आमिर एव जयते
बॉलीवुड स्टार आमिर खान के शो सत्यमेव जयते ने टीवी पर धूम मचा रखी है लेकिन क्या टीवी पर शो हो जाने से भ्रूण हत्याएं रुक जाएंगी.
क्या आमिर के कहने से हमारा सभ्य समाज बदल जाएगा और भ्रूण हत्याएं होनी बंद जाएंगी. ये एक बड़ा सवाल है जिसका जवाब किसी के पास नहीं है..
हालात तो ये हैं कि जब मैंने ये सवाल सोशल मीडिया पर उठाए तो कहा गया कि मैं नेगेटिव सोच वाला पत्रकार हूं.
मेरी समस्या न तो आमिर खान से है और न ही उनके कार्यक्रम सत्यमेव जयते से जिसमें कन्या भ्रूण हत्या को एक मुद्दा बनाया गया है.
समस्या इस बात से है कि क्या हमारा समाज इस हालत में पहुंच गया है कि किसी स्टार को बताना पड़ेगा कि कोई मुद्दा कितना गंभीर है या किस मुद्दे पर हमें सोचना चाहिए.
स्वदेश सिंह ने हवाला दिया अनपढ़ जनता का जिसे जागरुक किए जाने की ज़रुरत है लेकिन ये देखना भी ज़रुरी है कि भ्रूण हत्याओं का गढ़ हमारे गांव नहीं बल्कि शहर हैं जहां भ्रूणों की पहचान होती है.
सोशल मीडिया पर भ्रूण हत्या का विरोध करने वाले और टीवी पर कार्यक्रम देखकर आंसू बहाने वालों में कई वो लोग भी शामिल हैं जो लड़कियों को बोझ के तौर पर देखते होंगे.
क्या आपको लगता है कि वो टीवी पर शो देखकर लड़कियों के प्रति अपना दुराग्रह बदल लेंगे.
अगर हमारी मानसिकता यही रह गई है कि जो स्टार बोलेगा उसे ही मानेंगे तो फिर ऐसे समाज के बारे में कुछ कहने की ज़रुरत नहीं.
वैसे सोचने की ज़रुरत भी क्या है. आमिर खान ने कोक बेचा था तो हमने पिया ही था हो सकता है कि भ्रूण हत्या पर उनकी बात भी हम मान ही लें.
लेकिन मुझे लगता है कि ये क्षणिक आवेग है जो टीवी के ज़रिए लोगों के आंसूओं में तब्दील होकर निकला है.
इस शो ने उन लोगों को अपनी आत्मग्लानि आंसूओं के ज़रिए निकालने का मौका दिया है जो जानते हैं कि भ्रूण हत्याएं हो रही हैं लेकिन वो कुछ कहना नहीं चाहते. रोना आसान उपाय है.
ये आत्मशुद्धि का दौर है. फेसबुक एकटिविज्म का दौर है. एक मित्र संजय करीर ने सही कहा ये फेकबुक है.
भ्रूण हत्या की गंभीरता को समझने के लिए आमिर की ज़रुरत पड़ना ही दर्शाता है कि समाज कहां जा रहा है.
मां-बहन-बीवी-भाभी के साथ रहते रहते भी अगर हम औरत के महत्व को नहीं समझते हैं और इसके लिए आमिर की ज़रुरत पड़ती है तो क्या कहने हैं इस समाज के.
गलत साबित होना किसी को अच्छा नहीं लगता लेकिन मैं चाहता हूं मैं इस मुद्दे पर ग़लत साबित हो जाऊं. लोग आमिर के ज़रिए ही सही मुद्दे की गंभीरता को समझें और कुछ ऐसा हो कि ये भ्रूण हत्याएं रुक जाएं.
दिल्ली, पंजाब की गलियों में फैले डॉक्टरों की वो दुकानें बंद हों जहां लिंग परीक्षण होता है तभी मैं समझूंगा कोई बात बनी है. इस मुद्दे पर गलत साबित होने में मुझे बेहद खुशी होगी.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें
वाह सुशील भाई, बहुत सुंदर लिखा है आपने. क्या मिस्टर आमिर खान खुद की लड़की पैदा हुई तो खुश होंगे. शायद मेरे ख्याल से नहीं. यह एक नाटक है हकीकत तो अपनाना बहुत मुश्किल ही नहीं नामुमकिन होता है.
इडीयट बॉक्स से ज्यादा उम्मीद करना बेमानी है .. आप सही हैं जब कहते हैं , क्या भ्रूण हत्या अब आमिर के कहने से रुकेगा (यक़ीनन इसलिए ये शर्मनाक है समाज के लिए ) पर आमिर और टीवी ही सही , चलिए रविवार की सुबह श्रीकृष्ण और महाभारत की जगह भ्रूण हत्या तो जाना कईयों ने ..
