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हाफिज सईद के बहाने

हफ़ीज़ चाचड़हफ़ीज़ चाचड़|शनिवार, 07 अप्रैल 2012, 17:20 IST

सेना मुख्यालय के ठीक सामने वाले होटल के एक बड़े हॉल में वह बैठा हुआ था और सभी लोगों की नज़रें उस पर टिकी हुई थी.

लोग बड़े आदर और सम्मान के साथ उनके हाथ मिला रहे थे और कुछ तो उनके हाथ भी चूम रहे थे. उनके चेहरे पर कोई तनाव नहीं था और विश्वास के साथ अभिवादन कर रहा था.

स्थानीय और विदेशी पत्रकार उनसे बात करने के प्रयास कर रहे थे लेकिन पत्रकारों से बात करने बजाए वह अपने समर्थकों से बात कर रहे थे.

कुछ दिन पहले अमरीका ने उनकी गिरफ्तारी या गिरफ्तारी में मदद देने पर एक करोड़ डॉलर यानी करीब 90 करोड़ रुपए के इनाम की घोषणा की थी.

'रिवॉर्ड फॉर जस्टिस'वेबसाइट के अनुसार अमरीकी प्रशासन उन्हें नवंबर 2008 में हुए मुंबई हमलों सहित कई चरमपंथी कार्रवाईयों के लिए दोषी मानता है. उन्हें वांछित लोगों की सूची में दूसरे स्थान पर रखा गया है.

अमरीका ने उन सहित चार लोगों की गिरफ्तारी या गिरफ्तारी में मदद देने पर एक करोड़ डॉलर का इनाम रखा है. तालिबान के प्रमुख मुल्ला उमर, अल कायदा के वरिष्ठ नेता अबू दुआ और यासीन अल-सूरी का शायद रावलपिंडी में बैठे लोगों को पता हो, लेकिन किसी आम नागरिक को बिल्कुल पता नहीं है.

इनमें से वह अकेले हैं जो स्वतंत्र रुप से न केवल घूम रहे हैं बल्कि सार्वजनिक तौर पर भाषण भी दे रहे हैं. सेना मुख्यालय के सामने वाले होटल में बैठ कर जिस तरह से वह बात कर रहे थे, उससे लग रहा था कि वह सबको ललकार रहे हैं कि 'है कोई माई का लाल जो गिरफ्तार करे और रातों रात करोड़पति बन जाए.'

एक पत्रकार मित्र ने मुझसे कहा,'यार, अमरीकी दूतावास से केवल 45 मिनटों के फासले पर मेरे सामने एक करोड़ डॉलर का इनाम बैठा है और मैं कुछ नहीं कर पा रहा हूँ.'

उस समय शायद कई लोग ऐसा सोच रहे थे. उनका विश्वास भी सबके सामने था और वह बैठा भी अपने करीबी मित्रों के दफ्तर यानी सेना मुख्यालय के पास था. यह सब देख कर मैं अपने प्रिय देश के बारे में बहुत दुखी हूँ.

हमारी पीढ़ी के लोगों ने बेचारे इस देश को हमेशा से ही जंग की हालत में देखा है. 70 और 80 के दशक से लेकर आज तक हमारा देश दूसरे देश के युद्ध का मैदान रहा है.

हमारे देश के आम नागरिक बिल्कुल सुरक्षित नहीं हैं और अगर कोई सुरक्षित है तो वह दुनिया के सबसे बड़े आतंकवादी और चरमपंथी जिन्होंने हमेशा मेरे देश को 'कंडोम' की तरह इस्तेमाल किया है.

इस उदाहरण के लिए मैं अपने पाठकों से माफी चाहता हूँ. वही आतंकवादी और चरमपंथी हमारे शहरों में स्वतंत्र रुप से घूमते हैं और उस जगह बड़े बड़े घर बना कर रहते हैं, जहाँ हमने रहने की कल्पना भी नहीं की है.

