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दो परियों की दास्तां

वंदनावंदना|मंगलवार, 24 अप्रैल 2012, 12:47 IST

'क्या तुम्हारे साथ भी कुछ वैसा ही हुआ जो मेरे साथ हुआ".........अगर इस दुनिया से रुकसत होने के बाद वाकई लोग स्वर्ग या नरक में जाते हैं तो आज बेबी फलक बेबी आफरीन से शायद यही पूछ रही होगी. उम्मीद है ये दोनों जन्नत में ही होंगी क्योंकि नरक तो वो जिंदा रहते ही भोग चुकी हैं.

फलक और आफरीन वही बच्चियाँ हैं जिन्हें निर्दय समाज की बेदिली ने 'मार' डाला. अब सुर्खियों से ये दोनों गायब हो चुकी हैं, सिंघवी का कथित सेक्स सीडी कांड और आईपीएल की चमक दमक ने हेडलाइन की जगह ले ली है. लेकिन इन बच्चियों की दर्द भरी दास्तां ज़हन में अब भी ताज़ा है.

फलक ने जीवन के दो ही बसंत देखे थे. दो महीने तक वो एम्स अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच झूलती रही. जब उसे अस्पताल लाया गया था तो उस समय फलक के शरीर पर गहरे घाव और दांतों के निशान थे और बाजू की हड्डियां टूटी हुई थी. पुलिस के मुताबिक बच्ची कई हाथों से होते हुए अस्पताल पहुँची थी.

और तो और 14 साल की जो लड़की फ़लक को अस्पताल लाई थी, जाँच के दौरान ये पता चला था उसके पिता ने उसे निकाल दिया था और उससे वेश्यावृति करवाई जा रही थी. किसी कुचक्र में फँस कर रह गई थी फलक. नन्हीं सी जान फिर भी दो महीने तक लड़ती रही, दिल के दो दौरे सहे पर आखिर मौत से हार गई.

टीवी चैनलों पर आधा ढका सा फलक का जख्मी चेहरा अब तक आँखों के सामने घूमता है...ये जख्म फलक के शरीर पर नहीं बल्कि समाज की रूह पर प्रहार है अगर कोई उसे महसूस करे तो......

बंगलौर की बेबी आफरीन ने तो तीन महीने पहले ही इस दुनिया में कदम रखा था. इससे पहले कि वो अट्ठखेलियाँ करती, उसे लाड प्यार मिलता...पिता की कथित प्रताड़ना ने उसके सपनों और जीवन का गला घोट दिया. माँ की मानें तो इसकी वजह ये रही कि आफरीन के पिता को लड़के की हसरत थी और बच्ची का जन्म उन्हें इतना नागवार गुजरा कि जन्म के बाद से ही प्रताड़ित करना शुरु कर दिया.

ऐसी कई आफरीन और फ़लक भारत में और होंगी जिनका नाम कभी टीवी और अखबारों की सुर्खियों नहीं बन पाया.

वैसे हेडलाइन में आकर भी आफरीन और फ़लक का कौन सा भला हो गया.. क्योंकि ये सुर्खियाँ कुछ दिन बाद अखबारों के पन्नों से गायब हो गईं. बच्चियों की हालत देखकर जिन लोगों के मन हिकारत से भरे होंगे वो भी ये सब भूल रोजमर्रा की जद्दोजहद में व्यस्त हो चुके हैं.

और इस दौरान शायद कई और आफरीन और फ़लक की प्रताड़ना की ज़मीन तैयार हो चुकी होगी. अगर ऐसा हो रहा है तो इसके लिए प्रताड़ना करने वाले ही नहीं हम सब भी कसूरवार हैं. आखिर इस तरह का घिनौना काम करने वाले उसी समाज का हिस्सा हैं जिसमें हम-आप रहते हैं और बहुत बार चुप्पी साधे रहते हैं. ये ब्लॉग नहीं माफीनामा है आफरीन और फ़लक के नाम........

