ईरान और अमरीका के बीच सुलह करवा पाएंगे इमरान ख़ान?

    • Author, शुमाइला जाफ़री
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, इस्लामाबाद से

इमरान ख़ान ने इस्लामाबाद में गुरुवार को एक सभा को संबोधित करते हुए कहा है कि पाकिस्तान ईरान और सऊदी अरब में सुलह कराएगा.

पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी ईरान, सऊदी अरब और अमरीका जाने वाले हैं. ऐसे में बीबीसी ने यह पता लगाने की कोशिश की कि क्या पाकिस्तान मध्य पूर्व के मौजूदा संकट में शांति दूत की भूमिका निभा सकता है?

बीते तीन जनवरी को ईरान के कमांडर मेजर जनरल क़ासिम सुलेमानी की हत्या बग़दाद एयरपोर्ट पर अमरीकी ड्रोन हमले में हुई थी. इसके 24 घंटे के भीतर पाकिस्तान आर्मी के मुखिया क़मर जावेद बाजवा के पास अमरीकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो का फ़ोन आया था.

इसकी जानकारी पाकिस्तानी सेना की पीआर विंग आईएसपीआर ने ट्विटर पर दी है.

आईएसपीआर की ओर से इस फ़ोन कॉल के बारे में कहा गया, "क्षेत्रीय स्थिति, जिसमें मध्य पूर्व में हाल में बढ़े तनाव के संभावित असर के बारे में चर्चा हुई."

"पाकिस्तान सेना प्रमुख ने शांति और स्थायित्व के लिए सभी साझेदारों की ओर से स्थिति को सहज बनाने के लिए सकारात्मक ढंग से और प्रयास किए जाने पर ज़ोर दिया."

"सेना प्रमुख ने इस बात की ज़रूरत पर बल दिया कि अफ़ग़ान शांति प्रक्रिया की क़ामयाबी पर फ़ोकस बनाए रखा जाए."

अमरीकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो ने भी ट्विटर पर इसका जिक्र करते हुए लिखा कि पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल बाजवा से बात हुई.

उन्होंने ये भी लिखा, "ईरान की गतिविधियों से क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ रही है. अमरीकी हितों, नागरिकों, सुविधाओं और साझेदारों की रक्षा करने का हमारा संकल्प डगमगाएगा नहीं."

इस बातचीत की अहमियत क्या है

ज़ाहिर तौर पर, पॉम्पियो के ट्वीट से ऐसा लगा मानो एक तरह का आश्वासन दिया जा रहा है कि साझेदार एक-दूसरे का साथ नहीं छोड़ेंगे. इसका कुछ विश्लेषकों ने यह निष्कर्ष भी निकाला है कि इस संघर्ष में पाकिस्तान अमरीका के साथ खड़ा रहेगा.

वैसे यह बातचीत कई लिहाज़ से महत्वपूर्ण है. अमूमन ऐसा कम ही देखने को मिलता है कि पाकिस्तान के सेना प्रमुख के पास ऐसे फ़ोन कॉल्स आएं. सवाल यह भी है कि पाकिस्तान के सेना प्रमुख को क्यों फ़ोन किया गया, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को क्यों नहीं?

इसके कुछ घंटों के बाद एक दूसरा ट्वीट भी पाकिस्तान में सुर्खियां बनाने लगा था. इस बार यह ट्वीट अमरीकी सरकार के दक्षिण एवं मध्य एशियाई मामले के विभाग के आधिकारिक अकाउंट से किया था और यह ट्वीट अमरीका के शीर्ष नौकरशाह प्रिंसिपल डिप्टी असिस्टेंट सेक्रेटरी एलिस वेल्स के हवाले से किया गया.

इस ट्वीट में कहा गया कि पाकिस्तान के लिए अमरीका अंतरराष्ट्रीय सैन्य शिक्षा एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम को फिर से शुरू कर रहा है.

कुछ विश्लेषकों के मुताबिक़ ईरान-अमरीका के ताज़ा संघर्ष को देखते हुए इस कार्यक्रम को शुरू करने का फैसला लिया गया है. हालांकि पाकिस्तान सेना के प्रवक्ता इन आकलनों को खारिज करते हैं.

पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने भी कुछ बयान जारी किए जिसकी भाषा बेहद नपी तुली है, इससे मौजूदा मसले की संवेदनशीलता का पता चलता है.