हमारे देश की मीडिया को बस मुद्दा चाहिए और मिस्टर झा जब तक आप जैसे आलोचक रहेंगे इस भारत मे कोई भी कुछ नही कर पाएगा क्योंकि आपको तो केवल आमिर खान और भारत पर कीचड़ उछालने का मुद्दा चाहिए भानुप्रकाश श्रीवास्तव
आपकी बात में कड़वा सच छिपा है, लेकिन अगर अगर आम-भारतीय भ्रष्टाचार और काले धन के मुद्दे पर अन्ना हजारे जी और बाबा रामदेव जी के साथ खड़ा रहकर विरोध कर सकता है, तो आमिर खान के इस सामाजिक सरोकार में क्यूँ नहीं.? वैसे कन्या-भूर्ण हत्या के विरुद्ध कोई आन्दोलन-धरना-प्रदर्शन की कोई जरूरत नहीं हैं, सिर्फ अपनी सोच बदलनी है, और इसकी शुरुआत स्वयं से, अपने परिवार से शुरू करनी है, धीरे-धीरे यही मुहिम पूरे समाज में अवश्य फ़ैल जाएगी.. सोशियल साईट्स पर होने वाली बहस इसका तात्कालिक परिणाम है, और शीघ्र ही सम्पूर्ण मानव समाज ''सत्यमेव-जयते'' के दूरगामी परिणाम प्रतिफलित होते देखेगा..
अगर मान ले कि हालत नहीं बदलेगी तो चुप रहना भी तो कोई हल नहीं है. मुद्दा उठाने से पहले ये तय नहीं किया जा सकता कि आप सफल होंगे कि नहीं, मुद्दा उठाना ही अपने आप में बड़ी बात है. कम से कम कोई कोशिश तो कर रहा है...
और जहाँ तक आपके नकारात्मक सोच वाले पत्रकारिता का सवाल है तो इअसमे आपका दोष नहीं है. BBC ब्लॉग पर लिखने वाला हर कोई नकारात्मक ही लिखता है...
मुझे लगता है आपको इस बात से तकलीफ है कि जो काम आपका है वो एक नाचने-गाने वाला कर रहा है... जो मुद्दा अब तक आपलोग उठाते थे, या उसपर बोलना अब तक तथाकथित बुद्धिजीवी पत्रकारों का हक़ था उसपर एक अभिनेता कैसे बोल सकता है...
इसके बारे में उन परिवारों से जाकर पूछो कि एक लड़की की शादी करने में कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं. अगर किसी के घर में पांच लड़कियां हो जाए तो क्या वो इंसान भ्रूण हत्या नहीं करेगा. मैं सोचता हूं कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा समाज पर.
प्रिय सुशील, अच्छा काम और अच्छी सोच. लेकिन मैं एक बात कहना चाहूं कि हर चीज़ के लिए हमें आमिर जैसे लोगों की ज़रुरत होती है कि वो रास्ता दिखाएं. हम कई वर्षों तक गुलाम रहे और ये बात हमें रोकती है समाज के लिए अच्छा काम करने से.
आमिर साहब जल्द ही आप मुश्किल में पड़ने वाले हैं क्योंकि इस देश में सच बोलने वाले के खिलाफ़ यहां की संसद अवमानना का नोटिस जारी कर देती है जैसा कि रामदेव और केजरीवाल के साथ हुआ.
सुशील भाई, कन्या-भूर्ण हत्या के विरुद्ध अपनी सोच बदलने की ज़रूरत है. इसकी शुरुआत स्वयं से, अपने परिवार से करनी होगी, धीरे-धीरे यही मुहिम पूरे समाज में अवश्य फैल जाएगी. सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर होने वाली बहस इसका तात्कालिक परिणाम है और शीघ्र ही सम्पूर्ण मानव समाज 'सत्यमेव-जयते' के दूरगामी परिणाम प्रतिफलित होते देखेगा.आमिर जैसे लोगों की ज़रुरत होती है कि वो रास्ता दिखाएं.
कल आमिर खान का रिएलिटी शो "सत्यमेव जयते" देखा और देख कर बहुत दुःख हुआ कि कैसे परिवार वाले जुल्म ढाते हैं जब एक बेटी पैदा होनेवाली होती है.
क्या बेटियां होना इतना दुखद है.
क्या बेटियां प्यारी नहीं होतीं.
क्या बेटियों को इस संसार में आने का कोई हक नहीं है.
क्यों बेटियों की भ्रूण हत्या शिक्षित समाज में भी हो रही है.
क्यों मानव समाज पुत्री होने पर गर्व नहीं करता.
न जाने ऐसे कितने अनजाने पहलू हैं जिसे आज का समाज जानते हुए भी अनजान बना रहता है और कन्या होने का पता चलते ही उसे मां की कोख में ही खत्म कर दिया जाता है.
मेरी अपनी ओर से पूरे मानव समाज से विनम्र अपील है कि जैसे बेटा होने पर गर्व करते हैं वैसे ही बेटी होने पर भी गर्व महसूस करें. उसे भी आने दें और सही शिक्षा प्रदान करें. नहीं तो एक दिन ऐसा आएगा कि अपने बेटों के लिए बहू को ढूंढते रह जाओगे.
