'24 की उम्र में मरना नहीं चाहती...', निराशा और उम्मीद के बीच जूझते रफ़ाह क्रॉसिंग पर फंसे लोगों का हाल

- Author, फ़र्गल कीन
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़, रफ़ाह क्रॉसिंग ( ग़ज़ा-मिस्र सीमा से)
तीसरी बार बॉर्डर पार करने की कोशिश की जा रही है. लेकिन इस बार उम्मीद पहले से अधिक है. तमाम मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़, बॉर्डर इस बार पक्का खुल जाएगा.
एक परिवार दक्षिणी ग़ज़ा पर मिस्र की सीमा की ओर खुलती रफ़ाह क्रॉसिंग पर मौजूद है. उनकी एक ही ख़्वाहिश है - जंग को पीछे छोड़, बॉर्डर पार कर मिस्र में दाखिल होना.
सारे परिवार को जॉर्डन के दूतावास ने बुलाया है. उन्हें कहा गया है कि वो लोग रफ़ाह क्रॉसिंग पर पहुँचें.
ताला अबु नाहलेह की माँ जॉर्डन की नागरिक हैं. रफ़ाह क्रॉसिंग पर विदेशी पासपोर्ट वालों को जाने दिया जा रहा है. इसके अलावा घायल और बीमार लोगों को भी बॉर्डर क्रॉस करने दिया जा रहा है.
ताला के 15 वर्षीय भाई याज़िद शारीरिक रूप से अक्षम हैं और उन्हें मिरगी के दौरे पड़ते रहते हैं. याज़िद व्हीलचेयर के सहारे ही एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते हैं. उन्हें जो दवाएं चाहिए, वे ग़ज़ा के अस्पतालों में ख़त्म हो गई हैं. साथ ही लगातार हो रही बमबारी के कारण उनकी सेहत बदतर होती जा रही है.
चमत्कार की उम्मीद

ताला कहती हैं, "जैसे ही हिंसा बढ़ने लगी, याज़िद डर-सा गया. उसके मिरगी के दौरे में ख़तरनाक होते गए. हर बार पहले कहीं अधिक भयंकर दौरा पड़ने लगा."
परिवार में छह सदस्य हैं और सभी आर्थिक रूप से ताला पर निर्भर हैं. ताला ने स्कॉलरशिप के सहारे अमेरिका और बेरूत में पढ़ाई की है.
वो एक आत्मविश्वास से भरी हुए लड़की है जो सधे हुए शब्दों में अपना हाल बयान करती है. उनको सुनकर लगता है कि वो अपने परिवार को इस मुसीबत से निकालने के लिए बिल्कुल सही शख़्स हैं.
ताला कहती हैं, "हम बस जीने की कोशिश कर रहे हैं. पता नहीं हम ज़िंदा बच पाएंगे या नहीं लेकिन हम पूरी कोशिश करने वाले हैं. हम ज़िंदा रहने के लिए पूरी जान लगा देंगे क्योंकि मैं 24 साल की उम्र में मरना नहीं चाहती."
रफ़ाह क्रॉसिंग एक ऐसी जगह है जहां तक़दीर शब्द के अलग-अलग अर्थ हैं. इनमें बमबारी, भूख और पानी की किल्लत से बचना तक शामिल है.
22 लाख लोग और एक छोटी-सी ख़्वाहिश

इसका एक अर्थ ये भी है कि आप अपने उन लोगों को पीछे छोड़ देंगे जिनके पास विदेशी पासपोर्ट नहीं है.
और उनको भी, जो किस्मत से अब तक घायल या बीमार नहीं हैं. आप उन्हें भी पीछे छोड़ रहे हैं जो बमबारी के कारण अपने घरों से निकल कर बॉर्डर तक नहीं पहुँच पा रहे हैं.
ग़ज़ा में 22 लाख लोग रहते हैं. इनमें मुट्ठी भर ही ख़ुशकिस्मत हैं जो जंग से दूर जा पाएंगे.
मोना अपना सरनेम नहीं बताता चाहतीं. उन्होंने ऑस्ट्रेलियाई नागरिक से शादी की है इसलिए अब उनके पास भी विदेशी पासपोर्ट है.
मोना बॉर्डर तक जैसे-तैसे अकेले ही पहुँची हैं. उनके दिमाग में ग़ज़ा में फंसे अपने परिवार के ही ख़्याल आ रहे थे.

मोना ने बीबीसी को बताया, "मैं बिल्कुल ख़ुश नहीं हूँ. मैं अपना एक हिस्सा पीछे छोड़ कर जा रही हूँ. अपने भाई और बहन… मेरा पूरा परिवार यहीं है. ईश्वर ने चाहा तो वे सभी सुरक्षित रहेंगे. यहाँ हालात बहुत ही ख़राब हैं… बहुत ज़्यादा."
रफ़ाह क्रॉसिंग पर ग़ज़ा की ओर दीवार पर कुछ पेपर चस्पा हैं. कुछ पुरुष इन्हें निहार रहे हैं. उनकी उंगलियां एक-एक नाम के ऊपर से गुज़र रही हैं. ये वो भाग्यशाली लोग हैं जिन्हें बॉर्डर क्रॉस करने की अनुमति मिल चुकी है.
कई परिवार वेटिंग हॉल में प्लास्टिक की कुर्सियों पर बैठे हैं. एक छोटी सी जगह जहाँ हज़ार ख़्वाहिशें पल रही हैं.
कुल मिलाकर 400 विदेशी नागरिकों और बीमार-घायल लोगों को बुधवार को ग़ज़ा छोड़ मिस्र में दाख़िल होने दिया गया.
शाम होते-होते ये साफ़ होता जा रहा था कि इन लोगों में ताला अबु नाहलेह का परिवार नही होगा. परिवार एक बार फिर अपनी अपार्टमेंट में लौट गया.
अंधेरी और उदास अपार्टमेंट जहाँ कई दिनों में बिजली नहीं है.
ताला ने हमें एक वीडियो संदेश भेजा जिसमें उन्होंने कहा कि उन्हें अब कुछ समझ नहीं आ रहा है. वो थकी हुई लग रही थीं.
अपने संदेश में उन्होंने कहा, "हम घर पहुँच गए हैं. यहाँ न बिजली है, न खाना, न साफ़ पानी. मेरे भाई के पास अब सिर्फ़ एक ही दिन की दवाएं बची हैं. और हम अब भी यहीं हैं. अब रात हो चुकी है. पता नहीं कल हमें बॉर्डर क्रॉस करने का मौक़ा मिलेगा या नहीं. लेकिन मैं उम्मीद पर क़ायम हूँ."
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