बल बहुमत का या सत्ता का
मैं न तो अन्ना हज़ारे का अंध समर्थक रहा हूँ और न ही लोकपाल के मामले में सरकार के फ़ैसलों को हज़म कर पाया हूँ.
बीबीसी का पत्रकार होने के नाते ये गुण या हर चीज़ को शक़ की निगाह से देखने का दुर्गुण जैसे ख़ून में शामिल हो चुका है.
ऐसे में लोकपाल विधेयक को लेकर संसद में जारी कार्रवाई के बीच ही आंदोलन करने की टीम अन्ना की ज़िद पर एक ओर जहाँ खीझ उठती रही तो वहीं इस विधेयक को टालने की हरसंभव सरकारी कोशिश ने मेरे अंदर के संसदीय लोकतंत्र के समर्थक को कुछ हद तक मौन करने पर मजबूर किया.
अब जबकि संसद का शीतकालीन सत्र समाप्त हो चुका है या किया जा चुका है मैं कुछ हद तक टीम अन्ना की ज़िद को उनके नज़रिए से समझ पा रहा हूँ.
गुरुवार को दिन भर बहस पर ऑफ़िस में नज़र रखने के बाद देर रात तक घर पर भी टीवी से चिपका मैं वही बहस देख रहा था. उस समय तक कुछ समाचार चैनल ये ख़बरें चलाने लगे थे कि राज्यसभा में हंगामा कराकर कार्यवाही अनिश्चितकाल तक स्थगित करने की साज़िश हो सकती है.
मैं उपहास के नज़रिए से उन ख़बरों को देख रहा था कि सरकार की ओर से इतना बचकाना क़दम तो कम से कम नहीं उठाया जाएगा. पूरा देश इस बहस पर नज़रें लगाए है और इसका ये अंत तो कम से कम नहीं हो सकता.
मगर रात लगभग साढ़े ग्यारह बजे से जो होना शुरू हुआ वहाँ से वंदे मातरम् तक सिवाय ग़ुस्से के मन में कुछ नहीं आया.
विपक्षी सांसद ये जानने की कोशिश करते रहे कि रात 12 बजे के बाद क्या होगा. माकपा नेता सीताराम येचुरी ने खुलकर ये सवाल किया मगर सभापति की ओर से कोई स्पष्ट जवाब नहीं था.
मैं अभी तक ये नहीं समझ पाया हूँ कि सदन के नेता ख़ुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह वहाँ बैठे थे और इस पूरे दौरान उनके चेहरे के भाव बिल्कुल भी नहीं बदले.
क्या उन्होंने इस बात की ज़िम्मेदारी बिल्कुल भी नहीं समझी कि इस विधेयक पर सरकार के मुखिया होने के नाते उस मौक़े पर उन्हें कुछ कहना चाहिए, हस्तक्षेप करना चाहिए.
विपक्ष रात भर बैठने की चुनौती देता रहा और सरकार ने दंभ भरे स्वर में कहा कि सत्र को लेकर फ़ैसला सरकार का 'विशेषाधिकार' है.
विधेयक को लेकर आए 187 संशोधनों में सरकार को साज़िश दिख रही है मगर क्या उसका दूसरा मतलब ये नहीं था कि विधेयक में ऐसी कमियाँ हैं जिसे ठीक करने के लिए इतने संशोधन प्रस्ताव लाए गए हैं.
अंत के हंगामे के दौरान सरकार की ओर ये कहा जाना कि अगर आप लोकसभा वाला प्रस्ताव जस का तस पारित करना चाहते हैं तो हम अभी मतदान के लिए तैयार हैं- आश्चर्यचकित करता है.
राज्य सभा में अल्पमत वाली सरकार ने बहुमत के नज़रिए को क्या सिर्फ़ अपनी सत्ता और विशेषाधिकार के अहंकार में दरकिनार कर दिया.
सुबह मैंने उस सांसद के दल के एक नेता को टीवी पर सुना जिसने मंत्री महोदय के पास से काग़ज़ लेकर फाड़कर सदन में उछाल दिए थे. बचाव ये था कि आदमी भावावेश में ऐसे कुछ क़दम उठा बैठता है.
मुझे सहज याद आया कि ये सभी वही सांसद हैं जिन्होंने अन्ना हज़ारे के मंच से सांसदों पर हुई कुछ अशिष्ट टिप्पणी पर विशेषाधिकार हनन के नोटिस जारी करवाए थे. ऐसा नहीं है कि मैं उन टिप्पणियों का समर्थन कर रहा हूँ मगर स्पष्ट है कि वो टिप्पणी करने वाले लोग भावावेश में कुछ भी बोलने के हक़दार नहीं हैं.
कुछ और सृजनात्मक काम के लिए मैं जीवन के किसी मोड़ पर राजनीति में जाने की इच्छा रखने वाला वो व्यक्ति हूँ जो इन सब घटनाओं के बाद ये नहीं समझ पा रहा हूँ कि लोकतंत्र में बहुमत का बल होता है या सिर्फ़ सत्ता का.






