मन गुदगुदाता है
आश्चर्य है. प्रोफ़ेसर मटुकनाथ की प्रेमिका जूली को उनकी पत्नी सरेआम पीटती हैं. टेलीविज़न चैनल वाले किसी प्रायोजित कार्यक्रम की तरह इसका लाइव प्रसारण करते हैं. फिर बाद में लूप में डालकर बार-बार दिखाते हैं.
आश्चर्य न पिटाई में है न टीवी चैनलों की बेहयाई में. आश्चर्य उस गुदगुदी में है, जो मन के भीतर होती है.
आश्चर्य है कि यह सब देखकर मन नहीं पसीजता, दुख नहीं उपजता. जुगुप्सा जागती है. मन कसमसाता है. चरमसुख जैसा कुछ मिलता सा लगता है.
ऐसा सुख तब भी मिलता था जब अभी 'पीपली लाइव' का ज़माना नहीं आया था. तब अख़बारों में और बाद में पत्रिकाओं में तस्वीरें देखा करते थे. बार-बार देखा करते थे.
याद है आपको? घर की बड़ी बहू सोनिया गांधी के दिवंगत देवर की पत्नी और घर की छोटी बहू मेनका गांधी को घर से निकाल दिया गया था. सामान सड़क पर पड़ा था. एक छोटा बच्चा सामान के साथ खड़ा था. याद है आपको मन कैसा मुदित होता था ये तस्वीर देखकर?
मन बावरा है. तरह तरह की कल्पनाएँ करता है. अब तक वो तस्वीर मन में है. अब भी वह नज़र लगाए रखता है कि संसद के भीतर दोनों बहुओं के बीच कभी नज़रें मिलती हैं या नहीं. ख़बरों पर नज़र रहती है, छोटी बहू के घर बहू आ रही है तो बड़ी बहू की प्रतिक्रिया कैसी है.
आश्चर्य है कि बेगानी शादी में अब्दुल्ला क्यों दीवाना हो जाता है. अरे शादी में हो जाए तो हो जाए, शादी टूटने बिखरने लगती है तो भी चटखारे लेने में मज़ा आता है.
किसी ने फुसफुसाकर कहा था, "देश के सबसे बड़े औद्योगिक घराने की बहू एक पूर्व मिस इंडिया से नाराज़ हैं."
होती हैं तो हों, हमारी बला से. लेकिन आश्चर्य है कि मन में गुदगुदी हुई. दिल में एक लहर उठी. वह फुसफुसाहट एक कान से सुनी और फिर तुरंत दूसरा कान भी लगा दिया. परमानंद इसी को कहते होंगे.
अब हर कोई अख़बार के कोने के कॉलम में पढ़ रहा था कि मिसेस शाहरुख़ ख़ान यानी गौरी इन दिनों प्रियंका चोपड़ा नाम की एक फ़िल्म अभिनेत्री से नाराज़ हैं. सुना है कि उन्होंने कई और अभिनेता पत्नियों को अपनी नाराज़गी में साझेदार बना लिया है.
है तो बुरा. लेकिन क्या करें कि मन मंद मंद मुस्काता है. पुराने खाज को खुजली जैसा सुख मिलता है. सौतिया डाह की ख़बर जैसा सुख परनिंदा में भी नहीं.
अब देखिए ना. जया बच्चन के घर के सामने वाले आंगन में बैठा बोफ़ोर्स नाम का भूत 25 साल बाद ले देकर टला. राहत की सांस को दो दिन भी नहीं बीते थे कि अपने पत्रकार भाई-बहन लोग उनके पिछले आंगन की तस्वीरें लेने लगे. पूछा तो कहा कि पिछले दरवाज़े से एक और भूत घुस आया है. रेखा नाम का.
रेखा जी, कुछ ही दिनों में माननीय सांसद होंगीं. बस शपथ लेने की देर है. लेकिन लोग क्या-क्या चुटकुले सुना रहे हैं.
एक आदरणीय मित्र ने लिखा, "जो अमिताभ नहीं कर पाए वो सरकार ने कर दिया, जया और रेखा अब एक ही हाउस में हैं." बाद में पाया कि मित्र की कल्पनाशीलता फ़ेसबुक नाम के जंजाल में फैल गई है. हर कोई ऐसा ही कुछ लिख रहा है और साथ में एक इस्माइली चिपका रहा है.
गुदगुदी असर दिखा रही है.
किसी ने कहा, "जिसने अमिताभ को बोफ़ोर्स में झूठा फँसाया था, उन्ही लोगों की करतूत है कि अब बोफ़ोर्स से छूटे तो राज्यसभा में फँसा दिया."
लोग प्रतीक्षा कर रहे हैं कि किस दिन दोनों देवियाँ आमने सामने होंगीं. एक कल्पनाशील पत्रकार मित्र ने सलाह दी, "राज्यसभा के सिटिंग अरेंजमेंट का ग्राफ़िक बनवाकर उसमें दिखाओ कि जया कहाँ बैठेंगीं और रेखा कहाँ बैठेंगीं. इसे वेबसाइट पर लगवाओ. देखो कैसे हिट होता है."
कल्पना के घोड़े भाग रहे हैं. लोग आंखे मूंदे मंद-मंद मुस्कुरा रहे हैं. इस महंगाई के ज़माने में लोगों को मुफ़्त में सुख मिल रहा है.
आश्चर्य है कि कोई दुखी नहीं है. आपको अगर दुख है, तो अपना इलाज करवाइए. ये मटुकनाथ उर्फ़ चौराहे पर प्रेम का ज़माना है.





