दिल्ली दंगे और भीमा कोरेगांव हिंसा

दोनों ही मामले क्यों दिखते हैं एक जैसे?

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हिंसा की दो घटनाएँ, देश के दो हिस्सों में अलग-अलग वक़्त हुईं. पहली एक जनवरी 2018 को पुणे के पास भीमा कोरेगांव में, और दूसरी फ़रवरी 2020 में उत्तर पूर्वी दिल्ली में. भीमा कोरेगांव मामले का ताल्लुक़ दलित आंदोलन से है जबकि दिल्ली दंगों का सीएए विरोधी प्रदर्शनों से.

ये दोनों घटनाएँ एक ही वजह से चर्चा मे रहीं. दोनों ही मामलों में मुकदमे दर्ज हुए, गिरफ़्तारियाँ हुईं, दोनों ही मामलों में जिन लोगों को लंबे समय से हिरासत में रखा गया है, वे सब एक ख़ास तबके से आते हैं- बुद्धिजीवी, वकील, लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता और छात्र नेता. इनमें एक और बात कॉमन है कि ये हिंदुत्व की राजनीति, सीएए-एनआरसी, दलित-अल्पसंख्यक उत्पीड़न और मानवाधिकारों के उल्लंघन के मुखर विरोधी रहे हैं. दोनों ही मामलों में जिन लोगों के खिलाफ शिकायत होने के बावजूद कार्रवाई नहीं हुई वे हिंदुत्वादी राजनीति से जुड़े लोग हैं. साथ ही, दोनों मामले केंद्र सरकार के अधीन आने वाली जाँच एजेंसियों के हाथों में हैं.

महीनों से हिरासत में बंद लोगों में कई दशकों से सक्रिय और नामचीन रहे हैं, जबकि दिल्ली के मामले में कई युवा छात्र नेता भी गंभीर आरोपों का सामना कर रहे हैं जिनका ताल्लुक दो ऐसे शिक्षण संस्थानों से है जिनकी सरकार से तनातनी चलती रही है—जवाहरलाल नेहरू विश्विद्यालय और जामिया मिल्लिया इस्लामिया. गर्ल्स हॉस्टल में रहने वाली लड़कियों पर लगाई जाने वाली पाबंदियों के ख़िलाफ़ शुरू हुए ‘पिंजरा तोड़’ अभियान से जुड़ी दो छात्राओं को भी हिरासत में लिया गया है.  

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सरकारी जाँच एजेंसियों ने इन लोगों को हिंसा की साज़िश में शामिल, नक्सल समर्थक और प्रतिबंधित माओवादी संगठन से ताल्लुक़ रखने वाला बताया है, इनमें से ज्‍यादातर लोगों पर ग़ैर-कानूनी गतिविधि नियंत्रण कानून (यूएपीए) की धाराएँ लगाई गई हैं जो मोटे तौर पर आतंकवाद के मामलों में लगाई जाती हैं. जाँच एजेंसियों का कहना है कि ये लोग देश की एकता, अखंडता और सुरक्षा के लिए ख़तरा हैं इसलिए इन्हें ज़मानत पर रिहा नहीं होना चाहिए. यूएपीए के प्रावधानों के तहत जाँच एजेंसियाँ लोगों को बिना मुकदमा चलाए लंबे समय तक हिरासत में रख सकती हैं,

भीमा कोरेगांव मामले में एक चार्जशीट और उसके बाद एक सप्लीमेंट्री चार्जशीट फ़ाइल हो चुकी है जबकि दिल्ली दंगों के मामले की जाँच चल रही है. इन दोनों मामलों में जाँच एजेंसियों की निष्पक्षता पर सवाल उठे हैं, आरोप लगाने वालों का कहना है कि हिंदुत्व की राजनीति से जुड़े लोगों को दोनों ही मामलों में ‘खुली छूट’ और ‘क्लीन चिट’ दी गई है जबकि दूसरे लोगों के साथ अतिरिक्त सख़्ती बरती गई है. सवाल ये है कि क्या दोनों मामलों में अब तक हुई कार्रवाइयों का एक जैसा होना महज एक संयोग हैै?

बहरहाल, दोनों मामलों में अदालत ही बेकसूर और कसूरवार का फ़ैसला कर सकती है. इन मामलों में कानूनी प्रक्रिया के तहत अब तक जो कुछ हुआ है, जो दस्तावेज़ मौजूद हैं, जो तथ्य सामने आए हैं उनको एक जगह, एक साथ रखने की कोशिश है ताकि लगातार घट रही छोटी-बड़ी घटनाओं को आप समग्रता में जान-समझ सकें.

दिल्ली हिंसा

दिल्ली के उत्तर-पूर्वी इलाके में सीएए के खिलाफ़ शुरू हुए प्रदर्शनों का अंत दंगों की शक़्ल में हुआ. 23 फ़रवरी से 26 फ़रवरी 2020 के बीच हुए दंगों में 53 लोगों की मौत हो गई. 13 जुलाई को हाईकोर्ट में दायर दिल्ली पुलिस के हलफ़नामे के मुताबिक, मारे गए लोगों में से 40 मुसलमान और 13 हिंदू थे.

लाल रंग में दिख रहा है उत्तर-पूर्वी दिल्ली का जाफ़राबाद मेट्रो स्टेशन. 22 फ़रवरी को यहां सीएए के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया जा रहा था जिसमें ज़्यादातर महिलाएं शामिल थीं. इस प्रदर्शन को जाँच एजेंसियाँ दंगे की शुरूआत की वजह बता रही हैं.

क्या कहते हैं दंगे केअहम एफ़आईआर?


अब तक दिल्ली पुलिस ने दंगों से जुड़ी कुल 751 प्राथमिकियाँ दर्ज की. पुलिस ने दिल्ली दंगों से जुड़े दस्तावेज़ों को सार्वजनिक करने से इनकार कर दिया है.

पुलिस का तर्क है कि कई जानकारियां ‘संवेदनशील’ हैं इसलिए उन्हें वेबसाइट पर अपलोड नहीं किया जा सकता है. दिल्ली पुलिस ने सीपीआई (एम) की नेता वृंदा करात की हाईकोर्ट में दायर याचिका के जवाब में 16 जून को ये बात कही थी.

ऐसे में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों की जांच से जुड़ी जानकारियां जुटाना एक चुनौती रही है लेकिन बीबीसी ने जांच से जुड़े कोर्ट के ऑर्डर और एफ़आईआर-चार्जशीट जैसे दस्तावेज़ जुटाकर जाँच के तौर-तरीकों को समझने कोशिश की है.

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दिल्ली में दंगे में कुल 53 लोग मारे गए

दिल्ली में दंगे में कुल 53 लोग मारे गए

इनमें से सबसे अहम हैं एफ़आईआर 59, एफ़आईआर 65, एफ़आईआर 101 और एफ़आईआर 60. इनके साथ ही दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने जून महीने की शुरूआत में दंगों के पीछे की ‘क्रोनोलॉजी’ भी कड़कड़डूमा कोर्ट में पेश की है. 

हमले में बुरी तरह घायल मोहम्मद ज़ुबैर की कहानी

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FIR-59: छात्र नेताओं पर UAPA 

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इस मामले में दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच का कहना है कि दंगों के पीछे एक गहरी साज़िश थी. ये एफ़आईआर इसी कथित साज़िश के बारे में है.

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दंगों की ये ऐसी एफ़आईआर है जिसमें अनलॉफ़ुल एक्टिविटी प्रिवेंशन एक्ट (UAPA) की धाराएं लगाई गई हैं. इस एफ़आईआर में उन छात्र नेताओं के नाम शामिल हैं जो दिल्ली में सीएए के खिलाफ़ प्रदर्शनों में आगे-आगे दिख रहे थे.

6 मार्च 2020 को दर्ज हुई इस मूल एफ़आईआर में सिर्फ़ दो लोगों- जेएनयू के पूर्व छात्र नेता उमर ख़ालिद और पॉपुलर फ़्रंट ऑफ़ इंडिया (पीएफ़आई) से जुड़े दानिश के नाम हैं. पीएफ़आई खुद को समाजसेवी संस्था बताती है लेकिन उस पर केरल में जबरन धर्म परिवर्तन और मुसलमानों के बीच कट्टरपंथ को बढ़ावा देने का आरोप लगता रहा है.

एफ़आईआर-59 के आधार पर अब तक 14 लोगों को गिरफ्तार किया गया है. जिनमें से सफ़ूरा ज़रगर, मोहम्मद दानिश, परवेज़ और इलियास इस समय ज़मानत पर रिहा हैं. बाकी 10 लोग अब भी न्यायिक हिरासत में हैं. 

ख़ास बात ये है कि इनमें से ज्यादातर लोगों को शुरूआत में दिल्ली दंगों से जुड़ी अलग-अलग एफ़आईआर में गिरफ़्तार किया गया लेकिन जैसे ही उन मामलों में उन्हें ज़मानत मिली या मिलने की संभावना बनी, इनका नाम एफ़आईआर संख्या 59 में जोड़ दिया गया और इस तरह इन लोगों पर यूएपीए की धाराएँ लग गईं.

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मूल एफ़आईआर 59 में सबसे पहला नाम जेएनयू के छात्र रहे 'यूनाइटेड अगेंस्ट हेट' के सह-संस्थापक उमर ख़ालिद का है.

उमर ख़ालिद

उमर ख़ालिद

इशरत जहां

इशरत जहां

ख़ालिद सैफ़ी

ख़ालिद सैफ़ी

मीरान हैदर

मीरान हैदर

सफ़ूरा ज़रगर

सफ़ूरा ज़रगर

देवांगना कलिता

देवांगना कलिता

उमर ख़ालिद

उमर ख़ालिद

इशरत जहां

इशरत जहां

ख़ालिद सैफ़ी

ख़ालिद सैफ़ी

मीरान हैदर

मीरान हैदर

सफ़ूरा ज़रगर

सफ़ूरा ज़रगर

देवांगना कलिता

देवांगना कलिता

उमर ख़ालिद  का नाम पहली बार ख़बरों में जेएनयू छात्र नेता रहे कन्हैया कुमार के साथ फ़रवरी 2016 में आया था.

ये उन नामों की लिस्ट है जिन पर दिल्ली पुलिस ने दंगों की साज़िश और देश-विरोधी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाया है.  ये सभी लोग अलग-अलग और अपेक्षाकृत कम गंभीर आरोपों वाली एफ़आईआर में गिरफ़्तार होने से लेकर यूएपीए वाली एफ़आईआर-59 का हिस्सा कैसे बने? स्पेशल सेल का कहना है कि जेसीसी, पीएफ़आई, पिंजरा तोड़, यूनाइटेड अगेंस्ट हेट से जुड़े लोगों ने साज़िश के तहत दिल्ली में दंगे कराए.

ख़ालिद सैफ़ी- यूनाइटेड अगेंस्ट हेट 
इशरत जहां-
पूर्व कांग्रेस पार्षद
सफ़ूरा ज़रगर-
एमफ़िल छात्रा, जामिया 
मीरान हैदर-
पीएडी छात्र, जामिया 
गुलफिशा फ़ातिमा-
एमबीए छात्र, गाजियाबाद 
शादाब अहमद-
जामिया छात्र 
शिफ़ा-उर-रहमान-
जमिया एल्युमिनाई 
नताशा नरवाल-
जेएनयू छात्र,'पिंजरा तोड़' की सदस्य 
देवांगना कलिता-
जेएनयू छात्र, 'पिंजरा तोड़' की सदस्य 
आसिफ़ इक़बाल तन्हा-
जामिया छात्र 
ताहिर हुसैन-
पूर्व 'आप' पार्षद 

बीबीसी ने अब तक हुई इस पूरी कार्रवाई को समझने के लिए पहले एफ़आईआर से लेकर कोर्ट में हुई कार्यवाहियों का अध्ययन किया. 

6 मार्च से लेकर अब तक इस केस में क्या-क्या हुआ, पुलिस की दलीेलें क्या हैं और आख़िर कोर्ट ने कब-कब ज़मानत की अपील ख़ारिज की, और 2 लोगों के नाम से दर्ज इस एफ़आईआर में किस तरह 14 लोगों की गिरफ्तारी हुई? 

एफ़आईआर के मुताबिक उमर ख़ालिद ने अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की भारत यात्रा के दौरान दंगों की साज़िश रची और दानिश ने दंगों के लिए लोगों की भीड़ जुटाई. 

मूल एफ़आईआर की कॉपी में आईपीसी की धाराएँ---147 (दंगे भड़काने), 148 (दंगे में घातक हथियारों का इस्तेमाल), 149 (ग़ैर-कानूनी तरीक़े से सभा करना) 120B (आपराधिक षड्यंत्र)--लगाई गई थीं. ये सभी धाराएँ ज़मानती हैं.

इस मामले में मोहम्मद दानिश सहित तीन पीएफ़आई सदस्यों की गिरफ़्तारी हुई थी जिन्हें 13 मार्च को मेट्रोपॉलिटन मस्जिट्रेट की अदालत से ज़मानत इस शर्त के साथ मिली कि वे देश से बाहर नहीं जाएँगे. इस केस को क्राइम ब्रांच ने दर्ज किया था लेकिन कुछ दिन बाद ही साज़िश के केस की जांच दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल को ट्रांसफ़र कर दी गई. 

दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल साज़िश, आतंकवादी गतिविधि जैसे जटिल मामलों की जांच करती है. दिल्ली पुलिस केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन काम करती है.

