मैनेजरों की नौकरी को आर्टिफिशयल इंटेलिजेंस से कितना ख़तरा?-दुनिया जहान 

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दुनिया में दो अरब से ज़्यादा लोगों के लिए ऑनलाइन शॉपिंग आम बात है.

हम फ़िक्र तक नहीं करते कि ऑनलाइन शॉपिंग की दुनिया चलती कैसे है?

दरअसल, पेमेंट करते ही ग्राहक तक सामान पहुंचाने के लिए बनी कंपनियां कड़ी हरक़त में आ जाती है.

सबसे पहले पास के वेयरहाउस में 'पिकर' कहे जाने वाले शख़्स तक संदेश पहुंचता है. वो ग्राहक के ऑर्डर के मुताबिक़ सामान तलाशता है. इसके बाद सामान पैक करके डिस्पैच कर दिया जाता है.

डिपो दर डिपो आगे बढ़ते हुए सामान कुरियर के जरिए हमारे दरवाज़े तक पहुंचता है.

इस पूरी प्रक्रिया और इसमें लगे लोगों को मैनेज करती है आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस यानी एआई.

अब सवाल है कि वेयरहाउस और सप्लाई चेन में एआई का जिस तरह का दखल है, क्या बाकी जगह भी वैसा ही होने जा रहा है?

बड़ा सवाल है कि क्या कंप्यूटर प्रबंधकों की नौकरी छीन लेंगे?

बीबीसी ने इसका जवाब पाने के लिए चार एक्सपर्ट से बात की.

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इंसानों की जगह कंप्यूटर

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अमेरिकी टेक कंपनी रिथिंकरी के संस्थापक डेविन फिडलर बताते हैं, ''प्रयोग के लिए हमने कई सिस्टम तैयार किए हैं. हम देखना चाहते हैं कि डिजिटल मैनेजमेंट को कहां तक ले जा सकते हैं.”

डेविन फिडलर ने ऐसे सॉफ्टवेयर तैयार किए हैं जो लोगों को संभालते हैं. वो बताते हैं कि उन्हें कल्पना से ज़्यादा कामयाबी हासिल हो चुकी है.

डेविन फिडलरकहते हैं, ''हमारे पास ऐसा सॉफ्टवेयर है जो फ्रीलांसिंग प्लेटफॉर्म पर जाता है. ये ऐसे प्लेटफॉर्म हैं जहां आप दुनिया भर के फ्रीलांसर्स से संपर्क कर सकते हैं. वहां ये ऐसे लोगों की तलाश करता है जो प्रोजेक्ट पर काम करने के लिहाज से माकूल हों. ये आमतौर पर शुरू में उन्हें छोटा काम देता है ताकि उनकी क्षमता परखी जा सके. टीम में शामिल होने के बाद नतीजे हासिल होने तक ये उनकी मदद करता है.”

 इससे लगता है कि मानो यहां कोई प्रबंधक ही एक्शन में हो.

डेविन कहते हैं कि इससे साबित हुआ कि सेल्फ ड्राइविंग यानी खुद से चलने वाला रिसर्च प्रोजक्ट तैयार करना मुमकिन है. यहां आप सिर्फ़ बटन दबाते हैं. कंप्यूटर पूरी प्रक्रिया को चलाता है और नतीजा मिल जाता है.

तो क्या ये वो दौर है जहां इंसानी प्रबंधकों की विदाई करीब है? 

डेविन फिडलरइसका भी जवाब देते हैं.

वो कहते हैं, ''मुझे लगता है कि इंसानी मैनेजर की नई परिभाषा गढ़ी जा रही है, एक तरह से मैनेजमेंट की भूमिका एआई निभाने लगी है. इंसानों की भूमिका बदल रही है. अगर आप उबर के सिस्टम में मैनेजर की भूमिका के बारे में सोचें तो वो वहां इंसान सॉफ्टवेयर की निगरानी करते हैं. ये सॉफ्टवेयर हज़ारों लोगों को मैनेज करता है. 20 साल पहले बतौर मैनेजर एक इंसान के लिए ये नामुमकिन होता.''

डेविन के मुताबिक ऐसे तमाम काम जो प्रबंधकों के जिम्मे हैं, आगे एआई के जरिए होंगे. लेकिन क्या इससे प्रबंधक ख़तरा महसूस नहीं करेंगे.

डेविन कहते हैं कि तकनीक की वजह से मैनेजर की नौकरी ख़तरे में आएगी तो वो बाकी कर्मचारियों को लेकर ज़्यादा संवेदनशील तरीके से फैसले लेंगे.

डेविन का ये भी दावा है कि कि हम जितना सोचते हैं, मशीनें संवेदनाओं को उससे बेहतर तरीके से संभाल सकती हैं.

