इस विषय के अंतर्गत रखें अप्रैल 2012

मन गुदगुदाता है

विनोद वर्माविनोद वर्मा|शनिवार, 28 अप्रैल 2012, 15:12

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आश्चर्य है. प्रोफ़ेसर मटुकनाथ की प्रेमिका जूली को उनकी पत्नी सरेआम पीटती हैं. टेलीविज़न चैनल वाले किसी प्रायोजित कार्यक्रम की तरह इसका लाइव प्रसारण करते हैं. फिर बाद में लूप में डालकर बार-बार दिखाते हैं.

आश्चर्य न पिटाई में है न टीवी चैनलों की बेहयाई में. आश्चर्य उस गुदगुदी में है, जो मन के भीतर होती है.

आश्चर्य है कि यह सब देखकर मन नहीं पसीजता, दुख नहीं उपजता. जुगुप्सा जागती है. मन कसमसाता है. चरमसुख जैसा कुछ मिलता सा लगता है.

ऐसा सुख तब भी मिलता था जब अभी 'पीपली लाइव' का ज़माना नहीं आया था. तब अख़बारों में और बाद में पत्रिकाओं में तस्वीरें देखा करते थे. बार-बार देखा करते थे.

याद है आपको? घर की बड़ी बहू सोनिया गांधी के दिवंगत देवर की पत्नी और घर की छोटी बहू मेनका गांधी को घर से निकाल दिया गया था. सामान सड़क पर पड़ा था. एक छोटा बच्चा सामान के साथ खड़ा था. याद है आपको मन कैसा मुदित होता था ये तस्वीर देखकर?

मन बावरा है. तरह तरह की कल्पनाएँ करता है. अब तक वो तस्वीर मन में है. अब भी वह नज़र लगाए रखता है कि संसद के भीतर दोनों बहुओं के बीच कभी नज़रें मिलती हैं या नहीं. ख़बरों पर नज़र रहती है, छोटी बहू के घर बहू आ रही है तो बड़ी बहू की प्रतिक्रिया कैसी है.

आश्चर्य है कि बेगानी शादी में अब्दुल्ला क्यों दीवाना हो जाता है. अरे शादी में हो जाए तो हो जाए, शादी टूटने बिखरने लगती है तो भी चटखारे लेने में मज़ा आता है.

किसी ने फुसफुसाकर कहा था, "देश के सबसे बड़े औद्योगिक घराने की बहू एक पूर्व मिस इंडिया से नाराज़ हैं."

होती हैं तो हों, हमारी बला से. लेकिन आश्चर्य है कि मन में गुदगुदी हुई. दिल में एक लहर उठी. वह फुसफुसाहट एक कान से सुनी और फिर तुरंत दूसरा कान भी लगा दिया. परमानंद इसी को कहते होंगे.

अब हर कोई अख़बार के कोने के कॉलम में पढ़ रहा था कि मिसेस शाहरुख़ ख़ान यानी गौरी इन दिनों प्रियंका चोपड़ा नाम की एक फ़िल्म अभिनेत्री से नाराज़ हैं. सुना है कि उन्होंने कई और अभिनेता पत्नियों को अपनी नाराज़गी में साझेदार बना लिया है.

है तो बुरा. लेकिन क्या करें कि मन मंद मंद मुस्काता है. पुराने खाज को खुजली जैसा सुख मिलता है. सौतिया डाह की ख़बर जैसा सुख परनिंदा में भी नहीं.

अब देखिए ना. जया बच्चन के घर के सामने वाले आंगन में बैठा बोफ़ोर्स नाम का भूत 25 साल बाद ले देकर टला. राहत की सांस को दो दिन भी नहीं बीते थे कि अपने पत्रकार भाई-बहन लोग उनके पिछले आंगन की तस्वीरें लेने लगे. पूछा तो कहा कि पिछले दरवाज़े से एक और भूत घुस आया है. रेखा नाम का.