आज जिस तरह से प्रतिबंधित चरमपंथी गुट एक जुट हो रहे हैं, मुझे 80 के दशक वाला जनरल ज़िया-उल-हक़ का भयानक दौर याद आ रहा है कि किस तरह धर्म के नाम पर हमारे समाज में आतंकवाद और चरमपंथ का ज़हर घोला गया. उसी दौर में यही गुट सोवियत संघ के खिलाफ एकजुट हुए थे और अब अमरीका के खिलाफ हो रहे हैं.

न इस के लिए अमरीका, इसराइल और भारत दोषी हैं और न ही कोई पश्चिमी देश. अगर किसी का दोष है तो वह इस देश की उस विचारधारा है जो इस देश को इस्लाम का किला मानता है और विभाजन से ही उसका वर्चस्व बना हुआ है.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 18:53 IST, 07 अप्रैल 2012 राजीव कुमार:

    क्या लिखा है. हाथ चूम लेने को दिल करता है.

  • 2. 19:17 IST, 07 अप्रैल 2012 रवि शंकर, बाल्टीमोर, अमरीका:

    बहुत ही बढिया लिखा है चाचड़ जी. काश आप जैसे सोचने वाले पाकिस्तान मैं और भी होते तो दुनिया मैं इतनी कत्लोगारत एवं अशांति नहीं होती.
    अच्छा एवं सच्चा लिखते रहिए.

  • 3. 21:43 IST, 07 अप्रैल 2012 शब्बीर खन्ना, रियाद, सउदी अरब:

    वाह हफीज भाई, बधाई देता हूँ आपको सच लिखने के लिए. आप अब अपना खयाल रखें क्योंकि आपने वो सच लिखा है जिसे लिखने की हिम्मत कोई भी नहीं करता.

  • 4. 21:57 IST, 07 अप्रैल 2012 श्री:

    भाई हफी़ज़ चाचड़ इतना निराश न होइए....हर काली रात के बाद सूरज निकलता है. हाँ जब भी उजाला हो हमें उजाले की कद्र करनी चाहिए!

  • 5. 23:57 IST, 07 अप्रैल 2012 रमेश भारती साहिल:

    हफीज चाचड़ भाई पहले तो आप को पाकिस्तान से इतनी निष्पक्ष खबर तथा ब्लॉग लिखने के लिए धन्यवाद. हफीज सईद एक आतंकवादी है तथा उस पर करोड़ों का इनाम. यदि वह पाकिस्तान मेँ खुले आम घूम रहा है तो वह लोगों को ये नही बता रहा कि किसमेँ करोड़ो का इनाम लेने की हिम्मत है बल्कि दुनिया को ये दिखा रहा है कि पाकिस्तान आतंकवादियों को वैसे ही पालता है जिस तरीके से वह ओसामा बिन लादेन को पाल रह रहा था. इससे किसी दूसरे की औकात नहीं बल्कि स्वयं पाकिस्तान की औकात का पता लगता है कि एक मोस्ट वांटेड उसके घर मेँ पल रहा है और वह कुछ भी नहीं कर पा रहा है या नहीं कर रहा है. पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्या जवाब देगा? लेकिन कोई बात नहीं वक्त आएगा तो इनका भी वही हाल होगा जो लादेन का हुआ.

  • 6. 00:27 IST, 08 अप्रैल 2012 AJ:

    आप एक साहसी पत्रकार हैं जिन्होंने इस तरह खुलकर पाकिस्तान के चरमपंथियों के बारे में लिखा है. मैं आपको बधाई देता हूँ. मुझे लगता है कि कारण केवल कुछ लोगों की विचारधारा ही नहीं बल्कि पाकिस्तान के लोगों की अज्ञानता भी है जो तमाम सरकारों के आने के बाद भी दूर नहीं हुई. ये वो समय होता है जब कोई अवांछित गुट शून्य को भरने में कामयाब हो जाता है.

