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असम में क्यों हुई हिंसा और हिमंत बिस्वा सरमा के आगे क्या हैं मुश्किलें?
- Author, दिलीप कुमार शर्मा
- पदनाम, गुवाहाटी से बीबीसी हिंदी के लिए
साल 2016 में बीजेपी असम में "जाति, माटी, भेटी" अर्थात जाति, ज़मीन और मातृभूमि की रक्षा का वादा करके पहली बार सत्ता में आई थी. लेकिन यहां की जनजातियों में लगातार बढ़ रही नाराज़गी से इन नारों पर सवाल उठ रहे हैं.
अगले चार महीनों में राज्य में विधानसभा चुनाव होने हैं और पश्चिम कार्बी आंगलोंग ज़िले में हुई हिंसा की ताज़ा घटनाओं ने मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के सामने मुश्किलें खड़ी कर दी हैं.
भारतीय संविधान की छठी अनुसूची के तहत गठित स्वायत्त क्षेत्र कार्बी आंगलोंग की हिंसा में अब तक दो लोगों की मौत हो चुकी है. इस हिंसा में एक आईपीएस अधिकारी समेत 60 से ज़्यादा पुलिस के जवान घायल हुए हैं. कई महिला पुलिसकर्मियों को भी गंभीर चोटें आई हैं.
25 साल के एक विकलांग व्यक्ति के घर में लगाई आग में वह ज़िंदा जल गए. प्रदर्शनकारियों ने बीजेपी के नेतृत्व वाली कार्बी आंगलोंग स्वायत्तशासी परिषद के मुख्य कार्यकारी सदस्य तुलिराम रोंगहांग के घर को भी फूंक दिया.
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दो दिन से ज़िले में इंटरनेट सेवा बंद है. क्षेत्र की स्थिति इतनी ख़राब हो चुकी है कि सेना ने गुरुवार को इलाके में फ़्लैग मार्च किया है.
ऊपरी असम में कई समुदाय नाराज़
ऊपरी असम में बीते दो दशकों से पत्रकारिता कर रहे अवीक चक्रवर्ती मानते हैं कि पिछले कुछ समय से ख़ासकर ऊपरी असम के कई समुदायों में सरकार को लेकर नाराज़गी देखने को मिली है.
अवीक कहते हैं, "ऊपरी असम के छह समुदाय अनुसूचित जनजाति की मांग पूरी नहीं होने से उपेक्षित महसूस कर रहे हैं. बीजेपी ने अपने चुनावी घोषणा पत्रों में छह स्थानीय समुदायों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने का साफ़ वादा किया था. हाल ही में चाय जनजाति समेत इन समुदायों के लोग सरकार के ख़िलाफ़ सड़कों पर उतरे थे. अब कार्बी आंगलोंग में हुई हिंसा और वहां की जनजाति की नाराज़गी ने परेशानी को और बढ़ा दिया है."
हाल ही में डिब्रूगढ़ और तिनसुकिया ज़िले में सैकड़ों लोग एसटी का दर्जा देने की मांग पर विरोध आंदोलन कर चुके हैं. हाथों में मशाल लिए आंदोलनकारियों की तस्वीरों को समूचे देश ने देखा था. जिसके बाद असम कैबिनेट ने राज्य के इन छह समुदायों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने को लेकर मंत्रियों के समूह की एक रिपोर्ट को मंज़ूरी दी थी.
हालांकि दो दिन पहले मुख्यमंत्री सरमा ने मीडिया के सामने यह कह दिया था कि एसटी का दर्जा देने की प्रक्रिया 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले पूरी नहीं होगी. उन्होंने यह भी कहा कि एसटी की मांग कर रहे आंदोलनकारी संगठन भी चुनाव से पहले एसटी का दर्जा नहीं मांग रहे हैं.
सीएम के इस बयान के बाद कई संगठनों की कड़ी प्रतिक्रिया सामने आई है. इन संगठनों ने फिर से आंदोलन करने की चेतावनी दी है.