रेखा जी, कुछ ही दिनों में माननीय सांसद होंगीं. बस शपथ लेने की देर है. लेकिन लोग क्या-क्या चुटकुले सुना रहे हैं.

एक आदरणीय मित्र ने लिखा, "जो अमिताभ नहीं कर पाए वो सरकार ने कर दिया, जया और रेखा अब एक ही हाउस में हैं." बाद में पाया कि मित्र की कल्पनाशीलता फ़ेसबुक नाम के जंजाल में फैल गई है. हर कोई ऐसा ही कुछ लिख रहा है और साथ में एक इस्माइली चिपका रहा है.

गुदगुदी असर दिखा रही है.

किसी ने कहा, "जिसने अमिताभ को बोफ़ोर्स में झूठा फँसाया था, उन्ही लोगों की करतूत है कि अब बोफ़ोर्स से छूटे तो राज्यसभा में फँसा दिया."

लोग प्रतीक्षा कर रहे हैं कि किस दिन दोनों देवियाँ आमने सामने होंगीं. एक कल्पनाशील पत्रकार मित्र ने सलाह दी, "राज्यसभा के सिटिंग अरेंजमेंट का ग्राफ़िक बनवाकर उसमें दिखाओ कि जया कहाँ बैठेंगीं और रेखा कहाँ बैठेंगीं. इसे वेबसाइट पर लगवाओ. देखो कैसे हिट होता है."

कल्पना के घोड़े भाग रहे हैं. लोग आंखे मूंदे मंद-मंद मुस्कुरा रहे हैं. इस महंगाई के ज़माने में लोगों को मुफ़्त में सुख मिल रहा है.

आश्चर्य है कि कोई दुखी नहीं है. आपको अगर दुख है, तो अपना इलाज करवाइए. ये मटुकनाथ उर्फ़ चौराहे पर प्रेम का ज़माना है.

दो परियों की दास्तां

वंदनावंदना|मंगलवार, 24 अप्रैल 2012, 12:47

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'क्या तुम्हारे साथ भी कुछ वैसा ही हुआ जो मेरे साथ हुआ".........अगर इस दुनिया से रुकसत होने के बाद वाकई लोग स्वर्ग या नरक में जाते हैं तो आज बेबी फलक बेबी आफरीन से शायद यही पूछ रही होगी. उम्मीद है ये दोनों जन्नत में ही होंगी क्योंकि नरक तो वो जिंदा रहते ही भोग चुकी हैं.

फलक और आफरीन वही बच्चियाँ हैं जिन्हें निर्दय समाज की बेदिली ने 'मार' डाला. अब सुर्खियों से ये दोनों गायब हो चुकी हैं, सिंघवी का कथित सेक्स सीडी कांड और आईपीएल की चमक दमक ने हेडलाइन की जगह ले ली है. लेकिन इन बच्चियों की दर्द भरी दास्तां ज़हन में अब भी ताज़ा है.

फलक ने जीवन के दो ही बसंत देखे थे. दो महीने तक वो एम्स अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच झूलती रही. जब उसे अस्पताल लाया गया था तो उस समय फलक के शरीर पर गहरे घाव और दांतों के निशान थे और बाजू की हड्डियां टूटी हुई थी. पुलिस के मुताबिक बच्ची कई हाथों से होते हुए अस्पताल पहुँची थी.

और तो और 14 साल की जो लड़की फ़लक को अस्पताल लाई थी, जाँच के दौरान ये पता चला था उसके पिता ने उसे निकाल दिया था और उससे वेश्यावृति करवाई जा रही थी. किसी कुचक्र में फँस कर रह गई थी फलक. नन्हीं सी जान फिर भी दो महीने तक लड़ती रही, दिल के दो दौरे सहे पर आखिर मौत से हार गई.

टीवी चैनलों पर आधा ढका सा फलक का जख्मी चेहरा अब तक आँखों के सामने घूमता है...ये जख्म फलक के शरीर पर नहीं बल्कि समाज की रूह पर प्रहार है अगर कोई उसे महसूस करे तो......

