स्टैन स्वामी: भारत के सबसे बुजुर्ग शख़्स जिन पर लगा आतंकवाद का आरोप

फादर स्टेन स्वामी

इमेज स्रोत, RAVI PRAKASH/BBC

इमेज कैप्शन, फ़ादर स्टैन स्वामी तीन दशकों से आदिवासियों के साथ काम कर रहे हैं
    • Author, सौतिक बिस्वास
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

(मानवाधिकार कार्यकर्ता फ़ादर स्टैन स्वामी का आज यानी पाँच जुलाई, 2021 को निधन हो गया. स्टेन स्वामी भीमा कोरेगाँव हिंसा मामले में न्यायिक हिरासत में थे. तबीयत ख़राब होने के बाद उन्हें अस्पताल में वेंटिलेटर पर रखा गया था. ये रिपोर्ट पहली बार अक्तूबर 2020 में प्रकाशित हुई है. उनके निधन के बाद हम आपके लिए ये रिपोर्ट फिर से पेश कर रहे हैं.)

---------------------------------------------------------------------------------------------------

राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की एक टीम पिछले सप्ताह झारखंड की राजधानी राँची के बाहरी इलाक़े में स्थित लाल और सफेद रंग की एक इमारत में पहुँची.

अधिकारियों ने 83 साल के सामाजिक कार्यकर्ता फ़ादर स्टैन स्वामी को गिरफ़्तार कर लिया. उनका मोबाइल फ़ोन ज़ब्त करके, उन्हें बैग पैक करने के लिए कहा गया.

वो उन्हें एयरपोर्ट ले गए और वहाँ से मुंबई की फ़्लाइट में बैठ गए. इसके बाद फ़ादर स्टैन स्वामी को 23 अक्तूबर तक न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

वो भारत में सबसे बुज़ुर्ग व्यक्ति हैं, जिन पर आतंकवाद का आरोप लगाया गया है.

एनआईए ने स्टैन स्वामी पर 2018 के भीमा कोरेगांव हिंसा मामले में शामिल होने और नक्सलियों के साथ संबंध होने के आरोप लगाए हैं. साथ ही उन पर ग़ैर क़ानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) की धाराएँ भी लगाई हैं.

गिरफ़्तारी से कुछ दिनों पहले रिकॉर्ड किए गए एक वीडियो में फ़ादर स्टैन स्वामी ने कहा है कि जुलाई में उनसे पाँच दिनों में 15 घंटों तक पूछताछ की गई थी.

स्टैन स्वामी ने बताया कि अधिकारियों ने कथित तौर पर उनके कंप्यूटर से निकाले गए कुछ दस्तावेज भी दिखाए और दावा किया कि इससे उनके संबंध नक्सलियों से जुड़ते हैं. लेकिन स्टेन स्वामी ने नक्सलियों से संबंध होने की बात को ख़ारिज किया और कहा कि ये दस्तावेज़ झूठे हैं और चोरी से उनके कंप्यूटर में डाले गए हैं.

उन्होंने जाँचकर्ताओं को बताया कि अधिक उम्र, स्वास्थ्य समस्याएँ और कोरोना महामारी के कारण उनके लिए मुंबई जाना मुश्किल है. उन्होंने उम्मीद जताई थी कि मानवीय आधार पर इस पर ग़ौर किया जाएगा.

फ़ादर स्टेन स्वामी की गिरफ़्तारी के लिए विरोद प्रदर्शन कर रहे लोग

इमेज स्रोत, PTI

इमेज कैप्शन, फादर स्टेन स्वामी की गिरफ़्तारी के लिए विरोद प्रदर्शन कर रहे लोग

विरोध को दबाने की कोशिश

जून 2018 से अब तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार में भीमा कोरेगांव हिंसा मामले में शामिल होने के आरोप में 16 लोगों को जेल भेजा गया है. इनमें सामाजिक कार्यकर्ता, वकील, शिक्षाविद, बुद्धिजीवी और एक बुज़ुर्ग कवि वरवर राव भी शामिल हैं. उन्हें जेल में रहते हुए कोरोना वायरस संक्रमण भी हो गया था.

उन्हें आंतकवाद निरोधक क़ानून के तहत कई बार ज़मानत देने से इनकार कर दिया गया. कई जानकारों का कहना है कि ये विरोध को दबाने की कोशिश है.

