हुई. वे सीरिया जाने के लिए कई ट्रैवल एजेंट के चक्कर लगा रही हैं.
उनका कहना है कि जब वे धार्मिक यात्रा पर जाएँगी, तो शाम यानी सीरिया ज़रूर जाएँगी.
हालाँकि, उनको वहाँ जाने के ख़तरे के बारे में बताया जा रहा है लेकिन उनका कहना है, "हमें अपनी जान की परवाह नहीं है."
सीरिया से शिया समुदाय का जुड़ाव बहुत पुराना है. ऐतिहासिक तौर पर बताया जाता है कि सीरिया उम्मयद शासन का केंद्र रहा है.
इनकी इस्लाम के चौथे ख़लीफ़ा अली से नहीं बनती थी. शिया अली को अपना पहला इमाम मानते हैं.
कनाडा के ओटावा शहर में रहने वाले भारतीय मूल के मौलाना अली ज़फ़र ज़ैदी ने बीबीसी हिंदी से कहा, "शिया समुदाय के दो महत्वपूर्ण स्थान सीरिया में हैं. एक तो सैयदा ज़ैनब की क़ब्र है. यह इमाम हुसैन की बहन थीं. दूसरी उनकी बेटी सुकैना की है. इन्हें अरबी लोग रुक़ैया भी कहते हैं."
हालाँकि, अली ज़फ़र ज़ैदी का कहना है, "सीरिया बहुत ही पुरानी सभ्यता है.यह ईसाई और सभी मुसलमानों के लिए महत्वपूर्ण स्थल है. अभी वहाँ जाना मुनासिब नहीं है."
अनुमान के मुताबिक, भारत में तकरीबन दो करोड़ शिया मुसलमान हैं. लखनऊ इसका मुख्य केंद्र है. पूरी दुनिया में तकरीबन 15-17 करोड़ शिया मुसलमान हैं.
यह मुसलमानों की कुल आबादी के 10 प्रतिशत के बराबर है. ज़्यादातर शिया मुसलमान भारत, ईरान, इराक़, बहरीन, अज़रबैजान, सीरिया और यमन में रहते हैं.
वहीं, अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान, क़तर, तुर्की, सऊदी अरब, कुवैत, लेबनान और संयुक्त अरब अमीरात में भी शिया मुसलमान अच्छी ख़ासी संख्या में हैं.
अफ़्रीकी देशों में, दक्षिण अफ्रीका और कुछ अन्य देशों में भी शिया लोगों की आबादी है. इसके अलावा यूरोप, अमरीका और कनाडा में भी शिया हैं. ये ज़्यादातर विदेशी मूल के हैं.
इराक, ईरान, सीरिया और शिया
लखनऊ का संबंध शिया समुदाय से गहरा है. महमूदाबाद के पूर्व राजघराने से ताल्लुक़ रखने वाले प्रोफ़ेसर अली मोहम्मद ख़ान का कहना है, "लखनऊ में कई रौज़े (मज़ार) हैं. वे इराक, ईरान और सीरिया में जो मज़ार हैं, उन सबकी शबीह (कॉपी) हैं. पहले लोग वहाँ नहीं जा सकते थे."
"वहाँ जाने के लिए पैसे लगते थे और जाना भी आसान नहीं था. तो लखनऊ या हैदराबाद के लोग दर्शन के लिए कैसे जाते? इसलिए नवाबी हुकूमत में इनकी यहाँ तामीर की गई."
अली ख़ान ने बताया कि वे सीरिया के दमिश्क में कई साल रहे हैं. वहाँ काफ़ी तादाद में शिया और सुन्नी दोनों दर्शन के लिए आते थे. हालाँकि, अब एचटीएस के आने के बाद वहाँ जाना मुश्किल होगा.
हालाँकि, कई टूर ऑपरेटर ने नाम न ज़ाहिर करने की शर्त पर बताया कि भारत से जाने वाले यात्री ईरान या इराक जाकर सीरिया का वीज़ा लेते हैं.
पहले लोग बस से चले जाते थे. सीरिया में गृह युद्ध छिड़ने के बाद हवाई जहाज़ ही एक ज़रिया बचा था. बस के रास्ते में विद्रोहियों का कब्ज़ा हो गया है.
सीरिया के अभी हालात क्या हैं
शिया समुदाय की धार्मिक यात्राओं में ईरान का मशहद और कुम शहर भी शामिल रहता है.
इराक में नज़फ़, कर्बला, सामरा है. वहीं सीरिया में दमिश्क से कुछ दूरी पर सैयदा ज़ैनब के नाम से एक शहर ही बसा है.
बाराबंकी के हैदरगढ़ के रहने वाले अज़्मी ज़ैदी पिछले दिनों इन देशों की धार्मिक यात्रा पर गए थे. वे सात दिसंबर को सीरिया से दर्शन करके नज़फ़ पहुँचे थे.
