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माधबी पुरी बुच: सेबी चीफ़ पर लगातार लगते आरोप और अनसुलझे सवाल
- Author, निखिल इनामदार और अर्चना शुक्ला
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़, मुंबई
टॉप फ़ंड मैनेजर्स ने बीबीसी से कहा है कि भारत का शेयर बाज़ार नियामक अपने चीफ़ के ख़िलाफ़ बड़े पैमाने पर आरोपों के बाद अपनी विश्वसनीयता के ख़तरे का सामना कर रहा है.
सिक्योरिटी एंड एक्सचेंज़ बोर्ड ऑफ़ इंडिया (सेबी) की चेयरपर्सन माधबी पुरी बुच के ख़िलाफ़ कॉन्फ़्लिक्ट ऑफ़ इंटरेस्ट (जब किसी शख़्स का फ़ैसला उसकी व्यक्तिगत रुचि से प्रभावित हो) के इर्द-गिर्द कई आरोप लगाए गए हैं. हालांकि उन्होंने इनमें से कई आरोपों को ख़ारिज किया है और इस पर सार्वजनिक तौर से कुछ नहीं कहा है.
ये सब ऐसे समय हुआ है जब भारत के शेयर बाज़ार में तेज़ी है और जो इस साल दुनिया का सबसे बेहतर बाज़ार रहा है.
विदेशी निवेशकों ने तक़रीबन 6 अरब डॉलर का निवेश किया है. वहीं करोड़ों नए ऐसे निवेशक आए हैं जो कम अनुभवी हैं. इन नए निवेशकों ने तेज़ी से इलेक्ट्रोनिक अकाउंट खोलकर म्यूजुअल फ़ंड्स और आईपीओ में निवेश शुरू किया है.
बुच पर क्या-क्या हैं आरोप
बुच के लिए मुश्किल तब शुरू हुई है जब अगस्त में अमेरिका की शॉर्ट-सेलर कंपनी हिंडनबर्ग रिसर्च ने उन पर और उनके पति पर आरोप लगाए.
रिसर्च कंपनी का आरोप है कि उन्होंने उस विदेशी फ़ंड में निवेश किया था जिसका इस्तेमाल अदानी ग्रुप ने किया था और इस वजह से सेबी अदानी के ख़िलाफ़ खातों की धोखाधड़ी और बाज़ार के हेर-फेर के आरोपों की जांच से हाथ पीछे खींच रहा है.
इसके बाद से कई आरोप सामने आ चुके हैं.
मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने बुच पर आरोप लगाए हैं कि वो उस कंपनी से किराए की आय ले रही थीं जिसके ख़िलाफ़ जांच कर रही हैं. साथ ही पार्टी ने आरोप लगाया कि वो जिस आईसीआईसीआई बैंक में पहले काम किया करती थीं उससे नौकरी के बाद भी आर्थिक लाभ ले रही थीं.
आईसीआईसीआई भारत का सबसे बड़ा निजी क़र्ज़दाता है. कांग्रेस का आरोप है कि बैंक छोड़ने के बाद भी बुच ने इम्प्लॉई स्टॉक ऑनरशिप प्लान्स (ईएसओपीज़) के तहत बड़ी रक़म हासिल की थी.
दिग्गज मीडिया कंपनी ज़ी इंटरटेनमेंट एंटरप्राइज़ के मानद अध्यक्ष सुभाष चंद्रा गोयल का बुच पर आरोप है कि उनकी कंपनी और सोनी एंटरप्राज़ेस के बीच विलय नहीं होने दिया गया. एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में उन्होंने कहा कि “मुझे पक्का विश्वास है कि सेबी चेयरपर्सन भ्रष्ट हैं” और उन्हें “प्रतिशोध” लेने वाला बताया था.
सुभाष चंद्रा फ़िलहाल सेबी की कार्रवाइयों का सामना कर रहे हैं जिनमें फ़ंड में हेर-फेर करना शामिल है. इस वजह से उन पर लिस्टेड कंपनियों में प्रमुख पदों पर रहने पर भी रोक लगा दी गई है.
सेबी के अंदर भी उठी आवाज़
लेकिन शायद इससे भी ज़्यादा ख़राब है सेबी के अंदर ही लगातार बढ़ता असंतोष जो अब सार्वजनिक तौर पर बाहर आ चुका है.
