बीजेपी कश्मीर घाटी की 47 सीटों में से केवल 19 पर ही उम्मीदवार क्यों उतार पाई

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- Author, माजिद जहांगीर
- पदनाम, श्रीनगर से बीबीसी हिंदी के लिए
10 साल बाद जम्मू-कश्मीर में हो रहे विधानसभा चुनाव में क्या भारतीय जनता पार्टी चुनौतियों का सामना कर रही है?
जम्मू, जहाँ बीजेपी अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन करने की उम्मीद कर रही है, वहाँ पार्टी के अंदर असंतोष की ख़बरें हैं. वहीं कश्मीर घाटी की 47 सीटों पर बीजेपी ने सिर्फ़ 19 उम्मीदवार ही खड़े किए हैं.
यानी 28 सीटों पर बीजेपी ने उम्मीदवार ही नहीं उतारे.
ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या भारतीय जनता पार्टी जम्मू-कश्मीर में अलोकप्रिय हो गई है?
कश्मीर में बीजेपी क्या नाउम्मीद है?

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह से लेकर पार्टी के कई बड़े नेताओं ने दावा किया था कि अनुच्छेद 370 हटने के बाद से क्षेत्र में पहले की तुलना में शांति है और कश्मीर घाटी के लोगों का भी सरकार और भारतीय जनता पार्टी में भरोसा बढ़ा है.
लेकिन लोकसभा चुनाव में बीजेपी का कश्मीर में उम्मीदवार नहीं उतारना और फिर विधानसभा चुनाव में आधी से भी कम सीटों पर उम्मीदवार खड़े करने से सवाल उठ रहे हैं.
रविवार का दिन, सुबह के साढ़े दस बज रहे हैं. दक्षिण कश्मीर के ज़िला अनंतनाग की एक सीट पर भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ रहे रफ़ीक़ वानी अपने कार्यकर्ताओं के साथ चुनावी रणनीति बना रहे हैं. थोड़ी देर बाद उनको चुनाव प्रचार के लिए निकलना है.
फिर दोपहर 12 बजे सख़्त सुरक्षा घेरे के बीच वो 15 गाड़ियों के काफ़िले के साथ चुनावी रैली के लिए निकल पड़ते हैं. ये चुनावी रैली निपोरा इलाक़े में हो हो रही थी.
तमाम कोशिश के बावजूद रैली स्थल पर चंद महिलाओं समेत लगभग 300 लोग पहुँचे थे. रफ़ीक़ वानी उन चंद उम्मीदवारों में से एक हैं, जो भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव में क़िस्मत आज़मा रहे हैं.
कश्मीर में भारतीय जनता पार्टी के एक सीनियर नेता ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, ''एक तो हम चुनाव जीतते नहीं हैं और फिर पार्टी की तरफ़ से भी एक तरह से ताना दिया जाता है कि आपको टिकट दिया गया था लेकिन आप चुनाव जीत नहीं सके. इसलिए पार्टी ने इस बार ये तय किया है कि हम उन सीटों पर उम्मीदवार उतारेंगे ही नहीं, जहाँ हमारी हालत बहुत कमज़ोर है.''
2024 के लोकसभा चुनाव में भी बीजेपी ने कश्मीर घाटी में उम्मीदवार नहीं उतारे थे और सिर्फ़ जम्मू में उम्मीदवार उतारे थे. जम्मू की दोनों ही लोकसभा सीटों पर बीजेपी को जीत मिली थी. .
2019 में जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 को मोदी सरकार ने समाप्त कर दिया था.
उसके बाद कश्मीर घाटी में लंबे समय तक विरोध प्रदर्शनों का दौर चला था. हड़तालें हुई थीं और कई जगहों पर आंदोलनकारियों को काबू में करने के लिए सुरक्षाबलों पर बल प्रयोग करने के आरोप लगे थे.

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बीजेपी ने दावा किया कि अनुच्छेद 370 हटने के बाद से घाटी में शांति है और सामान्य जनजीवन पटरी पर आने लगा.
सरकार ने ये भी दावा किया कि इसके बाद से घाटी में चरमपंथी घटनाओं में कमी आई और लोग मुख्यधारा में लौटने लगे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इसी साल मार्च में श्रीनगर में एक रैली की थी.
लेकिन घाटी में बीजेपी की लोकप्रियता का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि या तो उसे उम्मीदवार नहीं मिल रहे या उम्मीदवार उतारना उचित नहीं लग रहा है.
वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक तारिक़ बट कहते हैं, “कश्मीर में भारतीय जनता पार्टी का मुक़ाबला यहाँ की क्षेत्रीय पार्टियों से है, जिन्होंने दशकों से यहाँ काम करके लोगों के बीच अपनी पैठ बनाई है. बीजेपी के लिए यहाँ पर उनसे मुक़ाबला कर जीतना बहुत मुश्किल होगा.”
तारिक़ कहते हैं, ''बीजेपी ने अनुच्छेद 370 ख़त्म कर देश के बाक़ी हिस्सों में एक ख़ास किस्म का नैरेटिव ज़रूर सेट किया. बीजेपी ने देश के बाक़ी हिस्सों में ज़रूर लोगों को समझाने की कोशिश की कि 370 हटते ही कश्मीर के सारे मसले हल हो गए और वहाँ के लोग अब भारत सरकार के साथ हैं.”
कहा जा रहा है कि कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस के गठबंधन ने भी कश्मीर में भारतीय जनता पार्टी की मुश्किलें बढ़ा दी हैं.
तारिक़ कहते हैं, ''कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस के चुनावी गठबंधन से कश्मीर में बीजेपी विरोधी लहर और भी बढ़ गई है. वैसे भी कश्मीर में बीजेपी के लिए कोई ख़ास माहौल नहीं था. अनुच्छेद 370 हटने के बाद से जो लोग ग़ुस्से में थे, उन्हें कांग्रेस-नेशनल कॉन्फ़्रेंस गठबंधन के तौर पर एक विकल्प मिल गया है. बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चुनौती है, अपने नैरेटिव को लोगों तक पहुँचाना.''
बीजेपी का जवाब