बंगलौर की बेबी आफरीन ने तो तीन महीने पहले ही इस दुनिया में कदम रखा था. इससे पहले कि वो अट्ठखेलियाँ करती, उसे लाड प्यार मिलता...पिता की कथित प्रताड़ना ने उसके सपनों और जीवन का गला घोट दिया. माँ की मानें तो इसकी वजह ये रही कि आफरीन के पिता को लड़के की हसरत थी और बच्ची का जन्म उन्हें इतना नागवार गुजरा कि जन्म के बाद से ही प्रताड़ित करना शुरु कर दिया.

ऐसी कई आफरीन और फ़लक भारत में और होंगी जिनका नाम कभी टीवी और अखबारों की सुर्खियों नहीं बन पाया.

वैसे हेडलाइन में आकर भी आफरीन और फ़लक का कौन सा भला हो गया.. क्योंकि ये सुर्खियाँ कुछ दिन बाद अखबारों के पन्नों से गायब हो गईं. बच्चियों की हालत देखकर जिन लोगों के मन हिकारत से भरे होंगे वो भी ये सब भूल रोजमर्रा की जद्दोजहद में व्यस्त हो चुके हैं.

और इस दौरान शायद कई और आफरीन और फ़लक की प्रताड़ना की ज़मीन तैयार हो चुकी होगी. अगर ऐसा हो रहा है तो इसके लिए प्रताड़ना करने वाले ही नहीं हम सब भी कसूरवार हैं. आखिर इस तरह का घिनौना काम करने वाले उसी समाज का हिस्सा हैं जिसमें हम-आप रहते हैं और बहुत बार चुप्पी साधे रहते हैं. ये ब्लॉग नहीं माफीनामा है आफरीन और फ़लक के नाम........

आस्था या अंधविश्वास

पंकज प्रियदर्शीपंकज प्रियदर्शी|शुक्रवार, 20 अप्रैल 2012, 03:16

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भारत के कई प्रमुख टीवी चैनल और समाचार चैनलों पर दरबार लगा है. बड़ी संख्या में भक्तों के बीच चमत्कारी शक्तियों का दावा करने वाले शख्स सिंहासन पर विराजमान हैं.

लोग प्रश्न पूछते हैं और बाबा जवाब देते हैं. सामान्य परेशानी वाले सवालों के असामान्य जवाब. एक छात्रा पूछती है, बाबा मैं आर्ट्स लूँ, कॉमर्स लूँ या फिर साइंस. बाबा कहते हैं- पहले ये बताओ आखिरी बार रोटी कब बनाई है, रोज एक रोटी बनाना शुरू कर दो.

एक और हताश और परेशान व्यक्ति पूछता है, बाबा नौकरी कब मिलेगी. बाबा कहते हैं क्या कभी साँप मारा है या मारते हुए देखा है. ये है निर्मल बाबा का दरबार.

जनता मस्त है और बाबा भी. बाबा की झोली लगातार भर रही है. बाबा के नाम प्रॉपर्टी भरमार है. होटल हैं, फ्लैट्स हैं, बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ हैं. कई अखबार दावा करते हैं कि जनवरी से बाबा के बैंक खाते में हर दिन एक करोड़ रुपए आ रहे हैं.

ये है 21वीं सदी का भारत. आधुनिक भारत. अग्नि-5 वाला भारत. कौन कहता है भारत में पैसे की कमी है. गरीब से गरीब और धनी से धनी बाबा के लिए अपनी संपत्ति कुर्बान कर देना चाहता है.

कई प्रमुख टीवी चैनलों और समाचार चैनलों पर जगह बना चुके निर्मल बाबा पर एकाएक मीडिया की तिरछी नजर पड़ गई है. अब टीवी चैनल निर्मल बाबा की पोल खोलने के लिए कमर कस चुके हैं.

कितनी अजीब बात है कई समाचार चैनल बाबा की बैंड बजाने पर तुले हैं और उन्हीं के चैनल पर बाबा अपने भक्तों को बेमतलब का ज्ञान बाँट रहे हैं.

