मायावती ने अशोक सिद्धार्थ को बीएसपी से क्यों निकाला, क्या पारिवारिक कलह से जूझ रही हैं पार्टी सुप्रीमो

बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती

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इमेज कैप्शन, बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती (फ़ाइल फ़ोटो)
    • Author, सैय्यद मोज़िज़ इमाम
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

सियासत में अपना स्वर्णकाल देख चुकीं बीएसपी प्रमुख मायावती के रुतबे के बारे में एक वक्त कहा जाता था कि पार्टी के बड़े नेता भी उनके बराबर में बैठने से कतराते थे.

लेकिन लगता है कि अब वह अपने अतीत की छाया भर रह गईं हैं. सियासत में लगभग सिफर पर पहुंच चुकी उनकी पार्टी को अब पारिवारिक कलह से भी नुकसान होने की आशंका जताई जाने लगी है.

ख़बर है कि उनके दोनों भतीजों के बीच अनबन गहरी हो गई है, जिससे पार्टी से अशोक सिद्धार्थ के निष्कासन को आधार मिल गया है.

अशोक सिद्धार्थ मायावती के बड़े भतीजे आकाश आनंद के ससुर हैं. कुछ वक्त पहले तक आकाश आनंद मायावती के आंखों के तारा थे लेकिन उनके ससुर को निकालने का फ़ैसला कर उन्होंने बीएसपी की राजनीति पर करीबी नज़र रखने वालों को चौंका दिया है.

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मायावती के इस सख़्त फैसले के बाद कयास लगाए जा रहे हैं कि उनके दूसरे भतीजे ईशान आनंद का पार्टी में कद बढ़ेगा. हालांकि सियासत में खुद पार्टी पुराना कद बरकरार रख पाएगी ये भी बड़ा सवाल है.

दरअसल, 2007 में उत्तर प्रदेश में अपने दम पर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने वाली बीएसपी राज्य में सिर्फ एक विधायक तक सिमट गई है. लोकसभा में पार्टी का स्कोर कार्ड सिफर पर है.

सियासत में बीएसपी का पुराना दबदबा वापस लाने के लिए मायावती कुछ वक्त से बड़े भतीजे आकाश आनंद को आगे बढ़ा रहीं थीं.

आकाश आनंद नेशनल को-ऑर्डिनेटर बनाए गए थे लेकिन बुधवार को मायावती ने अचानक ही आकाश आनंद के ससुर और अपने समधी अशोक सिद्धार्थ को पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में निष्कासित कर सबको चौंका दिया.

मायावती ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, '' बीएसपी की ओर से ख़ासकर दक्षिणी राज्यों आदि के प्रभारी रहे डॉ. अशोक सिद्धार्थ, पूर्व सांसद व श्री नितिन सिंह, ज़िला मेरठ को, चेतावनी के बावजूद भी गुटबाजी आदि की पार्टी विरोधी गतिविधियों में लिप्त होने के कारण पार्टी के हित में तत्काल प्रभाव से पार्टी से निष्कासित किया जाता है.''

हालांकि वरिष्ठ पत्रकार रचना सरन का कहना है कि पार्टी विरोधी गतिविधि की बात समझ में नहीं आ रही है.अशोक वैसे ही बहुत लो प्रोफाइल रहते हैं और अब रिश्तेदारी भी है तो वापसी भी हो सकती है.

दरअसल मायावती से सीधे रिश्तेदारी के बाद अशोक सिद्धार्थ का कद पार्टी में बढ़ गया था. ये मामला पार्टी की पहले हफ्ते में हुई दिल्ली की बैठक में कुछ लोगों ने उठाया था.

कौन हैं अशोक सिद्धार्थ

अशोक सिद्धार्थ

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इमेज कैप्शन, अशोक सिद्धार्थ की बेटी प्रज्ञा से मार्च 2023 में मायावती के भतीजे आकाश आनंद की शादी हुई थी
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अशोक सिद्धार्थ मायावती के रिश्तेदार बनने से पहले राज्यसभा और विधान परिषद के सदस्य रह चुके हैं.अशोक सिद्धार्थ की बेटी प्रज्ञा से मार्च 2023 में मायावती के भतीजे आकाश आनंद की शादी हुई थी.

अशोक सिद्धार्थ पेशे से डॉक्टर हैं. उन्होंने साल 2007 में बीएसपी की सदस्यता ली थी. इससे पहले वो बामसेफ में थे. वो 2016-22 तक राज्यसभा के सदस्य भी रहे. इसके पहले 2009 और 2016 में विधान परिषद के सदस्य रह चुके हैं.

