You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
क्या बांग्लादेश में सत्ता की कमान अब सेना के हाथ में होगी?
- Author, राघवेंद्र राव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
बांग्लादेश में कई हफ़्तों से चल रही अशांति की कहानी में जब पांच अगस्त को प्रधानमंत्री शेख़ हसीना के देश छोड़कर जाने का अध्याय जुड़ा तो इसकी घोषणा करने वाले शख़्स ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा.
बांग्लादेश सेना के अध्यक्ष जनरल वक़ार-उज़-ज़मान ने नेशनल टीवी पर आकर शेख़ हसीना के इस्तीफ़े की घोषणा की और साथ ही कहा कि बांग्लादेश में एक अंतरिम सरकार बनाई जाएगी.
ज़मान ने कहा कि सेना राष्ट्रपति से अंतरिम सरकार बनाने पर चर्चा करेगी, अंतरिम सरकार बनाएगी और देश को संभालेगी.
इस घोषणा के आते ही कई सवाल उठने लगे.
सबसे बड़े सवाल ये थे:
- कैसी होगी ये अंतरिम सरकार?
- क्या ये सरकार सेना के अधीन होगी?
- क्या बांग्लादेश एक मिलिटरी स्टेट या सैन्य राज्य बनने की दिशा में जा रहा है?
इन सवालों के साथ ही हालिया घटनाक्रम के दौरान बांग्लादेश में सेना की भूमिका के बारे में चर्चा शुरू हो गई.
क्या शेख़ हसीना का राज ख़त्म होने के पीछे सेना की भूमिका है और क्या सत्ता की चाबी अब जनरल वक़ार-उज़-ज़मान के हाथ आ गई है? ऐसी चर्चाएं भी हो रही हैं.
इन सब सवालों के जवाब तलाशने से पहले आइए जान लेते हैं बांग्लादेश सेना के अध्यक्ष वक़ार-उज़-ज़मान को.
कौन हैं वक़ार-उज़-ज़मान?
वक़ार-उज़-ज़मान का जन्म 1966 में ढाका में हुआ था.
क़रीब साढ़े तीन दशक लम्बे अपने करियर में उन्होंने कई साल शेख़ हसीना के साथ नज़दीकी तौर पर काम किया है.
वे प्रधानमंत्री कार्यालय के तहत सशस्त्र बल प्रभाग में प्रमुख स्टाफ़ अधिकारी के रूप में काम कर चुके हैं. बांग्लादेश सेना की वेबसाइट के मुताबिक़ ज़मान सेना के आधुनिकीकरण से भी जुड़े रहे हैं.
जनरल ज़मान को बांग्लादेश की सेना का अध्यक्ष बने बहुत ज़्यादा वक़्त नहीं बीता है. बीते 23 जून को ही उन्होंने बांग्लादेश सेना की कमान संभाली थी.
बांग्लादेश सेना की वेबसाइट के मुताबिक़, ज़मान के पास बांग्लादेश के राष्ट्रीय विश्वविद्यालय से रक्षा अध्ययन में स्नातकोत्तर की डिग्री और लंदन के किंग्स कॉलेज से रक्षा अध्ययन में कला में स्नातकोत्तर की डिग्री है.
सेना अध्यक्ष बनने से पहले उन्होंने छह महीने से अधिक वक़्त तक चीफ़ ऑफ़ जनरल स्टाफ़ के रूप में कार्य किया. इस भूमिका में उन्होंने सैन्य संचालन और खुफ़िया जानकारी, संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों और बजट की देखरेख की थी.
मौजूदा हालात में सेना की भूमिका?
साबिर मुस्तफ़ा वॉशिंगटन डीसी में वॉयस ऑफ़ अमेरिका बांग्ला के मैनेजिंग एडिटर हैं.
बांग्लादेश में मौजूदा संकट में सेना की भूमिका पर हमने उनसे बात की.
वो कहते हैं, "सेना ने क़ानून और व्यवस्था के मुद्दों पर हसीना सरकार का तब तक समर्थन किया जब तक कि यह साफ़ नहीं हो गया कि विरोध प्रदर्शन बहुत बड़े थे और प्रदर्शनकारी सेना की अवहेलना करने के लिए तैयार थे.”
“सेना प्रमुख जनरल वक़ार-उज़-ज़मान ने यह साफ़ कर दिया था कि वह अपने सैनिकों को गोली चलाने का आदेश नहीं देंगे. इससे शेख़ हसीना की किस्मत तय हो गई. लेकिन फिर सेना ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई. जनरल वक़ार ने देश चलाने के लिए अंतरिम सरकार के गठन पर चर्चा करने के लिए राजनीतिक दलों को आमंत्रित किया.”
