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ईरान-इसराइल के एक-दूसरे पर हमले: क्या अब जंग का ख़तरा टल गया है
- Author, कैवान हुसैनी
- पदनाम, संवाददाता, बीबीसी फ़ारसी सेवा
ईरान के ठिकानों पर इसराइल के सीधे हमले की रिपोर्टों के चौबीस घंटे बीत जाने के बाद भी इस घटना को लेकर अलग-अलग सूत्रों से विरोधाभासी जानकारियां मिल रही हैं.
शुक्रवार देर शाम तक, ईरान के सरकारी मीडिया और आईआरजीसी (रिवोल्यूशनरी गार्ड्स) समर्थित मीडिया के कवरेज से ये पता चलता है कि इसराइल के इस हमले से ईरान को कोई ख़ास नुक़सान नहीं पहुंचा है और ईरान इसे लेकर जवाबी कार्रवाई नहीं करेगा.
जब ईरान की सेना के कमांडर इन चीफ़ अब्दुलरहीम मोसावी से पूछा गया कि ईरान इसराइल के इस हमले पर कैसी प्रतिक्रिया देगा तो उन्होंने कहा, "आप पहले भी ईरान की प्रतिक्रिया देख रहे हैं."
दरअसल, मोसावी 13 अप्रैल को इसराइल पर ईरान के ड्रोन और मिसाइल हमले के संदर्भ में बोल रहे थे. वहीं, ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिवालय ने भी कहा है कि "ईरान के ख़िलाफ़ कोई विदेशी आक्रामक कार्रवाई नहीं हुई है."
हालांकि, ईरान के मीडिया ने भी बताया था और अधिकारियों ने भी इसकी पुष्टि की थी कि शुक्रवार सुबह एयर डिफेंस सिस्टम एक्टिवेट कर दिया गया था. मीडिया में भी ईरान के वायुक्षेत्र में गतिविधियों को लेकर ख़बरें प्रकाशित हुईं थीं. वहीं ईरान का इसे लेकर कहना है कि इस्फ़ाहन शहर के आसपास आसमान में गिने-चुने क्वॉडकॉप्टर (ड्रोन) दिखाई दिए थे जिन्हें हवा में ही नष्ट कर दिया गया था.
हमले के बारे में जानकारी
वहीं, ईरान की परमाणु ऊर्जा एजेंसी का कहना है कि देश के किसी भी परमाणु ठिकानों पर हमला नहीं हुआ है. एजेंसी ने ये भी कहा है कि संवेदनशील रेडियोएक्टिव पदार्थों की वजह से परमाणु ठिकानों को कभी निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए.
अभी तक इस संभावित हमले के बारे में जितनी भी जानकारियां आई हैं, उन्हें देखकर ये कहा जा सकता है कि ये एक सोचा-समझा और सटीक हमला था जो इसराइल के उद्देश्यों को पूरा करता है.
हालांकि, तथ्यों को और बेहतर तरीक़े से समझने के लिए अधिक जानकारियों की ज़रूरत होगी जो अभी तक सामने नहीं आई हैं.
अभी ये भी स्पष्ट नहीं है कि ये हमला अगर हुआ तो कहां हुआ, किस तरह के हथियार इसमें इस्तेमाल हुए और किस पैमाने पर नुक़सान हुआ.
इस हमले के बारे में सबसे अहम जानकारियां एक अमेरिकी रक्षा अधिकारी के हवाले से पश्चिमी मीडिया को मिलीं. इस अधिकारी ने बताया कि शुक्रवार, सुबह के वक़्त, इसराइल की तरफ़ से ईरान पर मिसाइल दाग़ी गई जिसने अपना लक्ष्य सफलतापूर्वक भेद दिया.
व्यापक सैन्य अभियान
इसराइल ने इस कथित हमले को लेकर कोई टिप्पणी नहीं की है और ना ही कोई अधिकारिक जानकारी दी है. हालांकि, ये पहली बार नहीं है जब इसराइल ने ईरान की ज़मीन पर सैन्य अभियान को अंजाम दिया है.
हालांकि, पहले किए गए हमलों के दौरान भी, इसराइल ने कभी भी ईरान पर हमलों की ज़िम्मेदारी नहीं ली है. इसराइल ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को भी बिना ज़िम्मेदारी लिए, नुक़सान पहुंचाया है.