लेकिन सवाल ये भी है कि ऐसा क्या किया जाए जिससे ये तय हो कि एआई लोगों की ज़िंदगी बेहतर बनाए और तबाही की वजह न बनें.

 डेविन फिडलर कहते हैं, ''मुझे लगता है कि इसे होशियारी से इस्तेमाल करना चाहिए. ऐसा सिस्टम बना देना आसान है जो किसी एक चीज़ में इजाफ़ा कर दे, मसलन मुनाफ़ा हासिल करना आसान बात है. ये सिस्टम जिस सामाजिक परिवेश में काम करता है, उसे उसकी जानकारी नहीं होती. उसे पता नहीं होता है कि वो जो कर रहा है वो फायदेमंद है या फिर इसकी वजह से परेशानियां बढ़ सकती हैं.”

डेविन कहते हैं कि यहां ध्यान रखना होगा कि ये भाड़े के सैनिक की तरह है. अगर कोई मुनाफे़ का लालची संगठन एआई का इस्तेमाल कर रहा है तो इसके बुरे नतीजे भी सामने आ सकते हैं.

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प्रबंधक की भूमिका

न्यूयॉर्क के कोलंबिया बिज़नेस स्कूल में प्रोफ़ेसर रीटा मैक्ग्राथ कहती हैं, ''मैनेजरों के लिए पुराने समय से जो भूमिका तय है, उसमें वो योजना बनाते हैं. लोगों को प्रोत्साहित करते हैं और काम करने के तरीके को व्यवस्थित करते हैं.''

वो बताती हैं कि एक ऐसा सिस्टम तैयार हो रहा है जहां अनुमति लेने जैसी औपचारिकताओं की ज़रूरत नहीं होती. वहां टीमें डिवाइस के भरोसे होती हैं

रीटा मैक्ग्राथकहती हैं, '' ऐसे ढांचे में आप फैसले लेने के मामले में प्रबंधन को यथासंभव हाशिए पर धकेल देते हैं. काम की प्रक्रिया को ज़्यादा पारदर्शी और ज्यादा स्पष्ट बनाने के लिए डेटा और तकनीक का इस्तेमाल करते हैं ताकि हर किसी को जानकारी हो सके कि क्या चल रहा है. अब आपको ये काम करने के लिए किसी मैनेजर की ज़रूरत नहीं होती.''

वो कहती हैं कि तकनीक की मदद से सिर्फ़ एक मैनेजर कई लोगों को संभाल सकता है. उनके लिए पहले ऐसा करना मुमकिन नहीं होता. इसे ही “स्पैन ऑफ़ कंट्रोल” कहा जाता है.

रीटा मैक्ग्राथबताती हैं, ''स्पैन ऑफ़ कंट्रोल का पारंपरिक मतलब है कि आपके मातहत कितने कर्मचारी हैं. ऐसे मामले में प्रबंधक के ऊपर उनकी निगरानी की ज़िम्मेदारी होती है. इसमें करीब सात लोगों की निगरानी का काम काफी माना जाता है. अगर इससे ज़्यादा की ज़िम्मेदारी मिलती है तो आप पर बोझ बढ़ जाएगा.''

वो आगे कहती हैं, “आज हम जो देख रहे हैं, उसमें ये मामला नहीं है. कुशलता से काम करने वाली कंपनियों में अगर 20 या तीस लोग हों तो वो कंप्यूटर सिस्टम के जरिए पता कर सकती हैं कि वो क्या कर रहे हैं. उन्हें पुराने तरीके से निगरानी करने की ज़रूरत नहीं होती.”

अंतरराष्ट्रीय डिलिवरी कंपनी यूपीएस ने इस स्थिति का फ़ायदा उठाया है. रीटा बताती हैं कि यूपीएस के ड्राइवर मोबाइल फ़ोन की जगह बीस्पोक डिवाइस इस्तेमाल करते हैं. वो यात्रा के दौरान इस डिवाइस पर हर कदम की जानकारी रिकॉर्ड करते हैं.

लेकिन क्या कंप्यूटर बोर्ड रूम की रणनीति को भी संभाल सकते हैं.

रीटा मैक्ग्राथकहती हैं, ''नहीं. मेरे हिसाब से रणनीति अब भी एक ऐसा क्षेत्र है जहां इंसानी खूबी की ज़रूरत होती है. ऐसी क्षमता की दरकार होती है, जहां भविष्य को लेकर कल्पना की जा सके. कंप्यूटर ये काम बहुत अच्छे तरीके से नहीं कर पाते. रणनीति के लिए कल्पनाशीलता की ज़रूरत होती है.''

कंप्यूटर रणनीति भले ही न बना सकते हों लेकिन प्रबंधन में उनकी भूमिका है. लेकिन उनकी जवाबदेही को लेकर सवाल उठते रहे हैं. इंसानों की जवाबदेही तय करना आसान है. रीटा कहती हैं कि मशीनों को जरूरत से ज़्यादा दखल देने का ये एक स्याह पहलू है.