अज़्मी ज़ैदी बताते हैं, "हम 16 लोग उस दिन वहाँ से करीब पाँच बजे चले थे. इराक के नज़फ़ में उतरते ही पता चला कि दमिश्क का हवाई अड्डा बंद कर दिया गया है. अगले ही दिन पता चला कि वहाँ पर सत्ता बदल गई है."
अज़्मी के मुताबिक, "जब वे सीरिया में थे तब इन लोगों को ये पता था कि विद्रोहियों ने अलप्पो और दीगर जगहों पर कब्ज़ा कर लिया है. हालाँकि,ये अंदेशा नहीं था कि सरकार का तख़्ता पलट होने वाला है."
कई बार सीरिया जा चुके अज़्मी का कहना है, "इस बार माहौल में दहशत थी और हालात संवेदनशील लग रहे थे."
नार्वे के ओस्लो में तौहीद सेंटर चलाने वाले भारतीय मूल के शमशाद हुसैन रिज़वी का कहना है, "वे इराक के नज़फ़ शहर में हैं. वह सीरिया नहीं जा पा रहे हैं क्योंकि वहाँ के हालात ठीक नहीं हैं."
रिज़वी का कहना है, "एचटीएस दर्शन करने वालों पर पांबदी नहीं लगा रहा है लेकिन उन पर भरोसा नहीं किया जा सकता है. वे दायश (आईएसआईएस) का ही हिस्सा हैं."
ईरान के सेहर रेडियो की प्रमुख रह चुकीं भारतीय मूल की ज़हरा ज़ैदी ने बताया कि वह नज़फ़ में हैं. उनकी कई भारतीय लोगों से मुलाकात हुई, जो सीरिया जाना चाहते हैं.
वहाँ के हालात की वजह से वे वापस अपने वतन लौटने पर मजबूर हैं. ज़हरा ज़ैदी का कहना है कि अभी संशय बना हुआ है कि विद्रोही श्रद्धालुओं के साथ कैसा सुलूक करेंगे.
हालाँकि, लखनऊ के मौलाना ग़ुलाम सरवर का कहना है, "जब वे लोग गए थे, तब भी सीरिया में हालात अच्छे नहीं थे. तब बशर अल-असद की सरकार थी."
"वहाँ ज़हाज़ से उतरने के बाद हम लोगों को सुरक्षा कर्मियों ने ही मज़ार का दर्शन कराया था. रात भर धमाके हो रहे थे. अब तो हालात और भी ख़राब हो सकते हैं."
सीरिया जाने या न जाने के सवाल पर कनाडा के मौलाना अली ज़फ़र ज़ैदी का कहना है, "नागरिकों को अपने मुल्क की एडवाइज़री के हिसाब से अमल करना चाहिए क्योंकि वहाँ अभी जिनके पास सत्ता है, उन्होंने दर्शन करने वालों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी नहीं ली है."
भारत सरकार के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने 13 दिसंबर को बताया था कि हमने सीरिया से 77 लोगों को निकाला है.
इसमें 44 लोग धार्मिक यात्रा पर थे. उनको बेरूत लाया गया था. वहाँ से भारत लाया गया. बाकी जो लोग वहाँ बचे हैं, उनसे दूतावास संपर्क बनाए हुए है.जो लोग वापस आना चाहते हैं, उनकी मदद की जा रही है.
सीरिया के शिया क्या कर रहे हैं
समाचार एजेंसी 'रॉयटर्स' की एक रिपोर्ट के मुताबिक, सीरिया के शिया और अन्य अल्पसंख्यक समुदाय के एक लाख से ज़्यादा लोग लेबनान में शरण ले चुके हैं.
अनाधिकारिक आँकड़े इससे ज्यादा हो सकते हैं. सीरिया में तकरीबन 23 लाख शिया हैं. ये पूर्व शासक बशर अल-असद के समर्थक माने जाते हैं.
दूसरी ओर, एचटीएस द्वारा नियुक्त प्रधानमंत्री मोहम्मद अल बशीर ने मीडिया से कहा है कि वे सभी धार्मिक समूहों के अधिकारों को सुरक्षित रखेंगे.
समाचार वेबसाइट 'फ्रांस-24' की एक ख़बर के मुताबिक सैयदा ज़ैनब के मज़ार के निदेशक दिब क्रेयाम ने कहा है कि उनकी अधिकारियों से बात हुई है.
मज़ार खुली हुई है और वहाँ पर काम करने वाले लोग आ सकते हैं.
शिया श्रद्धालुओं को ले जाने वाले कई टूर ऑपरेटरों ने नाम न ज़ाहिर करने की शर्त पर बताया कि जनवरी में हमारे साथ कई लोग सीरिया जाने वाले थे. नए हालात में अब वे लोग सिर्फ़ इराक और ईरान ही जा पाएँगे.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.