ऐसा हो सकता है कि इस बार इसराइल अधिकारिक रूप से इस हमले की ज़िम्मेदारी ले ले क्योंकी ईरान इसराइल पर किए गए व्यापक ड्रोन और मिसाइल हमले की ज़िम्मेदारी ले चुका है.
ईरान ने इसराइली सैन्य ठिकानों को अपने लिए वैध लक्ष्य बताया था और इस हमले को अपनी संप्रभुता की सुरक्षा बताया था.
इसराइल की सेना इस समय ग़ज़ा में व्यापक सैन्य अभियान चला रही है. इसराइल ने ईरान पर जो भी जवाबी कार्यवाई करना तय किया होगा उसमें ग़ज़ा में सेना की संलिप्तता का भी ध्यान रखा गया होगा.
इसराइल के ईरान पर संभावित हमले का मक़सद क्या है?
सात अक्तूबर को इसराइल पर हमास के हमले के बाद से इसराइल ग़ज़ा में सैन्य अभियान चला रहा है.
पिछले छह महीने से जारी इस लड़ाई का मक़सद ग़ज़ा से हमास को समाप्त करना और सभी इसराइली बंधकों को सुरक्षित रिहा कराना है.
ऐसे में, इस समय इसराइल के लिए पहली प्राथमिकता फ़लस्तीन का मुद्दा ही है.
हालांकि, जनता की भावनाओं या देश के कट्टरवादी वर्ग की मांग को पूरा करने में इसराइल ये लक्ष्य प्राप्त नहीं कर पाएगा.
ये भी आधुनिक इतिहास में पहली बार है जब ईरान ने इसराइल पर सीधा हमला किया है, ऐसे में, अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों के तहत इसराइल के पास ईरान पर जवाबी कार्रवाई करने के वाज़िब कारण हैं.
अगर इस नज़रिए से देखा जाए तो संयुक्त राष्ट्र के एक स्थायी सदस्य देश की तरफ़ से सीधे हमले का जवाब देना इसराइल की मजबूरी भी है.
अंतरराष्ट्रीय संबंध
इस स्तर पर, राष्ट्रीय संप्रभुता की सुरक्षा के मूल सिद्धांत के तर्क के साथ इसराइल के कई नीति निर्माताओं का मानना है कि जवाबी कार्रवाई करना एक ज़रूरी क़दम है.
हालांकि, ये संवेदनशील प्रतिक्रिया, जो मौजूदा अंतरराष्ट्रीय संबंधों के ढांचे में भले ही वास्तविक ज़रूरत लग रही है, इसका एकमात्र उद्देश्य बदला लेना या दंडित करना नहीं है.
जवाब देने के मामले में इसराइल के मुख्य लक्ष्यों में से एक डिटेरेंस यानी ‘हमला करने से रोकने’ की स्थिति पैदा करना है.
इसराइल का मक़सद आईआरजीसी की तरफ़ से किए गए सीधे हमले जैसी घटनाओं को दोहराये जाने से रोकना है. ईरान ने जब दमिश्क में अपने दूतावास के जवाब में इसराइल पर हमला किया तब उसका मक़सद भी यही था कि वो भविष्य में ऐसे हमलों को दोहराये जाने से रोके.
ईरान पर इसराइल के जवाबी हमले के मामले में हमला कहां किया गया, इसका स्थान और इससे कितना नुक़सान पहुंचा, ये बातें मायने रखती हैं.
ख़ुफ़िया नेटवर्क
अगर इसराइल ने इस हमले में ईरान के लिए रणनीतिक और सैन्य रूप से बेहद अहम ठिकानों को नुक़सान पहुंचाया है तब एक सीमित और नियंत्रित हमले के ज़रिए भी इसराइल ईरान को कठोर और स्पष्ट संदेश दे सकता है.
और अगर, इसराइल इस सीमित प्रतीत हो रहे हमले के ज़रिए ईरान की सेना को भारी नुक़सान पहुंचाने में कामयाब रहा है तो इससे ये स्पष्ट है कि इसराइल ने ये साबित कर दिया है कि उसकी सैन्य क्षमता ईरान से बेहतर है.
इससे इसराइल ने आईआरजीसी के कमांडरों को ये संदेश भी दिया होगा कि वह अपने ख़ुफ़िया नेटवर्क और मारक क्षमता से ईरान के भीतर किस हद तक घुस सकता है.
