हैप्पी बर्थडे मंटो
मंटो मियां बधाई. आज जीवित होते तो एक सौ कैंडल साथ जलाकर केक काट रहे होते.
अगर यह सोच कर परेशान हो कि इस्लामी गणतंत्र पाकिस्तान के सबसे बड़े जज तुम्हारे जन्मदिन पर क्यों खुश हैं, बधाई क्यों दे रहे हैं तो मियाँ बात यह है कि हमारे ब्रदर जजों के साथ तुम्हारे कुछ दिन बीते हैं. यह अलग बात है कि वह न्यायाधीश की कुर्सी पर थे और तुम अभियुक्तों के कठघरे में.
फिर तुम्हारे खिलाफ फैसला देने से पहले और एकाध बार बरी करने से पहले अपने चेंबर में बैठकर तुम्हारी अश्लील कहानियों के मजे भी लिए हैं, कानों को हाथ लगाकर अल्लाह से माफी भी मांगी है, तो इतना अधिकार तो बनता ही है कि 'हैप्पी बर्थ डे' बोल दें.
वैसे तुम्हें यह भी बताना था कि हमारी सारी कोशिशों के बावजूद तुम्हारी किताबें माशाअल्लाह खूब छप रहीं हैं और बिक भी रही है. पता नहीं तुम्हारे परिवार को रॉयल्टी मिलती है या नहीं लेकिन जिसे देखो मंटो छाप रहा है. हाल ही में एक किताब की दुकान पर तुम्हारी लिखी एक भारी भरकम किताब नजर आई. इसे उठाकर कुछ पन्नों पर नजर डाली तो इस दुबले-पतले बदन में वही सनसनी दौड़ गई जैसे साठ साल पहले अपने चेंबर में दौड़ी थी.
फिर दिल में कुछ हलचल होने लगी, किताब बंद की तो कीमत पर नज़र पड़ी 750 रूपए. बधाई मंटो मियां अब यह हिसाब करने मत बैठ जाना कि 750 रुपए में तुम शराब के कितने अध्धे खरीद सकते हो. मियां आजकल पीने के लिए पैसे के साथ दिल और गुर्दा भी चाहिए.
पहले अपने आप को शरीफ़ नागरिक साबित करना पड़ता है. हां लेखकों और पत्रकारों को आजकल साहित्यिक मेलें में बुलाकर खूब पिलाई जाती है. और अगर अंग्रेजी में लिखते हो तो ऐसी-ऐसी मिलती है कि तुम ने मम्मी के कोठे पर नहीं देखी होगी. लेकिन तुम्हें कोई काहे को बुलाए, क्योंकि तुम तो पीने से पहले ही साहित्यिक मेले के व्यवस्थापकों और उनके प्रायोजकों के माँ बाप की शान में गुस्ताखियाँ करने में लगे थे जैसे हमारे सम्मानित जज भाइयों की शान में करते थे.
मंटो मियाँ तुम्हें अपनी कलम से खींच कर पीने की आदत थी और फिर उसके बारे में लिखने की भले लोगों में बात करने की आदत थी. आजकल जो पीते हैं वो इस बारे में बात नहीं करते जो नहीं पीते वह झूम-झूम कर उपदेश करते हैं.
मियां सच्ची बात तो यह है कि साहित्यिक दुनिया में तुम्हारी भी गुस्ताखियां ही तुम्हें ले डूबीं. जिस महफ़िल में लोग होंठों के प्याले से जरा लेने की बात करते थे तुम वहाँ पर अपना ठर्रा खोल कर बैठ जाते थे.
अब तुम्हारे भतीजे की बेटी और तुम जैसी ही निडर इतिहासदान आयशा जलाल ने शोध से साबित किया है कि पाकिस्तान आने से पहले तुम सिर्फ शराब पीते थे, पाकिस्तान आकर तुम पक्के शराबी बन गए. यानी कि पाकिस्तान ने तुम्हें एक पूरा शराबी बना दिया.
जाहिर है तुम्हारा खून है दोष तो हमें ही देगी.
