'जेल बनी सियासी तौर पर नापसंद लोगों को रखने की जगह' आनंद तेलतुंबडे ने जेल में बिताए दिनों के बारे में और क्या बताया?

इमेज स्रोत, Getty Images
- Author, सुमेधा पाल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
मानवाधिकारों के पक्षधर लेखक और शिक्षाविद प्रोफे़सर आनंद तेलतुंबडे जातिगत हिंसा भड़काने के आरोप में बतौर अंडरट्रायल क़ैदी जेल में 31 महीने गुज़ार चुके हैं.
स्कॉलर और एक्टिविस्ट के तौर पर पहचान रखने वाले आनंद तेलतुंबडे कहते हैं, "आज के भारत में इंसाफ़ सत्ता पर निर्भर हो गया है."
तेलतुंबडे उन 16 शिक्षाविदों, वकीलों और एक्टिविस्ट में शामिल थे, जिन्हें भीमा कोरेगाँव केस में गिरफ़्तार किया गया था.
एक जनवरी, 2018 को पुणे के भीमा कोरेगाँव में हिंसा तब भड़क गई थी, जब दलित उस जंग की 200वीं वर्षगाँठ मना रहे थे, जिसमें उन्होंने ब्रिटिश सेना के साथ मिलकर पेशवा बाजीराव को हराया था.
बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
पुलिस का आरोप था कि अभियुक्तों के भाषणों ने हिंसा को उकसाया. पुलिस उन पर आतंकवाद-रोधी क़ानूनों के तहत केस दर्ज किया.
तेलतुंबडे को नवंबर 2022 में ज़मानत मिली, लेकिन इस मामले में आठ अभियुक्त अब भी जेल में बंद हैं, जबकि मुक़दमे की सुनवाई अब तक शुरू नहीं हुई है.
तेलतुंबडे और उनके साथ के अन्य अभियुक्तों का कहना है कि सभी आरोप झूठे और मनगढ़ंत हैं.
बीबीसी से बातचीत करते हुए तेलतुंबडे ने कहा कि भारत में न्याय अब एक 'आज़ाद नैतिक बल' नहीं रह गया है, बल्कि यह 'शासन का औज़ार' बन गया है.
'जेल बताती है कि आपकी कोई अहमियत नहीं है'

इमेज स्रोत, Getty Images
हाल ही में तेलतुंबडे के जेल के अनुभवों पर आधारित एक संस्मरण 'सेल एंड सोल' (कोठरी और आत्मा) प्रकाशित हुआ है. इसमें उन्होंने भारतीय जेल व्यवस्था को 'विनाशकारी' बताया है.
वह लिखते हैं, "...इसका मक़सद व्यक्ति को एक गुमनाम दिनचर्या में शामिल कर देना है. जहाँ नाम की जगह नंबर होते हैं और बातचीत की जगह आदेश. यहाँ हर नियम, हर देरी, हर अपमान आपको यह याद दिलाने के लिए होता है कि आपकी कोई अहमियत नहीं है."
तेलतुंबडे अपनी किताब में लिखते हैं कि राजनीतिक क़ैदी अब भी बिना मुक़दमे के जेल में हैं. इसके लिए वह सह-अभियुक्त और छात्र एक्टिविस्ट उमर ख़ालिद का नाम ध्यान दिलाते हैं.
ख़ालिद को सितंबर 2020 में दिल्ली में फ़रवरी 2020 में नागरिकता संशोधन क़ानून (सीएए) के समर्थकों और विरोधियों के बीच भड़की हिंसा से जुड़े मामले में गिरफ़्तार किया गया था. इस हिंसा में 50 से अधिक लोग मारे गए थे.
पुलिस का आरोप है कि ख़ालिद और अन्य एक्टिविस्ट ने यह हिंसा इसलिए भड़काई थी ताकि 'सरकार का तख़्तापलट' किया जा सके और उस समय भारत यात्रा पर आए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सामने भारत की ख़राब छवि पेश की जा सके.
ख़ालिद की ज़मानत याचिका निचली अदालतों ने छह बार ख़ारिज की है और अब यह याचिका भारत के सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है.
'सरकार के लिए जेल एक ताक़त'

