ईरान: इसराइल पर हमले के बाद देश में क्या है माहौल?

    • Author, जियार गोल
    • पदनाम, वर्ल्ड अफ़ेयर संवाददाता, बीबीसी फ़ारसी

ईरान ने पहली बार अपनी ज़मीन से सीधे इसराइल पर हमला किया है. ईरान के रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स (आईआरजीसी) के लिए इस पूरे इलाक़े में अपने सहयोगियों के बीच अपनी विश्वसनीयता बनाए रखने के लिहाज़ से ये हमला बेहद महत्वपूर्ण था.

ईरान ने इसराइल पर ये हमला अपनी इच्छाशक्ति के साथ-साथ अपनी मिसाइलों और ड्रोन की क्षमता का प्रदर्शन करने के लिए भी किया.

ईरान के इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स की स्थापना 45 बरस पहले की गई थी.

इसका मक़सद देश की इस्लामिक व्यवस्था की हिफ़ाज़त करना और सेना से अलग एक बेहतर विकल्प मुहैया कराना था.

अपनी स्थापना के बाद से ही रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स पूरे इलाक़े में ईरान की फ़ौजी, सियासी और आर्थिक ताक़त बन गए हैं.

शनिवार रात को हुए हमलों के बाद से ईरान के बहुत से समर्थकों ने फ़िलस्तीनी प्रतीक चिह्नों के साथ तेहरान की सड़कों पर उतरकर जश्न मनाया.

बीबीसी फ़ारसी सेवा को भेजे गए एक वॉयस मैसेज में ईरान की हुकूमत का समर्थन करने वाली एक युवा महिला ने कहा, “मैं मानती हूं कि इसराइल पर हमला करने का ये फ़ैसला बिल्कुल सही था. सीरिया और दूसरे देशों में ईरान के कमांडरों को हत्या को इसी क़दम से रोका जा सकता था.”

हालांकि, ईरान के इस्लामिक गणराज्य के कई आलोचक कहते हैं कि ज़रूरी नहीं है कि ईरान की हुकूमत, मुल्क के सभी नागरिकों के विचार की नुमाइंदगी करते हों.

बीबीसी फ़ारसी को भेजे गए एक वॉयस मैसेज में 40 साल के एक ईरानी नागरिक ने कहा, “हम इस्लामिक गणराज्य नहीं हैं. हम सच्चे ईरानी हैं. ख़ुद ईरान के लोग मौजूदा हुकूमत से जंग लड़ रहे हैं. हमारे दिलों में इसराइल समेत किसी भी देश के ख़िलाफ़ दुश्मनी के जज़्बात नहीं हैं.”

लगभग 50 बरस की उम्र की एक और महिला ने आशंका जताई कि इसराइल पर ईरान के इस हमले से पूरे इलाक़े में जंग छिड़ सकती है. इससे, ईरान, इसराइल और उसके पश्चिमी दोस्त देशों के बीच पूर्ण संघर्ष की शुरुआत हो सकती है.

ये डर अमरीकी डॉलर के मुक़ाबले ईरान की मुद्रा रियाल की क़ीमत में आई गिरावट से भी ज़ाहिर होता है.

पलटवार की आशंका और घबराहट

इसराइल पर ईरान के हमले के बाद शनिवार रात को ईरान में ज़बरदस्त तनाव का माहौल था. ईरान के लोगों को लग रहा है कि इसराइल भी पलटवार करेगा. इससे अवाम में घबराहट का माहौल साफ़ दिखा, और लोग ईंधन और खाने-पीने का ज़रूरी सामान जमा करने के लिए दौड़ भाग करते दिखे.

राजधानी तेहरान और ईरान के दूसरे बड़े शहरों में पेट्रोल पंपों के बाहर गाड़ियों की लंबी क़तारें लग गईं. वहीं, सुपरमार्केट में ख़रीदारों की बाढ़ सी आ गई.

वैसे तो इसराइल ने दावा किया है कि उसने ईरान की ओर से अपने ऊपर दाग़ी गई 300 मिसाइलों और ड्रोन में से 99 फ़ीसद को टारगेट पर गिरने से पहले ही रोक दिया. लेकिन ईरान के अधिकारियों ने इस हमले को क़ामयाब घोषित करके इसका जश्न मनाया है. उनका कहना है कि वास्तविक नुक़सान से ज़्यादा इस हमले की प्रतीकात्मक अहमियत है.

ईरान के चीफ ऑफ़ स्टाफ मेजर जनरल मुहम्मद बगेरी ने कहा कि इसराइल के भीतर उन्होंने जिन ठिकानों को निशाना बनाया, उनमें इसराइल का नोटाम वायु सैनिक अड्डा भी शामिल है, जहां से दो हफ़्ते पहले इसराइल के एफ-35 लड़ाकू विमानों ने उड़ान भरी थी.

दमिश्क में ईरान के वाणिज्य दूतावास पर इन्हीं विमानों ने बमबारी की थी जिसमें ईरान के रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स के कुल सात कमांडर मारे गए थे.

मेजर जनरल बगेरी ने ज़ोर देकर कहा कि ईरान ने अपना मक़सद पूरा कर लिया है और अब वो अपना अभियान जारी रखने का कोई इरादा नहीं रखता. ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी ने चेतावनी दी कि अगर इसराइल, उनके देश के ऊपर कोई नया हमला करता है, तो ईरान इस बार और भी मज़बूती से उसका जवाब देगा.