जैसा कि अमेरिकी सूत्रों ने बताया है, ऐसा संभव है कि सिर्फ़ एक ही मिसाइल दागी गई हो, अगर ये सच है तो, इस इससे भी इसराइल ने इस नज़रिए से अपनी ताक़त दिखा दी है कि ईरान ने तीन सौ के क़रीब मिसाइलें दाग़ी और इसराइल को कोई नुक़सान नहीं पहुंचा जबकि इसराइल ने सिर्फ़ एक मिसाइल दाग़ कर ही ईरान को नुक़सान पहुंचा दिया.
इस हमले में किस स्तर पर तबाही हुई है इससे वो संदेश भी तय होता है जो इसराइल ईरान को देना चाहता है. यदि इसराइल सिर्फ़ एक मिसाइल हमले से ईरान की रक्षात्मक या सैन्य क्षमता को भारी नुक़सान पहुंचाने में कामयाब रहा है तो ईरान की अगली कार्रवाइयों को रोकने में ये हमला अधिक कारगर साबित होगा.
क्या तनाव ख़त्म हो गया है?
चूंकि कुछ एक मिसाइलों के हमले से इसराइल रणनीतिक दृष्टि से वो हासिल कर सकता है, जो वो करना चाहता है तो ऐसे में ये उम्मीद की जा रही है कि अब और हमले नहीं होंगे.
अगर और हमले नहीं होते हैं तो दोनों देशों के बीच सैनिक तनाव बढ़ने की संभावना फिलहाल के लिए ही सही ख़त्म हो जाएगी.
वास्तविकता तो ये है कि तनाव बढ़ाने से बचने के इसराइल को कई फ़ायदे हैं. उसके पश्चिमी सहयोगी संतुष्ट रहेंगे और उसे अहम मुद्दों पर उनका साथ मिलता रहेगा.
हाल के हफ़्तों में अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इसराइल की पोजिशन गंभीर रूप से कमज़ोर होती दिखी है. ग़ज़ा का संघर्ष शुरू हुए छह महीने हो गए हैं और अब ये एक इंतहा पर पहुंच गया है.
इसराइल की स्थिति का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि सुरक्षा परिषद में इसराइल विरोधी प्रस्ताव को अमेरिका ने वीटो नहीं किया.
इस प्रस्ताव में इसराइल से संघर्ष विराम पर जल्द सहमत होने की मांग की गई है.
मिलिट्री टेंशन
ये इसराइल के लिए एक ऐसी शर्त है जिसे कबूल करना उसे मंज़ूर नहीं है, ख़ासकर उस स्थिति में जब फ़लस्तीनी इस्लामिस्ट ग्रुप के पास अभी भी बड़ी संख्या में इसराइली नागरिक बंधक हैं.
सुरक्षा परिषद में इस प्रस्ताव के पारित होने के कुछ ही समय के भीतर इसराइल ने दमिश्क स्थित ईरानी वाणिज्य दूतावास पर हमला किया.
उसके बाद से ग़ज़ा की लड़ाई से जुड़ी ख़बरों का रुख इसराइल और ईरान के बीच के मिलिट्री टेंशन की तरफ़ मुड़ गया.
जैसे ही ईरान ने 13 अप्रैल को दमिश्क में की गई इसराइली कार्रवाई का जवाब दिया, पश्चिमी देशों की नज़र में तेल अवीव की अंतरराष्ट्रीय स्थिति तेज़ी से बदल गई.
ईरान के हमले के बाद अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और अन्य यूरोपीय देशों का फोकस ग़ज़ा की मानवीय त्रासदी या तेल अवीव की सैन्य रणनीति में बदलाव की ज़रूरत से हटकर इस बात पर शिफ्ट हो गया कि इसराइल के पास किसी अन्य देश से हमले की सूरत में अपनी आत्मरक्षा का वैध अधिकार है.
