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दिल्ली में पैरा एथलेटिक्स: 22 पदक, 10वां स्थान, फिर भी नदारद रहे दर्शक
- Author, नॉरिस प्रीतम
- पदनाम, वरिष्ठ खेल पत्रकार, बीबीसी हिन्दी के लिए
दिल्ली में आयोजित विश्व पैरा एथलेटिक्स प्रतियोगिता में भारत ने 6 स्वर्ण, 9 रजत और 7 कांस्य पदक जीते. कुल 22 पदकों के साथ भारत ने पदक तालिका में दसवां स्थान हासिल किया.
जिन लोगों को पैरा खेलों का महत्व नहीं पता या जिन्होंने कभी पैरा खिलाड़ियों से मिलने का अवसर नहीं पाया, उनके लिए शायद यह दसवां स्थान बहुत अहमियत न रखता हो.
लेकिन अगर यह समझा जाए कि इन खिलाड़ियों ने किन कठिन परिस्थितियों में यह मुकाम पाया है, तो यह प्रदर्शन वाकई काबिल-ए-तारीफ़ है.
सुमित अंतिल, सिमरन शर्मा और निषाद कुमार जैसे भारतीय पैरा खिलाड़ी सामाजिक और आर्थिक कठिनाइयों से जूझते हुए इस मुकाम तक पहुँचे हैं.
निषाद कुमार की 2.14 मीटर की ऊँची छलांग शानदार प्रदर्शन रहा.
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दर्शकों की मौजूदगी किसी भी खिलाड़ी के मनोबल को बढ़ाती है, और पैरा खिलाड़ियों के लिए यह समर्थन और भी अहम होता है.
रोज़मर्रा की ज़िंदगी में जिन पर शायद ही कोई ध्यान देता है, वही खिलाड़ी जब विश्व स्तर की प्रतियोगिता में देश के लिए पदक जीतते हैं, तो खाली स्टेडियम उनके साहस और मेहनत का अपमान लगता है.
दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में भी यही स्थिति रही, जहाँ यह विश्व प्रतियोगिता आयोजित की गई थी.
आयोजनों की अनदेखी?
अफ़सोस की बात है कि आयोजकों की ओर से भी कई कमियाँ रहीं. यहाँ तक कि 1977-78 में अर्जुन पुरस्कार पाने वाले सतीश कुमार को भी आमंत्रित नहीं किया गया.
शायद आयोजकों को यह पता ही नहीं था कि दिल्ली के सतीश कुमार ने जर्मनी के कोलोन में हुई विश्व मूक-बधिर एथलेटिक्स प्रतियोगिता में भाग लिया था.
उन्होंने 25 किलोमीटर रेस में रजत और 10 हज़ार मीटर रेस में कांस्य पदक जीता था. इससे पहले सतीश ने 1977 की विश्व प्रतियोगिता में 25 किलोमीटर दौड़ में चौथा स्थान हासिल किया था.
अगर पैरा खेलों के आयोजक ही अपने पुराने खिलाड़ियों को याद नहीं रखेंगे, फिर आम जनता से कैसी उम्मीद की जा सकती है. जिस साल सतीश कुमार को अर्जुन पुरस्कार मिला, उसी साल क्रिकेटर जी. विश्वनाथ और हॉकी खिलाड़ी हरचरण सिंह को भी यह सम्मान मिला था.
कुछ लोगों ने दिल्ली की अचानक बढ़ी गर्मी और उमस को नेहरू स्टेडियम न आने की वजह बताया. लेकिन क्या उन्होंने सोचा कि व्हीलचेयर पर बैठकर प्रतियोगिता में भाग लेने वाले पैरा खिलाड़ियों का क्या हाल हुआ होगा?
वैसे भी इस स्तर तक पहुँचने के लिए कई खिलाड़ियों के परिवारों ने अपनी पूरी पूँजी दाँव पर लगा दी थी. किसी ने ज़मीन बेची, तो किसी ने पुश्तैनी जेवर. इतना ही नहीं, सामाजिक रूप से भी इन खिलाड़ियों को अक्सर उपेक्षा झेलनी पड़ती है.
अन्य खिलाड़ियों की तुलना में पैरा खिलाड़ियों के लिए सबसे ज़्यादा ज़रूरी होता है एक अच्छा फ़िज़ियोथेरेपिस्ट, जो या तो उन्हें मिलता नहीं है या फिर इतना महँगा होता है कि उनकी पहुँच से बाहर हो जाता है.
बड़े शहरों में तो किसी तरह काम चल जाता है, लेकिन छोटे शहरों में सुविधाओं की भारी कमी है. ऐसे में कठिन परिस्थितियों में जीवन गुज़ारना और खेलों में हिस्सा लेना, इन खिलाड़ियों के जज़्बे और हिम्मत को दर्शाता है.
खिलाड़ियों का संघर्ष जारी
हरियाणा व्हीलचेयर क्रिकेट के सचिव तरंग कश्यप ख़ुद व्हीलचेयर पर हैं.
उन्होंने कई बार शिकायत की है कि अगर वे मेट्रो में सफ़र करना चाहें तो यह लगभग असंभव है, क्योंकि मेट्रो स्टेशन के सिक्योरिटी गेट इतने तंग होते हैं कि व्हीलचेयर अंदर नहीं जा सकती.
सिक्योरिटी वाले कहते हैं कि व्हीलचेयर को फोल्ड करके अंदर ले जाएँ, जबकि तरंग कहते हैं "अगर मैं उतर ही सकता, तो फिर व्हीलचेयर की ज़रूरत ही क्या थी. लेकिन ये बात अक्सर सुरक्षा कर्मियों की समझ नहीं आती.''
विश्व प्रतियोगिता के लिए नेहरू स्टेडियम को तो सुलभ बनाया गया, लेकिन क्या देश के अन्य शहरों में ये खिलाड़ी बिना मुश्किलों के स्टेडियम पहुँच सकते हैं?
जवाब है, नहीं. अक्सर उन्हें गोद में उठाकर ले जाया जाता है, जो उनके आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाता है.
कॉर्पोरेट स्पॉन्सरशिप भी बहुत कम है, और जो मिलती है, वह केवल पदक जीतने वाले खिलाड़ियों तक सीमित है.
'ओलंपिक गोल्ड क्वेस्ट' जैसी संस्थाएँ इस दिशा में काम कर रही हैं, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि इन खिलाड़ियों को कॉर्पोरेट समर्थन पाने लायक कैसे बनाया जाए?
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.