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मन गुदगुदाता है

विनोद वर्माविनोद वर्मा|शनिवार, 28 अप्रैल 2012, 15:12 IST

आश्चर्य है. प्रोफ़ेसर मटुकनाथ की प्रेमिका जूली को उनकी पत्नी सरेआम पीटती हैं. टेलीविज़न चैनल वाले किसी प्रायोजित कार्यक्रम की तरह इसका लाइव प्रसारण करते हैं. फिर बाद में लूप में डालकर बार-बार दिखाते हैं.

आश्चर्य न पिटाई में है न टीवी चैनलों की बेहयाई में. आश्चर्य उस गुदगुदी में है, जो मन के भीतर होती है.

आश्चर्य है कि यह सब देखकर मन नहीं पसीजता, दुख नहीं उपजता. जुगुप्सा जागती है. मन कसमसाता है. चरमसुख जैसा कुछ मिलता सा लगता है.

ऐसा सुख तब भी मिलता था जब अभी 'पीपली लाइव' का ज़माना नहीं आया था. तब अख़बारों में और बाद में पत्रिकाओं में तस्वीरें देखा करते थे. बार-बार देखा करते थे.

याद है आपको? घर की बड़ी बहू सोनिया गांधी के दिवंगत देवर की पत्नी और घर की छोटी बहू मेनका गांधी को घर से निकाल दिया गया था. सामान सड़क पर पड़ा था. एक छोटा बच्चा सामान के साथ खड़ा था. याद है आपको मन कैसा मुदित होता था ये तस्वीर देखकर?

मन बावरा है. तरह तरह की कल्पनाएँ करता है. अब तक वो तस्वीर मन में है. अब भी वह नज़र लगाए रखता है कि संसद के भीतर दोनों बहुओं के बीच कभी नज़रें मिलती हैं या नहीं. ख़बरों पर नज़र रहती है, छोटी बहू के घर बहू आ रही है तो बड़ी बहू की प्रतिक्रिया कैसी है.

आश्चर्य है कि बेगानी शादी में अब्दुल्ला क्यों दीवाना हो जाता है. अरे शादी में हो जाए तो हो जाए, शादी टूटने बिखरने लगती है तो भी चटखारे लेने में मज़ा आता है.

किसी ने फुसफुसाकर कहा था, "देश के सबसे बड़े औद्योगिक घराने की बहू एक पूर्व मिस इंडिया से नाराज़ हैं."

होती हैं तो हों, हमारी बला से. लेकिन आश्चर्य है कि मन में गुदगुदी हुई. दिल में एक लहर उठी. वह फुसफुसाहट एक कान से सुनी और फिर तुरंत दूसरा कान भी लगा दिया. परमानंद इसी को कहते होंगे.

अब हर कोई अख़बार के कोने के कॉलम में पढ़ रहा था कि मिसेस शाहरुख़ ख़ान यानी गौरी इन दिनों प्रियंका चोपड़ा नाम की एक फ़िल्म अभिनेत्री से नाराज़ हैं. सुना है कि उन्होंने कई और अभिनेता पत्नियों को अपनी नाराज़गी में साझेदार बना लिया है.

है तो बुरा. लेकिन क्या करें कि मन मंद मंद मुस्काता है. पुराने खाज को खुजली जैसा सुख मिलता है. सौतिया डाह की ख़बर जैसा सुख परनिंदा में भी नहीं.

अब देखिए ना. जया बच्चन के घर के सामने वाले आंगन में बैठा बोफ़ोर्स नाम का भूत 25 साल बाद ले देकर टला. राहत की सांस को दो दिन भी नहीं बीते थे कि अपने पत्रकार भाई-बहन लोग उनके पिछले आंगन की तस्वीरें लेने लगे. पूछा तो कहा कि पिछले दरवाज़े से एक और भूत घुस आया है. रेखा नाम का.

रेखा जी, कुछ ही दिनों में माननीय सांसद होंगीं. बस शपथ लेने की देर है. लेकिन लोग क्या-क्या चुटकुले सुना रहे हैं.

एक आदरणीय मित्र ने लिखा, "जो अमिताभ नहीं कर पाए वो सरकार ने कर दिया, जया और रेखा अब एक ही हाउस में हैं." बाद में पाया कि मित्र की कल्पनाशीलता फ़ेसबुक नाम के जंजाल में फैल गई है. हर कोई ऐसा ही कुछ लिख रहा है और साथ में एक इस्माइली चिपका रहा है.

गुदगुदी असर दिखा रही है.

किसी ने कहा, "जिसने अमिताभ को बोफ़ोर्स में झूठा फँसाया था, उन्ही लोगों की करतूत है कि अब बोफ़ोर्स से छूटे तो राज्यसभा में फँसा दिया."

लोग प्रतीक्षा कर रहे हैं कि किस दिन दोनों देवियाँ आमने सामने होंगीं. एक कल्पनाशील पत्रकार मित्र ने सलाह दी, "राज्यसभा के सिटिंग अरेंजमेंट का ग्राफ़िक बनवाकर उसमें दिखाओ कि जया कहाँ बैठेंगीं और रेखा कहाँ बैठेंगीं. इसे वेबसाइट पर लगवाओ. देखो कैसे हिट होता है."