क्या चाहता है पाकिस्तान

ईरान पाकिस्तान का एकदम सटा हुआ पड़ोसी देश है. ईरान उन चंद मुल्क़ों में एक था जिन्होंने जम्मू कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म किए जाने के बाद कश्मीरी लोगों के पक्ष में दृढ़ और स्पष्ट रुख दिखाया था. लेकिन दूसरी ओर सैन्य और आर्थिक मामलों में पाकिस्तान की लंबे समय से अमरीका और उसके साझेदार सऊदी अरब के साथ साझेदारी रही है.

ख़राब अर्थव्यवस्था के चलते पाकिस्तान एक तरह से उनपर निर्भर भी है. इन्हीं कारणों से इराक़ में अमरीकी कार्रवाई के ख़िलाफ़ इस्लामाबाद कभी मज़बूत रुख़ नहीं रख पाया था.

इसलिए पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय का बयान मौजूदा स्थिति को गंभीर चिंता के साथ देखने और संबंधित साझेदारों से संयम दिखाने की अपील करने के अलावा कुछ और नहीं हो सकता है.

पाकिस्तान इंस्टीट्यूट ऑफ स्ट्रेटजिक स्टडीज़ की रिसर्च फ़ेलो अरहमा सिद्दीका मध्य पूर्व, खाड़ी, तुर्की और ईरान के सामरिक मामलों पर नज़र रखती हैं. जब ईरान और अमरीका के बीच तनाव बढ़ा तब अरहामा तेहरान में एक कॉन्फ्रेंस में हिस्सा ले रही थीं.

वह बताती हैं कि तेहरान के नीति निर्धारक और आम जनता, दोनों में पाकिस्तान की प्रतिक्रिया को लेकर निराशा है.

अरहामा बताती हैं, "वे लगातार पूछते रहे कि पाकिस्तान ने सुलेमानी की हत्या की खुलकर निंदा क्यों नहीं की है? वे उन वजहों को नहीं समझ पा रहे थे जिसके चलते पाकिस्तान सऊदी अरब और अमरीका को नाराज़ नहीं कर सकता है."

बावजूद इन सबके, पाकिस्तान को लग रहा है कि इस विवाद में उसकी भूमिका हो सकती है. पाकिस्तान के पूर्व विदेश सचिव सलमान बशीर ने कहा कि इमरान ख़ान की अमरीकी यात्रा के दौरान यह माना गया था कि ईरान और अमरीका को नजदीक लाने के लिए पाकिस्तान की ओर से कुछ कोशिश होनी चाहिए. इसलिए एक पृष्ठभूमि भी मौजूद है.

सलमान बशीर कहते हैं, "जनरल बाजवा को विदेश और रक्षा मंत्रियों के फ़ोन आना और हमारे विदेश मंत्री का ईरानी राजनयिकों से मुलाक़ात करना, इन सबसे संकेत मिलता है कि कुछ ना कुछ हो रहा है, पर्दे के पीछे से तनाव कम करने की कोशिश हो रही है और उसमें पाकिस्तान भी शामिल है."

हालांकि सलमान बशीर खुद ये भी मानते हैं कि स्थिति बेहद चुनौतीपूर्ण है. उन्होंने बताया, "यह काफी चुनौतीपूर्ण है क्योंकि स्थिति काफी उलझी हुई है. पाकिस्तान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह संघर्ष का हिस्सा नहीं बनेगा, इससे हम ईरान और अमरीका दोनों की मदद कर पाएंगे, इसका रास्ता आसान हुआ है."

क्या चाहते हैं इमरान

इस्लामाबाद में गुरुवार को विशाल रैली को संबोधित करते हुए पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने कहा कि किसी भी देश के ख़िलाफ़ हमले के लिए वे अपने देश की ज़मीन के इस्तेमाल की अनुमति नहीं देंगे.

उन्होंने अपने संबोधन में कहा, "पाकिस्तान किसी दूसरे के युद्ध में शामिल नहीं होगा, इसके बदले वह दो विरोधियों के बीच शांतिदूत के तौर पर काम करेगा. हम सऊदी अरब और ईरान में सुलह कराने की कोशिश करेंगे."

क़ायदे आज़म यूनिवर्सिटी इस्लामाबाद में इंटरनेशनल रिलेशंस के प्रोफ़ेसर डॉक्टर नाज़िर हुसैन का मानना है कि पाकिस्तान को यह विकल्प मजबूरी में चुनना पड़ रहा है.