बाबाओं को लेकर भारतीय जनता का प्रेम नया नहीं है. कभी किसी बाबा की धूम रहती है तो कभी किसी बाबा की. कभी आसाराम बापू और मोरारी बापू टीवी चैनलों की शान हुआ करते थे, तो आज निर्मल बाबा का समय आया है.

ये बाबा भी बड़ी सोच-समझकर ऐसे लोगों को अपना लक्ष्य बनाते हैं, जो असुरक्षित हैं. आस्था और अंधविश्वास के बीच बहुत छोटी लकीर होती है, जिसे मिटाकर ऐसे बाबा अपना काम निकालते हैं.

लेकिन नौकरी के लिए तरसता व्यक्ति या फिर बेटी की शादी न कर पाने में असमर्थ कोई गरीब इन बाबाओं का टारगेट नहीं. इनका टारगेट हैं मध्यमवर्ग, जो बड़े-बड़े स्टार्स और व्यापारिक घराने के लोगों की ऐसी श्रद्धा देखकर इन बाबाओं की शरण में आ जाता है.

बच्चन हों या अंबानी, राजनेता हों या नौकरशाह- इन बड़े लोगों ने जाने-अनजाने में इस अंधविश्वास को बल दिया है.

ऐश्वर्या राय की शादी के समय अमिताभ बच्चन का ग्रह-नक्षत्रों को खुश करने के लिए मंदिरों का दौरा, अंबानी बंधुओं में दरार पाटने के लिए मोरारी बापू को मिली अहमियत. चुनाव जीतने के लिए बाबाओं के चक्कर लगाते नेता.

दरअसल समृद्धि अंधविश्वास भी लेकर आती है. वजह अपना रुतबा, अपनी दौलत कायम रखने का लालच. जो जितना समृद्ध, वो उतना ही अंधविश्वासी. और फिर समृद्धि के पीछे भागता मध्यमवर्ग, इस मामले में क्यों पीछे रहेगा.

इसलिए इन बाबाओं के पौं-बारह हैं. फिर क्यों न निर्मल बाबा डायबिटीज से पीड़ित व्यक्ति को खीर खाने की सलाह देंगे. आखिर हमारी मानसिकता ही तो ऐसे तथाकथित चमत्कारियों को समृद्ध बना रही हैं.

चोरी की बीमारी

वुसतुल्लाह ख़ानवुसतुल्लाह ख़ान|मंगलवार, 17 अप्रैल 2012, 18:26

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कुछ समय पहले एक पाकिस्तानी समाचार पत्र में खबर प्रकाशित हुई थी कि पाकिस्तान के विभिन्न ऐयरपोर्ट्स से पाकिस्तानी इंटरनेशनल एयरलाइन की लगभग एक हज़ार ट्रॉलियाँ गायब हो गई, जो यात्रा सामान ढोने के लिए इस्तेमाल करते हैं.

ताज़ा गुल यह खिला कि ब्रिटेन की ग्रेटर मैनचेस्टर पुलिस ने पीआईए को एक पत्र लिख कर सूचित किया है कि एयरलाइन के कुछ कर्मचारी होटल में रहते हुए गिलास, तौलिया, शैम्पू, टूथ पेस्ट जैसी वस्तुएँ भी अपने साथ ले जाते हैं और दुकानों से छोटी मोटी वस्तुएँ गायब करने की कोशिश करते हुए पकड़े भी गए हैं.

ब्रिटेन की पुलिस ने इस रुझान को खत्म करने के लिए ज़रुरी कदम उठाने का अनुरोध किया है और पीआईए प्रशासन का कहना है कि वह इन घटनाओं की जाँच कर रही है.

क्लेप्टोमैनिया (छोटी-मोटी वस्तुएँ चुराने की आदत) एक मनोवैज्ञानिक बीमारी है. मरीज को अक्सर यह एहसास नहीं होता है कि वह जो कर रहा है असल में नैतिक अपराध है. कहा जाता है कि ढाई से पाँच प्रतिशत आबादी इस रोग से ग्रस्त होती है और किसी भी वर्ग के किसी भी व्यक्ति को क्लेप्टोमैनिया की समस्या हो सकती है.