पार्टी के सूत्रों के मुताबिक मायावती की नाराज़गी अशोक सिद्धार्थ का अपना गुट बनाने की वजह से है. कुछ फैसले बिना मायावती के इजाज़त के लिए जाते रहे हैं. उससे भी पार्टी के भीतर असंतोष था.

दिल्ली के चुनाव में मायावती ने आकाश आनंद के हवाले कर दिया था. लेकिन पार्टी के उम्मीदवार अपनी ज़मानत नहीं बचा पाए हैं. पार्टी का वोट का शेयर 2020 में तकरीबन 0.7 फीसदी था. वो 2025 में कम होकर 0.5 फीसदी रह गया है.

मेरठ के नितिन भी सिद्धार्थ के करीबियों में थे और दिल्ली के चुनाव में आकाश आनंद के सहायक के तौर पर काम कर रहे थे.

लखनऊ में रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार सैयद कासिम कहते हैं, "निष्कासन के पीछे अशोक का बढ़ता रसूख भी एक वजह है. अशोक के बेटे की शादी 9 फरवरी को लखनऊ में थी. जिसमें बीएसपी के पूर्वांचल और पश्चिम उत्तर प्रदेश के कई मंडलों के बड़े नेता शामिल हुए थे. कई पार्टी के नेता दूसरे प्रदेश से भी आए थे.''

उन्होंने बताया, '' इस शादी में रामजी गौतम भी थे. मायावती और रामजी गौतम की बैठक 11 तारीख को हुई है और अगले दिन ही ये फैसला लिया गया है. इस शादी का आमंत्रण देने फरवरी के पहले हफ्ते में अशोक मायावती से मिले भी थे. तब तक राजनीतिक रिश्ते ठीक लग रहे थे.''

आकाश आनंद और मायावती के राजनीतिक रिश्ते

आकाश आनंद (बाएं) के साथ मायावती

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इमेज कैप्शन, आकाश आनंद (बाएं) को अब तक मायावती के उत्तराधिकारी के तौर पर देखा जा रहा था

आकाश आनंद मायावती के भतीजे हैं. उनको मायावती के उत्तराधिकारी के तौर पर देखा जा रहा था.

आकाश अक्रामक राजनीति के हिमायती है. लोकसभा के चुनाव में बीजेपी पर ज़ोरदार हमला किया था. लेकिन मायावती ने उनको पद से हटा दिया था.

2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान आकाश ने बीजेपी पर तीखे हमले किए थे. जिसके खिलाफ काफी हंगामा हुआ था. मायावती ने 8 मई को उनको पद से हटा दिया था.

आकाश आनंद ने सोशल मीडिया एक्स पर लिखा कि मायावती का आदेश सिर माथे पर और भीम मिशन के लिए अंतिम सांस तक लड़ता रहूंगा.

हालांकि बाद में उनको पद पर बहाल कर दिया था. हरियाणा और दिल्ली के चुनाव में अहम ज़िम्मेदारी भी दी थी.

आकाश आनंद

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आकाश ने 16 जनवरी को लखनऊ में पार्टी की बैठक में कहा था कि सरकारी ज़ुल्म से लोग परेशान हैं.

जो तेवर आकाश आनंद के हैं वो तेवर कभी मायावती और बीएसपी के संस्थापक कांशीराम के हुआ करते थे.

लेकिन बीजेपी की सरकार केंद्र में आने के बाद मायावती की राजनीति में आक्रामकता कम हो गयी है.

विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी भी लगातार कमज़ोर हो रही है. आकाश के समर्थक मानते हैं कि मायावती को आकाश को 'फ्री हैंड' देना चाहिए.

सैयद कासिम कहते हैं, ''ये कार्रवाई ज़रूर अशोक सिद्धार्थ के खिलाफ है. लेकिन निशाने पर आकाश आनंद ही हैं. क्योंकि 4 फरवरी को राजस्थान की संगठन बैठक में आकाश आनंद को रास्ते से ही वापस बुला लिया गया था.''

दूसरे भतीजे ईशान की एंट्री?

मायावती ने कई बार आकाश आनंद का बचाव किया है

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इमेज कैप्शन, मायावती ने कई बार आकाश आनंद का बचाव किया है

आकाश आनंद के भाई और मायावती के दूसरे भतीजे ईशान आनंद सार्वजनिक तौर पर मायावती के जन्मदिन के मौके पर दिखाई दिए थे. तब से ये कयास लगाया जा रहा है कि ईशान भी राजनीतिक पारी शुरू कर सकते हैं.