मुद्दा तो निस्संदेह गंभीर था और समाज का ध्यान इस और आकर्षित करने का प्रयास करना भी गलत नहीं. असल बात इतनी है कि हमारे समाज की स्थिति इतनी दयनीय क्यों हो गई कि आमिर खान को आगे आकर यह बताना पड़ रहा है? मेनस्ट्रीम मीडिया ने अपने उत्तरदायित्व को सही तरीके से निभाया होता और वास्तवकि मुद्दों को ईमानदारी से उठाया होता तो शायद यह नौबत नहीं आती. विडंबना यह है कि मेनस्ट्रीम मीडिया अपनी साख खोकर रैटरेस में लगा है और उसे टीआरपी देने वाली खबरें गढ़ने से फुर्सत नहीं. इसलिए अब उसकी बात को आम लोग अहमियत नहीं देते. अगर आमिर खान की बात सुनकर लोग उस बदलाव की ओर बढ़ सकें, जिसकी उन्हें उम्मीद है तो इससे अच्छा और क्या होगा! शायद तब मेनस्ट्रीम मीडिया को भी आत्म-मंथन करना होगा कि सरोकारों की पत्रकारिता से वे कब तक और कितनी दूर रह सकते हैं? सोशल नैटवर्किंग साइट्स इस काम में अहम भूमिका निभा सकती हैं लेकिन दुर्भाग्य से वहां भी हमारे समाज की तरह अज्ञानता वाली स्थिति है. लोगों को इस माध्यम की ताकत का अंदाजा नहीं और वे इसका इस्तेमाल गैरजरूरी चीजों के लिए कर रहे हैं. अच्छा ब्लॉग लिखने के लिए शुक्रिया सुशील जी.
इस देश में तो यही होता है. जब अभिनेता बोलते हैं तभी लोग फैशन के तौर पर उनके साथ लेफ्ट राइट करना शुरू कर देते हैं. नकलचीपन हमारा चरित्र बन गया है.
आपका ये कहना कि क्या हमारे समाज की हालत ऐसी हो गयी है कि आमिर जैसे लोग हमें भ्रूण हत्या के मामले में जागरूक करें , सही है. मगर आप देख चुके हैं कि मीडिया की अपेक्षा फिल्मों का असर हमारे ऊपर कितना बढ़ता जा रहा है. प्यार-मोहब्बत, एक्शन, चोरी के तरीके आदि में नए-नए तरीकों के इस्तेमाल की वजह भी फिल्में ही हैं. देखना ये है कि हमारा समाज फिल्मकारों द्वारा चलाए जा रहे इस अभियान को स्वीकारता है या नहीं. वैसे आपके जागरूकता भरे ब्लॉग के लिए धन्यवाद.
आप बहुत कमाल के लोग मालूम होते हैं. यदि कोई अभिनेता सामाजिक जिम्मेदारियों को दरकिनार
कर सिर्फ नोटों की उगाही करे तो आपको तकलीफ होती है. मगर, यदि वही अभिनेता अपनी उस
लोकप्रियता को किसी मुद्दे पर जागरूकता बढ़ाने के लिए एक मंच देने की कोशिश करे तो भी आपको
तकलीफ होती है. मुद्दा ये नहीं है कि आमिर खान किस मुद्दे पर हमारी संवेदनशीलता की परीक्षा करेंगे. मुद्दा ये है कि कम से कम एक व्यक्ति इस सोये हुए जनमानस की सोच को खाद -पानी देने का काम तो कर रहा है. मगर माफ़ कीजियेगा आपकी पत्रकारिता इतनी "आत्ममुग्ध" है कि उसे वजह-बेवजह शोशेबाजी की कुछ आदत-सी हो गयी है. आपको ध्यानाकर्षण करना ही है तो खान साहब के शो से कहीं ज्यादा बेहतर मुद्दे हैं. जनाब. जाइये और उन पर कलम चलाइए.
माइ डियर झा बाबू आप ये बताइए कि समाज की कुरीतियों को खत्म करने के लिए आपने क्या कुछ उपाय किए हैं या कभी कुछ सोचा है. मुझे नहीं लगता क्योंकि आपके इस ब्लॉग में ऐसा कुछ नज़र नहीं आता कि आप इन मुद्दों के प्रति संवेदनशील हैं.
