सुनीता विलियम्स ने क्यों कहा, 'मुझे गुजरात में अपने पैतृक गांव जाना ही होगा'

    • Author, दिव्या उप्पल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

"जब आप ऊपर से पृथ्वी को देखते हैं, तो बहस और लड़ाई करना बहुत ही अजीब लगता है."

लगभग तीन दशकों के अपने करियर में भारतीय मूल की नासा अंतरिक्ष यात्री सुनीता 'सुनी' विलियम्स के लिए अंतरिक्ष से दिखने वाला नजारा एक अद्भुत छाप छोड़ गया है.

एक ऐसी छाप जो मानवता, तकनीक और पृथ्वी के प्रति उनके दृष्टिकोण को लगातार आकार दे रही है.

सुनीता विलियम्स नासा में 27 साल काम करने के बाद दिसंबर में रिटायर हुईं. वह हाल ही में कोझिकोड में संपन्न हुए केरल साहित्य महोत्सव में भाग लेने के लिए भारत में थीं. करीब एक दशक के बाद वो भारत आई थीं.

बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

दिल्ली और केरल की अपनी यात्रा के दौरान उन्होंने छात्रों, वैज्ञानिकों और फेस्टिवल में मौजूद रहे लोगों से मुलाकात की. इस दौरान उन्होंने अंतरिक्ष में बिताए अपने जीवन और अपने करियर के अप्रत्याशित आखिरी चैप्टर के बारे में बताया.

अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आईएसएस) पर तीन लंबी अवधि के मिशनों के दौरान विलियम्स ने ऑर्बिट में 600 से अधिक दिन बिताए. उन्होंने एक महिला के रूप में सबसे ज्यादा स्पेसवाक का रिकॉर्ड बनाया.

उन्होंने कहा, "मैंने नासा में नौकरी करने के बारे में कभी नहीं सोचा था. मैंने अंतरिक्ष में जाने की बिल्कुल भी कल्पना नहीं की थी."

अंतरिक्ष में गुजारने पड़े नौ महीने

पीछे मुड़कर देखने पर वह कहती हैं कि केवल मिशन ही यादगार नहीं हैं. सुनीता कहती हैं, "मैं उन सभी अद्भुत लोगों के बारे में सोचती हूं जिन्होंने मेरा मार्गदर्शन किया. मुझे सलाह दी और मुझे उस मुकाम तक पहुंचाया."

"मेरी सबसे बड़ी याद वास्तव में उन सभी लोगों से जुड़ी है जिनके साथ मुझे काम करने का मौका मिला."

2024 में विलियम्स को अंतरिक्ष में कुछ ही दिन गुजारने थे. लेकिन बोइंग स्टारलाइनर अंतरिक्ष यान में तकनीकी दिक्कत की वजह से उन्हें आईएसएस में नौ महीने गुजारने पड़े.

उन्होंने इसे सहजता से स्वीकार कर लिया.

उन्होंने कहा, "मुझे अंतरिक्ष में रहना बहुत पसंद है. इसलिए वहां होना ही मेरे लिए काफी था."

"मुझे वो सब करने का मौका मिला जो मुझे बहुत पसंद हैं. जैसे खिड़की से बाहर देखना, डायरी लिखना, एक्सपेरिमेंट करना. यह एक अद्भुत लैबोरेट्री है."

उनके दिन साइंस के एक्सपेरिमेंट्स, रोबोटिक आर्म ट्रेनिंग, उपकरणों की मरम्मत, ग्राउंड पर मौजूद टीमों के साथ कॉन्फ्रेंस और घंटों-घंटों की एक्सरसाइज में गुजरते थे.

उन्होंने कहा, "हर दिन अलग होता है, और यही इसे बेहद मजेदार बनाता है."

भावनात्मक तौर पर हालांकि वहां लंबे समय तक रहने से कुछ मुश्किलें पैदा हुईं.

विलियम्स ने कहा, "मैंने अपने परिवार के साथ कुछ प्लान बनाए थे. जिसमें मेरी 80 वर्षीय मां के साथ बनाया प्लान भी शामिल था."

"मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मेरा समय बर्बाद हो गया हो क्योंकि मैं उनके साथ नहीं थी. मैं अपने भतीजे और भतीजी के साथ भी कई काम नहीं कर पा रही थी."

उन्होंने कहा कि उनके परिवार के सहयोग ने उन्हें हिम्मत दी.

"उन्होंने मुझसे कहा, 'जाओ, ऊपर खूब मजे करो, हमें भी साथ ले जाओ और किसी दिन सुरक्षित अंतरिक्ष यान से वापस आ जाना.' इससे मुझे बहुत तसल्ली मिली."

बदलते भारत में घर वापस आना

विलियम्स ने बताया कि उनकी भारत की हर यात्रा पिछली यात्रा से बिल्कुल अलग होती है.

