लखनवी कबाब-बिरयानी के 'ज़ायके' पर क्यों मंडरा रहा ख़तरा

लखनवी टुंडे कबाब
    • Author, शकील अख़्तर
    • पदनाम, बीबीसी उर्दू

लखनऊ में जैसे ही रात होती है, वहां की हवा कोयले और तंदूर से पकाए गए कबाब और धीमी आंच पर पकने वाली बिरयानी की तेज़ सुगंध से भर जाती है. ख़ाने के शौकीन लोग न चाहते हुए भी इनकी ओर खिंचे चले आते हैं.

लखनऊ अपनी सभ्यता, संस्कृति और अपने स्वादिष्ट खाने के लिए प्रसिद्ध है. समय के साथ शहर की वो सभ्यता तो जाती रही लेकिन यहां के जायकेबाज़ों ने तरह-तरह के कबाब, बिरयानी समेत ऐसे व्यंजन बनाए जो अब लखनऊ की पहचान बन गए हैं.

शहर के तुलसी कंपाउंड के पास एक प्रसिद्ध रेस्तरां नौशी जान के मालिक शमील शम्सी लखनऊ के कबाबों के बारे में कहते हैं कि, "ये स्वादों की एक आकाशगंगा है." लेकिन इन स्वादिष्ट चारकोल-ग्रिल्ड कबाब और यहां की ख़ास यखनी, बिरयानी पर अब ख़तरे मंडरा रहे हैं.

लखनऊ प्रशासन ने हाल ही में वायु प्रदूषण को कम करने की कोशिशों के तहत शहर के सभी कोयले से चलने वाले रेस्तरां और दुकानों को कोयले की बजाय गैस पर स्विच करने के लिए कहा है.

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उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में वायु प्रदूषण एक बड़ी समस्या है. स्थानीय प्रशासन ने प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए एक पर्यावरण अनुसंधान संस्थान एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट से शहर के वातावरण का अध्ययन कराया. एजेंसी ने पाया कि शहर की वायु गुणवत्ता बेहद ख़राब हो गई है.

इसी अध्ययन में बताया गया है कि शहर के रेस्तरां में कोयले की जगह गैस के इस्तेमाल से वायु प्रदूषण में काफ़ी कमी आ सकती है. इस रिपोर्ट के बाद लखनऊ नगर निगम ने हाल ही में शहर के सभी रेस्तरां को खाना पकाने के लिए कोयले और तंदूर की बजाय गैस स्टोव का इस्तेमाल करने को कहा है.

हालांकि, अब रेस्तरां मालिकों और खान-पान के शौकीनों को ये डर सता रहा है कि कबाब और बिरयानी जैसी चीज़ों को पकाने से उनका मूल और पारंपरिक स्वाद ही ख़त्म हो जाएगा.

अमीनाबाद में शहर के मशहूर 'टुंडे कबाब' रेस्तरां के मालिक मोहम्मद उस्मान कहते हैं कि ये कबाब और बिरयानी सदियों से कोयले पर पकाए जाते रहे हैं.

कोयला इन्हें ख़ास ज़ायका देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. इनमें से कई व्यंजन तंदूर में बनाए जाते हैं. उनका कहना है, 'हम भी वायु प्रदूषण को लेकर चिंतित हैं और प्रशासन जो भी निर्णय लेगा हम उसका पालने करेंगे, लेकिन खाना पकाने के अलग-अलग पहलुओं पर भी विचार करने की ज़रूरत है.'

उनका कहना है कि स्थानीय प्रशासन को इस बारे में और शोध की जरूरत है. "इस तरह अचानक लिए गए फैसले से मुश्किलें बढ़ेंगी."

कोयला
इमेज कैप्शन, लखनऊ प्रशासन ने वायु प्रदूषण की वजह से कोयले को बैन करने की तैयारी की है

'कोयले पर पके कबाब का स्वाद ही अलग होता है'

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लखनऊ नगर निगम के फ़ैसले के बाद कई रेस्तरां मालिकों ने कोयले के साथ-साथ गैस स्टोव भी लगवा लिया है.

पुराने शहर के मुख्य चौक इलाके में सबसे पुराने टुंडे कबाब रेस्तरां में अब कोयले के तंदूर और भट्टियों के साथ एक बड़ा गैस स्टोव भी लगाया गया है.