जिस दिन उपयोगिता का अर्थ बदलेगा उस दिन भ्रूण हत्या किसकी होगी वह बहस वास्तव में सही मायने की बहस हो जायेगी और शायद यही कुछ 'स्त्री' (माँ, बहन, पत्नी और बेटी) के सन्दर्भ में भी बदलाव के लिए वाजिब होगा. जैसे-जैसे दलित मुद्दों को विस्तार मिलेगा वैसे-वैसे स्त्री और शूद्र के लिए 'द्विज' सोच उद्वेलित होगी और अपने साम्राज्य को विस्तार देगी और इन्ही अछूते मुद्दों को छूता हुआ सीरियल, फिल्म या भाषण या जो कुछ भी किया जाय कुछेक को पसंद ही आयेगा. पर क्या वास्तव में स्त्री इनमें कहीं सहभागी है. बदलाव के पक्ष में क्या वो पुरुष नहीं बनना चाह रही है. जैसे दलित और पिछड़े परिवर्तन के नाम पर द्विज ही बनना चाहते हैं. वैसे ही भ्रूण ह्त्या का मामला है.
सुशील जी आप या तो मानते हैं कि आमिर खान स्टार हैं और वो फिल्में भी बनाते हैं और कमाई भी करते हैं. वो ये भी जानते हैं कि भारत की जनता फिल्मों में क्या देखना चाहती है. इसी को ध्यान में रखते हुए और जनता की नस पहचानते हुए उन्होंने ये टीवी शो शुरू किया है. आमिर कह रहे हैं कि वो केवल मुद्दे उठा रहे हैं तो इसमें क्या गलत है.
आप लोग आलोचना करने के अलावा कुछ और कर भी नहीं सकते. अन्ना हजारे की आलोचना हो या आमिर खान की. आप आलोचना करने के रोग से ग्रसित हैं.
मैं आमिर खान और सुशील झा दोनों को सही मानता हूं. जहां तक आमिर का सवाल है वो अपने काम को ईमानदारी से करना चाहते हैं ये तो जाहिर है. इससे सूरत बदलेगी कि नहीं यो तो बाद की बात है. लेकिन इतना तो तय है कि टीवी मनोरंजन में लकीर का फकीर वाला शो नहीं है ये. ये सामयिक है. जिस तरह पुरानी फिल्मों को आज के समाज से जोड़कर नहीं देखा जा सकता. वो सामयिक थी और उसका असर जनता में इसी तरह था. आमिर का शो भी सामयिक है. मैं दुआ करता हूं कि सुशील जी गलत साबित हों.
आप खुद तो कुछ कर नहीं सकते, बस किसी और को करने भी नहीं देना है. जैसी हमारी सरकार है जिसे अन्ना और रामदेव के आंदोलन में बस बुराई दिखती है. अगर आप जैसे मीडिया के लोगों ने ये काम किया होता तो आज आमिर ये नहीं कर रहे होते. आपलोगों को टीआरपी और मसालेदार खबरों से फुरसत ही नहीं मिलती. और मिले भी क्यों, वहाँ पैसा जो है. आप केवल बातों को घुमा फिराकर कहना जानते हैं. आप बस अपना काम कीजिए, आपके बस का कुछ नहीं है.
सुशील जी अगर आमिर खान के कहने से देश में जागरूकता आती है तो इसमें बुरा ही क्या है. आज आमिर ने ये मुद्दा उठाया है तो हो सकता है कि आगे चलकर सरकार कुछ ऐसे नए कानून बनाए जिससे भ्रूण हत्या करने वालों को कुछ डर हो और इसमें कमी आए.
सुशील भाई, ये तो मानेंगे कि दुनिया ग्लैमर के पीछे भागती है तो यदि सच ग्लैमराइज़ हो जाए तो बुरा क्या है? बाबा रामदेव ने भी तो बाजारु तामझाम का इस्तेमाल करके योग और आयुर्वेद को 'देशी कैटेगरी ' से निकाल कऱ अन्तर्राष्ट्रीय पहचान दिलाई.
सुशील भाई, आप की बात कुछ हद तक सही है, कि एक पढ़े-लिखे समाज में ऐसे शो की जरूरत नहीं है. पर क्या सोये हुए समाज को जगाने की कोशिश छोड़ देनी चाहिए? अगर ऐसा होता तो मोहन दस करमचंद गाँधी ,महात्मा गाँधी नही बन पाते. मिस्टर परफेक्शनिस्ट ने कुछ ऐसा ही परफेक्ट करने की कोशिश की है. उन्हें इस सकारात्मक कदम के लिए धन्यवाद देता हूँ.
सौ सवालों का सिर्फ एक जवाब है - दहेज प्रथा बंद होनी चाहिए. यही वो जड़ है जिससे महिलाओं को लेकर समाज में तरह-तरह की कुप्रथाएँ प्रचलित हो गई हैं.
आप बहुत कमाल के लोग मालूम होते हैं. यदि कोई अभिनेता सामाजिक जिम्मेदारियों को दरकिनार
करके सिर्फ नोटों की उगाही करे तो आपको तकलीफ हैं. मगर यदि यही अभिनेता अपनी उस
लोकप्रियता को किसी मुद्दे पर जागरूकता बढाने के लिए एक मंच देने की कोशिश करे तो भी आपको
तकलीफ है. मुद्दा ये नहीं है कि आमिर खान साहब "कौन सी" राय पर हमारी संवेदनशीलता तय करेंगे, मुद्दा ये है कि कम से कम एक व्यक्ति इस सोये हुए जनमानस की सोच को खाद-पानी देने का काम तो कर रहा है. मगर माफ़ कीजियेगा आपकी पत्रकारिता इतनी "आत्ममुग्ध" है कि उसे वजह-बेवजह शोशेबाजी कीकुछ आदत सी हो गयी है. आपको ध्यानाकर्षण करना ही है तो खान साहब के शो से कहीं ज्यादा बेहतर मुद्दे हैं जनाब..जाइये और उन पर कलम चलाइए.