बादशाह जॉर्ज पंचम की रानी मैरी के बारे में कहा जाता है कि वह गहनों की काफी शौकीन थी मगर क्लेप्टोमैनिया से भी ग्रस्त थी. जब वह कभी अंगूठी या नेकलेस चुपके से अपने बैग में रखी लेती तो दुकानदार इस घटना को अनदेखा कर देता और रानी के नौकर खामोशी से रकम अदा कर देते.

लगभग तीस साल पहले पाकिस्तान की एक महिला वरिष्ठ राजनीतिज्ञ भी लंदन के एक डिपार्टमेंटल स्टोर से अंडरगार्मेंटस हैंड बैग में ले जाते हुए रोक ली गई थी.

विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी ने अपने अनुभव बताते हुए मुझे बताया कि फ़ाइव स्टार होटलों के कमरों में पर्दों और बिस्तर की चादरों से जूते साफ करने और कालीन पर शराब उड़ेलने की शिकायतों की तरफ़ हम ध्यान नहीं देते.

लेकिन सरकारी प्रतिनिधिमंडल में एक न एक क्लेप्टोमैनिक राजनीतिज्ञ, अधिकारी या पत्रकार जरूर होता है जो मामूली सस्ती वस्तुएँ गायब करने के कारण सरकारी अधिकारियों के लिए शर्मिंदगी का कारण बनता है.

क्लेप्टोमैनिया बीमारी का इलाज संभव है लेकिन जिस देश को क्लेप्टोक्रेसी (चोरों का शासन) जैसी बीमारी हो जाए तो उसका कोई मनोवैज्ञानिक इलाज नहीं.

क्लेप्टोक्रेसी ऐसी प्रणाली को कहते हैं जिसमें शासन वर्ग और उसके अधिकारी अंधे होकर सरकारी खजाना बाँट कर खाएं और चोरी पर सीना जोरी करते हुए लूटे हुए धन के बल पर अपनी राजनीतिक शक्ति बढ़ाते चले जाएं.

मुश्ताक सब्जी वाले के अनुसार, यहां दो तरह के लोग हैं. वह जिन्हें मौका मिल गया. वह जिन्हें मौका नहीं मिला. फुल स्टॉप ...

एक कविता पर बवाल

विनोद वर्माविनोद वर्मा|मंगलवार, 10 अप्रैल 2012, 22:07

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एक कवि की एक कविता पर दो देशों में बवाल मच गया है.

जर्मनी और इसराइल दोनों में एक तरह से ठन गई है. गरमा गरम बहस चल रही है. टेलीविज़न पर बहसें चल रही हैं और कविता की एक एक पंक्ति पर आरोप प्रत्यारोप चल रहे हैं.

जर्मनी के नोबेल पुरस्कार प्राप्त कवि गुंटर ग्रास ने कविता लिखी है, 'व्हाट मस्ट बी सेड'.

ये कविता इसराइल, उसकी परमाणु शक्ति और ईरान पर हमले की आशंका को लेकर लिखी गई है.

लोग आरोप लगा रहे हैं कि गुंटर ग्रास ने इसराइल की अनावश्यक निंदा की है और ईरान के प्रति बेवजह नरमी बरती है.

इस बात पर अलग से बहस की जा सकती है कि गुंटर ग्रास ने क्या लिखा और क्यों लिखा. कुछ लोग गुंटर ग्रास के नाज़ी संस्थाओं से संबंध और इस पर उनकी चुप्पी का सवाल भी उठा सकते हैं.

कुछ लोग इस कविता के बहाने से गुंटर ग्रास के पूरे कवित्व और व्यक्तित्व पर बहस कर सकते हैं.