ऐसा लगता है कि ईरान में ज़्यादातर लोग तनाव कम करने के हक़ में हैं. शनिवार रात के हमले से ईरान के फ़ौजी और सियासी दोनों ही तबक़ों में तसल्ली का भाव दिख रहा है.

ऐसा लगता है कि ईरान ने इसराइल को अपनी हिफ़ाज़त करने का पर्याप्त मौक़ा दिया था. उसका इरादा इसराइल को और नुक़सान पहुंचाने या लोगों को मारने का क़तई नहीं लगता.

पश्चिम एशिया में ईरान का दखल और आंतरिक विरोध

ईरान के बहुत से लोग पश्चिम एशिया के इलाक़े में रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स की दख़लंदाज़ी का विरोध करते हैं.

हाल के दिनों में ईरान में हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान बड़े पैमाने पर ‘न तो ग़ज़ा, न लेबनान. मेरी जान ईरान पर क़ुर्बान’ जैसे नारे लगाए गए थे.

ईरान के बहुत से लोगों का तर्क है कि विदेश में हथियारबंद लड़ाकों का समूह तैयार करने, उन्हें प्रशिक्षित करने और हथियार देने में ईरान जो अरबों डॉलर की रक़म ख़र्च कर रहा है, उसका इस्तेमाल उनके अपने देश के विकास और भविष्य को समृद्ध बनाने में किया जा सकता है.

इस क्षेत्र के मामलों में ईरान की जितनी दख़लंदाज़ी है उसके कारण उस पर पाबंदियां लगाई गईं हैं. वो दुनिया में अलग थलग पड़ गया है और इस वजह से देश की अर्थव्यवस्था की हालत बेहद कमज़ोर हो गई है. ईरान की अर्थव्यवस्था लड़खड़ा रही है, और महंगाई आसमान छू रही है.

आज की तारीख़ में ईरान में मिडिल क्लास लोगों के लिए भी रोज़मर्रा का ख़र्च पूरा कर पाना मुश्किल हो रहा है.

ईरान से हमें जो आवाज़ें सुनने को मिल रही हैं, उनसे संकेत मिलता है कि मौजूदा हुकूमत का ईरान के ज़्यादातर लोग समर्थन नहीं करते. ख़ास तौर से युद्ध छिड़ने की सूरत में वो समर्थन नहीं करेंगे.

1980 के दशक में इराक़ के साथ आठ साल चले संघर्ष के दौरान ईरान की अवाम के बीच ज़बरदस्त एकजुटता देखने को मिली थी. उस वक़्त ईरान के लाखों नौजवानों ने सद्दाम हुसैन की हुकूमत के ख़िलाफ़ अपने वतन की हिफ़ाज़त के लिए क़ुर्बानियां दी थीं. लेकिन, आज हालात वैसे नहीं दिखते.

ईरान-इराक़ युद्ध में हिस्सा लेने वाले एक फ़ौजी जो अब लक़वे की वजह से बिस्तर पर हैं. वो हुकूमत के विरोधियों को सख़्ती से कुचलने का कड़ा विरोध करते हुए बड़े सख़्त लहजे में कहते हैं- “मैं इनके लिए तो किसी सूरत में भी नहीं लड़ा होता.”

ईरान की इस्लामिक हुकूमत की नीतियों ने पुराने समर्थकों का नज़रिया भी बदल दिया है. इस वजह से ईरान के सियासी हालात काफ़ी बदले हुए नज़र आते हैं.

ईरान और उसकी क्षमता

ईरान के पास ज़्यादा घातक मिसाइलें और नुक़सान पहुंचाने वाले ड्रोन दाग़ने की क्षमता है.

लेबनान, सीरिया और इराक़ में उसका समर्थन करने वाले कई शिया हथियारबंद समूह सक्रिय हैं. इसके अलावा यमन के हूती भी ईरान के मज़बूत समर्थक हैं. लेकिन, ऐसा लगता है कि ईरान ने जान-बूझकर इसराइल पर बेहद हल्का हमला किया, ताकि उसको कम से कम नुक़सान हो.

आज जंग के हालात में ईरान की इस्लामिक सरकार केवल इसराइल और उसके बेहद ताक़तवर साथी अमेरिका की फ़ौजी ताक़त को लेकर फ़िक्रमंद नहीं है. उसको घरेलू स्तर पर उथल-पुथल का ख़ौफ़ भी सता रहा है.

2022 में पुलिस हिरासत में महसा अमीनी नाम की लड़की की मौत के बाद हुए विरोध प्रदर्शनों ने ईरान की इस्लामिक हुकूमत की कमज़ोरियां खुलकर उजागर कर दी थीं.

ईरान की इस्लामिक सरकार के बहुत से नेताओं को डर है कि इसराइल अमेरिका के साथ युद्ध छिड़ा तो उसके फ़ौजी और इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स के अड्डों और जनरलों को निशाना बनाया जाएगा. इससे हुकूमत के विरोधियों को भी फिर से सिर उठाने और विरोध प्रदर्शन करने का मौक़ा मिल जाएगा.

हालांकि, ईरान की हुकूमत ऐसे विरोध प्रदर्शनों को फिर से रोकने की हर तरह से कोशिश करती है.

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