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लेकिन भारतीय जनता पार्टी लगातार दावा कर रही है कि कश्मीर घाटी में लोग उससे जुड़ रहे हैं.
28 सीटों पर उम्मीदवार ना उतारे जाने के जवाब में बीजेपी के जम्मू-कश्मीर प्रवक्ता अल्ताफ़ ठाकुर कहते हैं, ''यह चुनाव हमारे लिए टेस्ट है. अगर हमें आज कामयाबी मिलती है तो आगे इससे ज़्यादा उम्मीदवारों को मैदान में उतारेंगे. वैसे भी हमें उम्मीद है कि कश्मीर घाटी में कमल खिलेगा और कम से कम हम सात सीटों पर जीत हासिल कर सकते हैं.''
वो दावा करते हैं कि कम उम्मीदवार उतारना पार्टी की मजबूरी नहीं बल्कि रणनीति है.
अल्ताफ़ ठाकुर कहते हैं, ''देश के दूसरे हिस्सों में भी हमने कई जगहों पर उम्मीदवार नहीं उतारे. हमने समान विचारधारा के दूसरे दलों से गठबंधन किया. यहाँ भी हमारी ताक़त जहाँ-जहाँ है, वहाँ हमने उम्मीदवार उतारे.''
हलांकि ठाकुर ये स्वीकार करते हैं कि जम्मू बीजेपी का गढ़ है लेकिन वो कश्मीर में भी अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद जता रहे हैं.
अल्ताफ़ ये भी संकेत देते हैं कि पार्टी को अगर अकेले बहुमत नहीं मिलता है तो वो समान विचारधारा के दलों के साथ गठबंधन कर सकती है. लेकिन वे दल कौन से होंगे, इसका जवाब नहीं दे पाए.
जम्मू में बीजेपी की चुनौतियां

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केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने जम्मू में ही पार्टी का घोषणा पत्र जारी किया था.
जम्मू-कश्मीर विधानसभा की 90 में से 43 सीटें जम्मू में हैं.
जम्मू ही भारतीय जनता पार्टी का असल वोट बैंक समझा जाता है. यहाँ हिन्दुओं की अच्छी ख़ासी आबादी है.
हालांकि इस बार बीजेपी ने जम्मू-के पीरपंजाल में भी कई मुसलमान उम्मीदवारों को टिकट दिया है. पीरपंजाल मुस्लिम बहुल इलाक़ा है.
पत्रकार और विश्लेषक हारुन रेशी कहते हैं, ''बीजेपी ने 2019 के बाद नैरेटिव बनाया था कि अब जम्मू-कश्मीर में हालात बेहतर हो गए हैं और शांति का दौर लौट आया है. लेकिन जम्मू क्षेत्र के कई इलाक़ों में चरमपंथी हमले बढ़ गए हैं. ऐसे में बीजेपी के दावों पर सवाल भी उठने लगे हैं.''
हाल ही में जब बीजेपी ने जम्मू क्षेत्र के लिए उम्मीदवारों की पहली सूची जारी की तो पार्टी मुख्यालय पर टिकट बँटवारे के ख़िलाफ़ विरोध-प्रदर्शन हुए और पार्टी ने एक घंटे के भीतर ही उम्मीदवारों की ये सूची रद्द कर दूसरी सूची जारी की.
उसके बाद जम्मू में पार्टी के कई सीनियर नेताओं ने पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया.
ऐसे ही जम्मू के एक सीनियर बीजेपी नेता ने नाम न बताने की शर्त पर बीबीसी से कहा, ''मुझे भी इस बार नज़रअंदाज़ किया गया और मेरी जगह एक दूसरे उम्मीदवार को टिकट दिया गया. टिकट बँटवारे से मेरे कार्यकर्ता भी नाख़ुश हैं.''
अल्ताफ ठाकुर कहते हैं, ''हर चुनाव में, हर पार्टी के अंदर ऐसा होता है. ये सिर्फ़ बीजेपी की बात नहीं है.''
पिछला चुनाव

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10 साल पहले हुए पिछले विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी 25 सीटें जीतकर दूसरे सबसे बड़े दल के तौर पर उभरी थी. तब पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी ने 28 सीटें जीती थीं.
उसके बाद दोनों पार्टियों ने मिलकर सरकार बनाई थी. लेकिन 2018 में आपसी मतभेदों के कारण ये गठबंधन सरकार गिर गई. तब से जम्मू-कश्मीर में चुनी हुई सरकार नहीं थी.