  • 7. 15:16 IST, 08 अप्रैल 2012 अमित सिन्हा :

    चरमपंथ और आतंकवाद कुछ भी नहीं होता. यह सब सत्ता की भूख है. पाकिस्तान एक ऐसा देश है जहाँ पर जिसकी लाठी उसी की भैंस वाला हाल है. पैसा और रुतबा पाने के लिए लोग आतंकवाद जैसी चीजों का सहारा लेते हैं इन सब का बैंक अकाउंट फ्रीज़ कर दो, इन सबकी अकल ठिकाने आ जाएगी. सबसे बड़ी बुरी बात हमारे मित्र देश पाकिस्तान में यह है कि यहाँ पर एक तरफ से यानी अमरिका और यूरोपीय देशों से तो पैसा आता है और चीन, रूस जैसे देशों से हथियार.बेचारी इस देश की जनता डरी और सहमी सी इन अत्याचारों से जूझती रहती है.सरकार को पैसा अमरीका देता है, बेचारी सरकार को वोट तब मिलेगा जब सेना या चरमपंथियों को पैसा देगी, और इन आतंकवादियों का पेट तब तक भरता रहेगा जब तक लोग डरते रहेंगे. इस देश की जनता को ही अब आगे बढ़ कर शिक्षित होना पड़ेगा और कुछ कर गुजरना पड़ेगा.

  • 8. 17:19 IST, 08 अप्रैल 2012 यूसुफ अली अजीमुदीन खाँ, रियाद:

    भाई हफीज आपने यह सब हकीकत के उलट लिखा है. इस सब के लिए अमरीका और पश्चिमी देश ही दोषी हैं. उन्होंने ही इन लोगों को जिहाद में धकेला और सोवियत संघ खत्म हो गया तो अमरीका ने इन्हें इस्तेमाल किए कंडोम की तरह फेंक दिया. अमरीका ने सब जगह मुसलमानों में अराजकता फैला रखी है जब इन लोगों ने अमरीका के खिलाफ आवाज उठाई तो इन्हें आतंकवादी और चरमपंथी करार दे दिया गया और इन पर प्रतिबंध लगा दिए गए.

  • 9. 21:20 IST, 08 अप्रैल 2012 मोहम्मद खुर्शीद आलम, औरंगाबाद, बिहार:

    आप भटके हुए पत्रकार मालूम पड़ते हैं. पाकिस्तान की तबाही का सारा दोष आपने इस्लामी विचारधारा को बताया है. मैं मानता हूँ कि ये हाल 100 फीसदी इस्लामी विचारधारा को दिल से न अपनाने के कारण है. अगर पाकिस्तान के अधिकांश लोग 100 फीसदी इस्लामी विचारधारा अपनाते तो वहाँ का प्रेसीडेंट मिस्टर 10 परसेंट नही होता और न ही लोग आतंकवाद को अपनाते. अमरीका भी एक कारण है जिसे आप कारण ही नहीं मानते जो आपके देश को गुमराह करता है.

  • 10. 21:55 IST, 08 अप्रैल 2012 संजय:

    एकदम सही.

  • 11. 14:07 IST, 09 अप्रैल 2012 ई ए खान, जमशेदपुर, भारत:

    हफीज चाचड़ साहब मैंने आप के ब्लॉग को एक साँस में पढ़ लिया जो पाकिस्तान के हालात का इतना सही आकलन है कि एक साँस में ही पढ़ा जाना चाहिए. हफीज साहब आप को एक शेर का मिसरा याद होगा - "जो बात दिल से निकलती है असर रखती है" - मुसलमानों, खास कर भारत के मुसलमानों का यह दर्द जो एशिया में पाकिस्तान के रूप में है और वहां जो कारगुजारियां सुनते और देखते हैं तो बेबस होकर आह भरने लगते हैं कि क्या इस्लाम यही सब करने को कहता है. कौन होते हैं इस तरह के स्वयंभू जेहादी जिन्होंने इस्लाम की ठेकेदारी ले रक्खी है और अपने को इस्लाम का सिपाही कह कर मारकाट और दहशत का बाज़ार गर्म रखते हैं. न चैन से जीते हैं और न दूसरों को जीने देते हैं.

  • 12. 14:55 IST, 09 अप्रैल 2012 सुनील:

    आपने काफ़ी गहराई से इन मुद्दों को उठाया, अति उत्तम.