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 15:17 IST, 24 अप्रैल 2012 BHEEMAL Dildarnagar:

    हम सब इसके लिए जिम्मेदार हैं. ये लिखकर आपने अपना दामन साफ कर लिया. अखबार नवीस बड़े वो होते हैं. मनोरंजन हेतु कभी मैने भी एक बैंक मैनेजर की किचन में पाँच बजे से 11 बजे तक काम किया था. खुद नौकर था, पड़ोस के एक बहादुर से दोस्ती हो गई. उसने बताया उसकी मेमसाहब कभी कभी कहती हैं बहादुर आज साबुन से नहा लेना और कभी खूब दबा के प्यार करती. शायद बुद्धिजीवी लोगों से आपका परिचय होगा. छोड़िए ये घड़ियाली आँसू.

  • 2. 17:10 IST, 24 अप्रैल 2012 E A Khan, Jamshedpur (Jharkhand):

    आदरणीय वंदना - फलक और आफरीन की दुखदायी दास्ताँ पढकर आठ दस दिनों से मन बहुत मर्माहत और खटास से भरा है. आप ने नए सिरे से इस घाव को ताज़ा कर दिया. यह किसी देश का अपना मसला हो सकता है लेकिन ये घटना सारे संसार की नीद उड़ाने के लिए काफी है. इस तरह के संवेदनशील ब्लॉग लिखने से क्या होगा जब तक की अंतर्राष्ट्रीय लेवल पर सरकार पर दबाव न डाला जाएगा की ज़िम्मेदार लोगों को कड़ी से कड़ी सजा मिले. लड़कियों पर होने वाले ज़ुल्म पर इतना सख्त कानून बनाया जाए कि लोग इस तरह के दुस्साह की कल्पना भी न कर सकें. आप तो स्वयं महिला हैं. आप तो इस समस्या को ज्यादा गहराई से समझ सकतीं हैं. कहीं ऐसा न हो की यह मामला सिर्फ एक समाचार ही बन कर न रह जाए.

  • 3. 19:31 IST, 24 अप्रैल 2012 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    वंदना जी कुछ नहीं होगा इस महान भारत में. रहा सवाल फलक या आफरीन का तो आप भी उसी समाज से हैं लेकिन आप खुशकिस्मत हैं कि आप आज इस मुकाम पर हैं. लेकिन फलक या आफरीन किस्मत वाली नहीं हैं. दुख होता है जब ऐसे ब्लॉग पढ़ने को मिलते हैं लेकिन जिम्मेदार कौन- हम सब और हमारा पूरा समाज.

  • 4. 20:42 IST, 24 अप्रैल 2012 Kapil Batra:

    मैं पूर्व में ईए खान की भेजी टिप्पणी के बारे में कहना चाहता हूँ कि खान साहब बीबीसी भी टिप्पणियों को मॉडेरेट करके छापती है- अगर उसकी आलोचना की जाए या फिर उसे ये बोला जाए कि आप खबर छाप कर मुद्दे को भूल गए हैं. लेकिन बीबीसी ने ब्लॉग पर आई पहली टिप्पणी को मॉडरेट नहीं किया. इस टिप्पणी का पहले वाक्य के बाद मुद्दे से कोई लेना देना नहीं है. इसलिए दूसरों से इतनी ज्यादा उम्मीद करना ठीक नहीं. ये एक ब्लॉग है जहाँ वंदनाजी ने अपनी भावनाएँ व्यक्त की हैं. ये भावनाएँ शायद केवल तात्कालिक हों लेकिन भावनाएँ तो हैं.

  • 5. 21:39 IST, 24 अप्रैल 2012 MERAJ ALAM :

    जब तक सख्त से सख्त सजा नहीं मिलती, तब तक जुर्म होते रहेंगे. इस तरह का घोर अपराध करने वालों को मौत की सजा मिलनी चाहिए

  • 6. 06:30 IST, 25 अप्रैल 2012 नवल जोशी:

