बीबीसी पैरा-स्पोर्ट्सवुमन ऑफ़ द ईयर: पैरालंपिक में दो गोल्ड जीतने वालीं पहली भारतीय महिला अवनि लेखरा

    • Author, दीप्ति पटवर्धन
    • पदनाम, खेल पत्रकार

अवनि लेखरा जब 13 साल की थीं तब उन्होंने स्पोर्ट्सपर्सन बनने का फ़ैसला किया.

अवनि को ये फ़ैसला लेने की प्रेरणा अभिनव बिंद्रा की आत्मकथा से मिली जो कि उस वक्त तक ओलंपिक की व्यक्तिगत प्रतिस्पर्धा में गोल्ड जीतने वाले एकमात्र भारतीय थे.

लेखरा उस वक्त ये जानती थीं कि उन्हें अपनी मदद खुद करनी होगी.

17 फ़रवरी को बीबीसी इंडियन स्पोर्ट्सवुमन ऑफ़ द ईयर अवॉर्ड समारोह में भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस धनंजय यशवंत चंद्रचूड़, कांग्रेस नेता सचिन पायलट और सांसद कार्तिकेय शर्मा ने अवनि लेखरा को बीबीसी पैरा-स्पोर्ट्सवुमन ऑफ़ द ईयर का अवॉर्ड दिया.

अवनि 23 साल की उम्र में पैरालंपिक में गोल्ड मेडल जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनी थीं. लेखरा ने यह कारमाना टोक्यो पैरालंपिक 2020 में 10 मीटर एयर राइफल एसएच 1 इवेंट में किया. हालांकि, कोरोना महामारी की वजह से टोक्यो पैरालंपिक का आयोजन 2021 में हुआ था.

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अवनि ने फ़ाइनल में 249.6 का स्कोर बनाकर वर्ल्ड रिकॉर्ड की बराबरी की और पैरालंपिक में नया रिकॉर्ड भी बनाया.

तीन साल बाद पेरिस पैरालंपिक 2024 में भी अवनि लेखरा ने गोल्ड मेडल जीता और पैरालंपिक में दो गोल्ड जीतने वालीं वो पहली भारतीय महिला बनीं.

लेखरा ने पेरिस पैरालंपिक में अपना वो रिकॉर्ड भी तोड़ा जो कि उन्होंने टोक्यो में बनाया था.

इससे पहले सितंबर 2024 में मेडल समारोह के दौरान लेखरा ने बताया कि वो पेरिस गेम्स से पहले पूरी तरह से फ़िट नहीं थीं.

लेखरा ने कहा, "हाल ही मेरी गाल ब्लेडर सर्जरी हुई थी और मैं बेड रेस्ट पर थी. उससे बाहर आने के लिए मानसिक तौर पर मजबूती चाहिए थी और बहुत सारी ट्रेनिंग की भी ज़रूरत थी ताकि फ़िजिकल स्ट्रेंथ हासिल की जाए. ये पैरालंपिक पिछले वाले से मुश्किल रहा."

हालांकि, शारीरिक चुनौतियों को पार करना ही अवनि लेखरा के सफ़र का केंद्र रहा है.

2012 में लेखरा के परिवार का कार एक्सीडेंट हुआ था. एक्सीडेंट के कारण अवनि को रीढ़ की हड्डी में चोट लगी और कमर से नीचे का हिस्सा पैरालाइज़्ड हो गया.

अवनि को छह महीने तक बेड रेस्ट पर रहना पड़ा. लेकिन आगे की लड़ाई और ज़्यादा मुश्किल रही.

अवनि को सबकुछ नए सिरे से सीखना पड़ा जिसमें कैसे बैठना है, ये भी शामिल था. उन्हें भावनात्मक तौर पर भी बहुत कुछ झेलना पड़ा.

दो साल बाद जब अवनि स्कूल में वापसी करने को तैयार थीं तो उनके परिवार को ऐसा स्कूल खोजने में परेशानी आई जो कि विकलांग बच्चों के माकूल हो.

2015 में अवनि के पिता ने उन्हें घर से बाहर भेजने के लिए स्पोर्ट्स अपनाने को प्रोत्साहित किया. अवनि ने तैराकी, तीरंदाज़ी और एथलेटिक्स में हाथ आजमाए, लेकिन शूटिंग में उन्हें अपना लक्ष्य मिला.