15 मार्च को इस केस में 302 (हत्या), 307 (हत्या की कोशिश), 124A (राजद्रोह) जैसी ग़ैर-ज़मानती धाराएं जोड़ी गईं. इसके अलावा 154A (गैर कानूनी सभा), 186 (किसी सरकारी कर्मचारी के काम में बाधा डालना), 353, 395 (डकैती), 435 (आगजनी या धमाके से नुकसान पहुंचाना), सार्वजनिक संपत्ति नुकसान निवारण अधिनियम के सेक्शन 3, 4 और आर्म्स एक्ट के सेक्शन 25 और 27 भी एफ़आईआर में जोड़ी गईं.

19 अप्रैल को इस केस में बेहद सख़्त एक्ट यूएपीए का सेक्शन 13 (गैर-कानूनी गतिविधि की सज़ा), 16 (आतंकवादी गतिविधि की सज़ा), 17 (आतंकवादी गतिविधि के लिए फ़ंड जुटाने की सज़ा) और 18 (साजिश रचने की सज़ा) जोड़ा गया. 

आम तौर पर किसी भी एफ़आईआर में 90 दिनों की अवधि में आरोपपत्र दाख़िल करना होता है लेकिन एफ़आईआर 59 में स्पेशल सेल ने यूएपीए 43D (2) का इस्तेमाल करके 17 सितंबर तक का वक़्त मांगा था लेकिन सेशन जज धर्मेंद्र राणा की कोर्ट ने 14 अगस्त तक का ही समय दिया यानी पुलिस को इस मामले में आरोप पत्र तैयार करने के लिए 120 दिन का वक़्त दिया गया है. हालाँकि 13 अगस्त को कोर्ट ने चार्जशीट दायर करने अवधि बढ़ाकर 17 सितंबर कर दी है.

यूएपीए में 90 दिनों की अवधि को 180 दिनों तक बढ़ाया जा सकता है लेकिन ऐसा करने के लिए जांच अधिकारी को कोर्ट के सामने अतिरिक्त वक़्त लेने की वजह बतानी होती है और दलीलों से कोर्ट को सहमत करना पड़ता है.

आइए उन लोगों के बारे में जानते हैं जिनकी दोबारा गिरफ़्तारी हुई.

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एक केस में ज़मानत और FIR 59 में दोबारा गिरफ़्तारी  

ख़ालिद सैफ़ी : उत्तर-पूर्वी दिल्ली के रहने वाले ख़ालिद पेशे से कारोबारी हैं. वे 'यूनाइटेड अगेंस्ट हेट' संस्था के मुख्य सदस्यों में से एक हैं.

साल 2017 में इस संस्था ने मॉब लिंचिंग के खिलाफ़ अभियान शुरू किया था. ये कैंपेन एक नौजवान लड़के जुनैद की चलती ट्रेन में पीटकर की गई हत्या के बाद शुरू किया गया और कई लोग इस कैंपेन का हिस्सा बने. इसके अलावा सैफ़ी देश भर में हुई लिंचिंग की कई घटनाओं को लेकर अभियान चलाते रहे हैं. 

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26 फ़रवरी 2020 को ख़ालिद सैफ़ी को गिरफ़्तार करके ले जाती हुई पुलिस

26 फ़रवरी 2020 को ख़ालिद सैफ़ी को गिरफ़्तार करके ले जाती हुई पुलिस

ख़ालिद सैफ़ी बीते चार महीने से मंडोली जेल में बंद हैं. सबसे पहले 26 फरवरी को एफ़आईआर संख्या 44 में उन्हें गिरफ़्तार किया गया. एफ़आईआर 44 में कहा गया कि ‘’ख़ालिद सैफ़ी, इशरत जहां और साबू अंसारी ने खुरेजी में चल रहे एंटी सीएए प्रदर्शनों के दौरान ग़ैर-क़ानूनी तरीके से भीड़ जुटाई और पुलिस के आदेश के बावजूद भीड़ को रास्ता खाली करने से रोका और पुलिस बल पर पत्थरबाज़ी करवाई जिससे कुछ पुलिस वालों को चोटें भी आईं.’’ 

इस एफ़आईआर में आईपीसी 307 (हत्या के इरादे से हमला) और आर्म्स एक्ट की धाराएं लगाई गईं.  

10 मार्च को एक वीडियो सामने आया जिसमें पुलिस कस्टडी में रहने के बाद पहली बार खालिद सैफ़ी कड़कड़डूमा कोर्ट परिसर में नज़र आए. इस दौरान उनके दोनों पैर टूटे हुए थे, दाएं हाथ की ऊंगलियां भी टूटी हुईं थीं. वे व्हीलचेयर पर थे.  26 फ़रवरी के वीडियो में ख़ालिद पुलिस के साथ अपने पैरों पर चलकर जा रहे थे यानी उनके पैर उसी दौरान टूटे जब वे हिरासत में थे.

एफ़आईआर 44 में कुल पांच लोगों को गिरफ्तार किया गया था. 

21 मार्च को कड़कड़डूमा कोर्ट से इस मामले में ख़ालिद सैफ़ी को छोड़कर बाकी सभी अभियुक्तों को ज़मानत मिल गई. कोर्ट ने सैफ़ी की जमानत याचिका ये कहकर रद्द कर दी कि ‘’इस मामले में गिरफ़्तार एक नाबालिग लड़के ने अपने बयान में कहा है कि उसे देसी कट्टा खालिद सैफ़ी ने मुहैया कराया और पुलिस पर हमला करने को उकसाया.’’ 

सैफ़ी की पैरवी कर रही वकील रेबैका जॉन ने कोर्ट में कहा कि  पुलिस कस्टडी में ख़ालिद को बुरी तरह पीटा गया. इन दलीलों के बावजूद उन्हें जज मंजूषा वाधवा की कोर्ट ने सैफ़ी को ज़मानत देने से इनकार कर दिया.  

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टूटे पैरों के साथ व्हीलचेयर पर अदालत लाए जाते खालिद सैफ़ी

टूटे पैरों के साथ व्हीलचेयर पर अदालत लाए जाते खालिद सैफ़ी

ठीक इसी दिन दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने ख़ालिद सैफ़ी का नाम एफ़आईआर 59 में जोड़ दिया. अब तक ख़ालिद सैफ़ी का नाम दिल्ली दंगों से जुड़ी कुल तीन प्राथमिकियों-44, 59, 101-में दर्ज किया जा चुका है. 

इशरत जहां


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इशरत जहाँ पेशे वकील हैं और पार्षद रह चुकी हैं

इशरत जहाँ पेशे वकील हैं और पार्षद रह चुकी हैं

पेशे से वकील और पूर्व कांग्रेस पार्षद इशरत जहां को भी ख़ालिद सैफ़ी के साथ 26 फरवरी को गिरफ्तार किया गया. इशरत को एफ़आईआर संख्या 44 में 21 मार्च को कड़कड़डूमा कोर्ट से ज़मानत मिल गई थी लेकिन ठीक उसी दिन रिहाई से पहले स्पेशल सेल ने उन्हें तिहाड़ जेल में ही दिल्ली दंगों की साज़िश से जुड़ी एफ़आईआर 59 में गिरफ़्तार कर लिया और उन पर भी यूएपीए की धाराएँ लग गईं.  

दो बार इशरत जहां की ओर से मेट्रोपॉलिटेन मजिस्ट्रेट की अदालत में ज़मानत की अर्ज़ी डाली गई थी. चूंकि इस केस में यूएपीए लग चुका है, ऐसे में ज़मानत देने का अधिकार सेशन कोर्ट के पास होता है और मेट्रोपॉलिटेन मजिस्ट्रेट इसमें ज़मानत नहीं दे सकता. इसके बाद 30 मई को सेशन जज धर्मेंद्र राणा ने उन्हें 10 दिन की अंतरिम ज़मानत दी. 

10 जून को ज़मानत की अवधि शुरू हुई, ये जमानत उन्हें उनकी शादी के लिए दी गई और 19 जून को ये ज़मानत खत्म हो गई. हालांकि इशरत के वकील ललित वलेचा ने पटियाला हाउस कोर्ट से सात दिन के एक्सटेंशन की मांग की थी जिसे जज ने ख़ारिज कर दिया. इस वक़्त इशरत फिर तिहाड़ जेल में हैं. 

सफ़ूरा ज़रगर


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सफूरा ज़रगर को कई बार की कोशिशों के बाद ज़मानत मिली

सफूरा ज़रगर को कई बार की कोशिशों के बाद ज़मानत मिली

 27 साल की सफ़ूरा जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी में एमफ़िल की छात्रा हैं. वे जामिया कॉर्डिनेशन कमेटी (जेसीसी) की मीडिया कॉर्डिनेटर भी हैं.

सफ़ूरा की गिरफ़्तारी की सबसे ज़्यादा चर्चा रही और इसकी सबसे बड़ी वजह थी उनका गर्भवती होना.  24 फ़रवरी को जाफ़राबाद थाने में दर्ज एफ़आईआर 48 के तहत 10 अप्रैल को सफ़ूरा को पूछताछ के लिए बुलाया गया, इसके बाद देर शाम उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. 

13 अप्रैल को इस मामले में उन्हें ज़मानत दी गई लेकिन इसके ठीक बाद रिहा करने के बजाय सफ़ूरा को एफ़आईआर 59 के तहत गिरफ़्तार कर लिया गया. 

पाँच दिन बाद 18 अप्रैल को सफ़ूरा की ज़मानत याचिका पर सुनवाई हुई और इस दौरान मजिस्ट्रेट ने दिल्ली पुलिस को सफ़ूरा पर लगाए गए आरोपों की ज़्यादा जानकारी के साथ 21 अप्रैल को दोबारा आने को कहा. 21 अप्रैल की सुनवाई से ठीक पहले 19 अप्रैल को स्पेशल सेल ने इस केस में यूएपीए लगाया. इसके बाद सफ़ूरा की ज़मानत याचिका ख़ारिज हो गई. 

तीन बार ज़मानत याचिका ख़ारिज होने के बाद दिल्ली हाई कोर्ट से 23 जून को सफ़ूरा ज़रगर को ‘मानवीय आधार’ पर ज़मानत दी गई है. इससे पहले तीन बार सफ़ूरा ज़रगर की ओर से इसी 'मानवीय आधार' पर ज़मानत की मांग को ख़ारिज किया गया था. यहां तक कि जब 22 जून को हाईकोर्ट में इस मामले पर सुनवाई हो रही थी तो दिल्ली पुलिस की तरफ़ से कहा गया था कि ‘बीते 10 सालों में तिहाड़ जेल में 39 बच्चों का जन्म हुआ है’’  लेकिन ठीक एक दिन बाद ही सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा था कि ‘’केंद्र सरकार को इस बात पर कोई आपत्ति नहीं है अगर सफ़ूरा को मानवीय आधार पर ज़मानत दी जाए.‘’ 

ये हैरान करने वाली बात है कि एक दिन पहले दिल्ली पुलिस आंकड़ों के ज़रिए जेल में डिलीवरी की संभावनाओं के पक्ष में अपनी राय रख रही थी, आखिर 24 घंटे में ऐसा क्या बदल गया कि पुलिस ने इस याचिका का विरोध नहीं किया. यहाँ ध्यान देने वाली बात है कि सफ़ूरा ज़रगर की गिरफ़्तारी पर एमेनेस्टी इंटरनेशनल से लेकर मेधा पाटकर और अरुणा रॉय जैसी हस्तियों ने आपत्ति जताई थी, और मीडिया में भी एक गर्भवती युवती को ज़मानत न दिए जाने पर चर्चा हो रही थी. 

 

मीरान हैदर


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मीरान हैदर जामिया से पीएच डी कर रहे हैं

मीरान हैदर जामिया से पीएच डी कर रहे हैं

  मीरान हैदर जामिया में पीएच डी के छात्र हैं और राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) की दिल्ली यूनिट के छात्र नेता हैं. जामिया के गेट नंबर 7 पर हो रहे सीएए विरोधी प्रदर्शन का मीरान अहम हिस्सा रहे हैं. 35 साल के मीरान 1 अप्रैल को गिरफ़्तार किए गए. इसके बाद 3 अप्रैल को उन्हें कस्टडी में भेजा गया.  

15 अप्रैल को मीरान के वकील अक़रम खान ने ज़मानत की अर्ज़ी डाली थी लेकिन जब उन्हें पता चला कि इस मामले में स्पेशल सेल ने गंभीर धाराएं लगाई हैं तो उन्होंने अपनी अर्ज़ी वापस लेकर अधिक तैयारी के साथ दोबारा अर्ज़ी डालने का फ़ैसला किया. मीरान अब भी न्यायिक हिरासत में हैं.

गुलफ़िशा फ़ातिमा


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गुलफ़िशा ने गाज़ियाबाद से एमबीेए की पढ़ाई की है

गुलफ़िशा ने गाज़ियाबाद से एमबीेए की पढ़ाई की है

 28 साल की गुलफ़िशा फ़ातिमा ने गाज़ियाबाद से एमबीए किया है. गुलफ़िशा दिल्ली में चल रहे एंटी-सीएए प्रदर्शन में नियमित रूप से भाग ले रही थीं. 9 अप्रैल को दिल्ली पुलिस ने उन्हें सफ़ूरा ज़रगर की तरह ही जाफ़राबाद थाने में दर्ज एफ़आईआर संख्या 48 के तहत गिरफ़्तार किया. 12 मई को सेशन कोर्ट से उन्हें इस मामले में ज़मानत मिल गई लेकिन उन्हें तिहाड़ जेल में रहते हुए ही एफ़आईआर संख्या 59 में गिरफ्तार कर लिया गया. वो अभी तिहाड़ में ही हैं. 

