इराक़ से अमरीकी सेना वापस क्यों नहीं जा रही?

ईरानी जनरल क़ासिम सुलेमानी के मारे जाने की प्रतिक्रिया में इराक़ी संसद में पाँच जनवरी को इराक़ से अमरीकी सैनिकों को हटाने के लिए एक प्रस्ताव पास किया गया था.

यह प्रस्ताव उस समझौते को रद्द करने के लिए था जिसके तहत इराक़ में अमरीकी सैनिकों को इस्लामिक स्टेट से लड़ने के लिए रहने की अनुमति मिली हुई है.

तीन जनवरी को इराक़ में बग़दाद इंटरनेशनल एयरपोर्ट के बाहर अमरीका ने ज़नरल क़ासिम सुलेमानी को मार दिया था. इसे लेकर इराक़ की संसद ने कड़ी प्रतिक्रिया ज़ाहिर की और कहा कि अमरीकी सैनिकों को यहां से जाने के लिए कहा जाए.

इराक़ में अमरीकी बलों और ईरान समर्थित बल पॉपुलर मोबिलाइज़ेशन यूनिट्स यानी पीएमएफ़ के बीच टकराव लगातार बढ़ता जा रहा है.

इराक़ी संसद में अमरीकी सैनिकों को वापस भेजने को लेकर प्रस्ताव पर वोटिंग से पहले इराक़ के प्रधानमंत्री आदिल अब्दुल-महदी ने कहा कि विदेशी सैनिकों को अब इराक़ छोड़ देना चाहिए. महदी ने दावा किया कि जनरल सुलेमानी इलाक़े में तनाव कम करने की कोशिश कर रहे थे.

इराक़ की संसद में प्रस्ताव तो पास हो गया लेकिन ज़्यादातर कुर्दिश और सुन्नी सांसदों ने इस प्रस्ताव का बहिष्कार किया. इस प्रस्ताव के समर्थन में मुख्य रूप से शिया पार्टियां थीं. संसद में कई सांसदों ने ज़ोर देकर कहा कि इराक़ से विदेशी सैनिकों को वापस भेजा जाए.

अटलांटिक काउंसिल में इराक़ इनिशिएटिव के निदेशक अब्बास ख़ादिम ने कहा है, ''इराक़ की संसद में हुई यह वोटिंग काफ़ी अहम है. यह प्रतीकात्मक और वास्तविक दोनों मोर्चों पर मायने रखती है. इससे पहले इराक़ ने 2011 में भी ऐसा ही किया था. तब इराक़ियों ने राष्ट्र हित से पहले संप्रभुता को तवज्जो दी थी. इराक़ के सामने ईरान और अमरीका हैं. अभी की सरकार में ईरान को लेकर सहानुभूति ज़्यादा है.''

स्कॉक्रोफ़्ट सेंटर में स्ट्रैटिजी एंड सिक्यॉरिटीज मिडल-ईस्ट के निदेशक क्रिस्टन फोन्टेंरोज ने अटलांटिक काउंसिल से कहा है, ''इराक़ की संसद में पास हुआ प्रस्ताव बाध्यकारी नहीं है. यह प्रस्ताव इराक़ की सरकार से कहता है कि वो अमरीकी सैनिकों को वापस भेजे लेकिन अमरीका की इराक़ में मौजूदगी इराक़ की सरकार के एग्जेक्युटिव फ़ैसले के आधार पर है. इस फ़ैसले को रद्द केवल एग्जेक्युटिव निर्णय से ही किया जा सकता है. इराक़ में अभी जो सरकार है वो केयरटेकर है और उसके पास इस मामले में अभी कोई संवैधानिक अधिकार नहीं है.''

वो कहते हैं, ''संसद में वोट से इराक़ी नेतृत्व का तेवर समझ में आता है. इस प्रस्ताव में खुला मतदान हुआ था. संभव है कि अगर गोपनीय मतदान होता तो नतीजे कुछ और आते.''

इसी संस्था के उप-निदेशक मैथ्यू क्रोइंग कहते हैं, ''अमरीकी सैनिक वापस जा सकते हैं लेकिन यह इराक़ के लिए भी बहुत आसान नहीं है. अगर अमरीकी सेना वापस जाती है तो इराक़ पर ईरान का नियंत्रण हो जाएगा. ऐसे में इराक़ की सरकार ऐसा कुछ भी करने से पहले दस बार सोचेगी.''

ट्रंप प्रशासन ने मंगलवार को ज़ोर देकर कहा कि अमरीकी सेना इराक़ में मौजूद रहेगी. ट्रंप ने कहा है कि इराक़ से अमरीका के पाँच हज़ार सैनिकों की वापसी हुई तो इराक़ के लिए यह सबसे बुरा होगा. अमरीकी राष्ट्रपति ने कहा कि इराक़ से सैनिकों की वापसी का यह सही वक़्त नहीं है.

मंगलवार को इराक़ के प्रधानमंत्री ने कहा था कि अमरीकी सेना ने सैनिकों की वापसी के लिए एक पत्र भेजा है. मंगलवार को समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने इसे लेकर एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी. हालांकि बाद में इसे लेकर कन्फ़्यूजन बढ़ गया.