उन्होंने कहा, "मैं यहां कई बार आ चुकी हूं. हर बार मुझे बदलाव देखने को मिला है. सड़कें, फ्लाईओवर, एक जगह से दूसरी जगह जाना अब पहले से कहीं ज्यादा आसन लगता है. हर जगह तकनीक पहुंच चुकी है.

वह साइंस और इनोवेशन के फील्ड में भारत की बढ़ती महत्वाकांक्षा से खासतौर पर प्रभावित हुईं.

उन्होंने कहा, "लोग तकनीक के क्षेत्र में हर तरह की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार हैं. इसमें अंतरिक्ष के क्षेत्र भी शामिल हैं."

भारत से उनका गहरा जुड़ाव है. गुजरात के उनके पैतृक गांव झुलासन के लोग लंबे समय से उनकी उपलब्धियों को अपनी उपलब्धियों की तरह मनाते आए हैं.

उन्होंने कहा, "यह सचमुच बहुत सम्मान की बात है. बेशक मैं अपने पिता और परिवार के साथ वहां जा चुकी हूं. इससे यह जुड़ाव और भी गहरा हो जाता है. मैं वहां के लोगों को जानती हूं."

वह जल्द ही अपनी बहन और परिवार के साथ वहां लौटने की उम्मीद करती हैं.

उन्होंने कहा, "केरल में आकर अच्छा लगा. मेरे पिता यहां के बारे में बहुत तारीफ करते थे. भारत के एक अलग हिस्से को देखने का मौका मिला. लेकिन मुझे झुलासन स्थित अपने घर वापस जाना ही होगा."

एक ही ग्रह, जिसे हम सब साझा करते हैं

विलियम्स कहती हैं कि ऑर्बिट से देखने पर सीमाओं और संघर्ष का कोई महत्व नहीं रह जाता है.

उन्होंने कहा, "जब आप (अंतरिक्ष से) नीचे अपने ग्रह को देखते हैं तो आपको एहसास होता है कि हम सब एक ही जगह पर साथ हैं. एक ही पानी, एक ही हवा, एक ही ज़मीन."

उनका मानना ​​है कि यह दृष्टिकोण इंसानों के बीच के बंटवारे को अजीब तरह से छोटा महसूस कराता है.

वह कहती हैं, "जब हम यहां इतनी सारी चीजों के बीच होते हैं तो इतनी सारी बातों से हमारा ध्यान भटकता रहता है. लेकिन अंतरिक्ष में लोगों से झगड़ने की कल्पना भी नहीं कर सकते."

उन्होंने कहा, "लोगों का बहस करना और लड़ना बहुत ही अजीब लगता है."

ये अनुभव विलियम्स को सहानुभूति के महत्व के और ज्यादा करीब ले गया.

उन्होंने कहा, "शायद हम सभी को बस एक पल रुककर प्रकृति की गोद में कहीं जाना चाहिए. एक-दूसरे की बात सुननी चाहिए, क्योंकि शायद हर किसी की बात में कुछ अच्छा होता है."

एआई और भारत की क्षमता

विलियम्स एआई को विज्ञान और अंतरिक्ष अभियानों में एक शक्तिशाली उपकरण बताती हैं. लेकिन वो मानती हैं कि इसकी भी कुछ सीमाएं हैं.

उन्होंने कहा, "एआई डेटा को बहुत तेजी से प्रोसेस कर लेता है. नंबर्स को एनालाइज कर सकता है और जानकारियों को जमा कर सकता है. रोबोट रिपीट होने वाले काम कर सकता है जबकि इंसान डिसीजन पर फोकस कर सकते हैं."

लेकिन उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि एआई को एक उपकरण ही रहना चाहिए, ये विकल्प नहीं होना चाहिए.

उन्होंने कहा, "यह सब कुछ नहीं है. यह सिर्फ हमें आगे के लिए मदद करने वाला एक उपकरण मात्र है."

"भारत के लिए इमेजिनेशन ही लिमिट है. भारत के पास मानव शक्ति और बहुत से प्रतिभाशाली लोग हैं जो अद्भुत काम कर सकते हैं."

रिटायर हो चुकीं विलियम्स ने बताया कि उनके जीवन का अगला पड़ाव यात्रा, परिवार और नई चुनौतियों से भरा होगा.

वह केरल के समुद्र तटों से लेकर लद्दाख के पहाड़ों तक, भारत के और अधिक हिस्सों को देखना चाहती हैं.

उन्होंने कहा, "मुझे पहाड़ बहुत पसंद हैं. मुझे कभी न कभी वहां जाना ही होगा."

अंतरिक्ष से मिली सीख पर विचार करते हुए, वह कुछ पल रुकीं और बोलीं, "धैर्य रखें और एक-दूसरे की बात सुनें."

और जब उनसे पूछा गया कि रिटायरमेंट के बाद उन्हें सबसे ज्यादा क्या उत्साहित करता है, तो उनका जवाब तुरंत था, "पहाड़ों पर चढ़ना."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.