यूरोपीय देशों और अमेरिका की प्रतिक्रिया
कुछ देर पहले तक जो इसराइल ग़ज़ा में मानवाधिकारों और अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों के उल्लंघन के लिए आलोचनाओं का सामना कर रहा था, वो अचानक ही ईरान के मिसाइल हमले से पीड़ित देश के तौर पर पेश किया जाने लगा. ईरान की छवि एक ऐसे देश की रही है जो अंतरराष्ट्रीय समुदाय का एक असंतुष्ट सदस्य है और जहां एक कट्टरपंथी धार्मिक विचारों वाली सरकार है और जिसका ट्रैक रिकॉर्ड बहुत अच्छा नहीं है.
ईरान के हमले के बाद यूरोपीय देशों और अमेरिकी हुकूमत ने जिस तरह की प्रतिक्रिया दी है, उससे ये संकेत मिला है कि ईरान की चुनौती से निपटना पश्चिमी देशों के लिए अधिक महत्वपूर्ण है.
हालांकि इसराइल के लिए पश्चिमी देशों का ये जो समर्थन है, वो कुछ शर्तों के साथ मिला है. अगर दोनों देशों के बीच युद्ध भड़कता है और मध्य पूर्व में असुरक्षा की भावना बढ़ती है तो इस इलाके में पश्चिमी देशों के हितों के लिए बड़ी चुनौती पैदा हो जाएगी.
यही वजह थी कि जैसे ही ईरान का हमला रुका, पश्चिमी देशों ने एक राजनीतिक मुहिम शुरू कर दी जिससे ईरान पर व्यापक इसराइली हमले को टाला जा सके.
बिन्यामिन नेतन्याहू की युद्ध कैबिनेट
अगर ईरान पर पलटवार करने में इसराइल शुक्रवार सुबह किए गए हमले के बाद रुक जाता है तो इससे घरेलू मोर्चे पर बिन्यामिन नेतन्याहू के समर्थकों के नाराज़ होने का जोख़िम भी है.
हालांकि, इस हमले का दायरा और आयाम इसराइल के पश्चिमी सहयोगियों और उन सभी देशों को ख़ुश करेगा जो विनाशकारी पूर्ण युद्ध को रोकने के लिए दोनों देशों से संयम बरतने की अपील कर रहे थे.
इसके विपरीत, अगर इसराइल अपने पश्चिमी सहयोगी देशों की तरफ़ से लगातार मिल रही चेतावनियों और सलाह को नज़रअंदाज़ करता है और ऐसे हालात पैदा करता है जिनमें ईरान फ़िर से प्रतिक्रिया देने की घोषणा करने के लिए मजबूर हो जाता है, और पहले से तीव्र प्रतिक्रिया देता है तो इसराइल आसानी से अपने सहयोगियों की सहानुभूति को गंवा सकता है.
ईरान को और अधिक ना उकसाने के लिए बिन्यामिन नेतन्याहू की युद्ध कैबिनेट पर दबाव बनाने वाले पश्चिमी सहयोगी देशों के अतिरिक्त, इसराइल के भीतर कुछ विपक्षी नेताओं का ये मानना है कि इस समय इसराइल को एक ईरान के साथ एक ख़तरनाक़ युद्ध में अपने संसाधन बर्बाद नहीं करने चाहिए.
इसराइल लंबे समय से राजनीतिक संकट का सामना भी कर रहा है और देश की सत्ता के शीर्ष पर खड़े प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू की स्थिति नाज़ुक बनी हुई है.
इस सबके ऊपर, सात अक्तूबर को हुए हमास के हमले, इस पर इसराइल की प्रतिक्रिया और सभी बंधकों को रिहा कराने में नाकाम रहने और हमास को पूरी तरह नष्ट न कर पाने की क़ीमत भी नेतन्याहू चुका रहे हैं और उनकी स्थिति और कमज़ोर हुई है.
ऐसे में, इसराइल के लिए ईरान पर एक विस्तृत और भारी नुक़सान पहुंचाने वाला हमला करना कोई आसान काम नहीं है.
इस तरह के हमले से, इसराइल ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जो नई स्थिति हासिल की है, सिर्फ़ ना वह प्रभावित होगी, बल्कि इसके कुछ ऐसे बेकाबू परिणाम भी होंगे जो ना सिर्फ़ इसराइल की सेना और सुरक्षा समुदाय के लिए अवांछनीय हैं बल्कि इसराइल में सत्ताधारी लिकुड पार्टी के राजनीतिक हितों के भी ख़िलाफ़ हैं.
लिकुड पार्टी को अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों से पहले से चुनौती भी मिल रही है.
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