ट्विटर, फ़ेसबुक के बाद अमेज़ॉन में गई नौकरियां, कितना बढ़ेगा ये संकट?

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ट्विटर और फ़ेसबुक के बाद दिग्गज टेक्नोलॉजी कंपनी अमेज़ॉन भी लगभग 10 हज़ार लोगों को नौकरी से निकालने जा रही है.
दुनिया भर में टेक्नोलॉजी के क्षेत्र की नौकरियों पर लगातार संकट मंडरा रहा है.
न्यूयॉर्क टाइम्स ने सोमवार को एक रिपोर्ट में दावा किया है कि इस हफ़्ते अमेज़ॉन में कॉरपोरेट और टेक्नोलॉजी से जुड़ी क़रीब 10 हज़ार नौकरियां बंद होने वाली हैं.
अगर ये संख्या 10 हज़ार तक रहती है तो उनमें अमेज़ॉन के तीन फीसद कॉरपोरेट कर्मचारी और एक फीसद टेक कर्मचारी शामिल होंगे.
रिपोर्ट के मुताबिक, अमेज़ॉन में होने वाली इस छंटनी का सबसे ज़्यादा असर एलेक्सा के साथ ही रीटेल डिविज़न और ह्यूमन रिसोर्स टीम पर भी होगा.
अमेज़ॉन से कुछ हफ़्ते पहले ट्विटर के नए मालिक एलन मस्क ने क़रीब आधे कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया था.
इसके बाद फ़ेसबुक की मूल कंपनी मेटा ने करीब 13 फ़ीसदी यानी 11 हज़ार कर्मचारियों को नौकरी से निकालने की घोषणा की.
मेटा के इतिहास में अब तक नौकरियों में इतनी बड़ी कटौती नहीं हुई थी.
नौकरियों में कटौती के एलान के बाद मार्क ज़करबर्ग ने कहा है कि ‘‘यह मेटा के इतिहास का सबसे मुश्किल फ़ैसला था.’’
नौकरियां जाने की वजह क्या है?

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अमेज़ॉन में नौकरियां जाने की रिपोर्ट कंपनी के संस्थापक जेफ़ बेज़ोस के सीएनएन को दिए उस इंटरव्यू के बाद आई है जिसमें उन्होंने कहा था कि वो अपनी 124 अरब डॉलर की संपत्ति को जीते जी धीरे-धीरे दान करेंगे.
अमेज़ॉन में नौकरियों पर संकट के बादल कई महीने पहले से मंडरा रहे हैं.
अप्रैल से सितंबर के बीच इस दिग्गज टेक कंपनी में करीब 80 हज़ार लोगों की नौकरियां जा चुकी हैं और कंपनी लगातार अपने यहां प्रति घंटा काम करने वाले कर्मचारियों की संख्या में कटौती कर रही है.
अमेज़ॉन ने सितंबर महीने में कई छोटी टीमों में लोगों को नौकरी देना बंद कर दिया था.
अक्टूबर महीने में अमेज़ॉन ने अपने मुख्य रीटेल बिज़नेस में करीब 10 हज़ार खाली पदों को भरने पर रोक लगा दी थी.
दो हफ्ते पहले, कंपनी ने अगले कुछ महीनों के लिए अपने क्लाउड कंप्यूटिंग डिविज़न में कंपनी भर में कॉरपोरेट हायरिंग पर रोक लगा दी. त्योहारों के मौसम में अमेज़ॉन की जॉब सिक्योरिटी को लेकर तारीफ़ होती रही है.
लेकिन नौकरियों में कटौती के इस एलान ने कहीं न कहीं यह दर्शाया है कि मंद होती वैश्विक अर्थव्यवस्था ने कंपनी पर कारोबार छोटा करने का दबाव बनाया है.
ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि क्या अमेज़ॉन में काम करने वालों की संख्या बहुत ज़्यादा थी या फिर ऐसे लोग भरे गए थे जिनका प्रदर्शन अच्छा नहीं था.
कोरोना महामारी का असर