लेकिन ये बात अपने आपमें ईर्ष्या पैदा करने वाली है कि एक कविता ने दो देशों के बुद्धिजीवियों के बीच हलचल पैदा कर दी है.

भारत जैसे देश में लोग इस बात को हँसी में उड़ा सकते हैं और कह सकते हैं कि फ़ुर्सत में होंगे लोग जो एक कविता पर बहस कर रहे हैं.

जिस देश में कबीर से लेकर सुब्रमण्यम भारती, ग़ालिब से लेकर अल्लामा इक़बाल, रविंद्रनाथ टैगोर से लेकर फ़ैज़ अहमज फ़ैज़ तक कविता की एक गौरवशाली परंपरा रह चुकी है, वहाँ कितना अजीब है कि कवि होकर कोई व्यक्ति सहज महसूस नहीं कर पाता.

यूँ ही नहीं है कि विनोद कुमार शुक्ल जैसे हमारे समय के महत्वपूर्ण कवि कहते हैं कि वे अपना परिचय कवि की तरह देने से बचते हैं.

कविता पर चर्चा, बहस, विवाद, विरोध आदि तो तब होंगे जब उसे कोई पढ़ रहा होगा.

कहने को तो ये भी कहा जा सकता है कि कुछ पढ़े जाने लायक लिखा जाएगा, तभी तो पढ़ा जाएगा. लेकिन जो ऐसा कहेंगे वो जानते हैं कि उन्होंने कविता पढ़ने को ग़ैरज़रुरी काम मान लिया है.

अब हमारा समाज न अपने कवियों को पहचानता है और न लेखकों को.

ऐसे में गुंटर ग्रास की कविता चाहे जैसी हो, उससे कोई सहमत हो या असहमत. कम से कम कविता पर चर्चा तो हो रही है.

एक समाज की जीवंत बचे होने के लिए इतना प्रमाण भी कम नहीं है.

हाफिज सईद के बहाने

हफ़ीज़ चाचड़हफ़ीज़ चाचड़|शनिवार, 07 अप्रैल 2012, 17:20

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सेना मुख्यालय के ठीक सामने वाले होटल के एक बड़े हॉल में वह बैठा हुआ था और सभी लोगों की नज़रें उस पर टिकी हुई थी.

लोग बड़े आदर और सम्मान के साथ उनके हाथ मिला रहे थे और कुछ तो उनके हाथ भी चूम रहे थे. उनके चेहरे पर कोई तनाव नहीं था और विश्वास के साथ अभिवादन कर रहा था.

स्थानीय और विदेशी पत्रकार उनसे बात करने के प्रयास कर रहे थे लेकिन पत्रकारों से बात करने बजाए वह अपने समर्थकों से बात कर रहे थे.

कुछ दिन पहले अमरीका ने उनकी गिरफ्तारी या गिरफ्तारी में मदद देने पर एक करोड़ डॉलर यानी करीब 90 करोड़ रुपए के इनाम की घोषणा की थी.

'रिवॉर्ड फॉर जस्टिस'वेबसाइट के अनुसार अमरीकी प्रशासन उन्हें नवंबर 2008 में हुए मुंबई हमलों सहित कई चरमपंथी कार्रवाईयों के लिए दोषी मानता है. उन्हें वांछित लोगों की सूची में दूसरे स्थान पर रखा गया है.

अमरीका ने उन सहित चार लोगों की गिरफ्तारी या गिरफ्तारी में मदद देने पर एक करोड़ डॉलर का इनाम रखा है. तालिबान के प्रमुख मुल्ला उमर, अल कायदा के वरिष्ठ नेता अबू दुआ और यासीन अल-सूरी का शायद रावलपिंडी में बैठे लोगों को पता हो, लेकिन किसी आम नागरिक को बिल्कुल पता नहीं है.

इनमें से वह अकेले हैं जो स्वतंत्र रुप से न केवल घूम रहे हैं बल्कि सार्वजनिक तौर पर भाषण भी दे रहे हैं. सेना मुख्यालय के सामने वाले होटल में बैठ कर जिस तरह से वह बात कर रहे थे, उससे लग रहा था कि वह सबको ललकार रहे हैं कि 'है कोई माई का लाल जो गिरफ्तार करे और रातों रात करोड़पति बन जाए.'