बीबीसी से बात करते हुए रेस्तरां के मालिक मोहम्मद अबुबकर ने कहा कि कोयले पर बने कबाब में जो स्वाद है, वह गैस में नहीं है. "अब हम गैस पर कबाब बनाने लगे हैं, लेकिन कई ग्राहक कहते हैं कि गैस स्टोव पर कबाब अच्छे नहीं बनते, हमें कोयले से बने कबाब दीजिए, कोयले से बने कबाब का स्वाद ही अलग होता है."

वह कहते हैं, "अलग-अलग तरह के कबाब, पुलाव, यखनी बिरयानी और ख़ास तरह की रोटी, शेरमाल, पराठा लखनऊ की पहचान हैं. इन व्यंजनों का स्वाद चखने वालों का कहना है कि इन्हें गैस पर पकाने से इनका असली स्वाद ख़त्म हो जाएग."

सोशल मीडिया इन्फ़्लुएंसर सबा जाफ़री कहती हैं, "काकोरी कबाब, शामी कबाब, गुठवा कबाब, बोटी कबाब, गिलावटी कबाब, मजलिसी कबाब, ये सब लखनऊ की जान हैं. अगर आप उन्हें गैस पर पकाएंगे तो ये बहुत क्रूर होगा."

एक रेस्तरां में अपने परिवार के साथ तंदूरी कबाब लुत्फ़ उठा रहीं ग़ज़ाला परवीन कहती हैं, "असली मज़ा कोयले से आता है. इसमें जो स्वाद होगा वह कभी भी गैस पर बने कबाब में नहीं होगा. इतने सालों तक कोयले पर खाना बनता रहा तो पर्यावरण प्रदूषित नहीं होता था. सड़क पर इतना प्रदूषण है, ये नहीं दिखता. उन्हें सिर्फ़ कोयले से परेशानी है."

एक रेस्तरां में मनल फ़ज़ा नाम की महिला ने बीबीसी से कहा, "अगर आपको गैस पर बना ही खाना है तो आप घर पर भी खा सकते हैं. आप यहां क्यों आएंगे? कोयला एक ऐसी चीज़ है जो भोजन में धुएं का स्वाद जोड़ता है. ये खाने को और भी मज़ेदार बना देता है."

लखनऊ के रहने वाले जुनैद सिद्दीक़ी कहते हैं कि लखनऊ के सभी पारंपरिक व्यंजनों की खासियत है कि वे कोयले और लकड़ी पर प्राकृतिक रूप से पकाए जाते हैं.

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'हमने किसी को बाध्य नहीं किया'

लखनऊ नगर आयुक्त इंद्रजीत सिंह ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि लखनऊ की पहचान यहां के व्यंजनों का स्वाद है. शहर के करीब तीन हज़ार रेस्तरां कोयले पर ये पारंपरिक व्यंजन तैयार कर रहे हैं.

उनका कहना है, "हमने उनके मालिकों से बात की है और उन्हें जागरूक करने की कोशिश की है कि कोयला जलाने से बहुत अधिक वायु प्रदूषण होता है. ये उनके पास काम करने वाले लोगों के स्वास्थ्य को भी नुकसान पहुंचा रहा है."

इंद्रजीत सिंह का कहना है इन रेस्तरां मालिकों ने हमारी बातों को सुना और अपनी मर्ज़ी से गैस भट्टियां लगा लीं. उन्होंने कहा, "अब तक 100 लोग गैस भट्टियां लगा चुके हैं. ये स्वैच्छिक है, हम किसी पर दबाव नहीं डाल रहे हैं."

लखनवी कबाब

'हम सरकार की पहल का समर्थन करेंगे, लेकिन...'

लखनऊ के इमामबाड़ा रोड के दोनों किनारों पर दर्जनों छोटे-बड़े रेस्तरां हैं जो तरह-तरह के कबाब, बिरयानी, शीरमाल और तरह-तरह के व्यंजन परोसते हैं.

यहां के मशहूर रेस्तरां 'कबाबची' के मालिक हामिद हुसैन ने बीबीसी से कहा कि सरकार जो भी कदम उठाएगी हम उसका समर्थन करेंगे लेकिन इस फ़ैसले में जल्दबाज़ी करने की ज़रूरत नहीं है.