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कोरोना महामारी के दौरान अमेज़ॉन के मुनाफ़े के साथ-साथ ऑनलाइन ग्राहकों की संख्या में भी जबरदस्त उछाल देखा गया था.
लेकिन कोरोना का असर कम होते ही कंपनी की ग्रोथ दो दशक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई.
कोरोना महामारी के दौरान काम अचानक बढ़ गया था क्योंकि ग्राहक तेज़ी से ऑनलाइन शॉपिंग की ओर बढ़े और कंपनियों ने अमेज़ॉन की क्लाउड कंप्यूटिंग सर्विस को चुना.
ऐसे में इस दिग्गज टेक कंपनी ने दो सालों में अपने यहां काम करने वालों की संख्या लगभग दोगुनी कर ली और साथ ही इस कामयाबी को विस्तार देने और नए प्रयोग करने की दिशा में आगे बढ़ने लगी.
हालांकि, कोरोना का असर कम होने की वजह से लोगों ने बाज़ारों में जाकर शॉपिंग शुरू की.
इससे अमेज़ॉन को भारी नुकसान हुआ क्योंकि कंपनी ने काफ़ी ज़्यादा निवेश करने के साथ ही अपना आकार भी बड़ा कर लिया था.
लोगों की ख़रीदारी की आदत बदली और साथ में बढ़ती हुई महंगाई से कंपनी को काफ़ी नुकसान हुआ.
अमेज़ॉन का कहना है कि उसने अपनी विस्तार योजनाओं को कुछ समय के लिए विराम दे दिया है. और अपने निवेशकों को बताया है कि फिलहाल ग्राहकों को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है.
न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, कंपनी के फ़ाइनेंस चीफ़ ब्रायन ओल्सावस्की ने बीते महीने निवेशकों से कहा कि ‘हम असलियत जानते हैं कि ग्राहकों की जेब पर कई तरह से असर पड़ रहा है.’
उन्होंने कहा कि 'कंपनी इस बात को लेकर अनिश्चित थी कि ख़र्च कहां जा रहा है, लेकिन हम इससे होने वाले कई तरह के परिणामों के लिए तैयार हैं.'
भारतीयों पर कितना असर?

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समाचार एजेंसी एएनआई की एक रिपोर्ट के अनुसार, सिंगापुर और दुनिया के अलग-अलग कोनों पर स्थित टेक्नोलॉजी कंपनियों ने या तो अपने यहां खाली पदों को भरना बंद कर दिया है या फिर टीमों को छोटा कर रही हैं.
सिंगापुर के मानव संसाधन मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार यहां 1.77 लाख रोज़गार कार्ड धारकों में से 45,000 भारतीय हैं.
इनमें से अधिकतर की नौकरी पर न सिर्फ़ मेटा के फ़ैसले का असर पड़ा है बल्कि दूसरी कंपनियां भी नौकरियों में कटौती कर रही हैं.
वाल्ट डिज़्नी ने भी नई नौकरियों पर रोक लगाने के साथ कुछ नौकरियों में कटौती की घोषणा कर दी है. इसके पीछे भी आर्थिक अनिश्चितता की संभावनाओं को वजह बताया जा रहा है.
ईटी नाऊ की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, कॉग्निजेंट इंडिया में जुलाई से सितंबर के बीच करीब छह फ़ीसदी लोगों ने खुद ही नौकरी छोड़ दी.
मनी कंट्रोल की एक रिपोर्ट में छपे कॉग्निजेंट इंडिया के प्रमुख राजेश नांबियार के एक बयान के मुताबिक अधिकतर कर्मचारियों ने खुद ही नौकरी छोड़ दी क्योंकि बहुत से लोगों ने फर्जी दस्तावेज़ लगाकर नौकरी ली थी.
बीते कुछ महीनों में मूनलाइटिंग के मामले भी खूब सामने आए हैं. दूसरी ओर वर्क फ्रॉम होम मोड के बाद ऑफिस खुले और कंपनियों ने कर्मचारियों के बैकग्राउंड चेक शुरू किए जिसमें बहुत से लोगों के दस्तावेज फर्जी पाए जा रहे हैं.
एसेंचर इंडिया ने भी बड़े स्तर पर लोगों को नौकरी से निकाला है.
कंपनी ने अपने एक बयान में कहा, ‘‘हमने यह सुनिश्चित करते हुए एक्शन लिया है कि हमारे क्लाइंट को मिलने वाली सेवाओं की हमारी क्षमता पर असर न पड़े.’’
ग्लोबल मार्केट के हालात देखते हुए कई महीने पहले ही भारतीय कंपनियों ने नई नौकरियां देने पर रोक लगा दी थी.
विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले समय में भारतीय टेक्नोलॉजी कंपनियों पर भी नौकरियां जाने का ख़तरा है.
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