मेरी आपसे गुजारिश है कि आप कृपया ब्लॉग लिखना बंद करें. और अगर आपका बॉस आपसे ये सब लिखवाता है (क्योंकि कोई तो होगा जो आपके ब्लॉग की समीक्षा भी करता होगा), तो आप दूसरी नौकरी देख लें. लेकिन आप ब्लॉग बंद कर दें, बस.
यहां ओशो की एक बात याद आ रही है- कोई किसी का आदर्श नहीं हो सकता, हर व्यक्ति का आदर्श उसके भीतर होता है जिसे बस उघाड़ने की जरूरत है. हम अगर यह सोच रहे हैं कि 20 करोड़ रुपए के मार्केटिंग खर्च के साथ शुरू हुआ कोई कार्यक्रम लड़कियों के प्रति हमारे जड़ समाज की चेतना को झकझोर देगा तो यह अपनी तरह की गलतफहमी के अलावा कुछ नहीं है. एक जमाने में हमारा समाज 'एंग्री यंगमैन' में अपनी समस्याओं का निदान देखता था और अब उसे 'इमोशनल हीलरों' से उम्मीदे हैं. यह समाज इतना कायर है कि खुद पहल करने से डरता है. आमिर खान सच में कुछ कर पाते हैं तो हमें खुशी होगी और हम चाहेंगे भी. हमारी शुभकामनाएं.
माफ़ कीजियेगा, आपका ये कहना कि अगर हमें औरतों के महत्व को समझने के लिए आमिर की जरुरत पड़ेगी, कुछ गले नहीं उतरा. कोई अगर कुछ अच्छा काम कर रहा है, तो आप जैसे लोग बजाय प्रशंसा करने के, उसमें बाल की खाल ढूँढने लग जाते हैं. क्या सब हाथ पर हाथ रख कर बैठे रहें, कि कुछ हो ही नहीं सकता? मेरे ख्याल से वो ज्यादा बुरा है. मन खुला रखिये साथ ही अपनी आँखें भी खुली रखकर थोड़ा समय इंतज़ार कर कोई सार्थक निंदा कीजिये वरना दूसरों को हतोत्साहित मत कीजिए.
e सुशील जी, आमिर खान के मु्द्दे उठाने की बात कह रहे हैं, उसमें वो कहाँ तक सफल होते हैं इसपर अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी. बीबीसी इंडिया बोल में किसी बात पर लोगों को बोलने का मौका देती है उसका कितना असर होता है ये मैं नहीं जानता. मैं ये कहना चाहता हूँ कि पहले आपके प्रोग्राम आप की बात बीबीसी के साथ में आप किसी बड़ी शख्सियत से मिलाते थे तो लोग अपनी राय भी रखते थे और सवाल भी करते थे और वे उनका जवाब भी देते थे जिसका असर जरूर पड़ता था. बीबीसी ने इसे क्यों बंद किया?
ये विचारनीय है पर कारगर नहीं क्योंकि अंदर की सोच इस तरह के प्रोग्राम से नहीं बदलती. पर लोगों को याद दिलाना अच्छी बात है.
सच ही है सुशील जी आप नकारात्मक पत्रकारिता ही करते हैं. इससे पहले आपके मन में ये बात क्यों नहीं आई कि कन्या भ्रूण हत्या पर आप कुछ लिखें जबकि आप के पास बीबीसी जैसा प्लेटफॉर्म है. क्योंकि किसी और ने इसकी शुरूआत कि इसलिए ये आपको पच नहीं रहा.विकास कुशवाहा जी ने बिलकुल ठीक कहा क आप आलोचना करने के रोग से ग्रसित हैं. क्या विडम्बना है कि अगर कोई अगर कुछ अच्छा करने जाता है तो आप जैसे लोग जो खुद को बुद्धजीवी मानते हैं, आलोचना करने लगते है. ठीक है कि यह समस्या कहीं ज्यादा है कहीं कम. तो क्या कोई इस बारे में बात ही न करे सिर्फ इसका अधिकार आप को मिला है क्या? और गौरव जी से तो मैं बिलकु ल सहमत हूँ कि सुशील जी आप बताएँ ना कि आपने अब तक कौन सा सामाजिक मुद्दा इतनी गंभीरता से उठाया है? सिर्फ दूसरे की आलोचना करने से काम नहीं चलता. बीबीसी को भी इस तरह के नकारात्मक लेखो को जगह नहीं देना चाहिए.