एमहर्स्ट के यूनिवर्सिटी ऑफ़ मैसाचुसेट्स में पब्लिक पॉलिसी की प्रोफ़ेसर संगीता कामत कहती हैं, "ये बहुत डरावना है. मानवाधिकारों के लिए काम करने वालों का इतना दमन भारत में कभी नहीं हुआ."

संगीता कामत कहती हैं कि इसकी तुलना 1975 से की जा सकती है, जब भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने मूलभूत अधिकारों को ख़त्म करके सेंसरशिप लगाते हुए आपातकाल की घोषणा की थी.

वह कहती हैं, "ये और ज़्यादा ख़तरनाक है क्योंकि ये अघोषित आपातकाल की तरह है."

फ़ादर स्टैन स्वामी पिछले कुछ समय से जाँच एजेंसियों के निशाने पर थे. स्टैन स्वामी ने वीडियो में बताया कि पिछले दो सालों में दो बार उनके घर पर छापे मारे गए, ताकि किसी तरह नक्सलियों से उनका संबंध साबित किया जा सके.

लेकिन, मृदुभाषी और कम चर्चित इस सामाजिक कार्यकर्ता को जानने वाले लोग कहते हैं कि 1991 में झारखंड आने के बाद से वे आदिवासियों के अधिकारों के लिए काम करते रहे हैं.

कई आदिवासी कोयले की खदानों में काम करते हैं

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, कई आदिवासी कोयले की खदानों में काम करते हैं

आदिवासियों के लिए संघर्ष

वर्ष 2000 में स्थानीय जनजातियों या आदिवासियों के अधिकारों सुरक्षा के लिए झारखंड का गठन हुआ था, लेकिन ये राज्य एक त्रासदी बन गया है. ये इलाक़ा नक्सली हिंसा और बार-बार पड़ने वाले सूखे का केंद्र रहा है. यहाँ की पाँच प्रतिशत से ज़्यादा आबादी हर साल पढ़ने या काम की तलाश में दूसरे राज्यों में जाती है.

भारत का 40 प्रतिशत मूल्यवान खनिज झारखंड में पाया जाता है, जिनमें यूरेनियम, अभ्रक, सीसा, बॉक्साइट, सोना, चांदी, कोयला और तांबा शामिल हैं.

लेकिन, इस क्षेत्र में हुआ विकास असमान है और ये आदिवासियों के अधिकारों की क़ीमत पर मिला है. ये आदिवासी राज्य की तीन करोड़ आबादी का एक चौथाई हिस्सा हैं.

भारत में मौजूद अन्य जनजातियों और आदिवासियों की तरह ये भी हाशिए पर रह रहे हैं. कई सकारात्मक और कल्याणकारी उपायों के बावजूद उनकी स्थिति में ख़ास सुधार नहीं आया है.

इतिहासकार रामचंद्र गुहा कहते हैं, "भारत के आदिवासी संसाधनों के कारण तिहरी मार झेल रहे हैं. वो घने जंगलों में रहते हैं, जहाँ तेज़ बहाव वाली नदियाँ बहती हैं और वहाँ लौह अयस्क और बॉक्साइट की प्रचूर मात्रा है."

छोड़िए YouTube पोस्ट
Google YouTube सामग्री की इजाज़त?

इस लेख में Google YouTube से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले Google YouTube cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.

चेतावनी: तीसरे पक्ष की सामग्री में विज्ञापन हो सकते हैं.

पोस्ट YouTube समाप्त

फ़ादर स्टैन स्वामी के एक सहयोगी कहते हैं कि वो लगातार आदिवासियों के लिए संघर्ष करते आए हैं.

नक्सली होने के तमगे के साथ जेलों में सड़ रहे 3000 महिलाओं और पुरुषों की रिहाई के लिए वो हाई कोर्ट गए. वो आदिवासियों को उनके अधिकारों की जानकारी देने के लिए दूरदराज़ के इलाक़ों में गए.

फ़ादर स्टैन स्वामी ने आदिवासियों को बताया कि कैसे खदानें, बांध और शहर उनकी सहमति के बिना बनाए जा रहे हैं और कैसे बिना मुआवज़े के उनसे ज़मीनें छीनी जा रही हैं.

उन्होंने साल 2018 में अपने संसाधनों और ज़मीन पर दावा करने वाले आदिवासियों के विद्रोह पर खुलकर सहानुभूति जताई थी. उन्होंने नियमित लेखों के ज़रिए बताया है कि कैसे बड़ी कंपनियाँ फ़ैक्टरियों और खदानों के लिए आदिवासियों की ज़मीनें हड़प रही हैं.