  • 13. 23:36 IST, 09 अप्रैल 2012 माधव शर्मा:

    पाकिस्तानी सियासत चाहकर भी इनके खिलाफ कार्रवाई नहीं कर सकती क्योंकि वहाँ का सूरत-ए-हाल ये है कि अलगाववादी संगठनों की पैठ सत्ता के गलियारों तक है. फौज ही एकमात्र विकल्प है. यदि वह आईएसआई के चंगुल से अछूती रहे तो.

  • 14. 14:20 IST, 10 अप्रैल 2012 रेहान:

    जिसके खिलाफ कोई सबूत नहीं, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने दोषी मानने से इनकार कर दिया, उसे अमरीका जैसे देश के कहने पर चरमपंथी कैसे कहा जा सकता है? अमरीका जिसने इराक़ में मासूमों को मारा और आज भी मार रहा है? किसी को चरमपंथी कहने से पहले उसे साबित करना चाहिए, फिर जो सजा दो वो सही है. पर ये क्या कि केवल अमरीका ने कह दिया तो बस वही सही है?

  • 15. 23:44 IST, 10 अप्रैल 2012 baloch:

    ये ब्लॉग स्वाभाविक और पाकिस्तान के ऐसे इतिहास का ब्यौरा दिखता है जिसके बारे में जानते सब हैं लेकिन कोई लिखता नहीं है. मेरी राय में ईमानदारी से लिखा गया है.

  • 16. 00:41 IST, 11 अप्रैल 2012 ritz:

    समसामयिक पाकिस्तान पर अच्छी टिप्पणी है. कट्टरता और अतिवाद कभी मानवीय संवेदनाओं और साहस का स्थान नहीं ले सकते. पढ़कर अच्छा लगा.

  • 17. 11:36 IST, 11 अप्रैल 2012 bhupendra:

    आपने अच्छा काम किया.

  • 18. 13:53 IST, 11 अप्रैल 2012 shyam pandey:

    पाकिस्तान ने जो बोया अब वही काट रहा है या अमरीका उन्हें मजबूर कर रहा है. दुख की बात है.

  • 19. 23:11 IST, 11 अप्रैल 2012 rajkumar:

    बेशकीमती लेख. बिल्कुल सही लिखा है पाकिस्तान के हालात के बारे में आपने. इसके लिए इस्लाम जिम्मेदार नहीं है लेकिन फिरकापरस्त लोग जरूर हैं.

  • 20. 15:45 IST, 13 अप्रैल 2012 मनोज ननकानी:

    हफ़ीज़ साहब अगर कुरान शरीफ़ की दो आयतों पर गौर फ़रमाया जाए - रब्बुल आलमीन, रहमतुल आलमीन - वो रब सब का है ये बात हमारे समझ में आ जाए तो पाकिस्तान ही नहीं इस दुनिया से चरमपंथ ख़त्म हो जाए.

  • 21. 19:04 IST, 16 अप्रैल 2012 रियाज़:

    बहुत बढ़िया लिखा है. सच्चाई का आईना देखने की हमारी हिम्मत नहीं है और जो कोई सच्चाई लिखता है उसको ही कोसना हमारे मज़हब का सिद्धांत बन गया.

  • 22. 23:26 IST, 18 अप्रैल 2012 मोहन पवार, नाशिक, महाराष्ट्र5v:

    हफीज़ भाई. पाकिस्तानमें जबतक जागीराना और आमिराना निजाम खत्म नहीं हो जाता तबतक यही हाल रहेगा. अवाम को मजहब के नशे में रखना इन्हीं जागीरदार और अमीर सियासतदानों की मजबूरी होगी. किस सियासतदान और आर्मी के जनरल ने अपने साहबजादों को विलायती कालेजों में भेजने के बजाय दहशतगर्दां में भर्ती करवाया है? ये बात अवामको समझनी चाहिए.

  • 23. 18:09 IST, 19 अप्रैल 2012 अभिषेक:

    ऐसी सच्ची टिप्पणी पढ़कर ये विचार उभरता है कि आख़िर पाकिस्तान का भविष्य क्या होगा?

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