तो क्या शेख़ हसीना को सत्ता से हटाने में सेना की कोई भूमिका रही है?
साबिर मुस्तफ़ा कहते हैं कि ऐसा लगता नहीं है. वे कहते हैं, "सेना ने अपनी भूमिका नियमानुसार निभाई है. हसीना ने जब कहा तब सेना ने काम किया और जब स्थिति की मांग हुई तब हस्तक्षेप किया. लेकिन कुछ दिन पहले सेना प्रमुख की अधिकारियों के साथ बैठक के दौरान अधिकारियों ने ये साफ़ कर दिया था कि अब तक अपने लोगों पर गोली नहीं चलाई. इसलिए राजनीतिक रूप से विवाद को सुलझाने की ज़िम्मेदारी शेख़ हसीना पर थी. वह नाकामयाब रहीं और उन्हें जाना पड़ा."
सवाल ये भी है कि क्या बांग्लादेश की सेना ने उग्र प्रदर्शनों का सहारा लेकर सत्ता हथियाने की कोशिश की है?
प्रोफ़ेसर हैप्पीमन जैकब दिल्ली-स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ़ इंटरनेशनल स्टडीज़ में कार्यरत हैं और भारत की विदेश नीति के जानकार हैं.
वे कहते हैं, "मुझे लगता है कि सेना तटस्थ रही और एक हद तक उन्होंने शांति स्थापित करने के लिए शेख़ हसीना प्रशासन का साथ दिया. लेकिन जब हालात मुश्किल हो गए तो उन्होंने और लोगों की हत्या जारी न रखने का फ़ैसला किया. उन्हें सत्ता हथियाने का मौका सूझा और उन्होंने ऐसा किया.”
“मुझे नहीं लगता कि यह कोई पहले से सोची समझी कोशिश थी. मुझे नहीं लगता कि हालात को भड़काने या उन्हें इस स्थिति तक पहुँचाने में उनकी कोई भूमिका थी. उन्हें एक मौका दिखा और उन्होंने सोचा कि शेख़ हसीना का सत्ता में बने रहना असहनीय है."
अंतरिम सरकार में सेना का दबदबा?
बांग्लादेश के सेनाध्यक्ष ने देश में अंतरिम सरकार बनाने की बात कही है. तो क्या अब अंतरिम सरकार में सेना की कोई भूमिका होगी? या सेना सिर्फ़ एक सरकार के गठन में मदद करेगी?
साबिर मुस्तफ़ा कहते हैं, "सेना प्रमुख ने सेना के सरकार चलाने के बारे में बात नहीं की. लेकिन उन्होंने प्रदर्शनकारियों से वादा किया कि सभी हत्याओं और अन्याय की जांच की जाएगी और वह यह सुनिश्चित करेंगे. इसलिए यह स्पष्ट है कि सेना सरकार में नहीं रहना चाहेगी, लेकिन देश को कैसे संचालित किया जाए इस बारे में उनकी बड़ी भूमिका बनी रहेगी...कम से कम फिलहाल तो."
प्रोफ़ेसर जैकब का कहना है कि बांग्लादेश में अंतरिम सरकार के गठन और संचालन में सेना अहम भूमिका निभाने जा रही है.
बांग्लादेश में प्रदर्शनकारी छात्रों ने साफ़तौर पर कहा है कि वो नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस को अगली सरकार की अगुवाई करता देखना चाहते हैं.
इस वक़्त बांग्लादेश में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी), जमात-ए-इस्लामी और प्रदर्शनकारी छात्र तीन मुख्य धड़े हैं. चौथा बड़ा धड़ा सेना है.
प्रोफ़ेसर जैकब कहते हैं, "ज़ाहिर है कि सेना प्रमुख इन सभी के साथ बातचीत कर रहे हैं. इसलिए अगर किसी अंतरिम सरकार के गठन की ज़रूरत है तो तो इन सभी को शामिल करना होगा. ये भी ध्यान रखना ज़रूरी है कि शेख़ हसीना को हटाने में वे एकजुट तो हुए लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उनके पास देश के भविष्य के लिए एक स्पष्ट एजेंडा है. मुझे नहीं लगता कि शेख़ हसीना के ख़िलाफ़ गए छात्रों में जमात-ए-इस्लामी के लिए बहुत ज़्यादा प्यार है. मुझे नहीं लगता कि सेना भी जमात-ए-इस्लामी को ख़ास पसंद करती है.
क्या बांग्लादेश सैन्य राज्य बनने की ओर बढ़ रहा है?
साबिर मुस्तफ़ा इस बात से इत्तेफ़ाक़ नहीं रखते.