इमेज स्रोत, ANI
भीमा कोरेगाँव और दिल्ली हिंसा- दोनों मामलों में एक्टिविस्ट, शिक्षाविदों और वकीलों पर ग़ैर-क़ानूनी गतिविधियाँ निषेध अधिनियम (यूएपीए) जैसे कठोर क़ानूनों के तहत आरोप लगाए गए हैं, जिनमें ज़मानत मिलना बहुत मुश्किल होता है.
बीबीसी से बातचीत में तेलतुंबडे ने कहा कि इन कार्रवाइयों से यह स्पष्ट होता है कि सरकार जेलों को 'अपनी ताक़त के तौर पर' इस्तेमाल करना चाहती है.
वह कहते हैं, "जेलें असहमति को ख़त्म करने और ग़रीबों, हाशिए पर पड़े लोगों के साथ ही राजनीतिक रूप से नापसंद लोगों को नियंत्रण में रखने की जगह बन गई हैं."
तेलतुंबडे यह भी कहते हैं कि लंबी और महंगी क़ानूनी प्रक्रिया के कारण हाशिए पर पड़े समुदायों के लिए ज़मानत जैसी राहत हासिल करना और कठिन हो जाता है.
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के उपलब्ध नवीनतम आँकड़ों के अनुसार, साल 2022 में भारत में कुल अंडरट्रायल क़ैदियों में क़रीब 19.3% मुसलमान थे.
वहीं दिसंबर 2022 तक अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के 20.9% और 9.3% क़ैदी थे.
ख़ुद भी दलित पृष्ठभूमि से आने वाले तेलतुंबडे कहते हैं कि जेल में बिताए समय ने उनके न्याय के प्रति दृष्टिकोण को पूरी तरह बदल दिया है.
उनका कहना है, "व्यवस्था को भीतर से देखने के बाद, अब मैं न्याय को केवल क़ानून या प्रक्रिया का विषय नहीं मान सकता."
अपनी किताब में तेलतुंबडे यह बताते हैं कि जेल अधिनियम, जो आज भी भारत में जेल प्रशासन का प्रमुख आधार है, 1894 में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान बनाया गया था.
उनके मुताबिक़, "इसलिए यह क़ानून न्याय या इंसान की गरिमा के लिए नहीं, बल्कि साम्राज्यवादी नियंत्रण बनाए रखने के लिए तैयार किया गया था."
आज़ादी की चिंता

इमेज स्रोत, BBC/Ravi Prakash
बीबीसी से बातचीत में तेलतुंबडे इस पहलू को स्पष्ट करने के लिए जेसुइट पादरी और आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता स्टेन स्वामी की मृत्यु का उदाहरण देते हैं.
भीमा कोरेगाँव मामले के सह-अभियुक्त स्टेन स्वामी का जुलाई 2021 में 84 वर्ष की उम्र में हार्ट अटैक से निधन हो गया.
उन्हें ख़राब सेहत के बावजूद दो बार ज़मानत नहीं मिली और जेल में उनकी हालत तेज़ी से ख़राब होती गई.
जेल अधिकारियों की इस बात के लिए आलोचना भी हुई कि उन्होंने स्वामी को एक स्ट्रॉ और सिपर (प्लास्टिक बोतल जिसमें नली लगी होती है) तक उपलब्ध नहीं करवाई.
सिपर की उन्हें काफ़ी ज़रूरत थी, क्योंकि पार्किंसंस रोग के कारण उनके हाथ काँपते थे.
तेलतुंबडे कहते हैं कि उनकी मृत्यु ने यह भी दिखाया कि यह व्यवस्था वास्तव में कैसी हो चुकी है.
वो कहते हैं, "ऐसा व्यवहार दिखाता है कि यह व्यवस्था असहमतियों को क़ानून के माध्यम से नहीं, बल्कि शरीर को तोड़ देने वाली और आत्मा को अकेला कर देने वाली धीमी यातना के ज़रिए सज़ा देती है."
तेलतुंबडे कहते हैं कि ऐसी परिस्थितियों में भी क़ैदियों के बीच एकजुटता ने जेल के भीतर एक तरह का प्रतिरोध क़ायम रखा.
उन्होंने कहा, "मेरे साथी क़ैदी, जो अक्सर समाज के सबसे ग़रीब और भुला दिए गए लोग थे, मेरे धैर्य के सहयात्री बन गए. उनके हावभाव, एक कप चाय को साझा करना, चिंता का एक शब्द, या चुपचाप किए गए विरोध के किसी काम ने इंसानियत पर मेरा विश्वास फिर से जगाया."
हालाँकि तेलतुंबडे अब जेल से बाहर हैं लेकिन वह कहते हैं कि उनका जीवन पूरी तरह बदल गया है और उन्हें लगता है कि उनकी आज़ादी छीन ली गई है.
उनको इस शर्त पर ज़मानत दी गई है कि वो महाराष्ट्र और पड़ोसी राज्य गोवा से बाहर नहीं जा सकते हैं.
वह कहते हैं, "आठ साल से अधिक समय बीत चुका है और अब तक आरोप भी तय नहीं हुए. मुक़दमा शायद अनंतकाल तक चलता रहेगा, ऐसे हालात में स्थायी आज़ादी की भावना केवल आपके मन के अंदर ही आ सकती है."