याद है जब उपर तले और बीच वाला मामला भुगतने कराची आए थे और सफर के खाने में केवल बीयर की दस बोतलें थीं. मियां अगर आज लिख रहे होते तो ऊपर नीचे और बीच पर तो माफी हो जाती लेकिन दस बीयर पीने की पता है कितनी सज़ा है? और अगर इस्लामी गणतंत्र के मुख्य न्यायाधीश को खबर हो जाती तो आधे पर भी ऐसा टांगता कि सारी उम्र तारीखें भुगतते रहते.
क्या-कहा एक-आधे पर?
अगर मेरी बात पर विश्वास नहीं रहा तो अतीखा ओढो से पूछ लो.
यह अतीखा ओढो कौन है?
अब पूछो कि मुख्य न्यायाधीश कौन है और क्या चाहता है और कोई कहानी जोड़ने बैठ जाओगे. मंटो मियां तुम्हारे साथ तो वैचारिक बातचीत करते भी पेंशन खतरे में पड़ जाती है. अब तुम्हारे आधे या बीयर की बोतल या मुख्य न्यायाधीश का उल्लेख नहीं होगा. और भी विषय हैं जैसे कि 'शलवार' को 'शलवार' कहने पर क्यों आग्रह है?

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मंटो के बहुत सारे अफसाने और किताबें विभाजन की त्रासदी के जीवंत दस्तावेज हैं. मंटो के जन्मदिन पर उनको असल बधाई तभी होगी जब दोनों देश मुकम्मल कमर कस कर यह प्रण करें कि दोनों तरफ के लोग अपने को भाई समझते हुए कोई इस तरह का काम नहीं करेंगे जिसमें किसी तरह की खटास की गुंजाइश हो. विभाजन के समय जितना भी कुछ हुआ है उस गम को भुलाने में सदियों लग जायेंगे. दोनों देशों को अपना अस्तित्व बरकरार रखने के लिए ज़रूरी है कि बड़े भाई और छोटे भाई की अपनी भूमिका को दोनों देश गहराई से समझें और इस तरह की बात सोचें जो हिंदी कवि हिंदुस्तान और पाकिस्तान के संदर्भ में कहा है की "तू अगर भूखा रहे तो मुझसे भी न खाया जाए" दोनों देशों की जनता एक दूसरे से बहुत प्यार करती है मेरा यह विश्वास है लेकिन कठिनाई कहीं और है जो किसी न किसी रूप में चाभी घुमाता रहता है.... हनीफ भाई मंटो को दोनों देश रहती दुनिया तक नज़र अंदाज़ नहीं कर पाएंगे.
कभी कभी सोचता हूँ क्या इस दुनिया में कहीं मंटो से नाम पर कोई सड़क है.. अगर है तो वो कहाँ से कहाँ तक जाती होगी. और क्या वहा से वहीँ तक जाती होगी जहाँ से जहाँ तक मंटो जाना चाहता होगा..
स्याह हाशिये - मंटो की एक और शानदार कहानी थी जब लाहौर में कुछ लोग मशहूर सर गंगाराम अस्पताल का नाम बदलने की जुगत में थे. कमलेश्वर ने भी इस मुद्दे को अपने "लेख" में उठाया था. मंटो मशहूर कलाकार अशोक कुमार के बेहद करीबी थे जिसका अशोक कुमार ने कई बार जिक्र किया था. मंटो पर इस्मत चुगताई की कहानी - मेरा दोस्त मेरा दुश्मन - पढ़ने लायक है. लोग उनको पसंद करें या नापसंद, मंटो को विभाजन के 65 साल बाद भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
मंटो को माफ़ कर देना ठीक होगा. ये पत्रकार, अदीब और ब्लॉग लेखक इसे तूल ना दें. मीन-मेख निकालना आप सबकी रोज़ी-रोटी का एक ज़रिया हो गया है. पाकिस्तान की जनता के आँसुओं को, गुरबत को देखो, कुछ रहम खाओ उनपर क्या शराबी-कबाबी लोगों की बात लेकर रोते हैं.
हैप्पी बर्थडे मंटो.