शी जिनपिंग ने चीनी सेना के सबसे बड़े जनरल को हटाया, क्या है वजह?

    • Author, स्टीफ़न मैकडोनेल
    • पदनाम, चीन संवाददाता

चीन की सेना पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के बड़े पदों से अधिकारियों को हटाया जा रहा है.

हाल ही में चीन के सबसे बड़े जनरल झांग यूशिया और एक अन्य बड़े अधिकारी जनरल ल्यू झेनली को उनके पद से हटा दिया गया.

इससे सवाल उठ रहे हैं कि देश में इतने शीर्ष स्तर पर यह झगड़ा क्यों शुरू हुआ? इससे चीन की सेना की ताक़त पर क्या असर पड़ेगा, ख़ासकर तब अगर चीन ताइवान पर हमला करना चाहे या कोई बड़ा युद्ध लड़े.

जनरल झांग यूशिया 75 वर्ष के हो गए हैं, वो सेंट्रल मिलिट्री कमीशन (सीएमसी) के उपाध्यक्ष थे.

सीएमसी कम्युनिस्ट पार्टी का वह ग्रुप है, जिसे राष्ट्रपति शी जिनपिंग हेड करते हैं. यही कमीशन देश की पूरी सेना को कंट्रोल करता है.

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इस कमीशन में आमतौर पर करीब 7 लोग होते हैं, लेकिन अब सिर्फ़ दो लोग बचे हैं- शी जिनपिंग और जनरल झांग शेंगमिन.

बाकी पहले ही भ्रष्टाचार विरोधी कार्रवाई में हटा दिए गए हैं.

सेंट्रल मिलिट्री कमीशन लाखों सैनिकों को कंट्रोल करता है. यह इतना ताक़तवर है कि 1979 से 1989 तक देश के सबसे बड़े नेता देंग शियाओपिंग ने सिर्फ़ यही पद संभाला था.

इतने बड़े जनरल को हटाने की क्या वजह?

एशिया सोसाइटी पॉलिसी इंस्टीट्यूट के लाइल मॉरिस ने बीबीसी से कहा, "कमीशन में शी जिनपिंग और एक जनरल बचे हैं, ऐसा पहले कभी नहीं हुआ. पीएलए में बड़ी उथल-पुथल मची हुई है. चीन की सेना में शीर्ष नेतृत्व की जगह ख़ाली हो गई है."

जब मॉरिस से पूछा गया कि इतने बड़े जनरलों को हटाने की असली वजह क्या है, तो उन्होंने कहा, "बहुत-सी अफ़वाहें चल रही हैं. अभी सच क्या है और झूठ क्या है, पता नहीं. लेकिन यह राष्ट्रपति शी जिनपिंग के लिए बुरा है. उनकी अगुवाई और सेना पर कंट्रोल कमज़ोर दिख रहा है."

सिंगापुर के नेशनल यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर चोंग जा इयान ने भी कहा, "झांग को हटाने की सही वजह पता नहीं, लेकिन बहुत-सी बातें कही जा रही हैं. कुछ कहते हैं कि उन्होंने अमेरिका को परमाणु राज़ दिए, कुछ कहते हैं तख़्तापलट की साज़िश की या गुटबाज़ी हुई. अफ़वाहें तो यह भी हैं कि राजधानी बीजिंग में गोलीबारी हुई."

उन्होंने आगे कहा, "लेकिन झांग और झेनली के हटने और इन अफ़वाहों से दो बातें साफ़ हैं- शी जिनपिंग की ताक़त अभी भी बहुत मज़बूत है और बीजिंग से जानकारी बहुत कम मिलती है."

सरकार की ओर से तो यही कहा गया है कि झांग और झेनली जांच के दायरे में हैं और उन पर "अनुशासन और क़ानून का गंभीर उल्लंघन" करने के आरोप हैं. चीन में ये शब्द भ्रष्टाचार के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं.

चीनी आर्मी के आधिकारिक अख़बार पीएलए डेली ने एक लेख में इसे और साफ़ कर दिया. उसमें लिखा था, "कम्युनिस्ट पार्टी भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ ज़ीरो टॉलरेंस रखती है, चाहे कोई कितना भी बड़ा क्यों न हो, उसे सज़ा मिलेगी."