भयानक रूप वाले राक्षस का ज़िक़्र
राज्य में उत्पन्न संकट की ऐसी स्थिति के बीच मुख्यमंत्री हिमंत ने गुरुवार की सुबह क़रीब 8 बजे अपने सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड के 24वें सर्ग का श्लोक 28 साझा किया. इस श्लोक "राक्षसो भैरवाकारो नित्यं त्रासयते प्रजाः....' का अर्थ है वह भयानक रूप वाला राक्षस यहां की प्रजा को हमेशा डराता रहता है.
सीएम के इस श्लोक का राजनीतिक विश्लेषक कई मतलब निकाल रहे हैं. राज्य में चार दशकों से पत्रकारिता कर रहे नव कुमार ठाकुरिया भयानक रूप वाले राक्षस वाली बात को यहां के बुद्धिजीवियों, लेखकों और पत्रकारों से जोड़कर देखते हैं.
वह कहते हैं, "असल में कार्बी आंगलोंग की हिंसा के बारे में जिस कदर लिखा जा रहा है, उसमें कार्बी जनजाति का अस्तित्व मिट जाने की बात हो रही हैं. लिहाज़ा ऐसा लगता है कि सीएम उन लेखकों पर कटाक्ष कर रहे हैं जिनके लेखन से लोगों में डर पैदा हो सकता है."
असल में गुवाहाटी में शुरू हुए असम पुस्तक मेले में भाग लेते हुए मुख्यमंत्री हिमंत ने बुधवार को कहा था कि आग बुझाने की अगर ताक़त न हो तो आग लगाने वाले लेख लिखने का भी अधिकार नहीं है.
2021 में राज्य के मुख्यमंत्री बने हिमंत बिस्वा सरमा ने बंगाली मूल के मुस्लिम बहुल इलाकों में लगातार बेदखली अभियान चलाया. इस तरह हज़ारों बीघा सरकारी ज़मीन ख़ाली करवाई.
लेकिन कार्बी आंगलोंग में सरकारी तौर पर तय चारागाह आरक्षित भूमि और विलेज ग्रेजिंग रिज़र्व की ज़मीन ख़ाली करवाने की मांग ने सीएम हिमंत को परेशानी में डाल दिया है.
'बीजेपी ने किसी की समस्या का समाधान नहीं किया'
कांग्रेस पार्टी ने राज्य सरकार से कार्बी आंगलोंग की स्थिति को बल प्रयोग के बजाय संवेदनशीलता से संभालने की अपील की है.
असम प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष तथा जोरहाट से लोकसभा सांसद गौरव गोगोई ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर लिखा, "यह साफ़ है कि जब तक हिमंत बिस्वा सरमा मुख्यमंत्री रहेंगे, असम के मूल निवासियों, जातीय समुदायों, जनजातियों और स्थानीय लोगों की चिंताएं हमेशा दूसरे नंबर पर रहेंगी."
कार्बी आंगलोंग की स्थिति को लेकर मुख्यमंत्री हिमंत पर सवाल उठाते हुए असम विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष देबब्रत सैकिया ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "मुख्यमंत्री केवल चुनाव में वोट लेने की बात को ध्यान में रखकर ही कोई क़दम उठाते हैं. जब कोई संकट वाली स्थिति उत्पन्न होती है तो वह समस्या से निपटने की बजाए अपने फ़ायदे के अनुसार काम करते हैं. इसलिए कार्बी आंगलोंग में आज ऐसी हिंसात्मक स्थिति पैदा हो गई है."
नेता प्रतिपक्ष ने आगे कहा, "जिस इलाके़ में हिंसा हुई है, वहां हिंदी बोलने वाली आबादी बसी है. पिछले लोकसभा चुनाव में सीएम ने हिंदी भाषी लोगों का समर्थन करते हुए उनकी समस्या को सुलझाने की बात की थी और बीजेपी जीत गई."
"इसके बाद जब कार्बी आंगलोंग स्वायत्तशासी परिषद का चुनाव था तो कार्बी लोगों से वादा कर दिया कि सरकार गैर कार्बी लोगों से ज़मीन ख़ाली कराएगी. बीजेपी वह चुनाव भी जीत गई, लेकिन किसी समुदाय के लिए कुछ नहीं किया गया. इसलिए आज स्थिति हिंसा तक पहुंच गई है."