 गुलफ़िशा के वकील महमूद पराचा के साथ मिलकर उनके भाई अकील हुसैन ने गुलफ़िशा की गिरफ्तारी को ‘गैरकानूनी हिरासत ’ बताते हुए हाई कोर्ट में हिबियस कॉर्पस (बंदी प्रत्यक्षीकरण) याचिका दायर की. इस याचिका के हाईकोर्ट में होने के बावजूद एडिशनल जज धर्मेंद्र राणा ने गुलफ़िशा को 25 जून तक की न्यायिक हिरासत में भेज दिया. 

 हालांकि सफ़ूरा को जिस दिन हाई कोर्ट की ओर से ज़मानत मिली उसके ठीक एक दिन पहले जज धमेंद्र राणा ने गुल़फ़िशा की बंदी प्रत्यक्षीकरण की याचिका ख़ारिज कर दी थी.

दरअसल, कोर्ट में ये याचिका इस आधार पर दायर की गई कि  ‘’यूएपीए के केस की सुनवाई का अधिकार सिर्फ़ एनआईए की स्पेशल कोर्ट को होता है लेकिन इस मामले में रिमांड ऑर्डर सेशन कोर्ट के जज ने सुनाया है जो उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर है.‘’ 

जबकि कोर्ट ने कहा कि ‘’ये दलील ग़लत है क्योंकि यूएपीए केस की सुनवाई एनआईए कोर्ट में हो ये तभी अनिवार्य है जब केंद्र सरकार ने ख़ास तौर पर केस को लेकर ऐसा आदेश दिया हो.’’ 

आसिफ़ इक़बाल तन्हा 


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तन्हा के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दिसंबर 2019 में किसी और मामले में हुई थी

तन्हा के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दिसंबर 2019 में किसी और मामले में हुई थी

 24 साल के आसिफ़ इकबाल तन्हा फ़ारसी भाषा के छात्र हैं. 17 मई को उन्हें जामिया नगर थाने में दर्ज 16 दिसंबर की एफ़आईआर 298 में गिरफ़्तार किया गया. लगभग 6 महीने बाद उनकी गिरफ़्तारी हुई. ये मामला 15 दिसंबर को जामिया यूनिवर्सिटी इलाके में पुलिस और सीएए के खिलाफ़ प्रदर्शन कर रहे लोगों के बीच हुई झड़प से जुड़ा था. 

20 मई को उनका नाम एफ़आईआर संख्या 59 में जोड़ दिया गया यानी तीन दिन पहले किसी अन्य मामले में गिरफ़्तारी और तीन दिन बाद 59 में शामिल कर लिया गया.  

28 मई को एफ़आईआर 298 में आसिफ़ को सेशन जज गौरव राव ने ज़मानत दे दी लेकिन तब तक वह यूएपीए वाली एफआईआर 59 में भी शामिल किए जा चुके थे.

एफ़आईआर 59 मामले में जब सेशन जज धर्मेंद्र राणा ने आसिफ़ इक़बाल तन्हा की न्यायिक हिरासत 25 जून तक बढ़ाई थी तो उन्होंने कोर्ट में कहा था- ‘’ऐसा लगता है कि जांच एक ही दिशा में की जा रही है. जांच अधिकारी ये ठीक-ठीक नहीं बता पाए हैं कि आखिर क्या जांच की गई है जिससे इनकी संलिप्तता को साबित किया जा सके.’’  आसिफ़ अब भी न्यायिक हिरासत में हैं. 

नताशा नरवाल और देवांगना कलिता


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देवांगना कलिता

देवांगना कलिता

नताशा और देवांगना का नाम इस केस में सबसे आख़िर में जोड़ा गया है. दोनों ही जेएनयू की छात्राएँ हैं और महिलावादी संगठन पिंजरा तोड़ की संस्थापक सदस्यों में शामिल हैं. पिंजरा तोड़ दिल्ली के कॉलेजों की छात्राओं का एक समूह है जो लड़कियों के प्रति सामाजिक गैर-बराबरी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाता है. साल 2015 में इसकी शुरूआत कैंपस में लड़कियों के साथ होने वाले भेदभाव के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने से हुई थी. 

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नताशा नरवाल

नताशा नरवाल

23 मई को देवांगना और नताशा को एफ़आईआर 48 में गिरफ्तार किया गया. उन पर आरोप लगा कि इन्होंने जाफ़राबाद मेट्रो स्टेशन पर हिंसा से एक दिन पहले एंटी सीएए प्रदर्शन का आयोजन किया. 24 मई को ही मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट अजीत नारायण ने इस मामले में उन्हें ज़मानत देते हुए कहा, ‘’अभियुक्त केवल एनआरसी और सीएए के खिलाफ़ प्रदर्शन कर रही थीं और ऐसा करना इस आरोप को साबित नहीं करता कि वे किसी हिंसा में शामिल थीं.’’ 

ठीक इसी दिन उन्हें दूसरे एफ़आईआर 50 में गिरफ्तार कर लिया गया. पुलिस ने अपनी चार्जशीट में कहा है कि दोनों ही लड़कियां दिल्ली दंगों की साज़िश रचने में शामिल हैं. इस मामले में एक व्हाट्सएप मैसेज को आधार बनाया गया है. जिसका शीर्षक है- ‘दंगे के हालात में घर की औरतें क्या करें.’ 

 इसके बाद 29 मई को नताशा नरवाल को एफ़आईआर 59 में गिरफ़्तार कर लिया गया यानी उन पर यूएपीए की धाराएँ लग गईं. 

दूसरी ओर, देवांगना कलिता को 30 मई को दरियागंज में एंटी-सीएए प्रदर्शन से जुड़े हिंसा के एक मामले में गिरफ़्तार कर लिया गया. ये घटना 20 दिसंबर 2019 को हुई थी. इसमें दंगा करने, सरकारी अधिकारी को ड्यूटी करने से रोकने का आरोप उन पर लगाया गया. 

  2 जून को इस मामले में भी मजिस्ट्रेट अभिनव पांडे ने देवांगना को ज़मानत देते हुए कहा, ‘’ऐसा कोई सीधा सबूत नहीं है जिसमें अभियुक्त किसी सरकारी कर्मचारी पर हमला करती नज़र आ रही हों. सीसीटीवी फुटेज भी ये नहीं दिखाता कि अभियुक्त हिंसा में शामिल है. फ़ोन-लैपटॉप से भी कुछ ऐसा भड़काऊ नहीं मिल सका है.‘’ 

 लेकिन इसके बाद 5 जून को स्पेशल सेल ने देवांगना को भी एफ़आईआर 59 में गिरफ़्तार कर लिया और उन पर यूएपीए लगा दिया गया.

इस तरह इन सभी अभियुक्तों की शुरूआती गिरफ्तारी अलग-अलग मामलों में की गई लेकिन अब ये सभी एफ़आईआर 59 का हिस्सा हैं और इन पर यूएपीए की धाराएं लगाई गई हैं.

90 दिनों में दायर नहीं हो सकी चार्जशीट 

15 जून 2020 को सेशन जज धर्मेद्र राणा ने यूएपीए 43D (2) के तहत 14 अगस्त, 2020 तक का समय चार्टशीट दायर करने के लिए दिया. आम तौर पर 90 दिन तक अगर जांच अधिकारी चार्टशीट दायर न कर सके तो अभियुक्त को खुद-ब-खुद ज़मानत मिल जाती है. चूंकि यूएपीए जांच एजेंसी को अतिरिक्त शक्तियां देता है ऐसे में जांच अधिकारी 180 दिन तक का वक्त कोर्ट से मांग सकता है. लेकिन अब इस केस में आरोपपत्र दाखिल करने की समयावधि बढ़ाकर 17 सितंबर, 2020 की जा चुकी है.

संसद में अमित शाह का बयान

दिल्ली पुलिस ने चार्जशीट को लेकर जो आवेदन सेशन कोर्ट में पेश किया है उसकी सबसे पहली पंक्ति कहती है- ‘’वर्तमान केस दिल्ली दंगों के पीछे की बड़ी साज़िश की पड़ताल करने के लिए है. 23 से 25 फरवरी के बीच हुए दिल्ली दंगों की साज़िश जेएनयू के पूर्व छात्र उमर ख़ालिद ने रची. इसमें उनसे जुड़े कई समूह भी शामिल हैं.’’ 

पुलिस का कहना है, ‘’ये एक बड़ी तैयारी के साथ रचा गया षड्यंत्र था. उमर ख़ालिद ने भड़काऊ भाषण दिया और अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की 24-25 फरवरी की भारत यात्रा के दौरान सड़कों और सार्वजनिक जगहों पर लोगों से जुटने को कहा. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रोपैगैंडा फैलाना इसका मकसद था ताकि यह संदेश जाए कि अल्पसंख्यकों को भारत में सताया जा रहा है.’’ 

‘’इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए फायरआर्म्स, पेट्रोल बम, एसिड की बोलतों का इंतज़ाम किया गया.’’

यहां खास बात ये है कि दिल्ली पुलिस उमर ख़ालिद को ‘साजिश का मुखिया’ तो बता रही है लेकिन पुलिस ने अब तक उन्हें गिरफ़्तार नहीं किया है. 

जांच में ये भी दावा किया गया है कि एक साज़िश के तहत दिल्ली में 21 जगहों पर शाहीन बाग़ की तर्ज पर एंटी सीएए प्रदर्शन शुरू किए गए. 

स्पेशल सेल का कहना है कि जांच में कई व्हाट्सएप ग्रुपों का पता चला है जो दंगों की पल-पल की जानकारी दे रहे थे और ये सभी अभियुक्त इन ग्रुपों से जुड़े हुए थे. 

डॉ. ज़ाकिर नाईक की 'भूमिका'


दिल्ली दंगों के तार धर्म प्रचारक ज़ाकिर नाईक से भी जोड़े गए हैं. ज़ाकिर नाईक पर अपने भाषणों से नफ़रत फैलाने और आंतकी गतिविधियों को बढ़ावा देने का आरोप है. वे इस वक़्त मलेशिया में हैं. एनआईए ने मलेशियाई सरकार से उनके प्रत्यर्पण के लिए अपील भी की थी जिसे वहां की सरकार ने ख़ारिज कर दिया.  

दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल का कहना है कि ‘’ख़ालिद सैफ़ी ने इन दंगों के लिए पीएफ़आई से फंड जुटाया. उनके पासपोर्ट की डिटेल के मुताबिक उन्होंने भारत से बाहर यात्रा की और ज़ाकिर नाईक से सपोर्ट/फ़ंड पाने के लिए मुलाकात की. 

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ज़ाकिर नाईक कई वर्षों से मलेशिया में रह रहे हैं

ज़ाकिर नाईक कई वर्षों से मलेशिया में रह रहे हैं

इन गिरफ्तारियों और आरोपों से पहले ही 11 मार्च को लोकसभा में दिल्ली दंगों पर जवाब देते हुए गृह मंत्री अमित शाह ने 'यूनाइडेट अगेंस्ट हेट' के सदस्य उमर ख़ालिद का नाम लिए बिना 17 फरवरी को दिए गए उनके एक भाषण का ज़िक्र किया था. गृह मंत्री ने कहा था कि ''17 फरवरी को ये भाषण दिया गया और कहा गया कि डॉनल्ड ट्रंप के भारत आने पर हम दुनिया को बताएंगे कि हिंदुस्तान की सरकार अपनी आवाम के साथ क्या कर रही है. मैं आप सबसे अपील करता हूं कि देश के हुक़्मरानों के ख़िलाफ़ बाहर निकलिए. इसके बाद 23-24 फ़रवरी को दिल्ली में दंगा हो गया". 

उमर ख़ालिद के 17 फरवरी को महाराष्ट्र के अमरावती में दिए गए एक भाषण का ज़िक्र दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने भी बतौर सबूत किया है. 

दरअसल, उमर ख़ालिद ने अपने भाषण में कहा था, "जब अमरीका के राष्ट्रपति ट्रंप भारत में होंगे तो हमें सड़कों पर उतरना चाहिए. 24 तारीख को ट्रंप आएंगे तो बताएंगे कि हिंदुस्तान की सरकार देश को बांटने की कोशिश कर रही है. महात्मा गांधी के उसूलों की धज्जियां उड़ रही है. ये बताएंगे कि हिंदुस्तान की आवाम हिंदुस्तान के हुक़्मरानों के ख़िलाफ़ लड़ रही है. उस दिन हम तमाम लोग सड़कों पर उतर कर आएंगे".

लोगों से प्रदर्शन करने के लिए कहना संविधान के मुताबिक़ अपराध नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकार है लेकिन हिंसा के लिए भड़काना अपराध की श्रेणी में आता है.

हालांकि सबूत और आरोपों की तस्वीर तब और साफ़ होगी जब इस मामले में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल चार्जशीट दायर करेगी. 

दिल्ली पुलिस की ‘क्रोनोलॉजी’

दिल्ली पुलिस ने इंटेलिजेंस ब्यूरो के अंकित शर्मा की हत्या के मामले में एफ़आईआर- 65  में चार्टशीट पेश की है. चार्जशीट एक ऐसी रिपोर्ट होती है जिसमें जांच कैसे की गई है, जांच में सबूतों के आधार पर क्या बातें सामने आई हैं, इनका विस्तृत लेखा-जोखा होता है. 

लेकिन अंकित शर्मा की हत्या के मामले में पुलिस ने चार्जशीट दाखिल करने से पहले ही दिल्ली दंगों को लेकर एक ‘क्रोनोलॉजी’ (घटनाक्रम की जानकारी) पेश की है. दावा है कि घटनाओं का ये क्रम दिल्ली में दंगे भड़कने की वजह रहा. 