भाई साहिब आप परिणाम की महत्ता को नकार कर उस अमल की बखिया उधेड़ रहे हैं जो कानूनन जायज है. गलत बात है कि बीबीसी की सोच का स्तर गिरता जा रहा है. क्या बीबीसी अपने प्रसार को बढ़ाने के लिए ऐसा लिखने को प्रोत्त्साहित करेगी?
सुशिल जी आप ने सही कहा हमारे समाज को सोचने की जरुरत है. लेकिन आप जैसे लोगों की बात सुनता कौन है. आमिर खान ने बाज़ार की भाषा में लोगो के सामने मुद्दा रखा है तो लोग सुनेंगे लेकिन देखना यह है कि कितना लोगों के दिल में लगता है. आपने इस पर बात की लेकिन दिल से बाज़ार को ध्यान में नहीं रखा इसलिए आपको नकारात्मक सोच वाला कहा गया. जो भी हो खान पहले ही कह चुके हैं कि मैं सिर्फ मुद्दा उठा सकता हूँ समाधान नहीं दे सकता. तो उनसे कितनी आशा की जाए? अब देखना है आमिर के चाहने वालों क दिल में कितना लगता है. मैं तो कहता हूँ जैसे भी हो हमारे सभ्य समाज के लोगो की सद्बुद्धि मिले.
टीवी शो से भ्रूण हत्या नहीं रुक सकेगी. सरकार चाहे तो दहेज प्रथा सख्ती से रोक कर और शादी पर फिजूल खर्चा रुकवाए तो भ्रूण हत्या रुक सकती है.
सुशील जी, बतौर नायक आमिर ख़ान अगर शराब बेचेंगे तो आपको बुरा नही लगेगा, बतौर अभिनेता ये अगर आईपीएल मे मस्ती करते हुए दिखेंगे तो भी आपको बुरा नही लगेगा पर अगर ये लोग सामाजिक बुराइयो को सबके सामने रखते है तो आपको बहुत बुरा लगेगा. यही तो समस्या है आप जैसे बुद्धिजीवियों की. अगर कोई और अच्छा काम करे तो आपको बुरा लग जाता है जैसे कि उसने आपके घर में चोरी कर ली हो. ये एक तमाचा हैi आप जैसे बुद्धिजीवियों और समाज पर जो ना इन बुराइयों को दूर करते है ना ही इसे सामने लाते है. आप के लेख से ही साबित होता है कि आप अपने विचारों के प्रति शंका रखते है, एक दिन में तो समाज परिवर्तित नहीं होगा पर कोशिश करते हुए हार जाना ही सबसे बड़ी जीत है. और अंत में -
मंज़िल तो मिलेगी ही, भटकते-भटकते ही सही,
गुमराह तो वो है, जो कभी घर से निकले ही नही.......
गर्व से कहता हू सत्यमेव जयते.......................!!!!!!!!!!!!!
झा साहबआप के ब्लॉग से लगता है के आप को भ्रूण हत्या से नहीं आमिर से ही नाराज़गी है. क्या फ़िल्मी दुनिया वाले इसी समाज का हिस्सा नहीं हैं. खैर जाने दें. काश आप ही पहल करते और कलम उठाते इस दुखती रग पर. मगर क्यों आप को भी मज़ा आता है फ़िल्मी दुनिया पर लिखने में. काश आप यूँ कहते -
मैं अकेला ही चला था जानिबे मंजिल मगर
लोग आते गये और कारवां बन गया
सुशील भाई, कन्या-भ्रूण हत्या के विरुद्ध अपनी सोच बदलने की ज़रूरत है. इसकी शुरुआत स्वयं से, अपने परिवार से करनी होगी, धीरे-धीरे यही मुहिम पूरे समाज में अवश्य फैल जाएगी और शीघ्र ही सम्पूर्ण समाज 'सत्यमेव-जयते' के दूरगामी परिणाम होते देखेगा. आमिर खान जैसे लोगों की ज़रुरत है कि वो रास्ता दिखाएं. जहाँ तक आमिर खान का सवाल है वो अपने काम को ईमानदारी से करना चाहते हैं ये तो जाहिर है आमिर कह रहे हैं कि वो केवल मुद्दे उठा रहे हैं तो इसमें क्या गलत है. अगर आमिर खान की बात सुनकर लोग उस बदलाव की ओर बढ़ सकें, जिसकी उन्हें उम्मीद है तो इससे अच्छा और क्या होगा मैं दुआ करता हूं कि सुशील भाई गलत साबित हों.
उपरोक्त सभी सुधि पाठकोँ की राय पढ़ने के बाद मैँ सिर्फ इतना कहना चाहता हुँ कि हम सभी को "बाल की खाल" निकालने के बजाए इस समस्या का निदान ढुँढने की एक सार्थक कोशिश करनी चाहिए, ताकि समय रहते हमारा समाज अपनी गलतियोँ को सुधार कर सके ।
झा साहब , हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम और वोह क़त्ल भी करते है तो चर्चा नहीं होती ! शायद यही हल हुआ आमिर का .जहाँ आप की कलम खामोश हो गयी वहां आमिर ने जुर्रत की और उसकी जुर्रत लगता है आपको नागवार लगी .