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तकनीक की सीमाएं

30 साल से मानव संसाधन प्रबंधन के क्षेत्र में काम कर रहीं एमी स्टीन कहती हैं,

“आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और लोगों के बीच संबंध को लेकर मेरे अंदर जिज्ञासा रहती है. मैं लंबे समय से इस बारे में सोच रही हूं. मेरा तकनीक के प्रति बहुत रुझान है.”

एमी स्टीन अपना नया ऐप दिखाती हैं और उसकी खूबियां बताती हैं.

 वो कहती हैं, ''जब मैं सुबह जागती हूं तो ये मुझे जोश बढ़ाने वाला एक छोटा मैसेज भेजता है. एमी क्या आज आप एक फ़ीसदी बेहतर होने को तैयार हैं. मुझे ये बहुत अच्छा लगता है. मैं कहती हूं कि हां मैं तैयार हूं.''

एमी के मुताबिक़ उनका ऐप बताता है कि आपकी ताक़त क्या है. आपके पास तरक्की के कितने मौके हैं? ये पूछता है कि क्या आप कुछ नया सीखने को तैयार हैं? यहां आपको टिप्स भी मिल सकते हैं. यानी एक तरह से ये एक ऐसा कोच है जो पॉकेट में रहता है.

लेकिन क्या ये ऐप मैनेजर की भूमिका भी निभा सकता है, इस सवाल एमी कहती हैं कि वो नहीं चाहतीं कि कोई ऐप उन्हें मैनेज करे.

एमी कहती हैं कि एक रोबोट अगर आपको ये बताता है कि आज कहां जाना है तो आपके लिए अच्छा रहेगा. वो आपकी डायरी भरे. नींद से जगाए. सहयोगी के तौर पर काम करे. लेकिन मैनेजरों की भूमिका इससे कहीं ज़्यादा होती है.

वो प्रोत्साहित करते हैं. तारीफ करते हैं. कई बार बेहतर करने के लिए चुनौती भी पेश करते हैं. एआई अभी ये काम नहीं कर सकती है. उसके लिहाज से ये काफी जटिल बातें हैं.

एमी स्टीनकहती हैं, मेरा फिटबिट बताता है कि मैं आज 10 हज़ार कदम चली हूं. ये मुझे नाचते पक्षी की तस्वीर भेजता है. ये अच्छा लगता है लेकिन जब मेरे बॉस कहते हैं कि कल तुमने जो काम किया था, उसने मेरी उलझनें आसान कर दीं, शुक्रिया. तो ये मेरे लिए बहुत मायने रखता है. कंप्यूटर जब तारीफ़ करता है तो वो वास्तविक होती है लेकिन इसके मायने वैसे नहीं होते हैं जैसे किसी इंसान से मिलने वाली तारीफ के होते हैं.”

एमी ये भी कहती हैं कि आपको एआई से डरने की ज़रूरत नहीं है. अगर डेटा को लेकर इसकी समझ हमसे बेहतर है तो हमें डरना नहीं चाहिए. सभी फैसले डेटा के आधार पर तो नहीं होते हैं. कुछ फैसले भावनाओं के आधार पर लिए जाने चाहिए.

एमी स्टीनकहती हैं, चालीस साल से कंपनी में काम कर रहे व्यक्ति को नौकरी से निकालें या नहीं अगर इस बारे में फैसला करना हो तो ये भावना पर आधारित फैसला होगा. आप कहते हैं कि अपने कर्मचारियों के प्रति हमारी निष्ठा है. भले ही वो अब उतने काम के नहीं रह गए हों लेकिन हम इस व्यक्ति को नौकरी पर बनाए रखेंगे. क्योंकि हमने अपने लिए कुछ मूल्य तय किए हैं.”

एमी कहती हैं कि काम के इतर भी लोगों की ज़िंदगी होती है. लोग सिर्फ़ मशीन के पुर्जे नहीं होते हैं. मशीनें कुछ चीजों का प्रबंधन करें ये अच्छा है लेकिन कई मोर्चों पर ये जोखिम भरा हो सकता है.

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रणनीति बनाने में कौन आगे?

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के ऑक्सफ़ोर्ड मार्टिन स्कूल में फ्यूचर ऑफ़ वर्क के डायरेक्टर कार्ल बेनडिक्ट फ्रे भविष्य में नौकरियों की क्या स्थिति होगी, ये बताने के लिहाज से वो आला एक्सपर्ट हैं. कंप्यूटर कब तक प्रबंधकों का काम करने लगेंगे, वो इस सवाल का भी जवाब देते हैं.