वे बताते हैं, "मुश्किल यह है कि पाकिस्तान से सटा हुआ पड़ोसी मुल्क है ईरानी. हम अमरीका और ईरान के बीच सैन्य तनाव का बोझ नहीं उठा सकते. अफ़ग़ान शांति प्रक्रिया में अमरीका की तरह हमारा भी बहुत कुछ दांव पर लगा है."

डॉक्टर नाज़िर हुसैन कहते हैं, "इस वक्त में, पाकिस्तान यह कोशिश कर सकता है कि स्थिति नहीं बिगड़े. वैसी स्थिति ना उत्पन्न हो जहां से वापसी संभव नहीं हो ताकि पूर्ण सैन्य संघर्ष की स्थिति पैदा ना हो."

लेकिन सवाल यही है कि क्या शांतिदूत बनने के लिए जितने दबदबे और प्रभाव की जरूरत होती है उतना पाकिस्तान के पास है?

डॉक्टर नाज़िर हुसैन के मुताबिक़ पाकिस्तान ऐसा कर सकता है. वे बताते हैं, "माइक पॉम्पियो और अमरीकी रक्षा मंत्री मार्क टी. इस्पर पाकिस्तानी सेना के प्रमुख के संपर्क में हैं. उन लोगों ने भारत से संपर्क क्यों नहीं किया? क्योंकि वे पाकिस्तान के भौगोलिक सामरिक महत्व के साथ साथ मुस्लिम जगत में पाकिस्तान की हैसियत को जानते हैं."

लेकिन नाज़िर हुसैन एक मुश्किल की तरफ इशारा भी करते हैं, "मुश्किल यह है कि दो देशों के बीच बात तो करवा सकता है लेकिन किसी पक्ष की ओर से शर्त रखने जाने पर दूसरे पक्ष की ओर से गारंटी नहीं दिलवा सकता."

सलमान बशीर का मानना है कि मौजूदा स्थिति में कोई अहम बदलाव ला पाना बेहद चुनौतीपूर्ण काम है.

वे कहते हैं, "अतीत में फ्रांस और यूरोप जैसे कहीं ज़्यादा ताकतवर देशों ने ईरान और अमरीका में सुलह की कोशिश की है, जो कारगर नहीं हुईं. इसलिए यह काफ़ी हद तक इस बात पर निर्भर होगा कि अमरीका और ईरान, सुलह के लिए कितने तैयार होते हैं."

हालांकि अरहामा सिद्दीक़ा का मानना है कि दोनों पक्ष के साथ संबंधों के बावजूद पाकिस्तान सऊदी अरब और ईरान या फिर ईरान और अमरीका को नज़दीक नहीं ला सकता है.

अरहामा कहती हैं, "अगर तनाव बढ़ता है तो पाकिस्तान निष्पक्ष नहीं रह पाएगा. उसे किसी ना किसी तरफ़ होना होगा. ईरान का पड़ोसी होने के बावजूद इस बात की संभावना ज्यादा है कि वह सऊदी अरब और अमरीका का पक्ष लेगा क्योंकि उन दोनों देशों पर उसकी आर्थिक निर्भरता है."

अगर ऐसा होता है तो पाकिस्तान के लिए भी मुश्किलें काफ़ी बढ़ जाएंगी. पाकिस्तान पहले से ही अस्थिरता का दंश झेल रहा है. ऐसे में ईरान का अमरीका से सैन्य संघर्ष शुरू हो जाता है तो पाकिस्तान पर बुरा प्रभाव पड़ेगा.

अरहामा सिद्दीक़ा के मुताबिक यह स्थिति पाकिस्तान के लिए किसी बुरे सपने जैसे होगी.

वह बताती हैं, "अमरीकी अधिकारियों ने पाकिस्तान के सेना प्रमुख को फ़ोन करके मदद मांगी और पाकिस्तान को पक्ष लेने से बचने को कहा. लेकिन पाकिस्तान का अपना असर है और भोगौलिक व सामरिक नज़रिए से वह महत्वपूर्ण स्थिति में भी है. यह बात अमरीका भी समझता है."