एक पत्रकार मित्र ने मुझसे कहा,'यार, अमरीकी दूतावास से केवल 45 मिनटों के फासले पर मेरे सामने एक करोड़ डॉलर का इनाम बैठा है और मैं कुछ नहीं कर पा रहा हूँ.'

उस समय शायद कई लोग ऐसा सोच रहे थे. उनका विश्वास भी सबके सामने था और वह बैठा भी अपने करीबी मित्रों के दफ्तर यानी सेना मुख्यालय के पास था. यह सब देख कर मैं अपने प्रिय देश के बारे में बहुत दुखी हूँ.

हमारी पीढ़ी के लोगों ने बेचारे इस देश को हमेशा से ही जंग की हालत में देखा है. 70 और 80 के दशक से लेकर आज तक हमारा देश दूसरे देश के युद्ध का मैदान रहा है.

हमारे देश के आम नागरिक बिल्कुल सुरक्षित नहीं हैं और अगर कोई सुरक्षित है तो वह दुनिया के सबसे बड़े आतंकवादी और चरमपंथी जिन्होंने हमेशा मेरे देश को 'कंडोम' की तरह इस्तेमाल किया है.

इस उदाहरण के लिए मैं अपने पाठकों से माफी चाहता हूँ. वही आतंकवादी और चरमपंथी हमारे शहरों में स्वतंत्र रुप से घूमते हैं और उस जगह बड़े बड़े घर बना कर रहते हैं, जहाँ हमने रहने की कल्पना भी नहीं की है.

आज जिस तरह से प्रतिबंधित चरमपंथी गुट एक जुट हो रहे हैं, मुझे 80 के दशक वाला जनरल ज़िया-उल-हक़ का भयानक दौर याद आ रहा है कि किस तरह धर्म के नाम पर हमारे समाज में आतंकवाद और चरमपंथ का ज़हर घोला गया. उसी दौर में यही गुट सोवियत संघ के खिलाफ एकजुट हुए थे और अब अमरीका के खिलाफ हो रहे हैं.

न इस के लिए अमरीका, इसराइल और भारत दोषी हैं और न ही कोई पश्चिमी देश. अगर किसी का दोष है तो वह इस देश की उस विचारधारा है जो इस देश को इस्लाम का किला मानता है और विभाजन से ही उसका वर्चस्व बना हुआ है.

कैसे भारत को कह दूँ महान?

रूपा झारूपा झा|मंगलवार, 03 अप्रैल 2012, 17:52

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मेरी पाँच साल की बेटी नई क्लास में गई है. नई टीचर और नई-नई बातें भी खूब करती है. स्कूल की दिनचर्या बताते हुए अचानक कहने लगी, आज एक नया गाना सिखाया गया-- भारत सबसे महान है..

ये महान क्या होता है और भारत है क्या महान.... अगर अख़बार पढ़ते हुए उस खबर पर नज़र ना जाती तो शायद टालने के लिए मैं कह ही देती कि हाँ सबसे महान है भारत..

लेकिन जैसे मुँह पर ताले पड़ गए थे.. आप सबने भी पढ़ी होगी वो ख़बर- एक बार फिर कम उम्र की घरेलू नौकरानी के साथ डाक्टर दंपति का दुर्व्यवहार, प्रताड़ना...ख़बर में उस लड़की के हवाले से लिखा था कि उसे भर पेट खाना नहीं दिया जाता था.

चिकोटी काटी जाती थी और उसकी चीख बाहर न पहुँचे इसके लिए मुँह को कपड़े से ठूँस कर बंद किया जाता था... कभी-कभी जूता भी ठूँस दिया जाता था.