कार्ल कहते हैं, ''हकीकत में वो स्थिति काफ़ी दूर हैं. इसका कारण ये है कि सामाजिक स्तर पर जहां जटिल मुद्दों पर चर्चा होती है, वहां कंप्यूटर की गणना से सही जानकारी नहीं मिल पाती. ये अर्थव्यवस्था और कामकाज के लिहाज से ट्रेंड को पहचानकर उसके मुताबिक तुरंत कदम नहीं उठा पाते.''

कार्ल उन शुरुआती लोगों में थे जिन्होंने आगाह किया था कि कई ऐसे काम जो अभी इंसान करते हैं, वो जल्दी ही तकनीक की मदद से किए जाने लगेंगे.

कार्ल ने एक प्रतियोगिता के बारे में बताया जहां लोगों ने चैटबोट्स के जरिए इंसानों और एआई से बात की. उन्हें ये बताना था कि इनमें से कौन इंसान है और कौन कंप्यूटर है.

कार्लने बताया, इस क्षेत्र से जुड़े कुछ लोग दावा करते हैं कि चंद साल पहले इस मामले में एक बड़ी कामयाबी हासिल हुई जब एक चैटबोट ने उसे परख रहे तीस फ़ीसदी लोगों को भरोसा दिला दिया था कि वो एक इंसान है. उसने खुद को 13 साल के अनाथ रूसी लड़के के तौर पर पेश किया, जिसके लिए अंग्रेज़ी दूसरी भाषा है. उसे अंग्रेज़ों की संस्कृति के बारे में कोई जानकारी नहीं है.”

कार्ल कहते हैं कि प्रबंधन का मतलब लोगों को सिर्फ़ ये बताना नहीं है कि वो क्या करें.

वो कहते हैं कि मैनेजरों को टीमें बनाने, लोगों को मुश्किल काम करने के लिए प्रेरित करने, सामान सप्लाई करने वालों और ग्राहकों से करार तय करने के लिए वेतन मिलता है. ये वो चीजें हैं जिन्हें आज की तारीख़ में सिर्फ़ कंप्यूटर के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता. इसे अगले कई साल तक भी कंप्यूटर के हवाले किया जाना संभव नहीं है.

लेकिन मैनेजर कुछ आसान काम भी करते हैं. वो लोगों को ये भी तो बताते हैं कि वो क्या, कब और कैसे करें?

कार्ल कहते हैं, ''ये सच है. मैनेजर कई ऐसे काम करते हैं जिन्हें मशीन के हवाले किया जा सकता है. अगर हम पीछे जाकर कंप्यूटर क्रांति को देखें तो हम पाएंगे कि बीते कुछ साल में मिडिल मैनेजमेंट का दायरा सीमित हो गया है. तकनीक ने कई चीजों को संभाल लिया है. आज के डिजिटल युग में कंप्यूटर की मदद से काफी काम हो जाते हैं.''

 ऐसे कई काम हैं जो पहले इंसान करते थे और अब कंप्यूटर करने लगे हैं. उदाहरण के लिए हर दिन लाखों शेयर खरीदे और बेचे जाते हैं. इस कारोबार का बड़ा हिस्सा कंप्यूटर की मदद से किया जाता है. इसमें इंसानों का कोई दखल नहीं होता है.

कार्ल कहते हैं कि लेकिन ये ध्यान रखना होगा कि इस मार्केट में गणनाओं की बहुत अहमियत है.

यहां कंप्यूटर का इस्तेमाल बढ़ता रहेगा लेकिन इसकी भी सीमाएं हैं.

कार्ल कहते हैं, ''अगर आप इससे आगे के प्रबंधन कार्य को देखें, मसलन निवेशकों को किसी खास फंड में पैसे लगाने के लिए तैयार करना और अच्छे लोगों की नियुक्ति करना, इसमें कंप्यूटर मददगार तो हो सकते हैं लेकिन यहां इंसानों की ज़रूरत पड़ेगी. जब कंप्यूटर ये सब कर लेंगे तो आपको कंपनी की भी ज़रूरत नहीं होगी.''

लौटते हैं, उसी सवाल पर क्या कंप्यूटर प्रबंधकों की नौकरी छीन लेंगे?

हमारे एक्सपर्ट की राय है कि अभी वो वक़्त काफी दूर दिखता है.

लेकिन, आज की बात करें तो भी कंप्यूटर प्रबंधकों का काम कर रहे हैं. ऐसे कंप्यूटर भी विकसित किए जा रहे हैं जो इंसानी संवेदना के मुताबिक काम कर सकें

हाल फिलहाल कंपनियों की रणनीतियां बनाने वाले प्रबंधकों पर कोई ख़तरा नहीं दिखता लेकिन जो लोग मिडिल मैनेजमेंट संभालते हैं, यानी लोगों को बताते हैं कि उन्हें कब और क्या करना है, उन्हें वैकल्पिक करियर को लेकर तैयारी शुरू कर देनी चाहिए.

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