आकाश को राजनीतिक रूप से कामयाबी ना मिलने पर ईशान को आगे बढ़ाने की तैयारी थी. मीडिया में इसको लेकर भ्रम फैलाया गया, जिससे भी मायावती नाराज़ थी.

आनंद परिवार के परिवारिक सूत्रों के मुताबिक घर के भीतर कोई अनबन नहीं है. ईशान अपने व्यापार पर ज्यादा फोकस कर रहे हैं.

वह पहली बार इस तरह के कार्यक्रम में दिखाई दिए इसको लेकर कहानी बनायी जा रही है. ईशान की उम्र भी ज्यादा नहीं है.

हालांकि मायावती ने कई बार आकाश का बचाव भी किया है. जब मायावती के रिटायर होने की खबर मीडिया में आई तो उन्होने कहा था, ''जबसे पार्टी ने श्री आकाश आनन्द को मेरे ना रहने पर या अस्वस्थ होने की हालत में बीएसपी के उत्तराधिकारी के रूप में आगे किया है तबसे जातिवादी मीडिया ऐसी फ़ेक़ न्यूज़ प्रचारित कर रहा है, जिससे लोग सावधान रहें."

बीएसपी ऊंचाई से ढलान की ओर?

मायावती

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इमेज कैप्शन, मायावती की अगुवाई में उत्तर प्रदेश में बीएसपी ने साल 1991 के बाद पूर्ण बहुमत की सरकार 2007 में बनायी थी

राजनीतिक विश्लेषक शरत प्रधान का मिल्कीपुर उपचुनाव से पहले कहना था, "बाज़ी मायावती के हाथ से निकल चुकी है. अब दलित वर्ग भी चन्द्रशेखर की तरफ़ देख रहा है. मायावती की पार्टी का ये हाल बीजेपी के साथ उनकी लुका छिपी का नतीजा है. ये कोशिश अब सिर्फ़ खुद को ज़िंदा रखने की है, पार्टी को दोबारा खड़ा करने का प्रयास है."

हालांकि मिल्कीपुर उपचुनाव में मायावती के ना लड़ने पर चन्द्रशेखर के उम्मीवार को दलित वर्ग का समर्थन नहीं मिल पाया था.बल्कि चुनाव बीजेपी और एसपी के बीच ही सिमट कर रह गया.

मायावती की अगुवाई में उत्तर प्रदेश में बीएसपी ने साल 1991 के बाद पूर्ण बहुमत की सरकार 2007 में बनायी थी.

मायावती की उस समय सोशल इंजीनियरिंग की तारीफ की जाती रही है. लेकिन 2012 के चुनाव में समाजवादी पार्टी ने बीएसपी को हरा दिया. इस हार के बाद बीएसपी लगातार कमज़ोर हो रही है.

अपने उदयकाल में बीएसपी ने कांशीराम की अगुवाई में पहले समाजवादी पार्टी से गठबंधन किया फिर गेस्ट हाउस कांड के बाद बीजेपी से और बाद में कांग्रेस के साथ भी गठबंधन किया.

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2019 में मायावती ने पुरानी बातों को पीछे छोड़ते हुए समाजवादी पार्टी के साथ फिर से गठबंधन किया.

इस बार पार्टी को 10 लोकसभा सीटों पर सफलता भी मिली लेकिन पिछले चुनावों में वह बिना किसी गठबंधन के चुनावी समर में उतरी और सीटों की संख्या के मामले में दस से शून्य पर आ गई.

बीएसपी के दोबारा खड़े होने के सवाल पर वरिष्ठ पत्रकार रचना सरन ने कहा, "जहां तक पार्टी के रिवाइवल की बात है तो पार्टी अभी भी खड़ी हो सकती है बशर्ते मायावती खुद को जनता के मुद्दों से कनेक्ट करें. आरक्षण का मामला ऐसा है जो बीएसपी के लिए अहम साबित हो सकता है लेकिन इसके लिए उसे सड़कों पर उतरना पड़ेगा, जिसके लिए कभी मायावती और कांशीराम जाने जाते थे. बीएसपी सड़क पर कांग्रेस से भी कम दिखाई दे रही है जिसकी वजह से उसके वोटों में बिखराव हुआ है."

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