5 सितंबर को ग़ुस्साए कर्मचारियों ने बाज़ार नियामक के मुख्यालय के बाहर एक असाधारण विरोध प्रदर्शन किया जिसमें उन्होंने बुच के इस्तीफ़े की मांग की. इससे पहले तक़रीबन 1,000 कर्मचारियों ने कथित 'नुक़सानदेह कार्य संस्कृति' की शिकायत करते हुए वित्त मंत्रालय को पत्र लिखा था जिसके बारे में स्थानीय मीडिया ने रिपोर्ट किया था.
इस शिकायत में कहा गया था कि बैठकों में ‘अत्यधिक दबाव’ और ‘चीखना, चिल्लाना, बेज़्ज़त करना’ आम बात हो गई है.
सेबी ने सार्वजनिक तौर पर इन दावों को ख़ारिज करते हुए कहा था कि ‘जूनियर अफ़सरों को शायद बाहरी तत्वों ने गुमराह किया है.’
हालांकि, गुरुवार को प्रदर्शनकारियों ने इस बयान को तत्काल वापस लेने की मांग की थी.
कौन से सवाल हैं बरक़रार
एक स्वतंत्र बिज़नेस विश्लेषक हेमिंद्रा हज़ारी कहते हैं, “ये बहुत ही अजीब है. कल तक आरोप बाहर से लग रहे थे लेकिन अब अंदर की समस्या बाहर आ गई है. कुछ तो गंभीर रूप से ग़लत है.”
बुच ने मज़बूती से अपना बचाव किया है और हिंडनबर्ग केस में लगाए गए किसी भी तरह के कॉन्फ़्लिक्ट ऑफ़ इंटरेस्ट के दावों को ख़ारिज किया है. वहीं आईसीआईसीआई बैंक से तनख़्वाह या ईएसओपीज़ लेने के दावे को ख़ारिज करते हुए कहा है कि उन्होंने बैंक छोड़ने के बाद केवल रिटायरमेंट के लाभ लिए थे.
इसके अलावा सेबी चीफ़ ने अब तक प्रदर्शनकारी कर्मचारियों या सुभाष चंद्रा के बयान पर कुछ भी सार्वजनिक तौर पर नहीं कहा है.
सेबी का पक्ष जानने के लिए बीबीसी ने उनसे संपर्क किया लेकिन उसने किसी भी तरह की टिप्पणी नहीं की है.
भारत के चर्चित मैनेजमेंट स्कूल इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट अहमदाबाद से पढ़ीं बुच कई मायनों में अनोखी रही हैं. वो सेबी का नेतृत्व करने वालीं सबसे युवा और पहली महिला चेयरपर्सन हैं. वो ऐसी पहली प्रमुख हैं जो प्राइवेट कॉर्पोरेट पृष्ठभूमि से आई हैं.
विशेषज्ञों का कहना है कि उनको सेबी में सुधार का श्रेय दिया जाता है जिसमें कड़े इंसाइडर ट्रेडिंग रूल्स और ऑडिटिंग फ़्रेमवर्क लागू करना शामिल है लेकिन उन पर ही अपने वित्तीय मामलों में पारदर्शिता की कमी के आरोप लग रहे हैं.
विशेषज्ञ सवाल उठाते हैं कि क्या सेबी अपने शीर्ष अफ़सरों से उन्हीं मानकों पर काम करवाता है जिनकी वह सरकारी कंपनियों से उम्मीद करता है.
आर्थिक मामलों की वरिष्ठ पत्रकार सुचेता दलाल मनीलाइफ़ पत्रिका के एक कॉलम में लिखती हैं, "इस मुद्दे की जड़ में नियामक संस्थाओं से जुड़े वरिष्ठतम अधिकारियों की संपत्ति से जुड़ी जानकारी है क्योंकि उनके पास अप्रकाशित संवेदनशील जानकारी होती है. उनके ऑर्डर और फ़ैसले स्टॉक मार्केट पर असर डाल सकते हैं. इसलिए कड़े अनुपालन और डिस्कलोज़र नियमों की ज़रूरत होती है."
दलाल लिखती हैं कि नियामक संस्थाओं के प्रमुखों के लिए विकसित देशों में क़ानून बड़े सख़्त हैं. मिसाल के तौर पर वे ऐसी कंपनियों में निवेश नहीं कर सकते जिनमें निवेश से कॉन्फ़्लिक्ट ऑफ़ इंटरेस्ट के हालात बनते हों.
