यूजीसी के नए नियम क्या हैं जिन पर हो रहा है विवाद?

उत्तर प्रदेश में बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया है.

उत्तर प्रदेश सरकार ने उनके ख़िलाफ़ अनुशासनात्मक कार्रवाई का आदेश दिया है.

लेकिन अलंकार अग्निहोत्री ने अपने इस्तीफ़े की जो वजह बताई उससे एक बार फिर यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन यानी विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए नियमों पर बहस केंद्र में आ गई है.

अलंकार अग्निहोत्री ने पत्रकारों से बात करते हुए आरोप लगाया कि, उत्तर प्रदेश में 'ब्राह्मण विरोधी अभियान' चल रहा है.

साथ ही उन्होंने कहा, "मेरे इस्तीफ़े की दूसरी वजह है यूजीसी के नए नियम जो एक तरह से सामान्य वर्ग के सभी छात्र, छात्राओं को अपराधी घोषित करते हैं. ये नियम जनरल कैटेगरी विरोधी हैं"

जिस यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन यानी यूजीसी (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) के नोटिफ़िकेशन की बात को अलंकार अग्निहोत्री ने अपने इस्तीफ़े की वजह बताया है, वो आख़िर है क्या और उस पर सामान्य वर्ग के लोगों की तीखी प्रतिक्रिया क्यों आ रही है?

सोशल मीडिया पर लोग क्यों इसका जमकर विरोध कर रहे हैं?

करणी सेना जैसे संगठनों ने क्यों इसके ख़िलाफ़ सड़कों पर उतरने का फ़ैसला किया है?

नए नियमों के मुताबिक, अब चाहे सरकारी कॉलेज हो या निजी यूनिवर्सिटी, हर जगह एक 'इक्विटी सेल बनाना ज़रूरी होगा. ये सेल एक तरह की अदालत जैसा काम करेगी. अगर किसी छात्र को लगता है कि उसके साथ भेदभाव हुआ है, तो वह यहां जाकर अपनी शिकायत दर्ज करा सकता है. कमेटी की सिफारिश पर संस्थान को उस पर तुरंत एक्शन लेना होगा.

नए नियम और विवाद

उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव ख़त्म करने के लिए यूजीसी ने अपने मौजूदा नियमों को और सख़्त किया है.

13 जनवरी को यूजीसी ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग विनिमय 2026 जारी किया जिसका उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थाओं में समानता को बढ़ाना है ताकि किसी भी वर्ग के छात्र, छात्राओं के साथ भेदभाव को रोका जा सके. इसका उद्देश्य

  • धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्म स्थान, विकलांगता के आधार पर छात्र-छात्राओं से भेदभाव ना हो और विशेष रूप से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों, आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों, विकलांगों और इनमें से किसी भी वर्ग के भी सदस्यों के विरुद्ध भेदभाव ख़त्म किया जा सके. इसके अलावा उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा दिया जा सके.
  • इसके मुताबिक़ जाति आधारित भेदभाव का अर्थ अनुसूचित जातियों, जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों के सदस्यों के विरुद्ध केवल जाति या समुदाय के आधार पर भेदभाव है.

विवाद की मूल वजह जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा में अन्य पिछड़े वर्गों (ओबीसी) को शामिल करना है. इसके पहले, ड्राफ्ट में जातिगत भेदभाव से सुरक्षा के दायरे में केवल एससी और एसटी (अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति) को रखा गया था.

लेकिन अब इसमें ओबीसी को भी शामिल कर लिया गया है, जिसका कई जगह कुछ लोग विरोध कर रहे हैं.

इस नोटिफ़िकेशन का विरोध करने वालों का तर्क है कि ये सामान्य वर्ग के लोगों के ख़िलाफ़ है.

क्योंकि इसमें सामान्य वर्ग के छात्र-छात्राओं के ख़िलाफ़ फ़र्जी आरोप लगाए जा सकते हैं जो उनके करियर के लिए घातक साबित हो सकते हैं.

नोटिफ़िकेशन के मुताबिक़ उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव खत्म करने के लिए एक इक्विटी कमेटी (समता समिति) बनाई जाएगी जिसमें ओबीसी, विकलांग, अनुसूचित जाति, जनजाति और महिलाओं का प्रतिनिधित्व होना चाहिए.

ये समिति भेदभाव की शिकायतों की जांच करेगी.

विरोध करने वालों का तर्क ये भी है कि इस समिति में सामान्य वर्ग के लोगों के प्रतिनिधित्व की बात क्यों नहीं कही गई है. उनके मुताबिक़ 'इक्विटी कमेटी' में सामान्य वर्ग का सदस्य नहीं होने से जांच निष्पक्ष नहीं हो सकेगी.

बदलाव की ज़रूरत क्यों पड़ी?

दूसरी तरफ सरकार का कहना है कि उच्च शिक्षा में ओबीसी छात्रों को भी भेदभाव का सामना करना पड़ता है, इसलिए उन्हें सुरक्षा देना ज़रूरी है.

इस संबंध में कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह के नेतृत्व वाली शिक्षा संबंधी संसदीय समिति ने सिफारिश की थी. उसी सिफारिश के आधार पर ओबीसी को भी इस दायरे में लाया गया है.

शिवसेना (यूबीटी) नेता प्रियंका चतुर्वेदी ने एक्स पर पोस्ट किया, "कैंपस में किसी भी प्रकार का जातिगत भेदभाव गलत है, और भारत में पहले ही कई छात्र इसके दुष्परिणाम झेल चुके हैं. लेकिन क्या कानून को समावेशी नहीं होना चाहिए और यह सुनिश्चित नहीं करना चाहिए कि सभी को समान रूप से संरक्षण मिले? फिर कानून के लागू होने में यह भेदभाव क्यों? झूठे मामलों की स्थिति में क्या होगा? दोष का निर्धारण कैसे किया जाएगा?"

उन्होंने कहा, "इस भेदभाव को कैसे परिभाषित किया जाए- शब्दों से, कार्यों से या धारणाओं से?. क़ानून के लागू होने की प्रक्रिया स्पष्ट, सटीक और सभी के लिए समान होनी चाहिए. कैंपस में नकारात्मक माहौल बनाने के बजाय, मैं आग्रह करती हूँ कि यूजीसी की यह अधिसूचना या तो वापस ली जाए या उसमें आवश्यक संशोधन किया जाए."

वहीं भारतीय जनता पार्टी के नेता और सांसद निशिकांत दुबे ने इन नियमों का बचाव करते हुए लिखा, "गरीब सवर्ण समाज को 10 प्रतिशत आरक्षण माननीय प्रधानमंत्री मोदी जी ने ही दिया. आज किस प्रकार की ग़लतफ़हमी UGC के नाम पर? संविधान का आर्टिकल 14 इस देश में जाति, वर्ग, वर्ण, धर्म या संप्रदाय के किसी भी भेदभाव के ख़िलाफ़ है,आप निश्चिंत रहिए, UGC का यह नियम अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़े वर्ग के साथ-साथ सवर्णों पर भी बराबर लागू होगा. यह राजनीति नहीं है, देश बाबा साहेब अंबेडकर जी के संविधान से ही चलता है."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.