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बुधवार, 18 अगस्त, 2004 को 13:24 GMT तक के समाचार

रामदत्त त्रिपाठी
लखनऊ से बीबीसी संवाददाता

लंबी कहानी है लखनऊ के टुंडे कबाब की

दिल्ली, मुंबई या पश्चिम के किसी शहर से लखनऊ आने वाले मेहमानों की अक्सर एक फ़रमाइश होती है टुंडे कबाब खाने की.

पाँच सितारा होटलों के एयरकंडीशंड रेस्त्रां छोड़कर ये लोग पुराने लखनऊ के चौक और नज़ीराबाद की भीड़-भाड़ वाली गली में टुंडे कबाब खाने जाते हैं.

और कबाब खाते ही नहीं बहुत से लोग यहाँ से कबाब पैक भी कराकर ले जाते हैं.

शुद्ध शाकाहारी होने के कारण मैंने कभी वहाँ जाने की जरूरत नहीं समझी.

फिर भी सोचा कि चलो पता करते हैं कि आखिर ये टुंडे कबाब क्या चीज़ है और करीब 100 सालों से लोग क्यों इसके दीवाने बने हुए हैं.

दूकान

चौक में अकबरी गेट के पास एक गली में मिली टुंडे कबाबी की यह दुकान.

बगल में एक तरफ चाँदी की वर्क कूटी जा रही थी, जो मिठाइयों में सजावट और सेहत के लिए लगाई जाती है.

दूसरी तरफ एक और 100 साल पुरानी दुकान-रहीम की नहारी कुलचे की.

एक बड़ी सी परात में कोयले की धीमी-धीमी आँच में कबाब पक रहे थे.

कारीगर मोहम्मद फ़ारूख करीब 25 सालों से यही काम कर रहे हैं. उनका कहना है कि टुंडे कबाब में माँस, मसाले और पकाने का जो फ़ार्मूला सदियों से चल रहा है वह आज भी हिट है और उसमें रद्दोबदल की जरूरत नहीं.

मगर असली सवाल मेरे दिमाग में यह था कि यह कबाब बनाने का सिलसिला शुरू कब हुआ और इसका नाम आखिर टुंडे कबाब क्यों पड़ा?

दुकान के मालिक हैं टोपी वाले बुज़ुर्ग 70 साल के रईस अहमद जो बड़ी मुश्किल से बातचीत के लिए तैयार हुए.

शायद उनको शक था कि मैं उनके हिट खानदानी फ़ार्मूले का नुस्ख़ा जानने आया हूँ.

खैर, रईस मियाँ जब एक बार माइक के सामने आए तो फिर धीरे-धीरे खुल ही गए.

भोपाल से अवध

रईस अहमद के पुरखे कोई 200 साल से ऊपर हुए भोपाल से आए थे, ये लोग भोपाल के नवाब के बावर्ची थे.

वे कहते हैं कि नवाब लोग खाने-पीने के बड़े शौक़ीन थे.

मगर जब बुढ़ापा आया और किसी नवाब या उनकी बेगम के मुँह में दाँत नहीं रहे और गोश्त खाने में मुश्किल होने लगी तो उनकी फ़रमाइश पर माँस को बारीक पीसकर अच्छे-अच्छे मसालों और पपीता डालकर ऐसा कबाब बनाया गया जो बस मुँह में रखते ही घुल जाए.

बूढ़े क्या, जवान नवाबों को भी गिलावट के कबाब का ऐसा चस्का लगा कि इन्हें अवध के शाही कबाब का दर्जा मिल गया.

कबाब का 'सीक्रेट' नुस्ख़ा

कबाब में बड़े यानी भैंस और छोटे यानी बकरे, दोनों के गोश्त का इस्तेमाल होता है.

कारीगरों का कहना है कि इसको बनाने में करीब 100 तरह के मसालों का इस्तेमाल होता है. इनमें से कुछ ईरान और दूसरे मुल्कों से भी आते हैं.

कबाब सुपाच्य हों इसलिए हर्रे का खास इस्तेमाल होता है लेकिन रईस अहमद मसालों, उनके अनुपात या पकाने का दूसरा विवरण देने को तैयार नहीं, उनका कहना है कि यह एक ख़ानदानी सीक्रेट है.