वो कहती हैं कि आईसीआईसीआई बैंक के बयान में स्टॉक ऑप्शन की नीति के बारे में कुछ ख़ामियां हैं जिसके कारण सुलझने के बजाय ये सारा मुद्दा और अधिक उलझ गया है.
शेयर मार्केट का क्या है भविष्य
सेबी जैसे नियामकों में आमतौर पर राजनीतिक और निजी क्षेत्रों से नियुक्तियां होती हैं. सेबी एक बोर्ड के ज़रिए चलता है जिसमें वित्त मंत्रालय, केंद्रीय बैंक और केंद्र सरकार के नामित सदस्य होते हैं.
इनगवर्न रिसर्च के श्रीराम सुब्रमण्यन कहते हैं कि ‘बुच मामला’ सिर्फ़ सेबी के लिए ही नहीं बल्कि सभी भारतीय नियामकों जैसे कि इंश्योरेंस वॉचडॉग या कॉम्प्टीशन कमीशन के लिए एक ‘सीख’ है, ताकि वो भी अधिक मज़बूत डिस्क्लोज़र प्रक्रिया अपनाएं.
सुब्रमण्यन कहते हैं, “यह और अधिक पारदर्शिता लाएगा.”
फ़िलहाल निवेशक बीते महीने की घटनाओं से विचलित नहीं दिख रहे हैं.
एक पुराने निवेशक कहते हैं, "ग्लोबल निवेशक वैसे भी भारत में निवेश करते वक़्त एक रिस्क प्रीमियम की अदायगी करते हैं इसलिए वो लोग तो इसे नज़रअंदाज़ ही करेंगे.”
हज़ारी कहते हैं कि अगर ये विवाद और अधिक बड़ा होता है तो हालात और ख़राब हो सकते हैं.
उनका आकलन है, "अगर अनुपालन से जुड़ी आंतरिक चेतावनियां बाहर आईं तो संस्थागत निवेश हमारी मार्केट से बाहर जा सकता है. और अगर ऐसा हुआ तो फुटकर निवेशक भी धीरे-धीरे बाज़ार से हाथ खींचने लगेंगे."
सेबी के भीतर और बाहर से बढ़ते दबाव के बीच माधबी पुरी बुच का सामना अब अपना पद छोड़ने जैसे मुश्किल सवाल से हो रहा है.
भारत के पूर्व वित्त सचिव सुभाष गर्ग ने पत्रकार बरखा दत्त को बताया है कि 'कुछ हफ़्ते पहले उनकी स्थिति 'अस्थिर' थी लेकिन अब तो धीरे-धीरे उनके लिए हालात मुश्किल होते जा रहे हैं.'
माधबी पुरी बुच का अपने पद से इस्तीफ़ा देना या सरकार द्वारा उन्हें निष्कासित किया जाना, अपराध की स्वीकृति जैसा होगा. और ये न माधबी पुरी बुच चाहेंगी और न ही सरकार.
शेयर बाज़ार के कम से कम तीन जानकारों ने बीबीसी को बताया है कि पूरे विवाद का संभावित नतीजा ये होगा कि सरकार माधबी पुरी बुच को एक्सटेंशन नहीं देगी. उनका मौजूद कार्यकाल जनवरी 2025 में समाप्त हो रहा है.
हज़ारी कहते हैं, “मेरे लिए सबसे हैरान करने वाली बात ये है कि सरकार इस मामले में बिल्कुल ख़ामोश रही है. अब सरकार को हस्तक्षेप करना चाहिए. जब शेयर बाज़ार के नियामक के ख़िलाफ़ गंभीर आरोप लगते हैं तो सरकार या न्यायपालिक ही कोई भरोसेमंद जांच करवा सकते हैं."
और लोगों ने भी कहा है कि सेबी को बोर्ड को आगे आकर सार्वजनिक रूप से आरोपों का जवाब देना चाहिए.
अपना नाम न बताने की शर्त पर शेयर बाज़ार में निवेश करने वाली एक विदेशी कंपनी के अधिकारी ने बताया कि ग्लोबल इनवेस्टर ये देखेंगे कि सरकार इस मुद्दे से कैसे निपट रही है और कितनी जल्दी कार्रवाई कर रही है.
वो कहते हैं, "भविष्य में निवेशकों का मत इन्हीं चीज़ों से प्रभावित होगा."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित