आस्था या अंधविश्वास
भारत के कई प्रमुख टीवी चैनल और समाचार चैनलों पर दरबार लगा है. बड़ी संख्या में भक्तों के बीच चमत्कारी शक्तियों का दावा करने वाले शख्स सिंहासन पर विराजमान हैं.
लोग प्रश्न पूछते हैं और बाबा जवाब देते हैं. सामान्य परेशानी वाले सवालों के असामान्य जवाब. एक छात्रा पूछती है, बाबा मैं आर्ट्स लूँ, कॉमर्स लूँ या फिर साइंस. बाबा कहते हैं- पहले ये बताओ आखिरी बार रोटी कब बनाई है, रोज एक रोटी बनाना शुरू कर दो.
एक और हताश और परेशान व्यक्ति पूछता है, बाबा नौकरी कब मिलेगी. बाबा कहते हैं क्या कभी साँप मारा है या मारते हुए देखा है. ये है निर्मल बाबा का दरबार.
जनता मस्त है और बाबा भी. बाबा की झोली लगातार भर रही है. बाबा के नाम प्रॉपर्टी भरमार है. होटल हैं, फ्लैट्स हैं, बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ हैं. कई अखबार दावा करते हैं कि जनवरी से बाबा के बैंक खाते में हर दिन एक करोड़ रुपए आ रहे हैं.
ये है 21वीं सदी का भारत. आधुनिक भारत. अग्नि-5 वाला भारत. कौन कहता है भारत में पैसे की कमी है. गरीब से गरीब और धनी से धनी बाबा के लिए अपनी संपत्ति कुर्बान कर देना चाहता है.
कई प्रमुख टीवी चैनलों और समाचार चैनलों पर जगह बना चुके निर्मल बाबा पर एकाएक मीडिया की तिरछी नजर पड़ गई है. अब टीवी चैनल निर्मल बाबा की पोल खोलने के लिए कमर कस चुके हैं.
कितनी अजीब बात है कई समाचार चैनल बाबा की बैंड बजाने पर तुले हैं और उन्हीं के चैनल पर बाबा अपने भक्तों को बेमतलब का ज्ञान बाँट रहे हैं.
बाबाओं को लेकर भारतीय जनता का प्रेम नया नहीं है. कभी किसी बाबा की धूम रहती है तो कभी किसी बाबा की. कभी आसाराम बापू और मोरारी बापू टीवी चैनलों की शान हुआ करते थे, तो आज निर्मल बाबा का समय आया है.
ये बाबा भी बड़ी सोच-समझकर ऐसे लोगों को अपना लक्ष्य बनाते हैं, जो असुरक्षित हैं. आस्था और अंधविश्वास के बीच बहुत छोटी लकीर होती है, जिसे मिटाकर ऐसे बाबा अपना काम निकालते हैं.
लेकिन नौकरी के लिए तरसता व्यक्ति या फिर बेटी की शादी न कर पाने में असमर्थ कोई गरीब इन बाबाओं का टारगेट नहीं. इनका टारगेट हैं मध्यमवर्ग, जो बड़े-बड़े स्टार्स और व्यापारिक घराने के लोगों की ऐसी श्रद्धा देखकर इन बाबाओं की शरण में आ जाता है.
बच्चन हों या अंबानी, राजनेता हों या नौकरशाह- इन बड़े लोगों ने जाने-अनजाने में इस अंधविश्वास को बल दिया है.
ऐश्वर्या राय की शादी के समय अमिताभ बच्चन का ग्रह-नक्षत्रों को खुश करने के लिए मंदिरों का दौरा, अंबानी बंधुओं में दरार पाटने के लिए मोरारी बापू को मिली अहमियत. चुनाव जीतने के लिए बाबाओं के चक्कर लगाते नेता.
दरअसल समृद्धि अंधविश्वास भी लेकर आती है. वजह अपना रुतबा, अपनी दौलत कायम रखने का लालच. जो जितना समृद्ध, वो उतना ही अंधविश्वासी. और फिर समृद्धि के पीछे भागता मध्यमवर्ग, इस मामले में क्यों पीछे रहेगा.
इसलिए इन बाबाओं के पौं-बारह हैं. फिर क्यों न निर्मल बाबा डायबिटीज से पीड़ित व्यक्ति को खीर खाने की सलाह देंगे. आखिर हमारी मानसिकता ही तो ऐसे तथाकथित चमत्कारियों को समृद्ध बना रही हैं.

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मैं भारत के सभी बाबाओं से नफरता करता हूँ. वे हर किसी को मूर्ख बनाते हैं और ज्यादा पैसा कमाते हैं. वे लोगों का वक्त बर्बाद करते हैं.
जब तक हमारी सोच नहीं बदलेगी, ऐसे बाबा कुकुरमुत्ते की तरह पनपते ही रहेंगे.
बहुत अच्छा लेख है.
आपने सही कहा. चैनल भी पाखंडी हैं. एक तरफ वे बाबा की आलोचना करते हैं तो दूसरी तरफ उनके ही कार्यक्रम दिखाते हैं.
बहुत अच्छा लेख है.
जब विज्ञान ही बाबा के भरोसे है तो जनता क्यों न रहे. कल अग्नि लांच के पहले नारियल फोड़ा जा रहा था. दिल्ली मेट्रो के हर चरण या कोई सरकारी इमारत बनने के पहले भूमि पूजन क्यों कराया जाता है.
ऐसे बाबाओं को तो देशद्रोही साबित कर देना चाहिए क्योंकि ये भारत को लूट रहे हैं.
पंकज जी, इस बीमारी से कोई भी अछूत नहीं है, जिसमें आपकी जमात भी शामिल है. जो किस्मत बनाने वाले बाबाओं, मुल्ला-मौलवियों, नेताओं के चक्कर लगाते हैं और तीनों को ही भोग लगाते हैं.
इक्कीसवीं सदी के भारत का एक दूसरा पहलू भी है- धर्मभीरुता. धर्मभीरु लोग इन तथाकथित बाबाओं के चक्कर में पड़ जाते हैं. अब जबकि मीडिया ने इनकी पोल खोलना शुरू किया है तो आम-जन की भी आँखें खुलने लगी है. टीवी पर प्रसारित बाबाओं के प्रवचन चैनलों की कमाई का जरिया है. अपने वारे-न्यारे करवाने के लिए बाबाओं के फेर में पड़ना केवल मूर्खता के अलावा कुछ भी नहीं. सामयिक मुद्दे पर सटीक बात के लिए शुक्रिया पंकज.
यह एक खुली हुई हकीकत है कि हर युग में चाहे किसका भी शासन रहा हो, हिंदू शासन हो या मुस्लिम शासन इन साधू संतों और तथाकथित गुरुओं बाबाओं का बोल बाला रहा है. शासन में यह लोग दूध मलाई का भोग खाते रहे हैं. शासक वर्ग की कुटिलता और शोषण के टूल के रूप में कार्यरत रहे हैं. किसी एक पीर फ़कीर या बाबा का पोल खुलते खुलते दूसरा परिदृश्य पर हाज़िर नाज़िर हो कर लूट खसोट का भागीदार हो उठता है. हमारा संविधान वैज्ञानिक सोच और उसके आधार पर व्यवस्था चलाने की वकालत करता है और इसका प्रावधान कर रखा है. लेकिन हमेशा उलटी गंगा बहती है. तरह-तरह के बाबा पीर फकीर समय-समय पर स्वयंभू किसी न किसी का अवतार कह कर सीधी सोच वालों का मन प्रदूषित करते रहते हैं. मेरा साफ़ तौर पर मानना है कि देश के उत्थान में इनकी भूमिका बेहद नकारात्मक होती है. भारत की निरीह जनता कब तक यह सब बर्दाश्त करते रहोगे.
पंकज निर्मल बाबा स्केम पिछले कई दिनों से चला आ रहा है पर आप ने सुंदर कटाक्ष किया है. मज़ा आ गया. दरअसल भारतीय समाज धर्म प्रेमी समाज है उसी का नतीजा है हम राम हनुमान को भूल कर निर्मल जैसे बाबा के चक्कर में आ जाते है .
ढोंगी बाबा देश के समस्या हो गए हैं. इन बाबाओं और मुल्लों से बचाने के लिए लोगों में जागरूकता लाना होगा. मैं ये नहीं कह रहा हूँ की आध्यात्म गलत है लेकिन धर्म और आध्यात्म के नाम पर ये कपटी बाबा और मुल्ला लोगों को बेबकूफ बना रहे हैं ये सरासर गलत है.
ऐसा इसलिए है कि आप ये अंतर करना न जानते हैं और न जानना चाहते हैं कि आप क्यों हर भगवाधारी से नफरत करते हैं. आप फिल्म और राजनीति के सभी लोगों से नफरत क्यों नहीं करते. आपकी जानकारी सीमित है और आपमें दूरदृष्टि का अभाव है. आप निर्मल बाबा की तुलना मोरारी बापू और आसारामजी बापू से न करें.
पहली बार जब टीवी पर देखा तो इंतजार था कि अब इनकी पोल खुलेगी, लेकिन ये तो बाकायदा प्रचार कर रहे थे. सवाल-जवाब सुनकर दुख हुआ लेकिन मनोरंजन भी. साधारण सवालों के असाधारण जवाब वो भी टीवी पर. देर आयद दुरुस्त आयद. अब एक और बाबा की पोल खुल गई है. खुदा खैर करे.
मजेदार आलेख. बधाई हो भाई. ऐसा ही लिखते रहो.
सही बात कहते हुए गलत संदर्भ न रखा करो , इसमें भाजपा का बाबा प्रेम कैसे आ गया, निष्पक्ष रहने की कोशिश करो, आपकी जानकारी के लिए कांग्रेस का इतिहास भी उठा लेना, एक गंभीर बात को भाजपा-कांग्रेस में बाटने की कोशिश न किया करो, अपना न सही बीबीसी का तो ध्यान रखो.
मुझे लगता है कि हमारी किताब इस अंधविश्वास को बढ़ाने के लिए सबसे ज्यादा जवाबदेह है. गुरूजी की सेवा करो- जब यह कहा जाता है तो हम यह मानते हैं कि गुरू जी को पैसा दो तो वह सिफारिश करके भगवान से हमको ज्यादा पैसा दिला देगा.
मैं आपको इसे दूसरी तरह से बताता हूं. अगर किसी व्यक्ति ने भगवान को आमने-सामने नहीं देखा है और कोई दूसरा आदमी कहता है कि उसने भगवान को देखा है और वह उसे उनसे मिलवा देगा को वह आदमी निश्चित रूप से उनपर विश्वास कर लेगा.
लेकिन आपने सही बात कही है कि आस्था और अंधश्रद्धा के बीच बहुत बारीक रेखा है. मैं भी निर्मल बाबा का प्रोग्राम हर दिन टीवी पर देखता हूं लेकिन मैं उसे एक कॉमेडी प्रोग्राम की तरह देखता हूं क्योंकि यह काफी मनोरंजक होता है.
बाबाओं के अलावा ऐसे मंदिर भी हैं जिनमें रोज करोड़ों रुपयों का चढ़ावा आता है. दोनों को एक ही श्रेणी में रखा जाना चाहिए. अंतर बस इतना है कि एक में हाड़-माँस का पुतला नज़र आ रहा है, दूसरे में नहीं. लोगों की आस्था और कुछ पैसे देकर काम सफल करवाने की चाह दोनों जगह है.
पंकज, आपने सही कहा कि सेलिब्रेटी लोग बहुत बड़े कारण हैं इस अंधविश्वास को बढ़ाने में. लोग उनको मानते हैं और उनकी तरह बाबा लोगों के पास जाकर अपना टाइम और पैसा दोनों बर्बाद करते हैं.
बाबा चोर है...
आज के समय में आदमी अपने आप को भूल गया है कि मानव किस चीज का नाम है, क्यों है और कौन है. लोगों ने बाहरी बनावट देखी और उसी में मगन हो गया है कभी अंदर झांकने की कोशिश नहीं की, तभी तो यह दशा है अंधविश्वासी मानव का
बहुत बढ़िया पंकज जी.
भारत में कई तरह की दुकानें खुली हुई है. मीडिया भी दुकानदारी कर रही है और बाबा लोग भी दुकानदारी चला रहे हैं. और लोग भी उसके पास जा रहा है और दुकान चलाने में मदद कर रहे हैं. माल ताजा नहीं है फिर भी माल को ताजा बताया जा रहा है.
आपकी बात पूरी तरह सही है. पढ़ा-अनपढ़, अमीर-गरीब, ख्याति नाम या समान्य लोग-ज्यादातर लोगों के अपने बाबा और बापू हैं, जिनके निर्देशानुसार वे काम करते हैं. कई बार लोगों को लगता है कि यह अतार्किक है, लेकिन तन,मन,धन के नुकसान के डर से वे उनके चक्कर से निकल नहीं पाते हैं.
बहुत अच्छा लेख है.
ये धंधा है पर गन्दा है. राजनेता भी तो देश को जनता के नाम पर ही लूट रहे हैं और खुद को सेवक बता रहे है. जो लोग टीवी पर माला और ताबीज बेच रहे हैं नरूला बाबा ने उनका धंधा बंद होने की कगार पर ला दिया. ये सारा शोर इसी बात का है. नरूला बाबा अगर अपना धंधा इतना नहीं फैलता तो किसी को कोई परेशानी नहीं थी. वो अपना धंधा बचाने के लिए दुसरे के धंधे को गन्दा बता रहे हैं. चुगली खबरी बाबा (तथाकथित मीडिया) इस लिए इस मुद्दे पर इतनी नूरा-कुश्ती कर रहा है क्योंकि आजकल और कोई चटपटी खबर है नहीं. सिंघवी और कांग्रेस पर तो कुछ बोलने की हिम्मत है नहीं. ऐसी ऐसी खबरें इन्होंने लोगों का अन्धविश्वास दूर करने के लिए गढ़ी और दिखाई हैं कि छोटी मोटी ख़बरों से तो अब जनता प्रसन्न भी नहीं होती. मछली फ़साने के लिए कांटे में आटा तो लगाना ही पड़ता है. यही ये लोग करते हैं. पर विडम्बना ये है कि जैसे जैसे हम सभ्य और ज्ञानशील समाज होने का बड़ा दावा करते हैं उसी अनुपात में हम धर्म भीरु, लालची और संवेदनाहीन हो रहे हैं.
आपका लेख पढ़ा. पूरा सत्य है.
प्रियदर्शी जी, दूसरे पर दोष देने से पहले अपने गिरेवान में झांकना जरूरी है. मैं आपकी बात से पूरी तरह सहमत हूं. लोग बाबा के पीछे भागते हैं लेकिन इस बात को हवा आप, मीडिया देते हैं. क्या छह महीना पहले कोई निर्मल बाबा को जानता था. अचानक वो कैसे हर घर के बाबा हो गए, ये आपने जानने की कोशिश की है? मीडिया का भी अपना सामाजिक दायित्व है, जो वह कभी नहीं निभाती है बस दूसरों से अपेक्षा रखता है.
बाबा के फ्राउड को बाहर लाने के लिए मीडिया को धन्यवाद.
लेख बहुत अच्छा है.
अच्छा लेख। जब तक इंसान है तब तक समस्या ही समस्या है। जब इंसान समस्या से भागना चाहता है तो ये बाबा लोग समस्या से भागने का ही मार्ग बताते हैं। जैसे- नौकरी, मुकदमे में जीत आदि के नाम पर ठगी का धंधा शायद युगों से चला आ रहा है।
राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील भी हद दर्जे की अन्धविश्वासी महिला है, किसी मुल्क के सबसे बड़े हुक्मरान ही ऐसे हों तो आम जनता की क्या बिसात. बहरहाल हर गुनाह में अवाम शामिल है, खंजर पर उंगलियों के निशान किसी के भी हों, पर कत्ल करने का इरादा हम सब रखते हैं.
आस्था या अंधविश्वास के मकड़जाल में फंसे बिना हम निश्चित रूप से कह सकते हैं कि बाबाओं ने भी अपनी इंडस्ट्री लगा रखी है जिसमें भविष्य के लिए किसी का खयाली आशियाना तैयार होता है ,सपनों के राजकुमार या राज कुमारी मिल जाती हैं, आदि ..आदि ..
यदि हम अपने परिश्रम पर भरोसा करना छोड़ देते हैं तो इन बाबाओं की शरण में जाते हैं और वहां जो होता है उनका क्या कहना ?????
भारत की जनता सिर्फ अंधी नहीं, गूंगी और बहरी भी है. मतलब स्पष्ट हैः करोड़पति नेता जी, अधिकारी जी, करोड़पति चपरासी जी, तिहाड़ वाले मंत्री जी और स्विसबैंक धारक व्यापारी जी (श्री420) की जय-जयकार होती है, होती रहेगी. मीडिया को सिर्फ बाबा दिखते हैं. मानसिक दिवालियापन है यह.
अच्छा है कि निर्मल बाबा के खिलाफ कुछ वीर-बहादुरों ने मोर्चा खोला हुआ है। लेकिन अगर यह लड़ाई निर्मल बाबा के बिल्कुल साथ-साथ रविशंकर, आसाराम, मोरारी या दूसरे बाबाओं के खिलाफ भी इसी तरह नहीं चलती है तो मेरा साफ मानना है कि यह लड़ाई लड़ने वाले तथाकथित वीर-बहादुर भी निर्मल बाबा की तरह ही हैं। निर्मल या रविशंकर जैसे तमाम बाबा दरअसल बड़े राजनीतिक सेटर होते हैं, इसलिए सरकार से लेकर हमारी पूरी व्यवस्था इनके खिलाफ कोई कदम नहीं उठाती, भले ये पूरे समाज को अंधा बनाते रहें...
मेरे यहां भी एक बाबा है नाम है जियर स्वामी, उनके भक्तों की कोई कमी नहीं है. निर्मल बाबा विवाद में आए तो मैं उनका नाम जाना. इधर जियर स्वामी, जो होटल के मालिक हैं, और कम से कम 10 हत्या कर चुक लोग उनके गोद में पल-बढ़ रहा है.
मैं अनजानी जी की बात से पूरी तरह सहमत हूँ कि आप मीडिया वाले अपना दायित्व ठीक से नहीं निबाह रहे हैं. पहले तो आप लोग उनका खूब प्रचार कर रूपये कमा लेते हैं और जब देखते हैं कि जनता जाग चुकी है तो उनकी पोल खोलना शुरू कर देते हैं. अगर आप लोग पहले ही जाग जाएँ तो भोली भाली जनता ठगने से बच जाए.
आस्था और विश्वास का ये बाबा लोग भरपूर लाभ उठाते हैं.
आस्था एवं धर्म से लोग डरते हैं और उतना ही ज्यादा विश्वास करते हैं. बस इसी कमजोरी का फायदा बाला लोग उठाते हैं.
भारत जैसे देश में आज सबसे बड़ी आवश्यकता बौद्धिक स्तर को ऊँचा करने की है. साइन्टिफिक तरीकों से तथ्यों को विश्लेषण करने की है, आंख मूदकर विश्वास करना मूर्खतापूर्ण है. हमें अपने बच्चों को स्कूल में सही जानकारी देनी चाहिए, उन्हें तार्किक बातें बतानी चाहिए. इस तरह की ढोंगी बातों को तर्क के आधार पर तुरंत खारिज किया जाना चाहिए. हमारे देश मे ऐसे लोगों को हमेशा हतोत्साहित किया जाना चाहिए, जो भोले-भाले लोगो को बेवकूफ बनाते हैं. सरकार को शिक्षा के क्षेत्र में आमूल-चूल परिवर्तन करना चाहिए जिससे हमारे बच्चे तार्किक हो सकें.
आज इस तरह का विश्वास दिलाना कि फलाँ चीज से फलाँ हो जाएगा, साइन्टिफिक विश्लेषणों से कभी स्वीकार नहीं की जा सकता जब तक कि तार्किक आधार न हो. मेरा मानना है कि सरकार को एक पंचवर्षीय योजना शिक्षा के क्षेत्र में पूर्ण रूप से लगा देना चाहिए, जिससे लोगो का बौद्धिक स्तर सुधर सके, और लोग उचित और अनुचित में फर्क समझ सकें.
भारत एक ऐसा देश है जहाँ आप एक पॉलीथीन में एक ईंट का टुकड़ा रख कर घूरना शुरू कर दीजिये वहां भीड़ जमा हो जायेगी या फिर सड़क से एक बड़े पत्थर को तिलक लगा कर अगरबत्ती सुलगा दीजिये वही आस्था का केंद्र बन जायेगा. लोगो के इस भोलेपन, पढ़े-लिखे अनपढ़ होने या फिर आवश्यकता से अधिक विश्वास करने की प्रवित्त का नाजायज़ फायदा उठा रहे है ये बाबा. हमारे देश में पैसा कमाना बहुत आसान है बस आपके दिमाग में एक शातिर खुराफात होनी चाहिए और निर्मल उर्फ़ कथाकथित बाबा उसी खुराफात की देन हैं. धर्म हमेशा से ही हमरे देश की सबसे बड़ी कमजोरी रहा है. दरअसल उनका धार्मिक ज्ञान ज्यादा नहीं है, हमारी वैज्ञानिक और तार्किक समझ कम है. ये बाबा जो लोगों को चाट, पकौड़े, अचार और गुलाब जामुन खा कर कृपा बरसाने की बात कर रहे हैं क्या उसका कोई वैज्ञानिक, वैचारिक या आध्यात्मिक आधार है. ऐसा भ्रम और अंधविश्वास फैलाने वाली मानसिकता में सुधार लाने की जरूरत है. लोगों को इस प्रकार की घटिया मानसकिता वाली चीजों को बढावा नहीं देना चाहिए. कहीं न कहीं सरकार और मीडिया भी दोषी है क्योंकि ये सब सरकार के नाक के नीचे हो रहा है.
आपकी बात ठीक है कि निर्मल बाबा जैसे बाबाओं ने जनता को गुमराह किया. और भी कई बाबा यही काम कर रहे हैं. जनता जब तक धर्म में बुद्धि का प्रयोग नहीं करेगी ये सब चलता रहेगा.
आखिर सरकार क्या कर रही है. निर्मल बाबा लोगों का वक्त और पैसा बर्बाद कर रहे हैं. लोग दूर-दूर से यात्रा करके समागम में शिरकत करने आते हैं जिसका कोई भी फायदा नहीं है. इससे सिर्फ अंधे विश्वास को बढ़ावा मिल रहा है. भारत में अंधविश्वास को कम करने के लिए टीवी चैनलों को सामने आना चाहिए. जबकि इतने विरोध के बावजूद बहुत से चैनल एक साथ निर्मल बाबा को दिखा रहे हैं. ऐसे बाबाओं को रोकने के लिए सरकार और मीडिया को सामने आना होगा.
लोग जानते हैं कि बाबा का आखरी परिणाम फर्जी ही होगा, फिर भी पहुंच जाते हैं बाबाओं की शरण में. मेहनत करो आप खुद बहुत बड़े बाबा हो.
बहुत अच्छा लेख है.
बहुत अच्छा लेख है.
मीडिया बाबा की जय. कभी इस तरफ तो कभी उस तरफ. कोई फर्क नहीं पड़ता कि क्या सही है क्या गलत. फर्क पड़ता है तो सिर्फ इस बात से कि उनके चैनल को कितने लोग मज़े के साथ अपना मनोरंजन करने के लिए देखते हैं. बाबा का जन्म भी वही करते हैं और फिर अपनी रेटिंग भरने के लिए बाबा के सच को भी वही सामने लाते हैं क्या मीडिया को किसी भी बाबा के सीरियल टेलिकास्ट करने से पहले ये जानकारी नहीं रखनी चाहिए की इस तरह के सीरियल अंधविश्वास को जन्म देंगे. मीडिया बाबा सबसे ज्यादा लोगों का बेवकूफ बना रहा है. निर्मल बाबा तो एक करोड़ कमा रहे हैं, मीडिया बाबा तो न जाने कितने करोड़ कमाते हैं लोगों का वक़्त बर्बाद करके. अगर इतनी ही जिम्मेदारी महसूस होती है जनता के लिए तो ऐसे विज्ञापन टीवी पर आने ही नहीं चाहिए. निर्मल बाबा तो आज हैं कल नहीं, लेकिन मीडिया वाले तो कभी न खत्म होने वाली बीमारी हैं. टीवी पर दिखने वाला एक प्रतिशत भी सच नहीं होता.
जब तक इंसान में अनिश्चितता की भावना है, बाबाओं का बाजार ऐसे ही गरम रहेगा. युवराज सिंह ने इसलिए एक साल पहले कैंसर का इलाज नहीं कराया, क्योंकि उनके बाबा पर उनको विश्वास था. शिक्षित लोग ज्यादा अनिश्चित हैं. किसी को नौकरी की समस्या है, तो किसी को देश में भ्रष्टाचार की. सब बीमार हैं और ऐसे बाबाओं की दूकानदारी में फँस रहे हैं. मेरी सास मुझसे इस बात पर नाराज हैं कि मैंने उनसे पूछ लिया कि लखानी की चप्पल पहनने से कैसे कृपा हो सकती है? निर्मल बाबा ने सारा पैसा एक नंबर में इकट्ठा किया है. मीडिया भी दो चार दिन बोल कर शांत हो गई.
जब तक लोगों को रोजगार, भ्रष्टाचार, परिवार, स्वास्थ्य, और धन के बारे में अनिश्चितता है, ये बाबा उन्हें आसानी से बेवकूफ बना सकते हैं. कोई अपने काम के लिए चिंतित है, और कोई स्वास्थ्य और धन के लिए चिंतित हैं. मीडिया अधिक इन बाबा लिए जिम्मेदार है. मेरी सास मुझसे यह कारण के लिए नाराज़ है क्योंकि मैंने उससे पूछा कि अगर व्यक्ति एक ब्रांडेड चप्पल पहने हुए कैसे अमीर हो सकता है? यह सिर्फ हास्यास्पद है. आज आप मीडिया के लिए कुछ अच्छे पैसे देते हैं, और वे आप को एक भगवान के रूप में विज्ञापित करेंगे. मीडिया उपलब्ध है बिक्री के लिए, नेता बिक्री के लिए उपलब्ध हैं, वास्तव में यह देश बिक्री के लिए उपलब्ध है. अगर आप एक अंधे व्यक्ति को अंधा बताओगे उसे बर्दाश्त नहीं होगा.
पंकज जी आपका यह लेख निश्चित रूप से अंधविश्वास की गहरी जड़ों पर कुठाराघात करता है, जो प्रशंसनीय है. किंतु विचारणीय तथ्य यह भी है कि लोग यदि विज्ञान के करिश्मे के बाद भी अंधविश्वास का दामन थाम लेते है तो कारण क्या है...क्या आपको नहीं लगता कि जब हमें किसी जरूरतमंद की सहायता करनी चाहिए तब हम उससे कन्नी काट लेते हैं और जब वह इस तरह के फेर में पड़ हमारा गुणगान छोड़ देता है तब हमें ध्यान में आता है कि वह व्यक्ति अंधविश्वासी है....
बहुत अच्छा लेख है
मैं मानता हूँ कि आस्था और अंधविश्वास में बहुत थोड़ा ही फर्क है- लेकिन यह भी सच है कि जब विज्ञान और व्यवस्था किसी के सामर्थ्य से बाहर हो जाती है तो चमत्कार करने वाले बाबा व्यक्ति की आख़िरी उम्मीद बन जाते हैं! देश की राजधानी में कितने ही सौतन-दुश्मन से छुटकारा-बीमारी -विदेश यात्रा - मनचाहा प्यार आदि को गारंटी से मुहैया कराने वाले कितने ही बाबाओं की खूब मोटी कमाई हो रही है क्योंकि गरीब बड़े अस्पतालों में इलाज नहीं करा सकता - ऊँची फीस दे कर मुक़दमा नहीं लड़ सकता. और क्या आज डाक्टर मरीजों को नहीं ठग रहे? वकील - टीचर- व्यापारी सभी तो लूटने में लगे हैं.मैं कितने वैज्ञानिको को जानता हूँ जो सिर्फ पैसा उगाहने के लिए प्रोजेक्ट बनाते हैं.हाँ उनके पास विज्ञान और वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने का कवच जरूर है.डाक्टर का इलाज फेल नहीं होता क्या? और अगर निर्मल बाबा जैसे लोग लोगों को ठग रहे हैं तो इसकी शिकायत सबसे पहले ठगी का शिकार व्यक्ति करे तो ठीक लगता है. कितने लोगों ने यह रिसर्च कर के स्थापित किया है की निर्मल बाबा के उपाय कारगर नहीं होते? अगर रिसर्च नहीं किया है तो आलोचना करने का क्या हक़ है किसी को?
बहुत तार्किक लेख है आपका. दूसरी बात कि बाबा बनने का कोई कॉलेज न खुल जाए या मैमेजमेंट का कोर्स न शुरु हो जाए मुझे इस बात की फिक्र है. बाबाओं का बाज़ार गर्म है. अद्वितीय लेख है आपका.