"मुस्लिम जगत में परमाणु ताकत वाला पाकिस्तान इकलौता देश है. उसके सऊदी अरब, तुर्की और मध्य पूर्व के देशों से मधुर संबंध हैं. वह अमरीका का साझेदार भी है. लेकिन हमें यह भी समझना होगा कि इन तमाम ख़ासियतों के बाद भी, आख़िर में जब तक वे दोनों देश ना चाहें, तब तक पाकिस्तान उनमें सुलह नहीं करा सकता."

कितनी सफल हो पाएगी कोशिश

कुछ महीने पहले, संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक के दौरान पाकिस्तान के इमरान ख़ान से अमरीका और सऊदी अरब ने संपर्क करके ईरान के साथ मध्यस्थता करने को कहा था. इसके बाद ही इमरान अक्टूबर में तेहरान गए, हालांकि उससे कुछ ठोस नतीजा नहीं निकला.

ईरान और सऊदी अरब के बीच संतुलन साधना भी पाकिस्तान के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण है. बीते दशकों में, पाकिस्तान अपने सैनिकों को कई बार सऊदी अरब भेज चुका है. हर बार पाकिस्तान यही दावा करता आया है ऐसा ट्रेनिंग हासिल करने के लिए किया गया है.

लेकिन 2015 में, पाकिस्तान की संसद में, सऊदी अरब के ऐसे अनुरोध पर बहस देखने को मिली और फिर यह फ़ैसला लिया गया कि पाकिस्तान की सेना सऊदी नेतृत्व वाले उस अभियान का हिस्सा नहीं बनेगी जिसके तहत ईरान समर्थित यमन के हूती विद्रोहियों पर कार्रवाई की जानी थी. उस वक्त यह आशंका जताई गई थी कि पाकिस्तान अगर अपनी सेना वहां भेजता तो देश के भीतर संप्रदायों के बीच तनाव बढ़ सकता है.

इसके कुछ महीने बाद, रियाद ने सुन्नी शासित देशों का एक चरमपंथ निरोधी सैन्य गठबंधन बनाने का ऐलान किया, पाकिस्तान के पूर्व सेना प्रमुख राहील शरीफ़ को इसका पहला कमांडर बनाया गया.

कुछ विश्लेषकों के मुताबिक़, इस गठबंधन का गठन इसलिए किया गया था ताकि सऊदी अरब मध्य पूर्व में ईरान पर अपनी बढ़त बना सके.

पाकिस्तान सुन्नी बहुल्य देश तो है ही, साथ में सऊदी अरब का नज़दीकी साझेदार भी. लेकिन पाकिस्तान की 20 प्रतिशत शिया आबादी, वैचारिक और धार्मिक तौर पर ईरान के साथ लगाव महसूस करती है. इसलिए अगर ईरान में संघर्ष छिड़ता है और पाकिस्तान ईरान के ख़िलाफ़ स्टैंड लेता है तो, सरकार को इस बात का अंदाज़ा है कि केवल दक्षिणी पश्चिमी सीमा पर अस्थिरता नहीं होगी बल्कि देश के अंदर भी अस्थिरता का माहौल बनेगा.

देश संप्रदाय के आधार पर किस स्पष्टता के साथ बंट जाता है, इसका अंदाज़ा उन पिछले उदाहरणों से भी होता है जब पाकिस्तानी सेना के सीरिया में जाकर इस्लामिक स्टेट के ख़िलाफ़ संघर्ष करने की ख़बरें आती थीं.

लेकिन विदेश मामलों के जानकार विश्लेषकों का विश्वास है कि पाकिस्तान संतुलन साधने में सफल रहेगा. पाकिस्तान के सऊदी अरब के साथ हमेशा मधुर संबंध रहे हैं लेकिन वह कभी ईरान के प्रति कटु नहीं हुआ.

अतीत में दोनों देशों के बीच सीमा पर छिटपुट संघर्ष जरूर हुए हैं लेकिन दोनों देशों ने सीमा पर हुए संघर्षों को निपटाने में कभी देरी नहीं की.

यही वजह है कि विश्लेषकों को उम्मीद है कि पाकिस्तान का इतना असर तो है कि वह ईरान, अमरीका और सऊदी अरब को एक साथ ला सके. मगर दुनिया के किसी भी संघर्ष के बारे में कहा जाता है कि अंतिम फ़ैसला उन्हीं पर निर्भर करता है, जिनके बीच संघर्ष छिड़ा होता है और वे अपने विवादों को सुलझाने के लिए कितने गंभीर हैं.

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