चार्जशीट के शुरुआती पांच पन्ने हत्या की जांच की जानकारी नहीं देते बल्कि दिसंबर महीने से चल रहे एंटी-सीएए प्रदर्शन, सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर के भाषण और दलित नेता चंद्रशेखर आज़ाद के भाषणों को दिल्ली दंगों की नींव बताते हैं. 

 दिल्ली पुलिस का कहना है कि ‘’13 दिसंबर को जामिया यूनिवर्सिटी रोड पर सीएए-एनआरसी के खिलाफ़ हुए प्रदर्शन से ही दिल्ली दंगों की नींव पड़ी. 2000 लोग बिना अनुमति जामिया मेट्रो स्टेशन के पास जुटे और संसद, राष्ट्रपति भवन की ओर बढ़ने लगे. शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए जामिया के एक नंबर गेट से पुलिस ने प्रदर्शन कर रहे लोगों को पीछे की ओर खदेड़ा तो प्रदर्शनकारी पुलिस पर पत्थर फेंकने लगे और सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया.’’ 

15 दिसंबर को दिल्ली पुलिस और जामिया छात्रों के बीच हुई झड़प को भी पुलिस ने क्रोनोलॉजी का हिस्सा बताया है. हालांकि पुलिस की रिपोर्ट में इस घटना को 16 फरवरी की तारीख़ के साथ दर्ज किया गया है. 

पुलिस के मुताबिक़, ’शाम 5.30 बजे से 6 बजे के बीच जामिया के कुछ छात्र, कुछ पूर्व छात्र, स्थानीय लोगों ने जामिया और न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी के कई रास्तों पर प्रदर्शन के दौरान बसों को आग लगाई. जब पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को खदेड़ा तो वे एक योजना के तहत जामिया कैंपस में घुस गए और पुलिस पर कैंपस के अंदर से पत्थरबाज़ी की, ट्यूब लाइट्स से हमला किया, भड़काऊ नारे लगाए. हालात को काबू करने के लिए पुलिस को जामिया कैंपस में घुसना पड़ा और 52 लोगों को दिल्ली पुलिस एक्ट के तहत कुछ वक़्त के लिए हिरासत में लिया गया.’ 

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जामिया मिल्लिया इस्लामिया की लाइब्रेरी में छात्रों पर डंडे चलाती दिल्ली पुलिस

जामिया मिल्लिया इस्लामिया की लाइब्रेरी में छात्रों पर डंडे चलाती दिल्ली पुलिस

इसमें पुलिस ने उस बल प्रयोग का ज़िक्र नहीं किया है जो 15 दिसंबर को उन्होंने जामिया की ज़ाकिर हुसैन लाइब्रेरी में छात्रों पर किया था. 15 फ़रवरी को पुलिस की इस कार्रवाई का वीडियो भी सामने आया था जिसमें पुलिस लाइब्रेरी में पढ़ रहे छात्रों को पीटती हुई दिख रही है. 

इस रिपोर्ट में पूर्व आईएएस और जाने-माने समाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर के एक बयान का जिक्र भी भड़काऊ भाषण के तौर पर किया गया है. 

पुलिस अपनी रिपोर्ट में कहती है, ‘’हर्ष मंदर 16 दिसंबर को जामिया के गेट नंबर 7 पर पहुंचे, यहां उन्होंने प्रदर्शनकारियों से सुप्रीम कोर्ट में यक़ीन न रखने की सलाह दी और कहा कि अपनी लड़ाई सड़कों पर उतरकर लड़ना होगा.‘’ 

पुलिस का कहना है कि हर्ष मंदर ने लोगों को भड़काने का काम किया है और बतौर सबूत पुलिस ने उनके 16 दिसंबर, 2019 के भाषण के छोटे हिस्से का ज़िक्र किया है. लेकिन उनके पूरे भाषण में गांधी के सिद्धांतों, आपसी प्रेम और शांति की बातें कही गई थीं जिनका पुलिस ने ज़िक्र नहीं किया है. 

दरअसल, दिल्ली पुलिस के लाठीचार्ज के ठीक एक दिन बाद हर्ष मंदर जामिया के गेट नंबर 7 पर छात्रों से बात करने पहुंचे. 

यहां उन्होंने भाषण देते हुए कई और बातों के अलावा कहा था, ‘’एक नारा उठाऊंगा कि लड़ाई किसके लिए है और किस लिए है? यह लड़ाई हमारे देश के लिए है, फिर हमारे संविधान के लिए है.'' उन्होंने अपने भाषण में सरकार की आलोचना की, सीएए को गलत बताया. इस भाषण में अदालतों के रवैए पर भी टिप्पणी की.

इस भाषण का अंत उन्होंने इस तरह किया--

 ‘’संविधान ज़िंदाबाद, मोहब्बत जिंदाबाद.‘’  

 ये साढ़े सात मिनट का पूरा भाषण यूट्यूब पर मौजूद है जिसे आप यहां सुन सकते हैं.

जामिया के गेट नंबर 7 पर दिया गया सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर का भाषण जिसे पुलिस ने भड़काऊ बताया है

शाहीन बाग में महिलाओं के सीएए-एनआरसी के ख़िलाफ़ 101 दिन चले प्रदर्शन को भी दिल्ली पुलिस दंगों की ‘क्रोनोल़ॉजी’ का हिस्सा मानती है.

इसके बाद पुलिस की ‘क्रोनोल़ॉजी’  22 फरवरी को जाफ़राबाद मेट्रो स्टेशन के पास हज़ारों की संख्या में जुटे प्रदर्शनकारियों पर आ जाती है. पुलिस का कहना है कि  ‘’66 फ़ुटा रोड पर चंद्रशेखर आज़ाद के भारत बंद आह्वान पर भीड़ जुटी और सरकार के खिलाफ़ नारेबाज़ी की गई. सड़कों पर भीड़ से लोगों की आवाजाही रोक दी गई. ‘’

लेकिन इसके बाद पुलिस की रिपोर्ट सीधे 23 फ़रवरी की शाम को जाफ़राबाद-मौजपुर सीमा पर हुई हिंसा पर चली जाती है.

जबकि इसी दिन बीजेपी नेता कपिल मिश्रा के उस बयान का कहीं कोई ज़िक्र नहीं किया गया है जिसमें उन्होंने सीएए के खिलाफ़ प्रदर्शन कर रहे लोगों को तीन दिन का अल्टीमेटम पुलिस की मौजूदगी में दिया था.

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बीजेपी नेता कपिल मिश्रा सीएए-एनआरसी विरोधी प्रदर्शनकारियों को अल्टीमेटम देते हुए

बीजेपी नेता कपिल मिश्रा सीएए-एनआरसी विरोधी प्रदर्शनकारियों को अल्टीमेटम देते हुए

मौजपुर में कपिल मिश्रा सीएए के समर्थन में हो रही रैली में पहुंचे. उन्होंने एक पुलिस के एक डिप्टी कमिश्नर की मौजूदगी में कहा था--

‘डीसीपी साहब हमारे सामने खड़े हैं, मैं आप सबके बिहाफ़ (की ओर से) पर कह रहा हूं, ट्रंप के जाने तक तो हम शांति से जा रहे हैं लेकिन उसके बाद हम आपकी भी नहीं सुनेंगे, अगर रास्ते खाली नहीं हुए तो. ट्रंप के जाने तक आप (पुलिस) जाफ़राबाद और चांदबाग खाली करवा लीजिए ऐसी आपसे विनती है वरना उसके बाद हमें रोड पर आना पड़ेगा.'   

इसी शाम को सीएए के खिलाफ़ और समर्थन में प्रदर्शन कर रहे लोगों के बीच हिंसा शुरू हुई लेकिन पुलिस ने 13 दिसंबर से शुरू हुई ‘’क्रोनोल़ॉजी’’ में 23 फ़रवरी के कपिल मिश्रा के बयान को पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया.

एक याचिका के जवाब में दिल्ली पुलिस ने हाईकोर्ट में कहा कि उन्हें ‘’जांच के दौरान ऐसे कोई सबूत नहीं मिले हैं जो इस ओर इशारा करते हों कि इस भाषण से दिल्ली में दंगे हुए.‘’

दिल्ली पुलिस की रिपोर्ट कहती है, ‘’23 फ़रवरी 3 बजे हमें जानकारी मिली कि मौजपुर में जाफ़राबाद मेट्रो स्टेशन वाले रास्ते को खाली कराने की मांग को लेकर हज़ारों की संख्या में लोग जुटे हैं और दोनों ही ओर से पत्थरबाज़ी की जा रही है.’’

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दिल्ली दंगे में पत्थरबाज़ी और आगज़नी की कई घटनाएँ हुईं

दिल्ली दंगे में पत्थरबाज़ी और आगज़नी की कई घटनाएँ हुईं

लेकिन इस दौरान दिया गया कपिल मिश्रा का भाषण पुलिस के रिकॉर्ड में दर्ज ही नहीं किया गया है.

ट्रंप का भारत दौरा और दिल्ली पुलिस के तर्क

दिल्ली पुलिस के मुताबिक़, ‘’ये दंगे तब किए गए जब अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप दो दिन की भारत यात्रा पर थे. ये संयोग नहीं था बल्कि देश की छवि को अंतराष्ट्रीय स्तर पर ख़राब करने की सोची-समझी साज़िश थी. मुस्लिम समुदाय के एक समूह को ये पता था कि ट्रंप की यात्रा के दौरान पूरा सिस्टम तैयारियों में व्यस्त होगा इसलिए दंगों के वक़्त को देखकर ये साफ़ पता चलता है कि इसके पीछे बड़ा षड्यंत्र रचा गया था.‘’

पुलिस का दावा है, ‘’जांच में सामने आया है कि ताहिर हुसैन ख़ालिद सैफ़ी के संपर्क में थे जो 'यूनाइटेड अगेंस्ट हेट' का हिस्सा हैं और उमर ख़ालिद इसके संस्थापक सदस्य हैं. खालिद सैफ़ी ने 8 जनवरी को ताहिर हुसैन और उमर ख़ालिद की मुलाक़ात शाहीन बाग में कराई. इस मुलाकात में सीएए-एनआरसी को लेकर 'बड़े धमाके' की तैयारी की गई ताकि केंद्र सरकार को झटका दिया जा सके और देश की छवि को वैश्विक स्तर पर नुकसान पहुंचाया जा सके.

उमर ख़ालिद ने इस बात का आश्वासन ताहिर हुसैन को दिया कि फ़ंड की चिंता ना करें, पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया इस दंगे के लिए फंड और ज़रूरी चीज़ों का इंतज़ाम करेगा. दंगों का वक़्त डॉनल्ड ट्रंप की भारत यात्रा से पहले या उसके दौरान तय किया गया.’’

सवाल

डॉनल्ड ट्रंप के संभावित दौरे को लेकर सबसे पहली रिपोर्ट 'द हिंदू' की पत्रकार सुहासिनी हैदर ने 14 जनवरी को दी थी. 

ट्रंप के दौरे को लेकर इससे पहले कोई ख़बर मीडिया में नहीं थी. दिल्ली पुलिस के मुताबिक़ ‘’उमर ख़ालिद-ताहिर हुसैन- ख़ालिद सैफ़ी ने 8 जनवरी को ही ये तय कर लिया था कि ट्रंप के भारत दौरे के समय दंगे भड़काए जाएँगे और बड़ा धमाका किया जाएगा".  जब ट्रंप के दौरे को लेकर खबर ही 14 जनवरी यानी 6 दिन बाद आई तो ये कैसे संभव है कि उन्हें इस दौरे की जानकारी पहले से थी. 11 फरवरी को सरकार और व्हाइट हाउस ने इस दौरे के बारे में पहला आधिकारिक बयान जारी किया था.

केरल की संस्था पीएफ़आई का गठन साल 2006 में हुआ. ये संस्था ख़ुद को सामाजिक कार्य करने वाली बताती है, खास तौर पर यह मुसलमानों के अधिकारों के लिए काम करने की बात कहती है. पीएफ़आई पर केरल में कई राजनैतिक हत्याओं और आंतकवादी गतिविधियों से जुड़े होने के आरोप लग चुके हैं. भाजपा सरकार से कई बार इस संस्था को बैन करने की आवाज़ें उठती तो रही हैं लेकिन पीएफ़आई पर अब तक बैन नहीं लग सका है.

फ़ाइनल रिपोर्ट में पुलिस किसी ठोस सबूत का ज़िक्र नहीं करती जो इस रिपोर्ट में किए गए दावों को साबित कर सकें.

FIR 60- शाहीन बाग में लंगर लगाने वाले बिंद्रा ‘षड्यंत्रकारी’

दिल्ली पुलिस ने  हेड कॉन्स्टेबल रतनलाल की हत्या की एफ़आईआर 60  में 17 लोगों की गिरफ़्तारी की है. इस केस की चार्जशीट में पुलिस ने शाहीन बाग, चांद बाग में एंटी सीएए प्रदर्शनकारियों के लिए लंगर लगाने वाले वकील डीएस बिंद्रा को दंगों का मुख्य षड्यंत्रकारी बताया है. पुलिस ने इसमें समाजिक कार्यकर्ता और स्वराज इंडिया के प्रमुख योगेंद्र यादव, दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्र नेता कंवलप्रीत कौर, जामिया कॉर्डिनेशन कमेटी की सदस्य सफ़ूरा ज़रगर, पिंजरा तोड़ की सदस्य देवांगना कलिता और नताशा  नरवाल, जामिया के छात्र मीरान हैदर का नाम भी चार्जशीट में शामिल किया है.

शाहीन बाग में लंगर लगाने वाले सिख वकील पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं

अभी इन लोगों को अभियुक्त नहीं बनाया गया है, केवल इनका ज़िक्र किया गया है. इस केस में ‘’और जांच के बाद‘’ एक सप्लीमेंट्री चार्जशीट पुलिस दायर करेगी.

दरअसल, 24 फ़रवरी को 42 साल के रतनलाल की तैनाती चांद बाग इलाके में थी जहां हिंसा भड़की. दंगाइयों ने उन पर हमला बोल दिया. घायल अवस्था में उन्हें अस्पताल लाया गया जहां उनकी मौत हो गई. इस हिंसा में डीसीपी अमित कुमार शर्मा, एसीपी अनुज कुमार भी गंभीर रूप से ज़ख़्मी हुए थे. कॉन्स्टेबल रतनलाल दिल्ली दंगों में जान गंवाने वाले शुरूआती लोगों में शामिल थे.

चार्जशीट 60- गवाहों के बयान

164 सीआरपीसी के तहत तीन चश्मदीद गवाहों के बयानों को चार्जशीट में दर्ज किया गया है- नजम अल हसन, तौक़ीर और सलमान उर्फ गुड्डू. इन तीन बयानों को पढ़ने पर पता चलता है कि इन सभी ने कुछ बातें एक जैसी कही हैं. मसलन-

नजम : "डीएच बिंद्रा ने बात शुरू की कि NRC, CAA  के खिलाफ़ आपको प्रदर्शन करना है. मैं लंगर और मेडिकल कैंप लगाऊंगा, पूरी सिख कौम आपके साथ है. अगर आप अभी नहीं उठेंगे तो वही हाल होगा जो 1984 में हमारा हुआ था".

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पुलिस रिकॉर्ड में नजम का बयान

पुलिस रिकॉर्ड में नजम का बयान

प्रदर्शन शुरु हो गया इसमें बाहर से लोग लाए जाते थे, जिनमें एडवोकेट भानु प्रताप, एडवोकेट डीएच बिंद्रा, योगेंद्र यादव तथा जेएनयू, जामिया और डीयू के छात्र आते थे जो सरकार और NRC के खिलाफ़ बोला करते थे.

तौकीरः जनवरी 2020 में चांद बाग के सर्विस रोड पर डीएस बिंद्रा के लंगर में सीएए और एनआरसी का विरोध प्रदर्शन शुरू हुआ. वहां जो भाषण होते उसमें डीएस बिंद्रा अक्सर 1984 के दंगे की याद दिलाते हुए कहा करते थे कि यह सरकार सीएए-एनआरसी लागू करके मुस्लिम, दलितों को सिखों की तरह प्रताड़ित करना चाहती है.

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तौकीर का बयान

तौकीर का बयान

वहां जो भाषण देते थे वे स्टूडेंट जामिया, जेएनयू और डीयू के होते थे जो प्रोटेस्ट करने के बारे में बताते थे.

सलमान उर्फ़ गुड्डूः डीएस बिंद्रा ने कहा था सीएए-एनआरसी मुस्लिम समुदाय के खिलाफ़ है. जैसा 1984 में सिखों के साथ हुआ था वैसा ही हाल करेंगे.

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सलमान उर्फ़ गुड्डू का बयान

सलमान उर्फ़ गुड्डू का बयान

जामिया-जेएनयू से लड़के-लड़कियां आते थे और स्टेज पर आकर भाषण देते थे और यह प्रोटेस्ट ऐसे ही चलता रहा.

ये बातें तीन अलग-अलग लोगो के बयानों में लगभग एक ही तरह से कही गई है.

इन बयान को ‘एनालाइज़’ करके दिल्ली पुलिस कहती है, ‘’सलीम खान, सलीम मुन्ना, डीएस बिंद्रा, सलमान सिद्दिकी, डॉ. रिज़वान, अतहर, शादाब, रवीश, उपासना तबस्सुम इस प्रदर्शन के आयोजक थे और लोगों को दंगे के लिए भड़काने में शामिल थे.‘’

लेकिन दिल्ली पुलिस ने ऐसे ‘भड़काऊ भाषणों’ का कोई भी इलेक्ट्रॉनिक सबूत पेश नहीं किया है.

आख़िर किसने कॉन्स्टेबल रतनलाल को मारा?

रतनलाल की हत्या के मामले में जिन 17 लोगों की गिरफ़्तारी पुलिस ने की है इन्हें सीसीटीवी वीडियो फ़ुटेज के आधार पर अभियुक्त बनाया गया है. पुलिस के मुताबिक इनके हाथ में, डंडे, रॉड और पत्थर थे.

रतनलाल की मौत हो गई जबकि दो और वरिष्ठ पुलिस अधिकारी गंभीर रूप से घायल हो गए थे

लेकिन यहां खास बात ये है कि हेड कॉन्स्टेबल रतनलाल की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के मुताबिक उनके शरीर पर 21 घाव थे. उनकी मौत अत्यधिक खून बहने से हुई और ये उनके फेफड़े में ‘राइफल्ड फायरआर्म’ के घाव के कारण हुआ था.

लेकिन पुलिस के सीसीटीवी फुटेज के विवरण के मुताबिक इनमें से किसी के भी हाथ में राइफ़ल-रिवाल्वर जैसे फायरआर्म्स नहीं थे. साथ ही पुलिस पूरी चार्जशीट में कहीं भी ये नहीं बताती कि इन 17 लोगों में से किसने और कैसे कॉन्स्टेबल रतनलाल की हत्या की है?

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आगजनी के लिए बड़े पैमाने पर पेट्रोल बमों का इस्तेमाल किया गया

आगजनी के लिए बड़े पैमाने पर पेट्रोल बमों का इस्तेमाल किया गया

अंकित शर्मा की हत्या, ताहिर हुसैन और पुलिस के सबूत

ताहिर हुसैन पर दिल्ली दंगों से जुड़े कुल 11 केस चल रहे हैं. एफ़आईआर 65 –अंकित शर्मा मर्डर, एफ़आईआर 101- चांद बाग हिंसा में अहम भूमिका, एफ़आईआर 59- दिल्ली दंगों के पीछे गहरी साज़िश. ये तीन सबसे महत्वपूर्ण मामले हैं. एफ़आईआर 101 और 65 दोनों ही मामले काफ़ी मिलते-जुलते हैं. 

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पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन पुलिस हिरासत में

पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन पुलिस हिरासत में

अंकित शर्मा के पिता रविंदर कुमार की एफ़आईआर के मुताबिक़ 25 फ़रवरी को शाम 5 बजे अंकित घर का सामान लेने बाहर गए लेकिन जब वह काफ़ी देर तक नहीं लौटे तो उनके घर वालों ने उनकी तलाश शुरू की. पता चला कि वे पास ही रहने वाले कालू के साथ बाहर गए हैं. कालू से जब अंकित के परिवार ने पूछा तो पता चला कि चांद बाग की मस्जिद से किसी लड़के को मारकर नाले में फेंका गया है. जब रविंदर कुमार ने दयालपुर थाने को सूचित किया तो गोताखोरो की मदद से एक लाश निकाली गई और उसकी पहचान अंकित के रूप में हुई.

पैराग्राफ़ 38 में पुलिस कुछ चश्मदीदों से पूछताछ के आधार पर कहती है, ‘’25 फ़रवरी को हिंदुओं की एक भीड़ ताहिर हुसैन के मकान E-7, ख़जूरी ख़ास से कुछ दूरी पर खड़ी थी. मकान के पास 20-25 की संख्या में दंगाई खड़े थे जिन्होंने हाथों में डंडे, चाकू और हथियार ले रखे थे. अंकित भीड़ से निकलकर दोनों ओर से लोगों को शांत कराने के इरादे से सामने आए, लेकिन ताहिर हुसैन के भड़कावे में आकर भीड़ ने अंकित को पकड़ लिया और चांद बाग पुलिया के सामने ‘बनी बेकर केक’ शॉप ई-17, नाला रोड, खजूरी ख़ास ले गए. उन पर यहां धारदार हथियार से हमला कर उनकी हत्या की गई  और लाश को नाले में फेंक दिया गया.‘’

सात चश्मदीदों के आधार पर पुलिस ने इस घटना का ये ब्यौरा पेश किया है. इनमें कालू नाम के उस शख़्स का बयान भी दर्ज है जो अंकित के घर के पास रहता है और अंकित के साथ घटना से ठीक पहले भी था.

हालांकि अंकित के पिता रविंदर कुमार ने पुलिस से की गई शिकायत में कहा था कि उन्हें भीड़ ने बताया कि चांद बाग की मस्जिद से किसी को मारकर फेंका गया. लेकिन पुलिस की तफ़्तीश में ये नहीं बताया गया है कि क्या उसने अंकित के पिता के, मस्जिद में अंकित को मारे जाने वाले दावे की पड़ताल की या नहीं. अगर हां तो वहां पुलिस को क्या मिला?  आम तौर पर पहले पुलिस शिकायतकर्ता के दावों की पड़ताल करती है.

पुलिस ने अपनी जांच में ये भी कहा है कि इस इलाके के सीसीटीवी कैमरे या तो काम नहीं कर रहे थे या हिंसा के वक्त उन्हें तोड़ दिया गया था.

12 मार्च के इस मामले में पुलिस ने 20 साल के हसीन नाम के शख़्स को गिरफ्तार किया. पुलिस  ने अपनी जांच में पाया कि उसने फ़ोन पर बातचीत के दौरान ये कबूल किया था कि उसने किसी को मारकर नाले में फेंका है. रिपोर्ट के पैराग्राफ़ 48 के मुताबिक़ उसने पूछताछ में ये कबूल किया है कि उसने हत्या अकेले की है.

लेकिन इस केस में विकल्प कोचर नाम के एक चश्मदीद ने पुलिस को दिए बयान में कहा है कि इलाके के पार्षद ताहिर हुसैन अंकित शर्मा की हत्या के वक़्त मौजूद थे और लोगों को हत्या के लिए उकसाया जिसके बाद हसीन के साथ मिलकर अनस, जावेद,शोएब आलम, गुलफ़ाम और फिरोज़ ने अंकित शर्मा की हत्या की.

ताहिर हुसैन के दंगे और अंकित शर्मा की हत्या में शामिल होने को लेकर पुलिस दो बातें मुख्य तौर पर कह रही है-

1. ताहिर हुसैन के मकान ई-7, खजूरी ख़ास, मेन करावल नगर में फॉरेंसिंक की टीम को पत्थर-ईंट के टुकड़े, टूटी हुई बोतलें, बोतलों में तेज़ाब और पेट्रोल बम मिले. ताहिर हुसैन के मकान की छत से दंगाइयों ने तेज़ाब भरी बोतल, पेट्रोल बम और पत्थर फेंके. इस मकान की पहली मंज़िल पर उनका दफ़्तर था. इस मकान की छत को लॉन्चिंग पैड की तरह इस्तेमाल किया गया और ताहिर हुसैन के घर को कोई नुकसान नहीं पहुंचा.

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ताहिर हुसैन के घर के छत से बरामद बोतलें

ताहिर हुसैन के घर के छत से बरामद बोतलें

2. ताहिर हुसैन ने 7 जनवरी को अपनी लाइसेंसी पिस्तौल खजूरी खास थाने में जमा की थी, 22 फरवरी यानी हिंसा शुरू होने के एक दिन पहले उन्हेंने खजूूरी खास थाने से अपनी पिस्तौल निकलवाई थी. पिस्तौल उन्होंने क्यों निकलवाई इसका संतोषजनक जवाब ताहिर की तरफ़ से नहीं मिला. इस पिस्तौल की 100 कारतूसों में से 22 इस्तेमाल की गईं और 14 का पता नहीं है.

अंकित शर्मा की पोस्टमार्टम रिपोर्ट कहती है कि उनके शरीर पर घाव के 51 निशान थे जो चाकू, डंडे या धारदार हथियारों से किए गए थे. अंकित के शरीर पर गोलियों का कोई निशान नहीं मिला.

अपनी इसी जांच पैराग्राफ 54 में पुलिस ताहिर हुसैन के कॉल डेटा के आधार पर कहती है कि उन्होंने 24 फरवरी से 25 फरवरी के बीच कई बार दिल्ली पुलिस की पीसीआर वैन को कॉल किया था.  24 फरवरी को दोपहर 2.50 बजे से शाम 6 बजे के बीच 6 बार पीसीआर को फोन किया गया और 25 फरवरी को 3.50 से 4.35 के बीच भी 6 बार पीसीआर को ताहिर हुसैन के नंबर से कॉल किया गया.  

24 फ़रवरी को की गई छह कॉल में से चार कॉल ही पीसीआर में लग सकीं. जिनमें से तीन कॉल को दयालपुर पुलिस स्टेशन से कनेक्ट किया गया.

इमरजेंसी ऑफिसर का कहना है कि घटनास्थल पर भारी भीड़ जमा थी और पुलिस बल संख्या में कम थी इसलिए वे ताहिर हुसैन की इमरजेंसी कॉल पर नहीं पहुंच सके. जब काफ़ी देर रात पुलिस ताहिर हुसैन के मकान पर पहुंची तो देखा कि अगल-बगल की दुकानों में आग लगी है और ताहिर हुसैन का घर बचा हुआ है. अपने मकान के सामने ताहिर हुसैन खड़े मिले. पुलिस आगे कहती है कि ''इसे देखकर लगता है कि ताहिर हुसैन दंगाइयों के साथ मौजूद थे और उन्होंने जान-बूझकर पीसीआर को फोन किया ताकि वो कानून से बच जाएं''

2 अगस्त को दिल्ली पुलिस की पूछताछ रिपोर्ट के आधार पर कुछ मीडिया रिपोर्ट्स सामने आईं जिनमें कहा गया कि ‘सरकारी क़बूलनामे में ताहिर हुसैन ने यह बात मानी है कि उनके एक सहयोगी ख़ालिद सैफ़ी और पीएफ़आई ने भी इस हिंसा को अंजाम देने में उनकी मदद की.'

इस दावे में कुछ भी नया नहीं है. दिल्ली पुलिस ने जून महीने में एफ़आईआर 101 में ये साफ़ लिखा है कि ताहिर हुसैन ने दंगों में अपनी भूमिका स्वीकारी है.

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एफ़आईआर 101 का पैराग्राफ़ 37

एफ़आईआर 101 का पैराग्राफ़ 37

हालाँकि ये बयान मजिस्ट्रेट की उपस्थिति में नहीं दिया गया है इसलिए ताहिर हुसैन के इस कबूलनामे को अदालत में अस्वीकार्य माना जा सकता है.

भीमा कोरेगांव

भीमा कोरेगांव का इतिहास

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भीमा-कोरेगांव वो जगह है जहाँ एक जनवरी 1818 को मराठा और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच ऐतिहासिक युद्ध हुआ था.

इस युद्ध में महार समुदाय ने पेशवाओं के खिलाफ अंग्रेजों की ओर से लड़ाई लड़ी थी. अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कंपनी ने महार रेजिमेंट की बदौलत ही पेशवा की सेना को हराया था.

महारों की इस विजय की याद में ही यहां ‘विजय स्तंभ’ की स्थापना की गई है, जहां हर साल एक जनवरी को दलित समुदाय के लोग, युद्ध में मारे गए लोगों को श्रद्धांजलि देने और अपने पूर्वजों के शौर्य को याद करने के लिए जुटते हैं.

इस स्तम्भ पर 1818 के युद्ध में मारे गए महार योद्धाओं के नाम अंकित हैं.

पुणे के भीमा कोरेगांव में हुई हिंसा का घटनाक्रम

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पुलिस ने भीमा कोरेगांव की हिंसा के मामले में दो चार्जशीट दाखिल की है क्योंकि गिरफ़तारियाँ दो अलग-अलग समय पर हुई थीं. पुलिस का कहना है कि उसने गिरफ़्तार लोगों से बरामद हुई हार्डडिस्क, पेन ड्राइव, मेमोरी कार्ड और मोबाइल फोन से मिली जानकारियों के आधार पर चार्जशीट बनाई है.

किसकी क्या भूमिका थी? पुलिस की चार्जशीट क्या कहती है?

सुधीर धावले, रोना विल्सन, सुरेंद्र गाडलिंग, शोमा सेन और महेश राउत की गिरफ़्तारी के मामले में फाइल की गई चार्जशीट कहती है-

'कबीर कला मंच' के सक्रिय सदस्य सुधीर धावले से प्रतिबंधित संगठन सीपीआई माओवादी ने कई बार अपने सदस्यों रोना विल्सन और सुरेंद्र गाडलिंग के ज़रिए संपर्क किया था. सीपीआई माओवादी ने उन्हें 'कबीर कला मंच' के बैनर तले एक कार्यक्रम का आयोजन करने के लिए कहा था.पुलिस के मुताबिक, इस कार्यक्रम का उद्देश्य भीमा कोरेगांव की लड़ाई की 200वीं वर्षगांठ के मौके पर दलित संगठनों को एकजुट करके सरकार के खिलाफ़ जनता के गुस्से को भड़काना था.

पुलिस के अनुसार, रोना विल्सन और सुधीर धावले ने फरार भूमिगत कार्यकर्ताओं कॉमरेड एम उर्फ़ मिलिंद तेलतुंबड़े और प्रकाश उर्फ़ रितुपर्ण गोस्वामी के साथ मिलकर एक आपराधिक साज़िश रची. साज़िश के तहत 'भीमा कोरेगांव शौर्यदिन प्रेरणा अभियान' के बैनर तले 1 जनवरी 2018 को सुधीर धावले और हर्षाली पोतदार ने 'कबीर कला मंच' के अन्य सदस्यों के साथ मिलकर सरकार के खिलाफ़ भीड़ जुटाई. पुलिस का कहना है कि उन्होंने 31 दिसंबर को एल्गार परिषद के तहत भड़काऊ नारे लगाए, गाने गाए और नुक्कड़ नाटक किए. पुलिस का आरोप है कि इसकी वजह से कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ी जिसने हिंसा का रूप ले लिया.

पुलिस का कहना है कि उसे पता चला कि धावले, गाडलिंग, विल्सन, राउत और सेन ने प्रतिबंधित संगठन सीपीआई माओवादी के निर्देश पर ही 'भीमा कोरेगांव शौर्य दिन प्रेरणा अभियान' और 'एल्गार परिषद' का आयोजन किया. पुलिस का दावा है कि उन्हें छापे के दौरान जो पत्राचार बरामद हुआ है उसमें लिखा गया है कि देश में बीजेपी-आरएसएस की ब्राह्मवादी नीतियों की वजह से दलित नाखुश हैं और उनकी असुरक्षा की इस भावना का इस्तेमाल लोगों को संगठित करने में किया जा जाना चाहिए. इस योजना को कार्यरूप देने के लिए प्रतिबंधित पार्टी ने सुरेंद्र गाडलिंग और शोमा सेन के ज़रिए पैसे उपलब्ध कराए. सीपीआई माओवादी की कमेटी के एक वरिष्ठ सदस्य ने जुलाई-अगस्त 2017 में धावले को पैसे उपलब्ध कराए.

पुलिस का आरोप है कि 'एल्गार परिषद' के आयोजन का मुख्य उद्देश्य सीपीआई माओवादी की योजना को पूरा करना था जिसका निर्णय ईस्टर्न रिजनल ब्यूरो (ईआरबी) की बैठक में लिया गया था. इस काम में फरार अभियुक्तों कॉमरेड मंगलू और कॉमरेड दीपू ने धावले के साथ नवंबर-दिसंबर 20017 के बीच तालमेल किया और महाराष्ट्र के कई दलित संगठनों का समर्थन हासिल किया.

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भीमा कोरेगांव में पहली जनवरी 2018 को दलित बहुत बड़ी संख्या में जुटे थे

भीमा कोरेगांव में पहली जनवरी 2018 को दलित बहुत बड़ी संख्या में जुटे थे

पुलिस का कहना है कि उसके पास इस बात के सबूत हैं कि महेश राउत के ज़रिए धावले, गाडलिंग और सेन को पाँच लाख रुपए दिए गए. पुलिस के मुताबिक ये पैसे राउत को प्रतिबंधित पार्टी सीपीआई माओवादी ने दिए थे. यह भी आरोप है कि महेश राउत ने टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज़ के दो छात्रों को छापामार लड़ाई की ट्रेनिंग के लिए जंगल में भेजा. पुलिस का कहना है कि ये बात उस चिट्ठी से साबित होती है जो रितुपर्ण गोस्वामी ने शोमा सेन को लिखी थी. पुलिस का दावा है कि महेश राउत सीपीआई माओवादी के सक्रिय सदस्य हैं और उनका काम नए लोगों को भर्ती करना है. राउत पर इन कामों के लिए पैसे जुटाने का भी आरोप है.

पुलिस का दावा है कि रोना विल्सन और गाडलिंग से बरामद किए गए कंप्यूटरों में सीपीआई माओवादी की इस्टर्न रिजनल ब्यूरो की मीटिंग का ब्योरा मिला है. यह बैठक दिसंबर 2015 में हुई बताई जाती है. पुलिस के मुताबिक इस बैठक में तय किया गया था कि दलितों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं को एकजुट किया जाए. पुलिस का कहना है कि रोना विल्सन और मिलिंद तेलतुंबडे के पत्राचार में भी यह बात सामने आई है.

पुलिस को एक पर्चा मिला है जिसका शीर्षक  है—वर्तमान चुनौतियां और हमारे काम. यह पर्चा सीपीआई माओवादी ने अपने सभी सदस्यों को भेजा था जो रोना विल्सन के कंप्यूटर से मिला है.  पुलिस का कहना है कि इस पर्चे के पेज नंबर 16 पर लिखा है कि गतिविधियाँ (आतंकवादी) भविष्य में जारी रहेंगी. इन्हीं सब उद्देश्यों को पूरा करने के लिए पुलिस के मुताबिक 'इल्गार परिषद' का आयोजन किया गया था.

रोना विल्सन पर पुलिस ने प्रतिबंधित पार्टी के सदस्य और ईआरबी के सचिव किशनदा उर्फ़ प्रशांत बोस के साथ मिलकर प्रधानमंत्री की हत्या करने और देश के खिलाफ़ युद्ध छेड़ने की साज़िश रचने का आरोप लगाया है.

पुलिस का निष्कर्ष है कि अभियुक्तों ने सीपीआई माओवादी की बड़ी साजिश को पूरा करने की कोशिश की जिसका मकसद भारत की संवैधानिक लोकतांत्रिक प्रणाली को उलटना था.

पूरक चार्जशीट

यह चार्जशीट वरवर राव, सुधा भारद्वाज, वरनॉन गोंज़ाल्विस और अरूण फरेरा की गिरफ़्तारी के बाद दायर की गई.

पुलिस का आरोप है कि वरवर राव ने रोना विल्सन और फरार अभियुक्त किशनदा उर्फ़ प्रशांत बोस के साथ मिलकर हथियार और गोला-बारूद खरीदने की साज़िश रची.

पुलिस के मुताबिक वरवर राव सीपीआई माओवादी के वरिष्ठ नेता हैं, पुलिस का कहना है कि राव प्रतिबंधित संगठन के नेताओं के संपर्क में थे. इसके अलावा पुलिस के अनुसार वरवर राव नेपाल के माओवादी नेता वसंत के साथ हथियारों का सौदा कर रहे थे. राव पर पैसे जुटाने और दूसरे अभियुक्तों तक पहुंचाने का आरोप भी लगाया गया है.  

पुलिस का कहना है कि वरवर राव और गाडलिंग अपने फरार भूमिगत साथियों को पुलिस और सुरक्षा बलों की आवाजाही के बारे में सूचनाएं देते थे जिसकी वजह से कई हिंसक हमले हुए और कई जानें गईं.

पुलिस के मुताबिक वरनॉन गोंजाल्विस, अरूण फ़रेरा और सुधा भारद्वाज भी सीपीआई माओवादी के सदस्य हैं. और अपने साथ युवाओं को जोड़ते रहे हैं और प्रतिबंधित संगठन की विचारधारा का प्रचार करते हैं.

गोंजाल्विस को पहले भी आर्म्स एक्ट और एक्सप्लोसिव्स एक्ट के तहत गिरफ्तार किया गया है, उनके खिलाफ़ मुंबई के काला चौकी पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज किया गया था और एक मामले में वे सज़ा भी काट चुके हैं. पुलिस का कहना है कि गोंजाल्विस अब भी सक्रिय माओवादी कार्यकर्ता हैं.

पुलिस का आरोप है कि एसोसिएशन ऑफ पीपुल्स लायर्स (आइएपीएल) सीपीआई माओवादी का ही संगठन है. सुधा भारद्वाज और गाडलिंग इस संगठन के सदस्य हैं और सीपीआई माओवादी उन्हें आर्थिक मदद देता है.

चार्जशीट में कहा गया है कि वरवर राव रिवॉल्यूशनरी डेमोक्रेटिक फ्रंट (आरडीएफ़) के अध्यक्ष हैं और यह प्रतिबंधित माओवादी संगठन का फ्रंट ऑर्गेनाइज़ेशन है. सीपीआई माओवादी के विचारों का प्रचार करने के लिए उन्होंने कई बैठकों, गोष्ठियों और रैलियों का आयोजन किया. पुलिस के मुताबिक वरवर राव, शोमा सेन, महेश राउत और फ़रार रितुपर्ण गोस्वामी हैदराबाद में आरडीएफ़ के वार्षिक सम्मेलन में शामिल हुए थे.

पुलिस के मुताबिक पर्सिक्यूटेड प्रिजनर्स सॉलिडैरिटी कमेटी (पीपीएससी) भी सीपीआई माओवादी का ही हिस्सा है. पुलिस का कहना है कि पीपीएससी को सीपीआई माओवादी ने वरवर राव के ज़रिए फंड मुहैया कराया था और पुलिस कहती है कि सुधा भारद्वाज पीपीएससी की प्रमुख सदस्य हैं.

एक जनवरी 20018 के भीमा कोरेगांव हिंसा कांड में पुलिस ने देश भर से लोगों को गिरफ़्तार किया है. इनमें कुछ लोग स्कॉलर हैं, कुछ वकील, कुछ लेखक-कवि और कुछ मानवाधिकार या दलित अधिकार कार्यकर्ता हैं. ये सभी अपने-अपने क्षेत्र के नामी-गिरामी लोग हैं. इनमें कुछ लोग आम पीड़ित नागरिकों की ओर से सरकार के खिलाफ़ कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए जाने जाते हैं. इस मामले में अभियुक्त बनाए गए लोगों के बारे में जानिए.

सुधीर धावले


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सुधीर धावले महाराष्ट्र के जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक और कवि हैं. वे मराठी में 'विद्रोही' नाम की एक पत्रिका भी प्रकाशित करते हैं. वे दलितों के अधिकारों के लिए आवाज़ उठाते रहे हैं. 2011 में उन्हें राजद्रोह के अभियोग के तहत गिरफ़्तार किया गया था, और उन पर एक आतंकवादी संगठन का सदस्य होने का आरोप लगाया गया था. बाद में अदालत ने उन्हें दोषमुक्त करार दिया. उस समय उनके वकील सुरेंद्र गाडलिंग थे, जो अब उन्हीं के साथ भीमा कोरेगांव केस में अभियुक्त हैं.

सुरेंद्र गाडलिंग


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सुरेंद्र गाडलिंग नागपुर में रहते हैं, पेशे से वकील हैं और मानवाधिकार से जुड़े मुकदमे लड़ते हैं. वे 'इंडियन एसोसिएशन ऑफ़ पीपुल्स लायर्स' के महासचिव भी हैं. वे दलित कार्यकर्ता भी हैं और कई अभियानों में शामिल रहे हैं. एक वकील के तौर पर उन्होंने यूएपीए और उससे पहले पुराने आतंकवाद निरोधक कानूनों टाडा और पोटा के अभियुक्तों के मुकदमे लड़े हैं. धावले दिल्ली विश्ववि्यालय के प्रोफ़ेसर जीएन साईंबाबा के भी वकील रहे हैं जिन्हें माओवादियों से संबंध रखने के लिए गिरफ़्तार किया गया था. साईंबाबा को गडचिरौली की अदालत ने दोषी ठहराया है. व्हीलचेयर के सहारे चलने वाले विकलांग प्रोफ़ेसर जीएन साईंबाबा अब भी जेल में हैं.  

रोना विल्सन


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जेएनयू के छात्र रहे विल्सन दिल्ली में रहते हैं. वे राजनीतिक बंदियों की रिहाई के लिए अभियान चलाते रहे हैं. वे पिछले कई वर्षों से इस क्षेत्र के सबसे सक्रिय कार्यकर्ताओं में से एक हैं. वे 'कमेटी फ़ॉर रिलीज़ ऑफ़ पोलिटिकल प्रिज़नर्स' (सीआरपीपी) के भी सदस्य हैं. वे जीएन साईंबाबा के बचाव और रिहाई के अभियान का भी संचालन करते रहे हैं. वे राजनीतिक कार्यकर्ताओं की गिरफ़्तारी का विरोध करते रहे हैं.

शोमा सेन


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शोमा सेन अंग्रेज़ी की प्रोफ़ेसर हैं, वे नागपुर की आरटीएम यूनिवर्सिटी में अंग्रेज़ी डिपार्टमेंट की हेड हैं. भीमा कोरेगांव की हिंसा में शामिल होने के आरोप में उन्हें नागपुर से गिरफ़्तार किया गया है. वे महिलाओं, आदिवासियों और दलितों के अधिकारों के मुद्दों पर लिखती रही हैं, उनके लेख प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में छपते रहे हैं. वे 'कमेटी फ़ॉर द प्रोटेक्शन ऑफ़ डेमोक्रेटिक राइट्स' की सदस्य हैं. वे मानवाधिकार के क्षेत्र में काम कर रही कई संस्थाओं से जुड़ी हुई हैं. उन्होंने अत्याचार की शिकार महिला राजनीतिक बंदियों का मामला उठाया है और उन्हें कानूनी सहायता दी है.

महेश राउत


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महेश राउत भीमा कोरेगांव मामले में गिरफ़्तार किए गए सबसे कम उम्र के व्यक्ति हैं. वे मूलत महाराष्ट्र के गडचिरौली ज़िले के रहने वाले हैं. उन्होंने अपनी पढ़ाई मुंबई के प्रतिष्ठित संस्थान—टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेस से की है. वे ग्रामीण विकास के जानकार हैं और प्राइम मिनिस्टर रूरल डेवलपमेंट प्रोग्राम के तहत फेलोशिप भी पा चुके हैं. वे गडचिरौली के ग्रामीण इलाकों में कई ग्राम सभाओं के साथ मिलकर काम कर रहे थे. गडचिरौली महाराष्ट्र का एक आदिवासी बहुल इलाका है जो माओवादी हिंसा से प्रभावित रहा है. वे जल, जंगल और जमीन के अधिकारों से जुड़े अभियानों में भी सक्रिय रहे हैं.

वरवर राव


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राव जाने-माने कवि, लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं. वे आंध्र प्रदेश में और तेलंगाना में तेलुगु कवि के रूप में जाने जाते हैं. उनके तकरीबन 15 कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं जिनका कई भाषाओं में अनुवाद भी हुआ है. उनके लेखन और कविताओं की वजह से कुछ लोग उन्हें माओवादियों से सहानुभूति रखने वाला भी बताते हैं. उन्हें वामपंथी कार्यकर्ता माना जाता है जिनका देश भर में कई संस्थाओं और अभियानों से निकट संबंध रहा है. पहले भी उन्हें कई बार गिरफ़्तार किया गया है. उन्हें पहली बार 1973 में गिरफ़्तार किया गया था, लेकिन उन्हें कभी किसी अभियोग में दोषी नहीं पाया गया है. वे आंध्र प्रदेश सरकार और नक्सलियों के बीच हुई बातचीत में भी मध्यस्थ के तौर पर शामिल रहे थे.

वरनॉन गोंज़ाल्विस


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मुंबई में रहने वाले गोंज़ाल्विस महानगर के कई कॉलेजों में पढ़ा चुके हैं. वे पिछले कई सालों से प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं के लिए लिखते रहे हैं. उन्हें 2007 में महाराष्ट्र की एंटी टेरर स्क्वाड ने गिरफ़्तार किया था. उन पर नक्सलियों से संबंध रखने और विस्फोटक रखने का आरोप लगा था. उन्हें अनलॉफुल एक्टिविटी प्रिवेंशन एक्ट यानी यूएपीए के तहत गिरफ़्तार किया गया था. मुंबई की एक अदालत ने उन्हें यूएपीए और आर्म्स एक्ट के तहत दोषी पाया था. छह साल कारावास में गुज़ारने के बाद उन्हें ज़्यादातर अभियोगों में दोषमुक्त करार दिया गया.

अरूण फरेरा


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फरेरा मुंबई में रहने वाले मानवाधिकार मामलों के वकील हैं. वे मानवाधिकारों से जुड़े कई अभियानों में शामिल रहे हैं. वे कमेटी फ़ॉर प्रोटेक्शन ऑफ़ डेमोक्रेटिक राइट्स यानी सीपीडीआर के सदस्य रहे हैं. वे इंडियन एसोसिएशन ऑफ़ पीपुल्स लॉयर्स से भी जुड़े रहे हैं. उन्होंने मुंबई में झुग्गी बस्तियों में रहने वाले लोगों को पुनर्वास के लिए भी आंदोलन चलाया था. 2007 में उन्हें पुलिस ने यूएपीए के तहत गिरफ़्तार किया गया था, उन पर माओवादी होने का आरोप लगाया गया था. 2014 में उन्हें सभी आरोपों से मुक्त कर दिया गया था. बाद में उन्होंने जेल में बिताए अपने दिनों पर एक किताब लिखी थी और कारावास में रहकर कानून की पढ़ाई भी कर रहे थे.

सुधा भारद्वाज


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सुधा भारद्वाज जानी-मानी मानवाधिकार कार्यकर्ता, मज़दूरों की नेता और वकील हैं. कई साल तक विदेश में रहकर उच्च शिक्षा हासिल करने के बाद सुधा भारद्वाज पिछले तीन दशकों से आदिवासी बहुल इलाकों में सामाजिक कार्य करती रही हैं. वे सरकार के खिलाफ़ मज़दूरों और आदिवासियों के मुकदमे वकील के तौर पर लड़ती रही हैं, यही वजह है कि उन्हें सरकार विरोधी और माओवादियों से सहानुभूति रखने वाली कार्यकर्ता कहा जाता है. वे जानी-मानी नागरिक अधिकार संस्था पीपुल्स यूनियन फ़ॉर सिविल लिबर्टीज़ की सचिव भी हैं. छत्तीसगढ़ में मजदूरों और आदिवासियों के बीच वर्षों से काम करने वाली भारद्वाज ने अपनी अमरीकी नागरिकता छोड़कर सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय हुईं थीं.

पुणे पुलिस ने लेखक-पत्रकार गौतम नवलखा और सामाजिक मामलों के अध्येता आनंद तेलतुंबडे का नाम 22 अगस्त 2018 को दूसरे अभियुक्तों के साथ एफ़आईआर में जोड़ा. इसके बाद लंबी कानूनी लड़ाई चली क्योंकि उन्होंने इसे अदालत में चुनौती दी. पुणे पुलिस और बाद में एनआईए ने उनकी अग्रिम ज़मानत की अर्ज़ी को चुनौती दी लेकिन उन्हें हिरासत में नहीं ले सकी. सुप्रीम कोर्ट ने इन दोनों व्यक्तियों की गिरफ़्तारी पर रोक लगा दी थी. जब 8 अप्रैल 2019 को अदालत ने नवलखा और तेलतुंबडे की ज़मानत की अर्ज़ी ठुकरा दी तो उन्होंने एनआईए के आगे आत्मसमर्पण कर दिया. नवलखा और तेलतुंबडे ने एनआईए के सामने 14 अप्रैल 2020 को आत्मसमर्पण कर दिया.

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भीमा कोरेगांव की घटना के बाद देश के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन हुए थे

भीमा कोरेगांव की घटना के बाद देश के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन हुए थे

पुलिस ने दोनों पर आरोप लगाया कि वे प्रतिंबधित संगठन सीपीआई माओवादी की एक बड़ी साज़िश का हिस्सा थे. उन्हें ज़मानत न देने के लिए यही दलील अदालत में रखी गई थी. पुलिस के मुताबिक गौतम नवलखा प्रतिबंधित संगठन में प्रमुख भूमिका निभाते हैं. पुलिस का कहना है कि वे लोगों को शामिल करने, उन्हें पैसे देने, योजना बनाने में सक्रिय रहे हैंऔर राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में शामिल रहे हैं. पुलिस का दावा है कि नवलखा के पास से बरामद सामग्री यह दिखाती है कि उन्होंने कार्यकर्ताओं को भूमिगत होकर देश के विरूद्ध काम करने के लिए उकसाया.

पुलिस ने आनंद तेलतुंबडे पर प्रतिबंधित संगठन का प्रचार करने का आरोप लगाया है. पुलिस का कहना है कि तेलतुंबडे दुनिया भर में सभा-सेमिनारों में हिस्सा लेने जाते थे और वहाँ प्रतिबंधित संगठन के विचारों को फैलाते थे. दूसरे अभियुक्तों के पास से ऐसी कई चीज़ें मिली हैं जिनमें ‘कॉमरेड आनंद’ का ज़िक्र है. पुलिस का कहना है कि आनंद तेलतुंबडे की भूमिका बहुत स्पष्ट है, वे 'स्टडी सर्किल' के ज़रिए नफ़रत की भावना का प्रचार कर रहे थे. उन पर प्रतिबंधित संगठन से फंडिंग लेने का भी आरोप है.

पुलिस ने आनंद तेलतुंबडे को 1 फ़रवरी 2019 को गिरफ़्तार किया था क्योंकि पुणे सेशन कोर्ट ने उनकी ज़मानत की अर्ज़ी ठुकरा दी थी. लेकिन अगले ही दिन उन्हें छोड़ना पड़ा क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने उनकी गिरफ़्तारी पर रोक लगा रखी थी.

गौतम नवलखा


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गौतम नवलखा एक जाने-माने एक्टिविस्ट हैं. वे लेखक भी हैं. दिल्ली में रहने वाले गौतम नवलखा ने वामपंथी और चरमपंथी आंदोलनों पर काफ़ी कुछ लिखा है. वे सरकार के अनुरोध पर अपहृत पुलिसवालों को माओवादियों से छुड़ाने के लिए हो रही बातचीत में मध्यस्थ की भूमिका भी निभा चुके हैं. वे नागरिक अधिकार कार्यकर्ता के तौर पर कई आंदोलनों से जुड़े रहे हैं.

आनंद तेलतुंबडे


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आनंद तेलतुंबडे अंतरराष्ट्रीय ख्याति के बुद्धिजीवी, अध्येता और लेखक हैं. उनकी कई किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं. वे इंजीनियर हैं और आइआइएम अहमदाबाद से भी पढ़ाई कर चुके हैं. वे भारत पेट्रोलियम के कार्यकारी निदेशक भी रह चुके हैं लेकिन उन्होंने इसके बाद अध्ययन-अध्यापन का रास्ता चुना. वे आइआइटी खड़गपुर में प्रोफ़ेसर रहे. इस समय वे गोवा इंस्टीट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट में सीनियर प्रोफ़ेसर हैं. वे कई पत्र-पत्रिकाओं में नियमित तौर पर लिखते रहे हैं. वे कमेटी फॉर प्रोटेक्शन ऑफ़ डेमोक्रेटिक राइट्स (सीपीडीआर) के सदस्य के तौर पर कई अभियानों में शामिल रहे हैं.