"ऐसी घटनाएँ तो छपती ही रहती हैं.. एनजीओ ने बढ़ा-चढ़ा कर रिपोर्ट लिखवाई होगी.. नौकरानियों का तो यही हाल है जिस थाली में खाओ उसी में छेद करो"....

अगर मैंने पिछले पांच साल से एजेंसी के जरिए मेड्स न रखी होती तो शायद पड़ोस की महिलाओं की इन दलीलो को सच भी मान बैठती पर अलोक धन्वा की एक कविता की एक पंक्ति उधार ले सकूँ, मुझे भी मालूम है 'कुलीनता की हिंसा"..

जूलियानी की याद बरबस ही आ गई..

जब मेरे घर एक एजेंट के ज़रिए वो पहली बार आई तो मुझे एक लंबी स्वस्थ लड़की का इंतजार था. जूलियानी बहुत छोटी सी.. दुबली-पतली लड़की थी.. लगता किसी ने उसे बच्ची रहने नहीं दिया और वो बड़ी हो नहीं पाई..

बोलती बहुत धीमे स्वर में.. घर में मदद करने के लिए एक कामकाजी मां के लिए किसी भी तरह की लड़की का मिलना मुँह-मांगे वरदान जैसा होता है..

मैंने सोचा कोई बात नहीं ठीक से खाएगी पिएगी तो स्वस्थ हो जाएगी.. बोलने भी लगेगी..
बोलने तो लगी पर स्वस्थ नही हो पा रही थी. डाक्टरी जांच से पता चला टीबी है. और लंबे अरसे से. मैंने पूछा पहले जहाँ काम करती थी वहां बीमार होती थी..

उसने जवाब दिया जो मैं शायद जानती थी, हाँ थोडा बुखार होता रहता था.. फिर ठीक हो जाता था. कभी डाक्टर के पास नहीं गई.. एक साल में कभी ले नहीं गई मैडम..

इलाज शुरू होने के तुरंत बाद ही वो स्वस्थ होने लगी.. खुश भी रहती थी और फिर एक दिन वो भाग गई.. एक पहचान के लड़के के साथ ...

फिर लौट भी आई दो दिनो बाद.. लड़का शादी-शुदा परिवार वाला था..

उसे लेने एजेंट आया और उससे पहले कि मैं उसे रोकती कस कर उसे तमाचा मारा..
मैं झट से उसे अंदर ले गई. पूछा आगे क्या करना है.. एजेंट के साथ जाना है या घर वापिस जाना है..

आश्चर्य था कि उसका चेहरा एक दम सपाट था..

घर चली जाओ जूलियानी, मै इंतज़ाम कर देती हूं,
नहीं दीदी वहाँ जाकर क्या करना है..
एजेंट के साथ जाओगी..
मन तो नही है.. वो भी मुझसे ज़बरदस्ती करता है..कई बार मना करती हूं फिर भी..
कहता है जीजा साली का रिश्ता है, छेडूंगा..

चुपचाप मेरी तरफ देखने लगी..
कातर दृष्टि से....

मुझे पता था वो जानना चाहती थी कि क्या वो मेरे पास काम करती रह सकती है?

मुझे अपनी छोटी बच्ची की सुरक्षा याद आई, मेरे पीछे बिल्कुल सुनसान मेरा घर फिर किसी का आना जाना शुरू कर दिया इसने तो... लड़की का मामला है किसी बड़ी मुसीबत मे ना पड़ जाउं..

जूलियानी को मेरी खामोशी से मेरे जवाब का अंदाज़ा हो गया होगा..

दुल्हन की तरह सजी जूलियानी झट उठ कर बोली, एजेंट के साथ जाउंगी...

जनवरी की ठंडी और गहरी रात में गुम होती चली गई जुलियानी.. केवल उसके दुपट्टे का गोटा दूर तक झिलमिलाता रहा..

और मुझे याद आई कुलीनता की हिंसा वाली पंक्ति.... अपनी बिटिया को ये कहने में शर्म सी महसूस हुई कि भारत सबसे महान है अगर महान होना कोई पोज़िटिव बात है तो......

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