सैकिया ने कहा, "कार्बी जनजाति के लोग 6 दिसंबर से भूख हड़ताल कर रहे थे लेकिन सरकार ने इस मुद्दे को गंभीरता से नहीं लिया. सीएम अब कह रहे हैं कि गुवाहाटी हाई कोर्ट का आदेश है, इसलिए उस इलाके में बेदखली अभियान नहीं चलाया जा सकता. लेकिन हिमंत की सरकार ने ऐसे कई बेदखली अभियान मुसलमान इलाकों में चलाए हैं जहां सुप्रीम कोर्ट ने आदेश जारी कर रखा था. राज्य में जब भी कोई गंभीर समस्या उत्पन्न होती है तो उसको सही प्रक्रिया से निपटाने की बजाए उसमें सांप्रदायिक नज़रिया जोड़ दिया जाता है."
राज्य की क्षेत्रीय पार्टी असम जातीय परिषद के अध्यक्ष लुरिनज्योति गोगोई ने भी कार्बी लोगों के भूमि अधिकारों की अनदेखी करने के लिए सरकार की आलोचना की है.
उन्होंने कहा, "हिमंत बिस्वा सरमा की सरकार लंबे समय से चली आ रही शिकायतों को क़ानूनी तौर पर हल करने में विफल रही है. जब भूमि पुत्रों को उनकी ज़मीन से वंचित कर दिया जाएगा, तो मूल निवासी कहां रहेंगे?"
'सीएम की कार्य क्षमता से जोड़ना उचित नहीं'
बीजेपी की मानें तो कार्बी आंगलोंग में हुई हिंसा में किसी तीसरे पक्ष का हाथ है. अपनी पार्टी के लिए लंबे समय तक कार्बी आंगलोंग ज़िले में काम कर चुके बीजेपी के वरिष्ठ नेता विजय कुमार गुप्ता ने बीबीसी से कहा, "असम को अशांत करने के इरादे से एक तीसरा पक्ष इस हिंसा को हवा दे रहा है. वरना आंदोलनकारी स्वायत्तशासी परिषद के प्रमुख का घर को क्यों जलाते? जबकि आंदोलन करने वालों को यह बात पता है कि जिस इलाके में वह बेदखली अभियान चलाने की मांग कर रहे हैं वहां गुवाहाटी हाई कोर्ट ने रोक का आदेश दे रखा है. ऐसे में सरकार कोर्ट के ख़िलाफ़ कोई काम नहीं कर सकती."
बीजेपी नेता विधानसभा चुनाव से पहले सीएम हिमंत के सामने खड़ी हुई मुश्किल के बारे में कहते हैं, "किसी एक घटना को मुख्यमंत्री की कार्य दक्षता से जोड़ना उचित नहीं है. हमारे मुख्यमंत्री के नेतृत्व में विकास योजनाओं से लेकर गरीबों के कल्याण के लिए बहुत काम हो रहा है. लिहाज़ा उनकी छवि और राजनीति पर कहीं कोई सवाल नहीं है. बात जहां तक कार्बी आंगलोंग की है तो अदालत का जो भी फैसला आएगा सरकार उसी के आधार पर आगे की कार्रवाई करेगी."
आने वाले विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री हिमंत की परेशानी का ज़िक्र करते हुए वरिष्ठ पत्रकार अनिर्बान रॉय कहते हैं, "जनजातियों की नाराज़गी वाजिब है. क्योंकि एसटी की प्रक्रिया तकनीकी तौर पर इतनी आसान नहीं है. इसमें समय लगता है लिहाज़ा मांग करने वाले लोगों की कड़ी प्रतिक्रिया आएगी."
"लेकिन अभी यह कहना कि इन मुद्दों की वजह से सीएम सरमा के लिए चुनाव कठिन हो जाएगा, जल्दबाज़ी होगी. 2019 में सीएए अर्थात नागरिकता संशोधन अधिनियम लागू करने के दौरान भी ऐसा लगा था कि असम में बीजेपी अब जीत नहीं पाएगी लेकिन पार्टी का प्रदर्शन बेहतरीन रहा."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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