    वंदना जी ,ब्लॉग में आपके द्वारा उठाए गए इस मुद्दे और मंशा से शायद ही कोई असहमत हो,लेकिन इन निष्कर्षों से शायद ही कोई सहमत हो, फलक और आफरीन के साथ जो हुआ वह माफीनामे से कैसे भुलाया जा सकेगा. हम सब इस गुनाह के भागीदार नहीं भी तो कम से कम तमाशबीन तो हैं ही और तमाशबीन होना भी कम बडा गुनाह नहीं है. जब कभी इस तरह की घटना हमारे सामने आ जाती है तो हम किसी तरह अपनी सहूलियत के अनुसार प्रतिक्रिया व्यक्त कर इन घटनाओं का कोई सुविधापूर्ण तर्क गढ़ लेते हैं, और आगे बढ जाते हैं किसी भी बात को उसकी निष्पत्ति तक नहीं पहुँचने देते हैं. यही इस घटना के साथ भी किया जा रहा है. जहॉ तक माफ़ीनामे की बात है तो अब हमें माफी देने के लिए बचा ही कौन है? फ़लक और आफ़रीन दोनों ही इस दुनिया में नहीं हैं वे हमें आईना दिखा गई हैं कि हम कैसे समाज में रहते हैं? और किस तरह बच निकलने के रास्ते तलाश लेते हैं. लेकिन आपने फिर से समाज को झिंझोड़ा है. यह आशा की एक किरण तो है ही. आपने इन दोनों के ज़रिए जिस तरह पिताओं पर टिप्पणी की है यह ग़लत है. फ़लक और आफ़रीन ऐसी बेटियाँ है जिनका पिता के नाम पर हत्यारों से सामना हुआ, और मारी गई. लड़के की हसरत में बेटी का कत्ल हो या फिर बेटी को दर-दर की ठोकर के लिए मजबूर करने वाला कुछ भी हो सकता है लेकिन पिता तो हो ही नहीं सकता है, पिता होने का मतलब जैविक पिता होने से कहीं दूसरी बात है. आफ़रीन के जन्म की प्रक्रिया में इस व्यक्ति की प्राकृतिक भूमिका हो सकती है लेकिन केवल इतने से ही इसे पिता नहीं कहा जाना चाहिए और इस तरह के कृत्य के बाद तो कतई नहीं. इस तरह के संबंध तो पशुओं में भी होते हैं लेकिन वे पिता नहीं हो जाते हैं पिता होना इससे आगे शुरू होता है और ज़रूरी भी नहीं है कि जो व्यक्ति जन्म की प्रक्रिया में सहयोगी हो वह अनिवार्य रूप से पिता भी हो, इस तरह के सम्बन्ध जैविक तो कहे जा सकते हैं लेकिन ये संबंध जब तक अपनी पूर्णता को उपलब्ध नहीं होते हैं तब तक इस तरह के लोगों को पिता नहीं कहना चाहिए. ये हत्यारे हैं और सिर्फ हत्यारे. पिता और पुत्री के संबंधों पर इस घटना से कोई भी प्रश्न चिन्ह लगाना गलत है. आजकल कथित रूप से पति पत्नियों को मरवा रहे हैं या प्रेमिकाएँ प्रेमियों का मरवा रही हैं लेकिन न तो ये पति हैं और न ही ये प्रेमिकाएँ, ये सिर्फ हत्यारे है जो अब संबंधों की ओट में अपना कृत्य कर रहे हैं. हमें इन्हें पहचानना होगा और सही तरीके से लोगों के सामने रखना होगा अन्यथा हमारा यह सरलीकरण भयानक तबाही ला सकता है लोग सम्बन्धों पर भरोसा करना ही छोड देगें. हमें संबंधों को इसकी सही जगह पर रखना हो. हत्यारे को सिर्फ हत्यारा कहना होगा. इस तरह की घटनाओं से यह पता चलता है कि समाज के अन्दर भयानक उथल-पुथल चल रही है और हम इसको नजरअंदाज करते जा रहे हैं. यह माफ़ीनामा भी इस घटना के अपराधबोध से मुक्ति पाने का एक तरीका ही है. अपराधबोध इस बात का कि इतने निर्मम,अन्यायपूर्ण, कुरूप,क्रूर और हिंसक समाज में हम रहते ही नहीं बल्कि इसे स्वीकार भी करते है, और इसमें अपना योगदान भी देते हैं ,केवल इसलिए कि हमारी जिंदगी में कोई खलल न हो हम घटनाओं को उस रूप में देखते ही नहीं जैसे कि वे घट रही हैं. और कभी बुरी तरह इसमें फंस जाते हैं तो अपना माफ़ीनामा पेश कर बच निकलने का रास्ता खोजते हैं. लेकिन इसके बावजूद भी वंदना जी की खास बात यह है कि इस मुद्दे को लेकर वे चुप नहीं हैं, और बात होगी तो नतीजे भी सामने आएँगे ही. चुप्पी तोड़ना वाकई बड़ी बात है, आपका धन्यवाद.