सर जी आपकी बात सही है. इससे भ्रूण हत्या कितनी रूकेगी ये कहना मुश्किल है और अगर रूक भी जाए तो क्या आफ़रीन और पलक जैसी घटनाएँ नहीं होंगी इसकी क्या गारंटी है.
हर एपिसोड के लिए तीन करोड़ रूपए लेकर समाजसेवा. वाह आमिर जी.
सुशील झा साह, इस तरह के ब्लॉग लिखकर आप अपने आप को ऐसी ही सोच रखनेवाले पत्रकारों की श्रेणी में लाना चाहते हैं. बीबीसी की सोच तो ऐसी नहीं होगी. किसी को तो सामने आना होगा. अगर कोई आम जनता को जागरूक करने की मुहिम चलाता है तो आप जैसे लोग अगर कुछ अपनी कलम से दो कदम आगे बढ़कर आते तो इस मुहिम में चार चाँद लग जाता. लोगों को समझाने में और आसानी होती. आपने इस मुहिम को और जटिल बना दिया. आमिर खान ही क्यों आप भी आ सकते हैं, हमारे समाज में बड़ा नाम है समाज सुधारकों का. आपकी जिम्मेदारी ज्यादा बनती है. आपके हाथ में कलम है, मीडिया है, धन्यवाद.
बहुत सही लिखा है सर पर मैं आपको बता दूँ कि आप गलत साबित नहीं होंगे. अपने देश के लोग भावनाओं में बहनेवाले हैं और स्टार ग्रुप इस बात को जानता है कि भारत के लोग क्या खरीदना पसंद करते हैं और वो आसानी से इस चीज़ को भी बेच रहे हैं.
झा साहब, आप एक अच्छे आलोचक है, हमें कोई भी मुद्दा उठाने के लिय एक बड़े चहरे की जरुरत होती है. अगर आमिर खान ने यह प्रयास किया है तो बुरा क्या है? मुझे लगता है कुछ तो असर जरुर होगा. अगर आमिर नहीं तो तो आप ही सुझाए कौन होना चाहिए इन मुद्दों को उठाने के लिए.
आमिर ने कम से कम कोशिश तो की ना? कोशिश करनेवालों की कभी हार नहीं होती. हम अपने नायकों से इसी तरह की पहल करने की उम्मीद रखते हैं. माना कि टीवी शो देखने वालों में बहुत से लोग लड़कियों को बोझ के तौर पर देखते हैं किन्तु उन्हें भी तो 'सत्यमेव जयते' ने आंसू बहाने पर मजबूर किया है? यदि कलिंग युद्ध की विभीषिका देखकर 'अशोक महान' तलवार डाल सकते हैं तो भारतीय दर्शक तो सहृदयता की प्रतिमूर्ति हैं, हम उनसे तो हृदय परिवर्तन की उम्मीद अवश्य कर सकते हैं. कृपया आप लोग भी आमिर के पुण्य कार्य में सहयोग दें. "सत्यमेव जयते"
अभिनेता होने की अपनी सीमाओं में रहते हुये अपनी विधा के माध्यम से आमिर खान का सामाजिक सरोकारों से खुद को जोड़ना नि:संदेह सरहनीय है. लेकिन मैं अपनी सीमाओं को जानते समझते हुए टीवी के सामने बैठकर एपिसोडिक रुदाली बनने से इनकार करता हूं. सामूहिक भावावेश से खुद को एक पल के लिए खुद को अलग करके अगर आप “सत्यमेव जयते” की परिकल्पना को देखें तो आप पाएँगे कि यह सास-बहू नाटकों वाली भावनाओं को रियालिटी शो के फॉर्मेट में दोहन करने का प्रयास है. मुझे “सत्य” की इस “जीत” पर संदेह है. आपकी तरह मैं भी दिल से चाहता हूं कि मेरी भी आशंकाएं गलत साबित हों और कोक बेचने वाले आमिर जागरुकता बेचने में भी कामयाब हों, तभी टी.वी. के माध्यम से लाइफ झिंगालाला होगी. अगर ऐसा हुआ तो यकीन मानिये मैं इस प्रोग्राम के डीवीडी खरीदकर बार-बार जरूर देखूंगा.
सुशील जी, मुझे नहीं पता की आपकी समस्या आमिर से है या फिर भारत के लोगों से. आमिर ने कोक इसलिए बेचा क्योंकि वो उसका काम है. पर इसमें बुरा क्या है कि कोई अपने काम से साथ साथ समाज को बदलने का प्रयास कर रहा है? रही बात आम लोगोx की तो उनके पास अपनी आम जिन्दगी में इतना समय नहीं है वो सामाजिक समस्या के बारे मैं सोचे. आमिर ने तो एक कोशिश की है मनोरंजन करने के साथ-साथ एक सामाजिक समस्या से लोगो को अवगत कराएँ. कोशिश करना तो बुरा नहीं. और मैं यह समझती हूँ की अगर 1 प्रतिशत लोगों ने भी इसको समझा तो आमिर का प्रयास सफल रहा.