इमेज स्रोत, X/@AnandTeltumbde
भीमा कोरेगाँव में आख़िर हुआ क्या था?
भीमा कोरेगाँव पुणे के पास स्थित है, जहां 1 जनवरी 2018 को हिंसा भड़की थी. यहां मराठा और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच हुए युद्ध की 200वीं वर्षगांठ मनाने के लिए एक समारोह आयोजित किया गया था.
भीमा कोरेगाँव में युद्ध से जुड़ा एक विजय स्तंभ है, जहां हज़ारों की तादाद में लोग जमा हुए थे, एक शख्स की मौत भी हो गई थी.
इस घटना से एक दिन पहले, यानी 31 दिसंबर 2017 को एल्गार परिषद ने पुणे के ऐतिहासिक शनिवारवाड़ा में एक कॉन्फ्रेंस आयोजित की थी. इसमें प्रकाश आंबेडकर, जिग्नेश मेवाणी, उमर ख़ालिद, सोनी सोरी और बीजी खोसले पाटिल के साथ तमाम दूसरे एक्टिविस्ट शामिल हुए थे.
भीमा कोरेगाँव में हिंसा के बाद पुणे पुलिस ने दो अलग-अलग मामले दर्ज किए थे. एक एफ़आईआर में शाम्भाजी भिड़े और मिलिंद एकबोटे जैसे हिंदूवादी नेताओं को नामजद किया गया था. ये मामला 2 जनवरी को पिंपरी पुलिस थाने में दर्ज कराया गया था.
इसके बाद 8 जनवरी को पुणे पुलिस ने तुषार दमगुड़े नाम के एक शख्स की शिकायत पर एल्गार परिषद से जुड़े लोगों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया.
इस एफ़आईआर में ये दावा किया गया कि भीमा कोरेगाँव में हिंसा एल्गार परिषद के लोगों के भड़काऊ भाषण की वजह से भड़की. इसी के आधार पर पुलिस ने तमाम कवियों, लेखकों, वकीलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार किया.
गिरफ़्तारी के बाद पुलिस ने इस मामले में चार्जशीट भी दाख़िल की. 17 मई को पुणे पुलिस ने चार्जशीट में यूएपीए एक्ट के तहत सेक्शन-13, 16, 18, 18-बी, 20, 39 और 40 के तहत नए आरोप जोड़े.
इस मामले में एनआईए ने भी 24 जनवरी 2020 को एक एफ़आईआर दर्ज की. इसमें आईपीसी के सेक्शन 153-ए, 505 (1)बी, 117 और 34 के साथ यूएपीए के सेक्शन 13, 16, 18, 18बी, 20 और 39 के तहत आरोप जोड़े गए.
पुणे पुलिस की जांच पूरी होने के बाद केन्द्र सरकार ने मामले को एनआईए को सौंप दिया. एनआईए ने इस मामले में 10 हज़ार पेज की चार्जशीट स्पेशल कोर्ट में दाख़िल की.
जांच एजेंसी की चार्जशीट के मुताबिक़ आनंद तेलतुंबडे, भीमा कोरेगाँव में शौर्य दिन प्रेरणा अभियान के आयोजकों में से एक थे और 31 दिसंबर को पुणे के शनिवारवाड़ा की कॉन्फ्रेंस में मौजूद थे.
एनआईए के मुताबिक गिरफ्तार किए गए सभी लोग उस साज़िश का हिस्सा थे, जिसकी वजह से भीमा कोरेगाँव में हिंसा भड़की.
हालांकि 26 नवंबर, 2020 को मुंबई हाई कोर्ट ने आनंद तेलतुंबडे को ज़मानत पर रिहा करने का फ़ैसला सुनाया था.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित















