'शायद अब ज़्यादा दिन ज़िंदा न रहूं': असम बेदख़ली अभियान के बाद नदी किनारे रहने को मजबूर लोग

    • Author, दिलीप कुमार शर्मा
    • पदनाम, ग्वालपाड़ा से लौटकर बीबीसी हिंदी के लिए

"यहां शाम ढलते ही बहुत ठंड होती है. रात को जब सोते हैं तो टीन पर जमा ओस का पानी मुंह पर गिरता है. सर्दी से हम सबकी तबीयत बिगड़ रही है."

इतना कहते ही 25 साल की नाज़मीना ख़ातून के चेहरे पर उदासी छा जाती है.

थोड़ी देर की चुप्पी के बाद वो बेहद नाराज़गी से कहती हैं, "ठंड के कारण मेरा बच्चा एक महीने बीमार रहा. उसकी तबीयत इतनी ख़राब हो गई थी कि वो कई दिनों तक बोल नहीं पाया."

"बोलने पर सांस अटक रही थी. इतनी ठंड में हाथ-पैर अकड़ जाते हैं. क्या बताऊं, यहां कितनी तकलीफ़ है. हम मुसलमान हैं इसलिए सरकार हमारी मदद नहीं कर रही."

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असम के ग्वालपाड़ा ज़िले की जलजली नदी के किनारे कड़ाके की ठंड और तेज़ हवा के साथ उड़ती धूल नाज़मीना जैसे सैकड़ों बेघर लोगों की मानो अब किस्मत का हिस्सा बन गई है.

असम सरकार के अतिक्रमण हटाओ अभियान के तहत बीते 9 नवंबर को कुल 588 परिवारों को बेदख़ल किया गया था. जिनके पास रिश्तेदारों के यहां या फिर किराए के मकान में जाने का विकल्प था, वो वहां चले गए.

लेकिन जिनके पास जाने के लिए कोई जगह नहीं बची थी, वे अपने छोटे बच्चों और बुज़ुर्गों के साथ इस कड़ाके की ठंड में नदी के किनारे रहने आ गए.

जलजली नदी के किनारे रेतीली जगह पर नीले-पीले रंग के प्लास्टिक और टीन की बनी छोटी-छोटी अस्थायी झुग्गियां काफ़ी दूर से ही दिखने लगती हैं. अभी सर्दियों का मौसम होने की वजह से नदी में पानी कम है, लेकिन बारिश शुरू होने के बाद यहां किसी का भी रहना मुमकिन नहीं होगा.

'बंगाली मूल के मुसलमानों' के घरों पर चला बुलडोज़र

ग्वालपाड़ा ज़िले के मोरनोई थाना क्षेत्र के अंतर्गत भाटियापाड़ा और दशभूजा गांव सरकारी बेदख़ली के कारण अब पूरी तरह उजड़ गए हैं. सरकार का कहना है कि ये दोनों गांव दहिकाटा रिज़र्व फ़ॉरेस्ट की ज़मीन पर अवैध तरीके़ से बसे हुए थे.

साल 2021 में हिमंत बिस्वा सरमा के मुख्यमंत्री बनने के बाद वनांचल की ज़मीन के साथ-साथ मठ और दूसरी सरकारी ज़मीनों पर बड़े पैमाने पर अतिक्रमण हटाने के अभियान चलाए गए हैं.

इन बेदखली अभियानों में 50 हज़ार से ज़्यादा परिवार प्रभावित हुए हैं, जिनमें अधिकतर बंगाली मूल के मुसलमान हैं. असम में बंगाली मूल के मुसलमानों को बोलचाल की आम भाषा में 'मियां' कहकर संबोधित किया जाता रहा है.

राज्य में बेदख़ली अभियान के बारे में मुख्यमंत्री ने हाल ही में पत्रकारों से कहा था, "अभी तक एक लाख 60 हज़ार बीघा ज़मीन अतिक्रमण मुक्त हुई है. लेकिन क़रीब 12 लाख बीघा ज़मीन अभी और खाली करवानी है. सरकार इस कार्रवाई को लगातार आगे जारी रखेगी."

पिछले ढाई महीनों से नदी किनारे रेतीली जगह पर टीन और प्लास्टिक की झुग्गी बनाकर रह रही नाज़मीना कहती हैं, "यहां पीने का पानी नहीं है. नहाने की सुविधा नहीं है. शौचालय नहीं है. हम महिलाओं को सब कुछ खुले में करना पड़ता है. जहां पुरुष नहाते हैं, वहीं मुझे नहाना पड़ता है. हमारे घर तोड़ दिए गए हैं."

वो बताती हैं, "वहां 519 मकान थे. 21 हिंदू परिवारों के भी मकान तोड़े गए थे, लेकिन सरकार की तरफ़ से उन्हें रहने के लिए ज़मीन दी गई है. मुआवज़ा दिया गया है. हमें कुछ नहीं मिला. हमारे साथ सरकार इतना भेदभाव क्यों कर रही है?"