मुझे लगता है कि आमिर परफेक्शनिस्ट हैं, मैंने दो एपिसोड देखे और दोनों ही में संदेश दिए गए जो बहुत महत्वपूर्ण है.
मुझे लगता है कि समाज में फैली किसी भी बुराई के खिलाफ कोई भी कदम उठाए , उसका स्वागत और समर्थन होना चाहिए. आमिर खान जी ने वैसे भी अपनी कला के माध्यम से हमको हमेशा अच्छी और सामाजिक सरोकार से जुड़ी हुई फिल्में ही दी हैं. समाज का एक बहुत बड़ा हिस्सा आमिर से बहुत लंबे समय से प्रभावित है, सो छोटे परदे पर उनके निकट संवाद का असर अवश्य होगा. वस्तुतः हमारी आदत ही हो गयी है हर अच्छी या बुरी बात कि कमियाँ निकालने की, आलोचना करने की क्योंकि किसी अच्छे कार्य की प्रशंसा करने के लिए भी तो सकारात्मक और विस्तृत सोच की ज़रूरत होती है.
आखिर आमिर क्या गलत कर रहे हैं अगर इसका समाज पर असर हो रहा है तो इसमें बुराई क्या है और हैरानी तो इस बात की है कि जो काम हमारे नेताओं को करना चाहिए वो आमिर कर रहे हैं आखिर क्यूं गहलोत सरकार नहीं जागी क्यूं आमिर को ही जाकर उन्हें जगाना पड़ा वो क्यूं आंखों पर पट्टी बांधे सब कुछ देखती रही. उन डॉक्टरों के खिलाफ कोई एक्शन नहीं लिया गया जो स्टिंग ऑपरेशन में दिखाए गए थे यही परेशानी है हमारे देश की, कोई न अच्छा काम करो और न करने दो.
आमिर बधाई के पात्र हैं, वो देश में हो रही बुराई या घोटालों को आम जनता के सामने ला रहे हैं.
सुशील झा जी , आप बिलकुल सही कह रहे हैं. मैं आप से सहमत हूं.
सुशील जी, आप तो कुछ कर नहीं रहे, दूसरों को तो करने दें.
आज की दुनिया है विज्ञापन की. शायद इसीलिए आमिर खान जमकर अपने कार्यक्रम का विज्ञापन कर रहे हैं.
इस समाज को आमिर की जरूरत क्योँ पङी लोगोँ को जागरूक करने के लिए...
लेकिन इससे पहले देश का मीडिया क्या कर रहा था?
क्या उसे बङे स्तर पर सामाजिक कुरीतियोँ के विरूद्ध लोगोँ को संवेदनशील बनाने का प्रयास नहीँ करना चाहिए था?? अब अगर यह काम एक अभिनेता कर रहा है तो सोये हुए मीडिया की भी नीँद खुली है... माना कि आमिर खान इस शो के लिए पैसा लेते हैँ, लेकिन जब अमिताभ बच्चन ने केबीसी चलाया तब आपने ये नोटिस नहीँ किया कि वो पैसे लेते है! उन्होने कितने लोगोँ को करोङपति बना दिया? यहाँ आमिर जिन मुद्दोँ को उठा रहे है, वो सब प्रांसगिक है, जिन पर सरकार के साथ लोगोँ को भी संवेदनशील होना पङेगा...
सुशील जी, ये देखकर बहुत अच्छा लग रहा है कि आमिर खान जैसा बड़ा कलाकार समाज के लिए सत्यमेव जयते के जरिए कुछ कर रहा है. हम उम्मीद करते हैं कि आमिर की कोशिशों से भ्रूण हत्या रुकेगी.
सुशील भाई, दूसरों पर उंगली उठाना आसान होता है. आपके कहने के अनुसार अमित जी का पल्स पोलियो अभियान भी गलत होना चाहिए. हमारे देश की अज्ञानता से आप भी परिचित हैं. मेरा आप से निवेदन है कि आप अपनी सोच को बदलें.
पहले तो आमिर की टीम को धन्यवाद जिसने ग्रामीण भारत को भी झकझोरा वरना शहर के चंद दकियानूस लोग खुद को काफी अडवांस समझते हैं. गांव कभी झाड़फूंक के लिए जाने जाते थे अब शहर वो जगह है जहां मानवता का कत्ल किया जाता है और हर रोज नए कत्ल के नए उपाय ढूंढे जाते हैं.
हमें बहन, भाभी और बहू सब चाहिए लेकिन बेटी नहीं, ये कैसे मुमकिन है. मैं कहता हूँ अगर आप मानव हो तो बंद करो ये भ्रूण हत्या.