कल्पना के घोड़े भाग रहे हैं. लोग आंखे मूंदे मंद-मंद मुस्कुरा रहे हैं. इस महंगाई के ज़माने में लोगों को मुफ़्त में सुख मिल रहा है.

आश्चर्य है कि कोई दुखी नहीं है. आपको अगर दुख है, तो अपना इलाज करवाइए. ये मटुकनाथ उर्फ़ चौराहे पर प्रेम का ज़माना है.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 17:41 IST, 28 अप्रैल 2012 BHEEMAL Dildarnagar:

    वर्माजी सिर्फ़ गुदगुदाने का प्रयास भर किया आपने. आपके स्तर के अनुरुप आपसे आशा की जाती है कि आप कुछ धीर गंभीर विषय पर लिखेंगे. बीबीसी का स्तर इतना छिछला क्यों? जो व्हेल जैसी थी आजकल झींगा जैसी क्यों दिखती है? सिर्फ़ नेताओं के पीछे भागने की क्या पड़ी है और भी बहुत से ग़म हैं नेताओं के सिवा.


  • 2. 03:36 IST, 29 अप्रैल 2012 samir diwan:

    बहुत अच्छा है.

  • 3. 10:35 IST, 29 अप्रैल 2012 Dr.Lal Ratnakar:

    विनोद जी ने कह तो सब कुछ दिया है, भारतीय सामाजिक सरोकारों से जोड़कर जिस सोनिया का जिक्र आपके ब्लॉग में हुआ है, वह सड़क के किनारे बसे करोड़ों करोड़ भारतीयों की कथा सा ही है. पर भारत को नेतृत्व दे रही 'सोनिया' के जिस असली चरित्र को इस ब्लॉग ने खुरचा है वह स्मरणीय ही रहेगा. " प्रोफ़ेसर मटुकनाथ की प्रेमिका जूली को उनकी पत्नी सरेआम पीटती हैं." के माध्यम से किसको और पिटवाने की ओर वर्मा जी का इशारा है समय बताएगा पर जनता का भी मन अब गुद गुदाने लगा है. देखिए अगली बार वह किसको "लोक सभा" भेजती है.

  • 4. 10:49 IST, 29 अप्रैल 2012 soumya:

    धीर गंभीर विषय के बाद अब आप गुदगुदाने की कोशिश कर रहे हैं.. बढ़िया है :)

  • 5. 16:50 IST, 29 अप्रैल 2012 Devendra Surjan, Jabalpur:

    ये गुदगुदी है या बीती बातों का मुरब्बा. आजकल मिक्स अचार भी खूब चलता है. हर चीज का स्वाद एक ही तेल और एक ही मसाले में. वही मज़ा इस मुरब्बनुमा अचारी ब्लॉग में मिल गया. स्तरीय ना होने की शिकायत वाले बताएं कि आठों इन्द्रियों को सुख देने वाले इस लेख में बेस्तर क्या है. स्वाद बदलिए. लेखक ने परोस दिया है.--- देवेन्द्र सुरजन , जबलपुर

  • 6. 21:12 IST, 29 अप्रैल 2012 Farid Ahmad khan :

    बहुत अच्छा लिखा है आपने.

  • 7. 11:34 IST, 30 अप्रैल 2012 E A Khan, Jamshedpur (Jharkhand):

    बीबीसी हिंदी में कभी कभी इस तरह के ब्लॉग भी अच्छे लगते हैं. नहीं तो ज़माने की खरी खोटी पढ़ने और उस पर टिप्पणी लिखते-लिखते मन में एक खटास सी आ गई थी. वर्मा जी आप को इस ब्लॉग के लिए धन्यवाद. अमिताभ बच्चन और रेखा वाली पुरानी कहानी तो हम भूल ही चुके थे.

  • 8. 10:33 IST, 02 मई 2012 राहुल रंजन:

    सीधी सरल भाषा में क्या ख़ूब चित्रण किया है आज की सामाजिक और व्यक्तिगत विचारधारा का.

  • 9. 11:55 IST, 02 मई 2012 nivas chandra:

    धन्यवाद.

  • 10. 13:46 IST, 03 मई 2012 इंद्रमणि मौर्य:

    अच्छा लिखा है विनोद जी ने.

  • 11. 17:38 IST, 03 मई 2012 रवींद्र:

    मेरा भी मन गुदगुदा गया है.

  • 12. 12:15 IST, 05 मई 2012 E A Khan, Jamshedpur:

    शुरू में इस ब्लॉग को चटखारे लेकर पढ़ा और टिप्पणी लिख मारी (लिखी नहीं) . लेकिन अब तो लोगों की बेतुका टिप्पणियाँ पढ़ कर और हिंदी अख़बारों द्वारा इस मुद्दे पर और ज्यादा बेतुकी बातें लिखे जाने पर शर्म आने लगी है.

  • 13. 06:11 IST, 07 मई 2012 sandy:

    अच्छा लेख लिखा है आपने.

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