  • 7. 10:55 IST, 25 अप्रैल 2012 भीमल, दिलदारनगर:

    वंदना जी आपने मेरी दुखती रग को छेड़ दिया. कहने की सीमा होती है, सहने की सीमा होती है. आप उत्तेजना में कुछ कटु बातें लिख गईं, खेद प्रकट करता हूँ. हमें बेहतर समाज की योजना बनानी चाहिए, नकारात्मक सोच को त्यागना होगा. हम ऊँचे,मध्यम श्रेणी के लोग, पक्की धारणा बना लें कि हम श्रम करनेवालों का शोषण नहीं करेंगे.फिर समाज के ये लोग समय से विकास के पथ पर आ जाएँगे, शिक्षिक होंगे. तनिक सोचिए, शोषण बंद कर दिया जाए, जो कि बुद्धिजीवी और ऊँचे लोग करते हैं, तो फिर कोई क्यों परियों की हत्या करना चाहेगा.

  • 8. 15:24 IST, 25 अप्रैल 2012 E A Khan, Jamshedpur (Jharkhand):

    वंदना जी के ब्लॉग पर मेरी टिप्पणी पर बत्रा जी द्वारा विचार प्रकट परने पर मैं उनकी आभारी हूँ कि उन्होंने मेरी टिप्पणी को ध्यान से पढ़ा है. मैं उनके सुझाव से पूरी तरह सहमत हूँ लेकिन इस गंभीर मसले पर जिस तरह वंदना जी का दिल दुख सकता है उसी तरह उनका ब्लॉग पढने पर मेरा दिल भी दुखित हुआ है.

  • 9. 20:53 IST, 25 अप्रैल 2012 बिंदेश्वर पांडे, बीएचयू:

    वंदना जी, इस माफ़ीनामे को पढ़ कर दुनिया में दरिंदगी की क्या हद हो सकती है इसका पता चला.
    शुक्रिया.

  • 10. 00:22 IST, 26 अप्रैल 2012 Saptarshi:

    ये अलग बात है कि ये हरकत बहुत घटिया है. लेकिन एक बार खुद से सवाल पूछ कर देखिए. आप में से कितने लोग हैं जो बेटे की जगह बेटी को प्राथमिकता देते हैं? अब आइए हमलोग मिलकर कुछ आँसू बहाते हैं और उस कहावत को याद करते हैं कि इस देश में भगत सिंह दोबारा पैदा हो लेकिन पड़ोसी के घर, मेरे घर नही.

  • 11. 09:00 IST, 28 अप्रैल 2012 Anwar Ali:

    वंदना जी आपने सही और बेबाकी से लिखा है. कुछ लोग समझते हैं कि भारतीय समाज में सुधार की गुजांइश नहीं है. ये नकारात्मक सोच है. हम हाथ पर हाथ रख कर नहीं बैठ सकते. सुधार की प्रक्रिया चलती रहती है. खबर एक बार मीडिया में आने के बाद सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि वो घटनाओं का संज्ञान ले और कार्रवाई करे. समाज और मीडिया के जागरुक रहने से ही कुछ हासिल होगा.

  • 12. 19:13 IST, 29 अप्रैल 2012 vandana dwivedi:

    जिस देश में नारियों की पूजा होती हो, जहाँ के धर्म कहते हैं कि यत्र पूजयते नारी तत्र रम्याते देवता...वहाँ के पूरे समाज के लिए राजनेताओं के लिए ये बहुत ही शर्मनाक बात है.

  • 13. 19:59 IST, 08 मई 2012 Gaurav Suman:

    आपने एकदम सही कहा वंदना जी. आज भले ही हमारा समाज और हमारा देश आगे निकल गया हो लेकिन लोगों की सोच आज भी वही है जो 100-200 साल पहले थी. इसके लिए कोई और नहीं बल्कि हम जिम्मेदार हैं. हम लोगों को ये बदलना होगा. हम सभी को बीवी चाहिए, बहन चाहिए लेकिन बेटी नहीं. जब बेटी ही नहीं होगी तो बहन या बीवी कहाँ से आएगी.

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