टोक्यो में गोल्ड जीतने के बाद अवनि ने कहा, "एक बार गर्मी की छुट्टियों के दौरान मेरे पिता मुझे एक शूटिंग रेंज में लेकर गए. मुझे शूटिंग के प्रति कनेक्शन महसूस हुआ. मैंने कुछ निशाने लगाए और वो काफी ठीक थे. फोकस और निरंतरता वो बातें हैं जो शूटिंग के बारे में मुझे अच्छी लगीं."

स्पोर्ट्स चुनने के बाद अवनि को स्कूल स्तर की प्रतियोगिताओं में पूरी तरह से फ़िट बच्चों की चुनौती का सामना करना पड़ा.

व्हीलचेयर पर होने की वजह से अवनि को जो अटेंशन मिल रहा था वो उसकी वजह से असहज भी होती थीं. बावजूद इसके अवनि तेजी से आगे बढ़ीं.

2017 में अवनि ने अपना पहला अंतरराष्ट्रीय मेडल जीता. उन्होंने उस साल वर्ल्ड शूटिंग पैरा स्पोर्ट्स वर्ल्ड कप के 10 मीटर एयर राइफ़ल स्पर्धा में सिल्वर मेडल जीता. इस इवेंट का गोल्ड मेडल स्लोवाकिया की वेरोनिका ने जीता.

नवंबर 2022 में बीबीसी को दिए इंटरव्यू में अवनि ने कहा था कि इस इवेंट के बाद मेरी नज़र पैरालंपिक गोल्ड पर थी.

उन्होंने कहा था, ''उस दिन मुझे महसूस हुआ कि मैं गोल्ड मेडल जीत सकती हूं. अगर मैं यहां तक आई हूं और अपने देश का प्रतिनिधितत्व कर रही हूं और व्हील्स पर रहते हुए सिल्वर जीता है तो मैं पैरालंपिक में भी मेडल जीत सकती हूं. उसके बाद मुझे बहुत प्रोत्साहन मिला."

पैरालंपिक में गोल्ड मेडल जीतने का लक्ष्य तय करने के एक साल बाद अवनि ने ओलंपियन शूटर सुमा शिरूर के साथ ट्रेनिंग शुरू की.

यह फ़ैसला उनके लिए टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ.

शिरूर अवनि को बेसिक्स पर वापस लेकर आईं और उन्हें वो राइफ़ल दिलाई जो कि उनके प्रतिद्वंद्वी इस्तेमाल करते हैं. उनकी वजह से अवनि को अपना आत्मविश्वास बढ़ाने में मदद मिली.

पेरिस गेम्स के बाद शिरूर ने इस बात पर ध्यान दिलाया कि अवनि जैसे पैरा एथलीट के लिए बाहर जाना कितना मुश्किल है क्योंकि सार्वजनिक स्थान व्हीलचेयर के मुताबिक़ नहीं होते.

व्यवस्था से जुड़े इन मुद्दों को अलग रख दिया जाए तो भी अवनि को गोल्ड जीतने के रास्ते में और मुश्किलों का सामना करना पड़ा है.

वो 2018 पैरा एशियन गेम्स में मेडल नहीं जीत पाईं. उन्हें कोविड-19 लॉकडाउन की वजह से घर में ही प्रैक्टिस करनी पड़ी.

टोक्यो गेम्स से पहले उन्हें कुछ महीनों के लिए प्रैक्टिस रोकनी पड़ी क्योंकि कमर की चोट के लिए उन्हें फिजियोथेरेपी करवानी पड़ी.

पेरिस गेम्स के पहले भी उन्हें गाल ब्लेडर की सर्जरी से गुजरना पड़ा.

लेकिन इनमें से कुछ भी अवनि को पैरालंपिक में भारत की सबसे कामयाब महिला बनने से नहीं रोक पाया.

उनके आत्मविश्वास को उनके एक्स अकाउंट के कवर पर लगा फोटो बेहतर तरीके से बयां करता है जिसमें लिखा है, "जिंदगी अच्छे कार्ड्स रखने के बारे में नहीं, बल्कि इस बारे में है कि जो कार्ड्स आपके पास हैं उन्हें आप कैसे खेलते हैं.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित

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