77 साल के हज़रत अली का कहना है कि जब से वो नदी किनारे रहने आए हैं, लगातार बीमार रहते हैं.

सुबह की धूप में बैठे अली कहते हैं, "मैं अपने घर पर ही ठीक था. लेकिन अब वहां कुछ नहीं बचा है. यहां आने के बाद सब कुछ ख़राब हो गया है. ठीक से खाना-पीना तक नहीं मिलता. ऊपर से इतनी ठंड है कि शायद मैं अब ज़्यादा दिन ज़िंदा भी न रहूं. ठंड ने बीमार कर दिया है."

हज़रत अली के पैरों में काफ़ी सूजन दिख रही थी. उनके साथ नदी किनारे प्लास्टिक तंबू में रह रहे उनके बेटे अबुल कलाम भी कई तरह की गंभीर बीमारियों से ग्रस्त हैं.

39 साल के अबुल अपनी तकलीफ़ पर कहते हैं, "पहले घर टूट गया. फिर पिछले महीने मेरा ऑपरेशन हुआ है. बूढ़े माता-पिता हैं. मैं अब काम करने लायक नहीं रहा. लोगों की थोड़ी-बहुत मदद से गुज़ारा कर रहे हैं. आगे कुछ पता नहीं."

अबुल कलाम का परिवार 15 सालों से माटिया ब्लॉक के डूबापारा लुप्त चर गांव में रह रहा था और उनके पास ज़मीन के मालिकाना हक़ से जुड़ा कोई भी काग़ज़ नहीं है.

वो कहते हैं, "हमें नहीं पता था कि जिस ज़मीन पर हम रह रहे थे, वो दहिकाटा रिज़र्व फ़ॉरेस्ट है. यह ज़रूर जानते थे कि यह ज़मीन सरकार की है. भू-कटाव के कारण रहने के लिए ज़मीन नहीं थी, इसलिए 2011 में हम डूबापारा लुप्त चर में रहने चले गए."

49 साल की जमुद्दीन निशा विकलांग हैं. पति की मौत हो चुकी है और दो बेटियों की शादी के बाद वो अकेली डूबापारा लुप्त चर गांव में रह रही थीं. प्रशासन ने उनका मकान भी तोड़ दिया.

वो कहती हैं, "मेरा कोई नहीं है. घर तोड़ देने के बाद यहां नदी किनारे आ गई. यहां खाना-पीना तक मुश्किल हो गया है. इतनी ठंड में लोगों के घरों में मांगने जाती हूं. बहुत कष्ट हो रहा है."

"सरकार की तरफ़ से कुछ नहीं मिला है. रहने की जगह भी नहीं बची. अरुणदोई योजना का कुछ पैसा मिलता था, वहां से भी नाम काट दिया गया. सरकार से अपील करती हूं कि हम नदी भू-कटाव में ज़मीन गंवाने वाले लोग हैं, हमारी मदद की जाए."

जिन हिंदू परिवारों को सरकार ने ज़मीन दी, उन्होंने क्या कहा?

ग्वालपाड़ा ज़िला प्रशासन ने 21 हिंदू परिवारों को डूबापारा इलाके़ में रहने की जगह दी है, जिनके घर दहिकाटा रिज़र्व फ़ॉरेस्ट में तोड़े गए थे.

सपना दास का परिवार अब इस नई जगह को अपना बसेरा बनाने की मशक्कत में लगा है. सपना कहती हैं, "25 साल तक वहां रहे. फिर हमारा मकान तोड़ दिया गया."

वो कहती हैं, "दो महीने बाद अब यहां जगह दी गई है. यहां अच्छा नहीं लगता. पानी नहीं है. बिजली नहीं थी. बहुत परेशानी झेलकर बिजली का कनेक्शन लिया है. बहुत तकलीफ़ में रहना पड़ रहा है."

इस दौरान हुई परेशानी पर वो कहती हैं, "पति गैरेज में काम करते थे. लेकिन घर तोड़ने का नोटिस मिलने के बाद से परेशानी बढ़ गई. काम-धंधा बंद हो गया. बच्चों की पढ़ाई छूट गई. काफ़ी दिनों तक बाहर रहना पड़ा. फिर यह ज़मीन मिली है."

उनका कहना है, "अब जैसे-तैसे टीन की एक छत डाली है. यहां पानी-शौचालय कुछ भी नहीं था. वहां हमारे पास तीन बीघा ज़मीन थी. पैसा जुटाकर थोड़ी-थोड़ी ज़मीन ख़रीदी थी. फिर सब कुछ तबाह हो गया."

ज़िला प्रशासन ने क्या कहा?

ग्वालपाड़ा के ज़िला उपायुक्त प्रदीप तिमुंग बेदख़ली की इस पूरी कार्रवाई को सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुरूप बताते हैं.

उन्होंने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया, "ज़िले में अब तक तीन अलग-अलग जगहों पर बेदख़ली अभियान चलाया गया है. मेरे ज़िले की ज़िम्मेदारी लेने के बाद दहिकाटा रिज़र्व फ़ॉरेस्ट में कार्रवाई हुई है. वहां 588 घर तोड़े गए हैं और उन परिवारों को शिफ़्ट किया गया."