उनका कहना है कि सभी रेस्तरां से एक साथ कोयला हटाना ठीक नहीं है. ख़ासकर वो जो टैक्स भरते हैं. लखनऊ में कई रेस्तरां मालिक खोमचों पर खाना बेच रहे हैं, जहां खरीदारों की कतारें लगी रहती हैं. यानी कि स्वाद बिकता है. इस स्वाद का मुख्य हिस्सा पानी है और दूसरा हिस्सा कोयले की आग है. इसका समाधान ढूंढने की ज़रूरत है.

ताहिरा साद रिज़वी फूड बिज़नेस चलाने वाले परिवार से आती हैं. उनका कहना है कि वायु प्रदूषण यहां एक समस्या है लेकिन कोयले पर प्रतिबंध से ये कितना सुधरेगा, इसमें संदेह है.

वह कहती है कि प्रशासन ने पूरी रिसर्च के बाद ही ये फ़ैसला लिया होगा क्योंकि इसके कई प्रभाव होंगे. उन्होंने कहा, "ऐसे कई व्यंजन हैं जिन्हें कोयले के बिना बनाने की हमने कभी कल्पना भी नहीं की होगी."

लखनऊ के तुलसी कंपाउंड के पास लोकप्रिय बिरयानी और कबाब हब नौशी जान रेस्तरां के मालिक शमील शम्सी इस बात से असहमति जताते हैं कि कोयले पर रोक लगाने से वायु गुणवत्ता में सुधार होगा.

उनका कहना है कि यह बिल्कुल पर्यावरण का मामला नहीं है. यह बात पूरी तरह गलत है कि लखनऊ की हवा प्रदूशित हो रही है.

पुराने लखनऊ शहर के चौक इलाके में एक लोकप्रिय 'इदरीस बिरयानी' रेस्तरां है. यहां लखनऊ की ख़ास यखनी बिरयानी बिकती है. इस पुरानी शैली के रेस्तरां के बाहर, कोयले से जलने वाले तंदूर पर पाँच-छह कढ़ाहियां चढ़ी हुई हैं.

इदरीस बिरयानी के मालिक मोहम्मद अबुबकर का कहना है कि स्वाद तो ऊपर वाले के हाथ में है, लेकिन सरकार को बीच का रास्ता निकालना चाहिए.

वह कहते हैं, "हमें भी समाज में रहना है और देखना है कि सरकार लोगों के हित में क्या अच्छा कर रही है. हमें सरकार की पहल का पालन करना होगा, लेकिन कोयले के संबंध में अगर कुछ रियायत दी जाए तो यह काफ़ी बेहतर है."

कोयला

हिमांशु बाजपेई शहर के जाने-माने क़िस्सागो हैं. उन्होंने अपने कई क़िस्सों के ज़रिए लखनऊ की पुरानी सभ्यता के अलग-अलग पहलुओं पर रोशनी डाली है.

उनका कहना है कि प्रदूषण यहां एक बड़ी समस्या है लेकिन अगर सरकार की मंशा वाकई सही है तो प्रशासन को सबसे पहले ठोस योजना के तहत कार्रवाई करनी चाहिए और शहर में गोमती नदी को साफ़ करना चाहिए. यहां पूरे शहर का सीवेज और कचरा जमा होता है. कारखानों से गंदगी गिरती है. कोयले से भी वायु प्रदूषण बढ़ रहा है लेकिन पहले कारखानों और मोटर वाहनों से होने वाला प्रदूषण कम करें.

हिमांशु बाजपेई कहते हैं, "सरकार की इस पहल से उन लोगों में चिंता पैदा हो रही है जो पीढ़ियों से पारंपरिक तरीके से खाना बना रहे हैं, लेकिन वे धीरे-धीरे नए तरीके को अपना लेंगे. लखनऊ में इतने प्रतिभाशाली लोग हैं कि वे गैस पर भी आनंद और स्वाद लाएंगे."

रेस्तरां मालिक धीरे-धीरे अपने यहां गैस स्टोव लगा रहे हैं. वे जानते हैं कि वायु प्रदूषण एक संवेदनशील मुद्दा है और देर-सबेर उन्हें कोयले का इस्तेमाल बंद करना ही होगा. अब उनका ध्यान खाना पकाने के बदलते तरीकों में अपने व्यंजनों का स्वाद बरक़रार रखने पर है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

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