इन जनरलों पर असल में क्या आरोप हैं, यह जनता को नहीं बताया गया और शायद कभी बताया भी नहीं जाएगा. लेकिन जिनके नाम जांच में आए हैं, उन्हें कम से कम जेल की सज़ा तो मिल ही जाती है.

पीएलए डेली ने झांग और झेनली को पहले से ही दोषी मानते हुए लिखा, "उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी की केंद्रीय कमेटी का भरोसा तोड़ा और सेंट्रल मिलिट्री कमीशन को कमज़ोर किया."

माना जा रहा है कि जनरल भ्रष्टाचार की वजह से हटाए गए होंगे, लेकिन इसमें कोई राजनीति भी हो सकती है. ऐसा इसलिए क्योंकि पहले भी इस तरह से जनरल हटाए गए हैं. ऐसा कहा जाता है कि जब शी जिनपिंग सत्ता में आए थे, तब चीन में बहुत भ्रष्टाचार था.

लेकिन कुछ लोग कहते हैं कि शी जिनपिंग ने भ्रष्टाचार के नाम पर अपनी जांच टीमों का इस्तेमाल उन लोगों को हटाने के लिए किया जो उनके ख़िलाफ़ हो सकते थे या जो पूरी तरह वफ़ादार नहीं थे.

इससे शी जिनपिंग को फ़ायदा हुआ और माओ के बाद उन्हें सबसे मज़बूत कंट्रोल मिला. लेकिन इस तरह की राजनीति के नुक़सान भी होते हैं. सेना में डर का माहौल बन जाए तो लोग फ़ैसले लेने में डरते हैं या कमज़ोर फ़ैसले लेते हैं.

इनके हटने से पीएलए को नुक़सान हुआ?

झांग के पिता शी जिनपिंग के पिता के साथ क्रांति में साथ थे. झांग और शी बहुत पुराने साथी माने जाते थे. इसलिए उनका हटना और भी चिंताजनक रही है, क्योंकि इससे यही लग रहा है कि अब कोई भी सुरक्षित नहीं है.

झांग पीएलए के उन चुनिंदा अफ़सरों में से एक थे, जिन्होंने युद्ध देखा था. झांग का जाना चीनी सेना के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है.

एशिया सोसाइटी पॉलिसी इंस्टीट्यूट के लाइल मॉरिस मानते हैं कि झांग का जाना शी जिनपिंग को लंबे टाइम तक परेशान करेगा. उन्होंने कहा कि यह शी जिनपिंग के लिए एक बुरी तस्वीर है और आने वाले वर्षों में पीएलए में काफ़ी उलझन रहेगी.

इतने बड़े जनरलों के हटने से बाकी अफ़सर भी सोच रहे होंगे कि अब किसकी बारी है? नीचे के अफ़सर उच्च अधिकारियों का हाल देखकर शायद प्रमोशन भी न चाहें, क्योंकि प्रमोशन मिलते ही शी जिनपिंग की नज़र में आ जाएंगे और उन पर जांच बैठ जाएगी. जनरलों को हटाने का यह सिलसिला तब हो रहा है, जब चीन अपने पड़ोसी देश ताइवान पर दबाव बढ़ा रहा है. हमले से द्वीप पर क़ब्ज़ा कर लेने की धमकी दे रहा है.

विशेषज्ञ इस बात का आकलन कर रहे हैं कि बड़े जनरलों को हटाए जाने से ताइवान पर हमले की योजना कितनी कमज़ोर हुई है. कुछ का मानना है कि ज़्यादा असर नहीं पड़ेगा. प्रोफ़ेसर चोंग कहते हैं, "जनरलों को हटाए जाने से चीन की ताइवान पर क़ब्ज़े की इच्छा कम नहीं होगी. यह कम्युनिस्ट पार्टी और ख़ासकर शी जिनपिंग पर निर्भर है."

उन्होंने आगे कहा, "इसका प्रभाव शायद ऑपरेशन के फ़ैसलों पर पड़े. ऊंचे लेवल पर अच्छे सैन्य अफ़सर न हों या डरे हुए हों, तो सबकुछ शी ही तय करेंगे. ताइवान की तरफ़ बढ़ने या हमला करने के फ़ैसले खुद शी ही करेंगे."

बीबीसी की यवेट टैन की अतिरिक्त रिपोर्टिंग के साथ.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.