पड़ोसी पान वाले ने मुझे बताया कि रईस अहमद की दोनों बेटियाँ इसीलिए नाराज हो गयीं कि उन्हें टुंडे कबाब के मसालों का फ़ार्मूला नहीं बताया गया.

रईस अहमद ने इस बात की तस्दीक की, "हम मसालों को सीक्रेट रखते हैं. अपने या अपने ही नस्ल में हमारे दादा बाबा ने हमको बताया, हम अपने बच्चों को सिखाते-बताते हैं. अपने लड़कों को बता दिया. लड़कियाँ थोड़े कारोबार करेंगी हमारे यहाँ"

और टुंडे नाम कैसे पड़ा. इस नायाब नवाबी कबाब का?

टुंडे का मतलब

टुंडे शब्द के मायने हैं लूला या जिसका हाथ कटा हो.

रईस अहमद कहते हैं, "जब दादा वग़ैरह बैठते थे, उनके वालिद बैठते थे, दुकान पर यूं ही बैठते थे. मशहूर तब से हुई कि जबसे हमारे वालिद का हाथ पतंग उड़ाते समय टूट गया जिसे बाद में काटना पड़ा. उसी कटे हाथ से बैठते थे दुकान के ऊपर तो वो टुंडे कबाबी मशहूर हो गए."

इनका असली नाम था हाजी मुराद अली, जैसे बनाने वाले पुराने, वैसे ही खाने वाले भी, पीढ़ियों का रिश्ता है.

लखनऊ के ही सैय्यद मोहम्मद वक़ार का कहना है कि टुंडे कबाब का स्वाद, खुशबू, फ़्लेवर और क्वालिटी बिलकुल पहले जैसी बरक़रार है, इसीलिए यह आज भी पहले जैसे मशहूर हैं.

कबाब की शोहरत

एसएम रियाज़ इलेक्ट्रॉनिक्स मैकेनिक हैं और अपनी पत्नी बिन्ते ज़ोहरा को बड़ी दूर से यहाँ कबाब खिलाने लाते हैं, जानते हैं क्यों?

क्योंकि शाहरूख़ ख़ान भी यहाँ कबाब खाने आये थे.

सब का कहना है कि कबाब तो उनके घर में भी बनता है, पर ये बात पैदा नहीं होती.

आठ-दस साल पहले टुंडे कबाब की एक नई ब्रांच खुल गई है अमीनाबाद से सटे नज़ीराबाद में, जहाँ रईस अहमद के बेटे मोहम्मद कमाल उस्मानी बैठते हैं.

कमाल उसमानी को सिंगापुर बुलाया गया था अपने कबाब पेश करने.

वह बंबई में बीजेपी नेता प्रमोद महाजन और शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे के यहाँ भी कबाब बना चुके हैं. फिल्मी सितारों, शायरों, गायकों की लंबी फ़ेहरिस्त है जो उनके मेहमान होते हैं.

उस्मान भाई का कहना है कि फिलहाल वह कुछ नया करने की नहीं सोचते.

उनके दादा हाजी मुराद अली ने जब दुकान शुरू की थी तो एक पैसे के 10 कबाब मिलते थे और आज 10 रुपए प्लेट में लोगों का पेट भर जाता है.

शाकाहारी कबाब

कमाल उस्मानी कहते हैं उनके परिवार का उद्देश्य मुनाफ़ा कमाना नहीं है, "सदाक़त ख़ुद ब ख़ुद करती है शोहरत, ज़माने में मुनाफ़ा चाहिए इतना कि जितना हो नमक खाने में."

उस्मान भाई कहते हैं कि उनके घर में शाकाहारी खाना भी ऐसा उम्दा बनता है कि लोग करेला खाकर झूम उठें.

उन्होंने वादा किया कि अगर जगह का बंदोबस्त हो गया तो मेरे जैसे शाकाहारी के लिए भी वेज कबाब, वेज बिरयानी और कुछ ऐसे ही पकवानों का इंतज़ाम करेंगे.

शुद्ध शाकाहारी होने के कारण मैं कबाब का स्वाद तो नहीं चख सका, लेकिन वह खुशबू जो धीमे-धीमे आँच से धुएँ के साथ उठ रही थी, अब भी मुझे याद आ रही है.