इराक़ के प्रधानमंत्री अब्दुल महदी ने कहा कि उनकी सरकार को अंग्रेज़ी और अरबी में अमरीकी सेना का वो पत्र मिला है लेकिन दोनों एक जैसे नहीं हैं. ऐसे में इराक़ ने इस मामले में अमरीका से योजना पर स्पष्टीकरण की मांग की है.

अब पेंटागन यानी अमरीकी रक्षा मंत्रालय ने इस बात को स्वीकार किया है कि अमरीका के नेतृत्व वाली गठबंधन सेना की वापसी वाला पत्र ग़लती से चला गया था.

सीएनएन को दिए इंटरव्यू में मंगलवार को अमरीकी रक्षा मंत्री मार्क एस्पर ने कहा, ''वो पत्र ड्राफ्ट था और इस पर किसी का हस्ताक्षर नहीं था. ऐसे में यह पत्र इराक़ के अधिकारियों के लिए कोई मायने नहीं रखता है. इसका कोई मतलब नहीं है.''

उन्होंने कहा, ''मैं साफ़ कर दे रहा हूं कि अमरीकी सेना की वापसी नहीं होने जा रही. इस मसले पर मेरी बाद इराक़ के रक्षा मंत्री से हुई है. मैंने कह दिया है कि सेना वापसी की अभी कोई योजना नहीं है. हम इस्लामिक स्टेट से लड़ना जारी रखेंगे. पत्र ड्राफ्ट था. यह हमलोग की ग़लती है. इस पर कोई हस्ताक्षर नहीं था और इसे कभी जारी भी नहीं किया गया.''

दूसरी तरफ़ ईरान चाहता है कि अमरीका तत्काल इराक़ से बाहर जाए.

ईरान के विदेश मंत्री जवाद ज़रीफ़ ने सीएएन को दिए इंटरव्यू में कहा है, ''मध्य-पूर्व में हमारे साथ जनता है. हम यहां के लोगों के साथ हैं. अमरीकी राष्ट्रपति कह रहे हैं कि उनके पास कई ट्रिलियन डॉलर के ख़ूबसूरत हथियार हैं. उन्हें पता होना चाहिए कि ख़ूबसूरत हथियार वाले दुनिया पर शासन नहीं कर सकते. दुनिया पर लोगों का लोगों के लिए शासन होगा. मध्य-पूर्व के लोग अमरीका से ख़फ़ा हैं. लोग चाहते हैं कि अमरीका इस इलाक़े से जल्दी वापस जाए.''

ईरानी विदेश मंत्री ने कहा, ''अमरीका इस इलाक़े में लंबे वक़्त तक नहीं रह सकता. लोग बिल्कुल नहीं चाहते हैं कि अमरीका यहां रहे. राष्ट्रपति ट्रंप को जो सूचना मिल रही है वो सच नहीं है. अमरीका बार-बार अपनी ग़लतियां नहीं दोहरा सकता है. ट्रंप मध्य-पूर्व के साथ अमरीका के लिए भी ठीक नहीं हैं.''

सद्दाम के इराक़ और ईरान में विवाद

सद्दाम अपने आप को अरब देशों का सबसे प्रभावशाली प्रमुख समझने लगे थे. उन्होंने वर्ष 1980 में नई इस्लामिक क्रांति के प्रभावों को कमज़ोर करने के लिए पश्चिमी ईरान की सीमाओं में अपनी सेना उतार दी थी. इसके बाद आठ वर्षों तक चले युद्ध में लाखों लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी.

इस दौरान जुलाई, 1982 में सद्दाम हुसैन ने अपने ऊपर हुए एक आत्मघाती हमले के बाद शिया बाहुल्य दुजैल गाँव में 148 लोगों की हत्या करवा दी थी. मानवाधिकार उल्लंघन के ऐसे कई मामलों के बावजूद अमरीका ने इन हमलों में सद्दाम का साथ दिया था.

इराक़ शिया बहुल देश है लेकिन सद्दाम हुसैन सुन्नी थे. ऐसे में ईरान के साथ इराक़ के शियाओं की सहानुभूति हमेशा से रही है.

ईरान में हमले पर क्या बोला इराक़?

इराक़ी संसद के स्पीकर मोहम्मद अल-हलबौसी ने कहा है कि इराक़ की सरकार के पास यह अधिकार है कि अपनी संप्रभुता बचाए और मुल्क को युद्ध के अखाड़ा बनने से रोके.

उन्होंने इराक़ की सभी पार्टियों से विवेक से काम लेने का आग्रह किया है. उन्होंने कहा कि ईरान का इराक़ में अमरीकी सैन्य ठिकानों पर हमला उनके मुल्क की संप्रभुता का उल्लंघन है.

मोहम्मद अल-हलबौसी ने कहा, ''इराक़ की संप्रभुता बचाने के लिए सरकार को ज़रूरी क़दम उठाने चाहिए. इराक़ को बेवजह युद्ध का अखाड़ा बनाया जा रहा है. हम इस टकराव में कोई पार्टी नहीं हैं.''

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