"इस बेदख़ली अभियान के बाद 153 हेक्टेयर इलाक़ा अपने कब्ज़े में लिया गया है. इस पूरी प्रक्रिया में हमने सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के दिशा-निर्देशों का पालन किया है."

बेदख़ल किए गए लोगों के तमाम आरोपों पर डीसी तिमुंग कहते हैं, "किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं किया गया है. जो लोग दावा कर रहे थे कि यह उनकी ज़मीन है, उन्हें समय और सुविधा दी गई ताकि वे अपने काग़ज़ात लेकर सुनवाई में आ सकें."

उनका कहना है, "प्रशासन ने नोटिस देने के बाद 15 दिनों का समय दिया. दावों और अधिकारों पर सुनवाई के बाद फाइनल नोटिस के लिए भी 15 दिनों का समय दिया गया था. जिनका ज़मीन पर अधिकार नहीं था, उन परिवारों को हटाया गया. कुछ लोगों के पास ज़मीन का अधिकार था, उनके मकान नहीं तोड़े गए."

हिंदू परिवारों को ज़मीन देने से जुड़े सवाल पर वो कहते हैं, "पहले जो ग्वालपाड़ा था, उसका आधा हिस्सा भू-कटाव के कारण ब्रह्मपुत्र में चला गया. इसके बाद यहां के मूल लोग खाली पड़ी सरकारी ज़मीन पर बैठ गए."

"इसका फ़ायदा उठाकर कुछ बाहरी लोग भी अन्य ज़िलों से आकर ज़मीन पर कब्ज़ा करने लगे. लिहाज़ा जो ग्वालपाड़ा के मूल पीड़ित लोग हैं, उन्हें ज़मीन देकर फिर से बसाना हमारी ज़िम्मेदारी है. उन्होंने वनांचल खाली करने में प्रशासन के साथ सहयोग किया है. अब तक 21 परिवारों को ज़मीन दी गई है."

स्थानीय विधायक ने क्या बताया?

जिन गांवों पर सरकारी बुलडोज़र चला है, वो इलाका ग्वालपाड़ा ईस्ट विधानसभा क्षेत्र में आता है. यहां कांग्रेस के विधायक अबुल कलाम रशीद आलम जीतते रहे हैं. लेकिन जलजली नदी किनारे रह रहे बेदख़ल किए गए लोगों का आरोप है कि विधायक ने उनकी कोई मदद नहीं की.

इन आरोपों पर विधायक आलम कहते हैं, "मदद नहीं करने की बात बिल्कुल सही नहीं है. जिस दिन बेदख़ली अभियान चला, उस दिन मैं वहां गया था."

"बाद में पीने के पानी के लिए हैंडपंप दिया, सोलर लाइटें दीं और कुछ दिनों तक राशन भी दिया. वहां लोगों की ज़रूरतें बहुत ज़्यादा हैं और मैं विपक्ष का विधायक हूं, इतना मेरे लिए संभव नहीं है."

वो कहते हैं, "जब तक यह सरकार रहेगी, लोगों की मदद करना थोड़ा मुश्किल है. अगर मैं सीधे पीड़ितों की मदद करने जाऊंगा तो उन्हें और परेशान किया जाएगा. ऐसी स्थिति बन गई है. यह चुनावी मुद्दा है और कुछ नहीं."

कुछ महीने पहले मुख्यमंत्री सरमा ने 'मियां समुदाय' को लेकर पत्रकारों से कहा था, "मेरे मुख्यमंत्री बने रहने तक असम में 'मियां' शांति से नहीं रह सकेंगे. यह पक्की बात है. जो मियां संदिग्ध नागरिक हैं, उन्हें कष्ट देना ही मेरा काम है."

इन सबके बीच वरिष्ठ पत्रकार समीर के. पुरकायस्थ का कहना है कि असम सरकार के अवैध अतिक्रमण हटाओ अभियान से लेकर नागरिकता और बाल विवाह, बहू विवाह के संदर्भ में हुई कार्रवाइयों में प्रभावित होने वाले ज़्यादातर लोग बंगाली मूल के मुसलमान हैं.

वो मुख्यमंत्री सरमा द्वारा एक्स पर किए गए एक ट्वीट का हवाला देते हुए कहते हैं, "मुख्यमंत्री ने इस साल के पहले दिन ट्वीट में लिखा था- 'सर्वे धर्मा राजधर्मे प्रविष्टाः तस्माद्धर्मो राजधर्मः परो मतः'. अर्थात राजधर्म को सबसे महत्वपूर्ण और श्रेष्ठ धर्म माना गया है. लिहाज़ा उन्हें सभी प्रकार के धार्मिक कर्तव्यों, नैतिक नियमों और सामाजिक व्यवस्थाओं का पालन करना चाहिए."

राज्य में अगले तीन महीनों के भीतर विधानसभा चुनाव हैं और बीजेपी बेदख़ली अभियान को एक बड़ा मुद्दा बनाती दिख रही है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.