आज़ादी के बाद से, 17 लाख से अधिक भारतीय पावर स्टेशनों, सिंचाई परियोजनाओं और कारखानों के लिए अपनी ज़मीनों से विस्थापित हुए हैं.

खेतों में काम कर रहे लोग

इमेज स्रोत, Getty Images

तबीयत भी नहीं रोक सकी

स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता सिराज दत्ता बताते हैं, "अपनी ख़राब तबीयत के बावजूद भी फ़ादर स्टैन स्वामी आदिवासियों की सहायता का कोई मौक़ा नहीं छोड़ते थे. उनको कैंसर भी हुआ था और उनकी तीन सर्जरी भी हुई है. उनके हाथ काँपते रहते हैं. वो अपनी पसंदीदा चाय भी स्ट्रॉ से पीते हैं. कुछ सालों पहले उन्होंने लिंचिंग के ख़िलाफ़ होने वाले विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया था और अपने काँपते हाथों से पोस्टर उठाने की कोशिश की थी."

फ़ादर स्टैन स्वामी को एक दशक से भी ज़्यादा समय से जानने वाले अर्थशास्त्री और सामाजिक कार्यकर्ता ज़्यां द्रेज़ उन्हें एक 'सज्जन और ईमानदार आदमी' बताते हैं, जो समय के पाबंद, धर्मनिरपेक्ष और अपने उद्देश्य के लिए समर्पित थे.

ज्यां द्रेज़ कहते हैं, "हो सकता है कि उन्होंने माओवादियों के साथ सहयोग या सहानुभूति रखने वाले लोगों की मदद की हो और ऐसा होना झारखंड में असामान्य बात भी नहीं. लेकिन ऐसा करने से वो माओवादी नहीं हो जाते. उनकी गिरफ़्तारी विपक्ष को कमज़ोर करने के एक बड़े प्रयास का हिस्सा है."

उनके दोस्त बताते हैं कि फ़ादर स्टैन स्वामी का ऐसे आंदोलनों की तरफ़ रुझान मनीला यूनिवर्सिटी में हुआ था. वो अपने दोस्तों को बताया करते थे कि वो फिलिपींस के राष्ट्रपति मार्कोस के भ्रष्ट और क्रूर शासन को उखाड़ फेंकने वाले जन आंदोलन से प्रेरित हुए हैं. भारत लौटने के बाद भी वो लैटिन अमरीका में जन आंदोलनों के संपर्क में रहे और उनके बारे में लगातार पढ़ा करते थे.

महिलाएं

इमेज स्रोत, Getty Images

किसान परिवार से आए

तमिलनाडु में जन्मे फ़ादर स्टेन स्वामी के पिता किसान थे और उनकी माँ गृहणी थीं.

उन्होंने एक दशक से अधिक समय तक बेंगलुरु में हाशिए पर मौजूद समुदायों के नेताओं के प्रशिक्षण के लिए एक स्कूल चलाया.

स्टैन स्वामी के दोस्त और एक्टिविस्ट ज़ेवियर डायस बताते हैं, "उनके लिए किसी भी चीज़ की तुलना सबसे ज़्यादा ज़रूरी लोग थे. उन्होंने लोगों की सेवा के लिए चर्च की मान्यताओं की भी परवाह नहीं की."

ज़ेवियर डायस कहते हैं, "वह अपनी समस्याओं की फ़िक्र भी नहीं करते थे. दो महीनों पहले, उनके भतीजे की कोविड-19 के कारण मौत हो गई थी. कुछ दिनों पहले शायद इसी दुख में उनकी बहन भी गुज़र गईं, जिनकी उम्र 90 साल से भी अधिक थी. तब वो कहते थे कि ये मेरा निजी नुक़सान है, लेकिन जब कई लोग बीमारी के कारण मर रहे हैं तो हमें उनके नुक़सान के बारे में भी सोचना चाहिए."

एनआईए के आने से हफ़्ते भरे पहले ज़ेवियर डायस के घर पर डिनर करते हुए दोनों ने भविष्य पर चर्चा की और गिरफ़्तारी को लेकर आशंका भी जताई थी.

फ़ादर स्टैन स्वामी कहते थे, "मेरे बैग पैक हैं और मैं जाने के लिए तैयार हूँ."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)