हनी बाबू एमटी


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भीमा कोरेगांव मामले में गिरफ़्तार किए गए 12वें व्यक्ति हनी बाबू हैं. वे दिल्ली विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी के एसोसिएट प्रोफ़ेसर हैं, वे लिंग्विस्ट्क्स यानी भाषा विज्ञान में विशेषज्ञता रखते हैं. दिल्ली यूनिवर्सिटी की वेबसाइट के मुताबिक वे भाषा की राजनीति और समाज विज्ञान में भी गहन दिलचस्पी रखते हैं. उन्हें 28 जुलाई को दिल्ली में गिरफ़्तार किया गया. उन पर प्रतिबंधित संगठन सीपीाआई माओवादी से संबंध रखने के आरोप हैं. भीमा कोरेगांव हिंसा में प्रतिबंधित संगठन की भूमिका की जांच कर रही एजेंसी एनआईए का दावा है कि हनी बाबू 'एल्गार परिषद' का आयोजन करने वालों के साथ संपर्क में थे और उसके पास इस बात को साबित करने के लिए सबूत हैं. माओवादियों से संपर्क रखने के मामले में सज़ा काट रहे प्रोफ़ेसर जीएन साईंबाबा की रिहाई के चलाए जा रहे अभियान से हनी बाबू जुड़े हुए थे, हनी बाबू की पत्नी भी दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाती हैं. हनी बाबू को जानने वाले कई साथी प्रोफ़ेसरों का कहना है कि वे एक लोकप्रिय प्रोफ़ेसर थे और उनके लेक्चर सुनने के लिए छात्र बड़ी तादाद में आते थे. हनी बाबू जातिवाद और दलितों के मुद्दों पर लगातार मुखर रहे हैं.

सरकार बदलने के साथ बदली जाँच एजेंसी

पुणे के विश्रामबाग पुलिस स्टेशन में एफ़आईआर दर्ज होने के बाद अगले कुछ महीनों में पुणे पुलिस ने 23 में से 9 अभियुक्तों को गिरफ़्तार किया. पुणे पुलिस ने इस मामले में चार्जशीट भी दायर कर दी, उसके बाद 21 फ़रवरी 2019 को एक पूरक चार्जशीट भी फ़ाइल की गई.

8 जनवरी, 2018 को इस मामले में एफ़आईआर दर्ज की गई. 17 मई, 2018 को पुणे पुलिस ने इसमें यूएपीए का सेक्शन 13,16,18,18B, 20, 38, 39 और 40 लगाया.

एनआईए ने भी 24 जनवरी, 2020 को इस मामले में एफ़आईआर दर्ज की है जिसमें आईपीसी की धारा- 153A, 505(1)(B), 117 और 34  लगाई गई है. इसके साथ ही यूएपीए का 13,16,18,18B, 20, 39 सेक्शन भी जोड़ा गया है.

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भीमा कोरेगांव में बड़े पैमाने पर हिंसा और तोडफोड़ की घटनाएँ हुई थीं

भीमा कोरेगांव में बड़े पैमाने पर हिंसा और तोडफोड़ की घटनाएँ हुई थीं

इस दौरान महाराष्ट्र में बीजेपी और शिवसेना की साझा सरकार थी. अक्तूबर 2019 में नाटकीय घटनाक्रम के बाद सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी राज्य की सत्ता से बाहर हो गई. शिव सेना, कांग्रेस और एनसीपी की गठबंधन सरकार सत्ता में आई.

22 दिसंबर 2019 को नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद पवार ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि पुणे पुलिस की 'एल्गार परिषद' मामले की जाँच संदेहास्पद है. उन्होंने कहा, “कार्यकर्ताओं को राजद्रोह के आरोप में जेल में डालना गलत है. लोकतंत्र में हर तरह के विचारों को अभिव्यक्त करने की स्वतंत्रता है. पुणे पुलिस की कार्रवाई गलत और प्रतिशोध की भावना से प्रेरित है. कुछ अफ़सरों ने अधिकारों का दुरुपयोग किया है.” इस बयान के बाद विवाद छिड़ गया, पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने पुलिस की कार्रवाई को सही ठहराया.

इसके कुछ ही दिनों के बाद जनवरी 2020 में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने मामला पुणे पुलिस से लेकर नेशनल इन्वेस्टिगेटिव एजेंसी (एनाईए) को सौंपने का निर्देश दिया. शरद पवार की पार्टी एनसीपी से जुड़े महाराष्ट्र के गृह मंत्री अनिल देशमुख ने इस फ़ैसले का विरोध करते हुए इसे 'असंवैधानिक' बताया था.

केस हाथ में लेने के बाद एनआईए ने मुंबई में एक अलग एफ़आईआर दर्ज की जिसमें 11 अभियुक्तों और कुछ अन्य लोगों के नाम दर्ज किए. एनआईए ने इस मामले में भारतीय कानून की अन्य धाराओं के अलावा यूएपीए भी लगा दिया. हालांकि इस मामले में एनआईए ने 124 (ए) यानी राजद्रोह की धाराएं नहीं लगाई हैं.

भीमा कोरेगांव न्यायिक जाँच आयोग

1 जनवरी को भीमा कोरेगांव और आसपास के इलाकों में भड़की हिंसा के बाद देश भर में उसे लेकर विरोध प्रदर्शन हुए. मामले के गर्माने के बाद इस बात की जाँच के लिए एक न्यायिक आयोग का गठन किया गया कि हिंसा की शुरूआत कैसे हुई. कई ‘फैक्ट फाइंडिंग’ कमेटियों ने अलग-अलग लोगों को ज़िम्मेदार ठहराया. इसी बीच पुणे ग्रामीण पुलिस और पुणे सिटी पुलिस ने दो अलग-अलग दिशाओं में जाँच की. महाराष्ट्र की तत्कालीन देवेंद्र फडणवीस सरकार ने 9 फरवरी 2018 को हिंसा की जाँच के लिए दो सदस्यों वाले न्यायिक आयोग का गठन किया. इस समिति के अध्यक्ष कोलकाता हाइकोर्ट के रिटायर्ड मुख्य न्यायाधीश जेएन पटेल थे.

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इस आयोग को अपनी रिपोर्ट चार महीने में सौंपनी थी, लेकिन अब तक चार बार आयोग का कार्यकाल बढ़ाया गया है और फ़ाइनल रिपोर्ट अभी तक नहीं आई है. चौथी बार इसका कार्यकाल बढ़ाकर 4 अप्रैल 2020 तक किया गया था लेकिन उसके कोरोना की वजह से लॉकडाउन शुरू हो गया. ढाई साल पहले जिस आयोग को चार महीने में अपनी रिपोर्ट सौंपनी थी उसने अब छह महीने का एक्सटेंशन मांगा है.

अब तक 29 गवाहों ने आयोग को अपना बयान दिया है जबकि 50 अन्य गवाहों को आयोग के सामने हाज़िर होने का सम्मान भेजे जाने की संभावना है. आयोग ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के प्रमुख शरद पवार को भी गवाह के तौर पर बुलाया है. इसके पहले पवार आयोग के सामने एक हलफ़नामा दायर कर चुके हैं. इसके अलावा करीब 500 हलफ़नामे आयोग को मिले हैं जिन्हें अलग-अलग लोगों, सरकारी अधिकारियों और संगठनों ने दायर किया है.

हिंदुत्ववादी कार्यकर्ता 

एक ओर जहाँ पुणे सिटी पुलिस ने इन आरोपों की जाँच की है कि भीमा कोरेगाँव की हिंसा में वामपंथी कार्यकर्ताओं का हाथ था, वहीं पुणे ग्रामीण पुलिस ने इन शिकायतों की पड़ताल की है कि 1 जनवरी  2018 को हुई हिंसा के पीछे कई हिंदुत्ववादी नेताओं की भूमिका थी. 

दो जनवरी को पिंपरी पुलिस स्टेशन में एफ़आईआर दर्ज हुई कि हिंदुत्ववादी नेताओं ने भीमा कोरेगांव और आसपास के इलाकों में भीड़ को हिंसा के लिए भड़काया था. शिकायत करने वाली अनिता साल्वे ने आरोप लगाया था कि मिलिंद एकबोटे और संभाजी भिड़े नाम के हिंदुत्वादी नेताओं ने उस भीड़ का नेतृत्व किया जिसने 1 जनवरी को दलित संगठनों के आयोजन में हिंसा की.

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मिलिंद एकबोटे

मिलिंद एकबोटे

एफ़आईआर दर्ज कराने वाली महिला का कहना है कि वे घटनास्थल पर मौजूद थीं और उन्होंने अपनी आँखों से दोनों अभियुक्तों को देखा था. शिकायत दर्ज कराने वाली महिला का कहना है कि वे ‘शौर्य दिन’ के आयोजन में हिस्सा लेने अपनी मित्र अंजना के साथ वहाँ गई थीं. जब उनकी दोस्त शिकरापुर टोल प्लाज़ा पार करके सनासवाड़ी पहुँची तो वहाँ मौजूद भीड़ ने पथराव करना और आग लगाना शुरू कर दिया.

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संभाजी भिड़े

संभाजी भिड़े

एफ़आईआर में दर्ज है कि भीड़ में कई लोगों के पास हथियार थे और वे उनसे लोगों को पीट रहे थे. एफ़आईआर में संभाजी भिड़े को शिवजागर प्रतिष्ठान का प्रमुख और मिलिंद एकबोटे को हिंदू जनजागरण समिति का प्रमुख बताया गया है जिनके साथ 'ऊंची जाति' के लोग शामिल थे. सेशन कोर्ट, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने जब मिलिंद एकबोटे की अग्रिम ज़मानत की अर्जी खारिज कर दी तो उन्हें पुणे पुलिस ने 14 मार्च 2018 को गिरफ़्तार कर लिया, उनके खिलाफ़ दंगा करने और उत्पीड़न करने सहित कई गंभीर अभियोग लगाए गए. पुणे कोर्ट ने 4 अप्रैल 2018 को अनिता साल्वे की शिकायत पर दर्ज हुए मामले में उन्हें ज़मानत पर रिहा कर दिया लेकिन शिकरापुर पुलिस की एक शिकायत पर उन्हें दोबारा हिरासत में ले लिया गया. शिकरापुर पुलिस का कहना था कि हिंसा से ठीक पहले एकबोटे और उनके समर्थकों ने कुछ पर्चे बाँटे थे.

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भीमा कोरेगांव की हिंसा में एक व्यक्ति की मौत हो गई थी

भीमा कोरेगांव की हिंसा में एक व्यक्ति की मौत हो गई थी

19 अप्रैल को पुणे सेशन कोर्ट ने उन्हें ज़मानत दे दी. दूसरे अभियुक्त संभाजी भिड़े को कभी गिरफ़्तार नहीं किया गया जबकि उनके ऊपर 1 जनवरी 2018 को भीमा कोरेगांव में रहकर लोगों को उकसाने का आरोप लगा था. कई संगठनों ने उनके खिलाफ़ कार्रवाई की माँग की और अदालत का भी दरवाज़ा खटखटाया. इस मामले में पुलिस ने अब तक चार्जशीट फ़ाइल नहीं की है. ऊपर जिन दो एफ़आईआर का ज़िक्र है, उनके अलावा भीमा कोरेगांव की हिंसा को लेकर पुणे ग्रामीण पुलिस के अधिकार क्षेत्र में कुल 30 मामले दर्ज हुए हैं.     

कौन हैं एकबोटे और भिड़े?


 पुणे के हिंदुत्ववादी कार्यकर्ता मिलिंद एकबोटे अपनी विचारधारा की वजह से कई विवादों में घिरे रहे हैं. वे समस्त हिंदू अगाड़ी नाम का एक संगठन चलाते हैं, वे लंबे समय से गौरक्षा अभियान चलाते रहे हैं. उन्होंने प्रतापगढ़ के किले में मौजूद आदिलशाही सेनापति अफ़ज़ल खान की कब्र को हटाने के लिए उग्र आंदोलन चलाया था जिसके बाद से उनके सतारा ज़िले में घुसने पर प्रतिबंध लगा दिया गया था.

वे वेलेंटाइंस डे मनाने के विरोध में भी प्रदर्शनों का आयोजन करते रहे हैं. वे राजनीतिक तौर पर भी सक्रिय रहे हैं और उनका जुड़ाव हिंदू महासभा, शिव सेना और भाजपा से रहा है. वे शिव सेना के टिकट पर 2014 में विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा था. वे पुणे नगर निगम के पार्षद भी रहे हैं. संभाजी भिड़े को उनके समर्थक गुरुजी के नाम से बुलाते हैं. 85 वर्ष के हिंदुत्ववादी कार्यकर्ता भिड़े पश्चिमी महाराष्ट्र के सांगली इलाके से आते हैं.

वे 'शिवप्रतिष्ठान हिंदुस्थान' नाम का संगठन चलाते हैं. वे हिंदुत्व पर व्याख्यान देने के लिए जगह जगह जाते रहते हैं. वे अपने शुरूआती दिनों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े थे लेकिन बाद में शिवाप्रतिष्ठान की स्थापना करने के लिए आरएसएस से अलग हो गए. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी के दूसरे नेताओं से उनकी निकटता सार्वजनिक जानकारी में रही है.

भिड़े अपने बयानों और अपनी गतिविधियों, दोनों की वजह से विवादों में रहे हैं. साल 2008 और 2009 में उनके खिलाफ़ कई गंभीर आरोप लगे जिनमें सांगली में दंगे भड़काने का आरोप भी था, लेकिन बाद में एक आरटीआई के ज़रिए पता चला कि भीमा कोरेगांव की घटना से छह महीने पहले ही उन पर लगे सारे अभियोग हटा लिए गए.

Reporter: Kirti Dubey (Delhi riots), Mayuresh Konnur (Bhima Koregaon)
Illustrations: Puneet Barnala, Gopal Shoonya
Images: Getty
Executive Producer: Rajesh Priyadarshi
Production: Shadab Nazmi