वे कहते हैं कि सेना जो भूमिका निभा रही है वो इसलिए है क्योंकि बांग्लादेश में इस वक़्त कोई अन्य संस्था नहीं है जो मध्यस्थ की भूमिका निभा सके. उनके मुताबिक़ सेना सत्ता नहीं संभाल रही है और निकट भविष्य में ऐसा करने की उनकी कोई योजना नहीं लगती है.
मुस्तफ़ा के मुताबिक़, बांग्लादेश की सेना इस बात का ध्यान रखना चाहेगी कि चीज़ें कैसे व्यवस्थित की जाएं ख़ासतौर पर नए चुनावों के लिए आगे का रास्ता कैसे बनाया जाए.
वो कहते हैं, "वक़ार-उज़-ज़मान महत्वाकांक्षी नहीं दिखते और काम करने की बात करते समय 'हम' शब्द का इस्तेमाल करते रहे हैं. संक्षेप में वे खुद को एक स्ट्रांगमैन के रूप में पेश नहीं कर रहे हैं. इसलिए मैं अंतरिम चरण के लिए सेना को एक फैसिलिटेटर के रूप में काम करते हुए देखता हूं."
'गेंद सेना के पाले में है'
प्रोफ़ेसर हैप्पीमन जैकब कहते हैं कि ये कहना नामुमकिन है कि क्या बांग्लादेश एक सैन्य राज्य बनने की राह पर है या नहीं. लेकिन साथ ही वे कहते हैं कि "गेंद सेना के पाले में है".
वे कहते हैं, "अगर उन्हें (सेना को) लगता है कि वे पूर्ण सत्ता चाहते हैं तो तकनीकी रूप से कहें तो उनके लिए यह मुमकिन हो सकता है... सत्ता हथियाओ और सत्ता बनाए रखो."
उनका कहना है कि सेना ये बात भी जानती है कि शेख़ हसीना प्रशासन को इसलिए हटाया गया क्योंकि आम जनता उन्हें पसंद नहीं करती थी...युवा उन्हें पसंद नहीं करते थे, छात्र उन्हें पसंद नहीं करते थे.
वे कहते हैं, "और पिछली सरकार ने जो कठोर और अत्याचारी क़दम उठाये वो काम नहीं आए और सैकड़ों-हज़ारों लोग शेख़ हसीना के घर की ओर मार्च कर रहे थे. अगर सेना प्रमुख उस सबक को गंभीरता से लेते हैं तो मुझे लगता है कि सेना सत्ता हथियाने और मार्शल लॉ लागू करने से पहले दो बार सोचेगी."
प्रोफ़ेसर जैकब का मानना है कि सेना तुरंत सत्ता हथियाने के लिए कुछ नहीं करेगी.
वो कहते हैं, "वे स्थिरता का इंतज़ार करना चाहेंगे और जब तक स्थिरता हासिल नहीं हो जाती, वे ऐसी योजना बनाने की कोशिश करेंगे जिसमें सभी को खुश रखा जा सके. अगर उन्हें लगता है कि स्थिरता हासिल होने के बाद सेना की मज़बूत मौजूदगी वाली व्यवस्था को जारी रखा जा सकता है, तो मुझे लगता है कि वे उस समय इस बारे में सोचना चाहेंगे. मुझे नहीं लगता कि वे इस समय उस रास्ते पर चलना चाहेंगे."
आगे की राह
प्रोफ़ेसर जैकब के मुताबिक़ "कहानी अभी ख़त्म नहीं हुई है."
वे कहते हैं, "हम अभी भी बांग्लादेश में हसीना के बाद के राजनीतिक भविष्य को देख रहे हैं और मुझे लगता है कि कई प्रतिस्पर्धी ताक़तें इस अवसर का फ़ायदा उठाने की कोशिश कर रही हैं. इसलिए इससे क्या निकलेगा, ये कोई नहीं जानता."
उनके मुताबिक़ अतीत में ऐसे कई उदाहरण हैं जब बांग्लादेश में सेना ने सत्ता संभाली और कुछ वर्षों के लिए अंतरिम प्रशासन की स्थापना की और फिर लोकतंत्र की ओर लौट गई. "अब तक तो ऐसा लगता है कि वे इसी पर काम कर रहे हैं. लेकिन ये नहीं कहा जा सकता कि इतिहास इस बार खुद को दोहराएगा या नहीं."
साथ ही वो कहते हैं कि अगर अतीत के उदाहरणों पर ग़ौर करें तो सेना एक ऐसी संयुक्त सरकार बना सकती है जिसमें अवामी लीग के अलावा सभी मुख्य खिलाड़ी हों. उनके मुताबिक़ ये संयुक्त सरकार देश में एक निश्चित स्थिरता पैदा कर सकती है जिसके बाद एक या दो सालों में आम चुनावों का रास्ता साफ़ हो सकता है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)